28 December 2004

लालू प्रसाद यादव...


Akshargram Anugunj



फिल्म ताल के एक दृश्य में, मीता वशिष्ठ जो आलोक नाथ की बहन बनी है कहती हैं "भाई साहब, विक्की भले ही शातिर दिमाग हो पर दिल से बिल्कुल देहाती है|" दरअसल आलोक नाथ को विक्की में ईक्कसवीं सदी के शातिर भारतीय युवक के सारे लक्षण मौजूद होने के कारण उन्हें विक्की अपनी बेटी से शादी के लिए पसंद नहीं है, पर मीता वशिष्ठ के अकाट्य तर्क से वह हथियार डाल देते हैं| यही इस आलेख का सूत्रवाक्य है| हम भारतीय चाहे दिल से कितने भी आधुनिक क्यों न हों, सादगीपूर्ण व्यक्तित्व ही पसंद करते हैं| जब कस्बे और गाँवों में रहने वाला समाज अपने नेतृत्व को हाथ में सेलफोन , बगल में लैपटाप दबाये फीलगुड, पोटा ईत्यादि चीखते हुए देखता है तो उसे अपने से कटा हुआ महसूस करता है| उसकी समस्याऐं पचास साल में भी बदली नहीं है वही रोटी, वही पानी वही सड़क और वही समाज के उच्च वर्ग द्वारा शोषण| लालू प्रसाद रोटी सड़क दें या न दें, शोषण के खिलाफ मजलूमों को आवाज जरूर दे देंते हैं और यही उनकी सफलता के कारणों में एक है| सामान्य जनता का मन अभी भी अपने नेता में राजा हरीशचंद्र की छवि ढूढता है जो वेष बदल कर राज्य का पुरसाहाल लेता था|




यही ईमेज चलती है जनता के बीच!

जाहिर है एक ओर अगर रेलों में ईंटरनेट जैसी विशुद्ध अमेरिकी सुविधाऐं देने की बात करने वाले नेता हो दूसरी ओर रेलवे स्टेशन पर छापे मारने के सस्ते परंतु लोकप्रिय लालूवादी तरीके, तो भले ही दोनों जनता का धन लूटने के मामलें में एक ही थैली के चट्टे बट्टे हों, जनता जुड़ाव तो राजा हरीशचंद्र से ही करेगी बिल गेट्स से नही| चाहे लालू हों या मायावती दोनो समाज के शोषित वर्ग को समाज के उच्च वर्ग के खिलाफ खड़ा होने का हौसला देते हैं और इसीलिए उनके सर्वेसर्वा बने बैठे हैं| उदाहरण साफ है, जब मोहल्ले के पंडित और ठाकुर त्रिशूल यात्रा निकालते हैं तो कभी दलित वर्ग उनके साथ खड़ा होता है, नहीं| क्योकि उन्हे समझा दिया गया है कि रामजन्मभूमि के मलबे में कोई ऊँची जातवाला दबके नहीं मरा, वह सब तो बस नीचे खड़े नारे लगाते रहे| इसीलिए यह वर्ग महारैला में सवर्णों को लाठी चमका कर ही खुश हो लेता है, फिर चाहे पाँच साल भ्रष्टाचार में पिसता रहे| लालूश्री देहाती ही बने रहना चाहते हैं और वैसे ही दिखना चाहते हैं जैसा कि उनका वोटरवर्ग है| अगर उन्होनें हेयरस्टाईल या बोलने का लहजा बदला तो जनता कोई और लालू ढूढ लेगी| अभिजात्य वर्ग, जो राल्फ लारेन पहनना और वर्सेज लगाना सीख चुका है, अब देहाती भारतीयों को लाफिंग मैटर समझता है, इसीलिए उसे लालू भी विदूषक लगते हैं| अब जरा विषय को हल्के अँदाज की ओर मोड़ते हुए एक सच्ची परंतु मनोरंजक घटना का जिक्र करता हूँ| कुछ साल पहले जब शरद यादव केंद्रीय मंत्री थे ‌और लालू विपक्ष में, तब लालू जी ने "यह आईटी वाईटी क्या होता है?" कह कर एक नयी बहस को जन्म दे दिया| दिल्ली के प्रगतिमैदान में आईटी मेला लगा था और एक दिन लालू अपने चेले चपाटों के साथ मेले में पहुँच गये | आयोजकों को किसी हंगामें का डर सताने लगा| पर लालू चहलकदमी करते हुए वेबदुनिया के स्टाल पहुँच गये| हिंदी में चलती वेबदुनिया की साईट से उन्हे कौतूहूल हुआ| वेबदुनिया के संचालक जोश में आकर लालू जी के प्रश्नों का उत्तर देने लगे| किसी ने उन्हे बहुभाषी ईमेल सुविधा के बारे में बताया| लालूजी को यह जानकर निराशा हुई कि भोजपुरी वेबदुनिया की सूची में शामिल नहीं थी| पर उन्होनें एक ईमेल एकाउँट खोला और देवनागरी का प्रयोग करके पटना के किसी प्रशासनिक अधिकारी को भोजपुरी में ईमेल भेज मारी| पंडाल के बाहर संवाददाताओं के सवालो की बौछार का उन्होनें अपनी चिरपरिचित शैली में जवाब दिया "देखिए, हम आईटी का इसलिए विरोध करता हूँ क्योकि ई सब कंपूटर अंग्रेजी में चलता है| इससे गरीब गुरबा का क्या भला होगा? पर ई वेबदुनिया वाले अच्छा काम किये हैं, अभी हिंदी में कंपूटर चालू हैं, वादा किये हैं कि भोजपुरी भी लायेंगे कंपूटर पर| हम इस चीज से बहुत खुश हूँ|" खैर अगले दिन लालूजी की फोटो छपी पेपरों में ईमेल करते हुए और आईटी के पुरोधाओं ने चैन की साँस ली|




कंपूटर चालू हैं
पर उसी दिन माननीय केंद्रीय मंत्री शरद यादव प्रगतिमैदान पहुँचे| विभिन्न कंपनियों के स्टालो का अवलिकन करने के दौरान उन्हें कोई वेबदुनिया के स्टाल खींच ले गया यह कह कर कि कल लालू वहाँ गये थे और रंग जमा गये अपना| शरद यादव भी फोटो खिंचाते रहे | तभी किसी चमचे ने कहा "मंत्री जी, कल लालूजी ने ईमेल करी थी, आप भी करिए|" शरद जी ताव में कंप्यूटर कंप्यूटर के सामने बैठ गये और तामील किया वेबदुनिया के संचालक को कि "हमें भी ईमेल करनी है|" संचालक ने कहा "मंत्रीजी, पहले आप एकाउँट खोलिए|" यह सुनते ही शरद जी किंकर्तव्यविमूढ हो गये और उन्होने अपने सचिव को तलब किया| उन्होंने बड़े भोलेपन से सचिव से कहा , "भाई, यह कह रहे हैं कि ईमेल करने के लिए एकाउँट खोलना जरूरी है| पर मेरे पास इस वक्त कैश नहीं है, अब ईमेल कैसे करूँ?"

27 December 2004

एक आदर्श पार्किंग लाट की तलाश में!


parking

जो जमीन सरकारी है! वह जमीन हमारी है!


मान लीजिए कि आप छुट्टी वाले दिन परिवार के साथ खरीदारी करने शापिंग माल, या किसी मशहूर जगह, या यूँ ही कहीं घूमने फिरने जाते हैं| आप देखते हैं कि पार्किंग लाट ठसाठस भरा है| कार की पिछली सीट पर कारसीट में पिछले एक घंटे से बँधे बच्चों के सब्र का बाँध अब टूट चुका है और उन्होंने अपनी चिल्लपों से आपकी कार गुलजार कर रखी है| या फिर आपको कार पार्क करने की जल्दी लघुशंका,दीर्घशंका या फिर किसी और ही शंका (शायद आपने अपने कालेज के जमाने की किसी शोख नाजनीन को किसी कार से उतर कर जाते हुए देखा है) की वजह से है| आपके दो तीन पंक्तियों में व्यर्थ घूमने के बाद अचानक आपकी पत्नी आपको अगली पंक्ति के आखिरी लाट की ओर ईशारा करती है जो अभी तक खाली है| आप उस ओर जय बजरंगबली कहते हुए कार भगाते हैं कि अचानक दूसरी तरफ से एक कार आती है और वह खाली लाट को आपके मुँह से निवाले की तरह छीन लेती है| हैरान न होइये, आपका पाला अभी-अभी पार्किंग लाट के लुटेरे से पड़ा है| ऐसी घटनाऐं अक्सर होती हैं| इन घटनाओं ने मुझे पार्किंग स्थल पर एक छोटा सा शोध करने की प्रेरणा दी|
प्रस्तुत है पार्किंग स्थल पर एक छोटा सा शोध :
पार्किंग लाट में चार तरह के जीव पाये जाते हैं|
खोजी शिकारी: ऐसे कारचालक आदर्श पार्किंग लाट मिलने तक उसे नारायण की तरह ढूँड़ने में यकीन रखते हैं| आदर्श पार्किंग लाट को लेकर इनके अपने मापदंड होते हैं , जैसे कि जो पार्किंग लाट छाँव में हो, जिससे गंत्वय तक सबसे कम चलना पड़े , या फिर जिसके बगल में कोई भी खटारा गाड़ी पार्क न हो| ईच्छानुसार पार्किंग लाट मिलने तक यह व्याकुल आत्माऐं पार्किंग लाट की तीन चार पंक्तियों के चक्कर लगाती रहतीं हैं| ऐसा कारचालक पार्किंग लाट अपने आगे पीछे दिखने पर उससे दूरी बनाये रखने में ही भलाई है|
धैर्यशाली चिड़ीमार: ऐसे कारचालक पहली श्रेणी के कारचालकों से थोड़े ज्यादा मात्रा में आलसी होते हैं| पसंद तो इनकी भी होती है पर यह उसके लिए चक्कर लगाने कि जगह किसी कोने में बगुला भगत की तरह खड़े रहते हैं और मनचाहा लाट मिलने पर तुरंत झपट्टा मारते हैं| इस श्रेणी की एक उपश्रेणी पैदा हो गई है, देशी चिड़ीमार| ऐसे जंतु, व्यस्त भारतीय बाजारों (विदेशों में गिने चुने शहरों में जहाँ एक साथ कई भारतीय दुकाने हों) में पाये जाते हैं| चूँकि इनकी प्रतिस्पर्धा देशी लोगों से ही होती है अतः विशुद्ध देशी तरीका ईजाद किया है इन लोगों ने| बाजार पहुँचने पर यह लोग किसी कोनें में कार खड़ी कर अपने साथ आये माता,पिता,सास,ससुर या फिर बीबी को पार्किंग स्थल पर भेज देते हैं, जो कोई भी पार्किंग लाट खाली होते ही उसके बीच में अँगद के पाँव की तरह जम जाते हैं और अपनी कार को आने का ईशारा कर देते हैं| अब नजदीक खड़ा कारवाला बेचारा टापता रह जाता है और दूर खड़ा इस अँगद के पाँव का रिश्तेदार शान से चेहरे पर अमरीशपुरी स्टाईल वाली मुस्कान लिए कार पार्क करने आ जाता है|
जासूस: यह लोग ताक में रहते हैं दुकान से थैले लेकर बाहर निकलते ग्राहकों के| यह अपनी कार से उनका पीछा उनके वाहन के पार्किंग लाट तक करते हैं| इन्हें आप चोर या लुच्चा लफंगा न समझे| यह तो बस आपके पार्किंग लाट को खाली करने के ताक में रहते हैं , तब तक इनके पीछे वाहनों की कतार भी लग जाये , इनके कानों पर जूँ नहीं रेंगती| इनकी वजह से वह लोग भी परेशान होते हैं, जो अपनी कार में तसल्ली से सामान रखना चाहते हैं| अब यहाँ सिक्के के दो पहलुओं की तरह दो तरह के लोग हो सकते हैं| एक तो वह जिसे थैलो से लंदे फंदे , अपनी कार में पहुँचने पर न सिर्फ सामान सलीके से रखना है, बल्कि अपने झगड़े पर ऊतारू दोनों बच्चों को भी शांत करके बैठाना है| इस व्यक्ति की मुश्किलों का कहीं अंत नहीं, क्योकि कार के बाहर एक धैर्यहीन आत्मा उसके पार्किंग लाट से हटने के ईंतजार में रास्ता रोको आंदोलन किये है और धैर्यहीन आत्मा के पीछे की सारी कारें हार्न बजा बजा कर आसमान सिर पर उठायें हैं, जब्कि कार के अंदर बच्चे गदर काटे हैं कि उनका कोई प्रिय सामान जल्दबाजी में डिक्की (trunk) में रख दिया गया है और बच्चे घर पहुँचने तक सब्र करने को कतई तैयार नहीं | वहीं सिक्के का दूसरा पहलू भी हो सकता है| ऐसा मेरे साथ अक्सर देशी मार्केट में ही हुआ है , जब किसी मशहूर और बड़े ईंडियन स्टोर के बाहर मैं अपनी कार में बैठा किसी ग्राहक को पार्किंग लाट तक जाते देखता हूँ तो तसल्ली से कार उसके पीछे लगा देता हूँ कि वह भाईसाहब चैन से अपना सामान रखकर बाहर निकलें और मैं अपनी कार लगाऊँ| पर कई बार ऐसे भाईसाहब पूरी बेफिक्री से सामान रखते हैं फिर कार का दरवाजा बंद कर बगल के डोसे वाली दुकान ओर चल देते हैं | वह सीन बिल्कुल हिंदी फिल्म के सीन की तरह होता है, वह लापरवाह भाईसाहब जो आपको पहले ईशारा करने की जहमत उठा सकते थे , आपको किसी बेवकूफ की तरह ईंतजार करता रहने देते हैं और फिर कादर खान की तरह नजर फेर कर चल देते हैं क्योकि उनमें आपसे नजर मिलाने का साहस नहीं| आपकी स्थिति रस्सी से बँधे, गुस्से से फड़फड़ाते शोले के धर्मेंद्र की तरह है जो कुछ कर नहीं सकता, जब्कि उन बदतमीज भाईसाहब की श्यामवर्णा बीबी आपकी ओर कनखियों से अरूणा ईरानी की तरह व्यंग्य भरी कुटिल नजर फेंकना नहीं भूलती|
बेपरवाह: इस तरह के लोग हमेशा सबसे दूर वाले पार्किंग लाट में गाड़ी लगाना पसंद करते हैं| यह लोग पाँच तरह के हो सकते हैं

  • कुवाँरे

  • बिना बच्चों वाले युवा दंपत्ति

  • मस्तमौला

  • वजन घटाने पर अमादा व्यक्ति जिसे ज्यादा से ज्यादा पैदल चलने की सलाह दी गई हो

  • ऐसा खब्ती जिसे हमेशा किसी अनाड़ी ड्राईवर के द्वारा अपनी प्यारी कार ठोंक दिये जाने या फिर खरोंच लगने का फितूर सवार रहता है


यहाँ पार्किंग में होने वाले दो झमेलों का जिक्र करना प्रासंगिक रहेगा| बड़े शहरों में खासतौर पर न्यूयार्क में, गैराज में पार्क करना खासा महँगा पड़ता है जब्कि स्ट्रीट पार्किंग सस्ती होती है| पर स्ट्रीट पार्किंग में चवन्नी डालने का झंझट है| अक्सर आपके पास समुचित मात्रा में रेजगारी नहीं होती| ऐसी स्थिति में आपको आसपास की दुकान से खाँमखा में च्यूईंगम वगैरह खरीदना पड़ता है| दूसरा झमेला अमेरिका में बने कुछ मंदिरों का है| इनके व्यवस्थापक या तो पचास साल पहले भारत से आये होंगे या फिर यह लोग जरूर भारत सरकार के किसी योजना मंत्रालय में काम कर चुके होंगे| जिस तरह भारत में कोई भी सरकारी योजना बनाते हुए जनता की सुविधा सबसे बाद में देखी जाती है , उसी तरह यह व्यवस्थापक भी सस्ती जमीन और अपने घर से मंदिर की निकटता पहले देखते हैं , चाहे वहाँ फकत दस बीस पार्किग लाट बनाने की जगह ही मिल पाये| अक्सर ऐसी जगह कार दूर गली में कार लगानी पड़ती हैं| लौटने के बाद अक्सर कार पर खरोंच या कोई शीशा चटका मिलता है या हो सकता है अवैध स्थल पर पार्किग करने की वजह से आपकी कार ही क्रेन से उठा ली गयी हो| आप भले ही जुर्माना अदा करने के बाद नास्तिक बन दुबारा मंदिर न आनें की कसम खा लें, पर मंदिर के हमेशा जारी रहने वाले निर्माणकार्य के लिए चंदे वाले गुजारिशी पत्र आपके घर पर अनवरत पहुँचते रहेंगे|

व्यस्त स्थलों पर पार्किंग लाट के लिए मगजमारी को एक अमेरिकी महिला ने ईन सटीक शब्दों मे व्यक्त किया "व्यस्त स्थलों पर पार्किंग लाट मिलना बिल्कुल अच्छा जीवन साथी पुरूष तलाश करने के बराबर है| जितने भी ढंग के होंगे वह पहले ही किसी के हो चुके होंगे| बचे हुए तो ज्यादातर disabled ही मिलते हैं जो अपने किसी काम के नही| "

13 December 2004

देशी घर के विदेशी कुत्ते की पहचान का संकट




सपनो की रंगीली दुनिया!


भला सोचिए, एक अच्छा खासा सुव्यवस्थित भारतीय एनआरआई परिवार कुत्ता क्योंकर पालेगा? खैर हर बात की तरह इस बात का भी कोई गंभीर कारण होना ही चाहिए| घर के अधेड़ वय वाले गंजेपन की ओर बढते गृहस्वामी के लिए यह एनआरआईकरण की तरफ होती प्रगति में एक और तमगा साबित हो सकता है| वैसा ही काल्पनिक तमगा जो वह घर खरीदने के बाद,या गैराज में बेंज अथवा लेक्सस कार खड़ी करने के बाद या अपने बेसमेंट में ३५ ईंच का टीवी रखने के बाद हासिल करता है| घर में पल रही बार्बी डाल (कन्या) के लिए बाहर कुत्ता टहलाना पड़ोस के स्मार्ट लड़कों से जानपहचान बड़ाने का अच्छा माध्यम हो सकता है| साथ ही यह एक अप्रवासी परिवार में पलने से उपजी हीनभावना को दूर करने में भी सहायक है| उस लड़की के छोटे भाई के लिए तो कुत्ता एक अमेरिकन ड्रीम है बिल्कुल x-box, playstaion और ford mustang हासिल करने के स्वप्न की तरह| अलबत्ता गृहस्वामिनी के लिए यह एक अनचाहा सरदर्द जरूर हो सकता है पर कूपमंडूक बनने के लाँछन से बचने के लिए वह कुकुर महाराज को घर का सदस्य बनने से नही रोकती| पर एक देशी घर में पलने वाले विदेशी कुत्ते (क्षमा कीजिए, हलाँकि यहाँ अमेरिकी परिप्रेक्ष्य में परिवार विदेशी है और कुत्ता देशी) की मनोदशा पर कभी किसी ने गौर किया है| फर्ज कीजिए कि इस कुत्ते का नाम बार्नी है और पड़ोस के गोरे परिवार में रहने वाले कुत्ते का नाम डेव है| आखिर जिस घर में बार्नी को ताउम्र रहना है उस घर को लेकर उसके भी कुछ अरमान होते हैं| एयरकंडीशनर कि ठंडी हवा में अलसाते बार्नी के मनमस्तिष्क में क्या कुछ घुमड़ता रहता है| हो सकता है उसे बहुत कुछ अखरता हो| हो सकता है कि शाकाहारी भोजन खाने पर मजबूर वह बेचारा बार्नी डेव को मिलने वाले पौष्टिक माँसाहार से रश्क करता हो| किचन में या पूजाघर में घुसने पर पड़ने वाली गृहस्वामिनी की फटकार उसके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाती होगी| हर शनिवार को डेव को उसकी छप्पन छुरी गोरी मालकिन के साथ फ्रिस्बी खेलते को देख कर बार्नी को अपनी मालकिन के साथ खेलने की हूक उठती होगी| पर बार्नी वह दिन भूल नहीं सकता जब वह अरमान भरे दिल से अपनी सोनी टीवी पर सास बहू का झोंटानुच्चवल वाला सीरीयल देख रही मालकिन के पास जाकर लड़ियाता था, उनके ध्यान न देने पर भौंका भी था पर बदले में बजाये फ्रिस्बी खेलने के, बेचारे बार्नी को मालकिन की चप्पल खानी पड़ी| हर सप्ताहाँत पर डेव को उसका मालिक अपने पिकअप ट्रक में फ्रंट सीट पर बैठा कर हवाखोरी के लिए जाता है| होमडिपो के बाहर ट्रक में अपने मालिक का ईंतजार करते हुए डेव ने कई बार अपने मालिक के खुले हुए पेप्सी के गिलास से चुस्कियाँ ली हैं और उसके मालिक को रत्ती भर भी नहीं पता चला| पर बेचारे बार्नी को यह सब नसीब नहीं| बार्नी को सबसे ज्यादा कोफ्त उस दिन होती है जब घर में कोई पार्टी होती है| एक बार ऐसी ही एक पार्टी में बार्नी एक काली सलवार पहने भीमकाय महिला को नया सोफा समझ कर उस पर कूद गया था| फिर जो बवाल हुआ तो पूछिए मत| वह दिन है और आजका दिन है, बार्नी को हर पार्टी वाले दिन बेसमेंट में नजरबंद कर दिया जाता है| पार्टी के बाद बचने वाले खाने को मजबूर किया जाना भी बार्नी को हरगिज पसंद नहीं| आखिर देशी मालिक अपनी फिक्र करें न करें बार्नी को अपनी फिगर का ख्याल रखना पड़ेगा वरना वह गारफील्ड की तरह बैडौल हो जायेगा| हलाँकि जैसा हम सोच रहे हैं, हो सकता है बार्नी ठीक उसका उल्टा सोच रहा हो| सुना है कि कुत्तों को पिछले जन्म की याद होती है| संभव है कि जब वह आरामदेह सोफे पर ठंडी हवा में पड़ा कुनमुना रहा हो तो उसके सपनों में पिछले जन्म की यादें तैर रहीं हो| तब उसका नाम शेरू था और वह मुजफ्फरनगर के शामली कस्बे में रहता था|इस जन्म में वह सिर्फ Sitaram Yechuri की तरह भौंकता है|शामली में शेरू भौंकनें के अलावा काटना भी जानता था| वह गलियों का राजा था और रात बेरात को किसी चोर उच्चके की हिम्मत नहीं होती थी कि उसकी गली में घुस जाये| भिखारियों, रद्दी बेचने वालों या राह भटके मुसाफिरों को दौड़ा कर उनके घर छोड़ना या किसी नाली में गिरा देना उसे अलौकिक आनँद की अनुभूति कराता था| इस नेक काम में उसके यार दोस्त मोती, कालू, पीलू , लालू , कजरा , झबरा ईत्यादि नाम के कुत्ते भरपूर साथ देते थे| अमेरिका की तरह वहाँ कोई बंदिश नहीं थी| यहाँ सिर्फ नाम की आजादी हासिल है| अदृश्य लक्ष्मण रेखाओं से घिरी है बार्नी की दुनियाँ| पिछले जन्म में शामली वाले शेरू को पूरी आजादी थी|जब चाहो भौंको , जिसको चाहो काटो, जहाँ चाहो घूमों| गली गली में शेरू का नाम था| उसके शायर दोस्त झबरा ने उसकी शान में एक बार क्या कसीदा पड़ा था|
शान हो तो ऐसी जैसी है शेरू भाई की शान!
जिस गली से भी निकल के जाते हैं,
पिल्ले चिल्लाते हैं अब्बा जान, अब्बा जान!!
यहाँ कि तरह वहाँ किसी से मिलने, अपाईंटमेंट लेकर नहीं जाना पड़ता था| किसी भी नयी कार या स्कूटर को दाँयी तरफ की पिछली टाँग उठा कर पवित्र करने का उसे जन्मसिद्ध अधिकार हासिल था|वहाँ कल्लू हलवाई का बचा खाना भी क्या लजीज और मसालेदार होता था, उस खाने को धर्मपाल दूधवाले की मरखनी गाय से बाँटना उसे बिल्कुल पसंद नहीं था| उस खबीस गाय को खदेड़ कर भगाने के बाद, वह खुद को सामने दीवार पर लगे पोस्टर में बंदूक लहराते मिथुन चक्रवर्ती से कम नहीं समझता था|सबसे ज्यादा तो उसे इस जन्म का कभी खत्म न होने वाला सन्नाटा सालता है| जब वह पिछले जन्म का शेरू था तो गली में बजने वाले लाउडस्पीकर पर आई एम ए डिस्को डाँसर सुनते ही उसका दिल बल्लियों उछलता था| अमेरिकी गाने तो खैर उसे कभी सुहाए नहीं, अब भारतीय फिल्म के गानों में भी वह बात नहीं रही| अमेरिका की तरह उसे वहाँ हर छमाही पर डाक्टर के यहाँ फालतू के चेकअप के लिए नहीं जाना पड़ता था|शामली में मुफलिसी थी पर जिंदादिली में कहीं से कमीं न थी| एक वह जिंदगी थी जो चलती रहती थी, जिसमें धक्के थे पर धड़कन भी थी| खींचतान थी पर रिश्तों,यार दोस्तों की खूशबू भी थी| दोस्त थे, यार थे जिनके बीच बोलने से पहले सोचना नहीं पड़ता था कि आखिर क्या बात की जाये|
अरे यह मैं क्या सोच रहा हूँ| हद है, सोंचते सोंचते स्थिति बड़ी शोचनीय हो गई है| सामने सोफे पर पड़े अलसाते कुत्ते के ख्यालों मे मैं भला क्यों अतिक्रमण कर रहा हूँ| सोंच रहा था कि सामने पड़ा बार्नी क्या सोच सकता है और सोंचते सोंचते मैंनें अपनी सोंच का घालमेल खामखाँ बार्नी की सोच से कर डाला|चाहे अमेरिका हो या भारत दोनों लोकताँत्रिक राष्ट्र हैं और मुझे कोई हक नहीं बार्नी पर अपनी सोंच लादने का| लगता है कि यह फलसफा दूर का ढोल बनता जा रहा है जो हमेशा दूर से ही सुहावना दिखता है| भारत में रह कर अमेरिका अच्छा लगता था या दूसरे शब्दों में सपना था या तो अमेरिका जाना या भारत में ही अपना एक अमेरिका बनाना| अब यहाँ आने के बाद जेब में भारतीय पासपोर्ट और मन में विलायती सपने! दोनों के मेल से एक नए देश, नई ज़मीन, नए माहौल में बसने की प्रक्रिया अपने आप में लंबी और जटिल है| किसी ने सच कहा है जब हम भारत की सरहद को छोड़ते हैं तो हमारा प्यारा भारत एक डिजिटल फोटो की तरह हमारे जेहन में चस्पां हो जाता है| फिर चाहे बालीवुड माधुरी दीक्षित से अंतरामाली तक पहुँच जायें, हमारे कानों में वहीं गीत(काँटा लगा कतई नहीं) गूँजते हैं, वही दृश्य घुमड़ते हैं जैसे हमने वतन छोड़ते वक्त देखे थे| हम वापस जाना चाहते हैं उसी भारत में जैसा छोड़ कर आये थे, और साथ ले जाना चाहते हैं वह सब जो अर्जित किया है| पर क्या कानपुर में I-285 जैसे हाईवे संभव हैं? खैर यह बहस तो दशकों से चल रही है और तब तक चलेगी जब तक अमरीकी जनता न्यूयार्क की 64th Street पर H1B के लिए लाईन लगाना शुरू न कर दे| फिलहाल मैं बार्नी के दिमाग से बाहर आता हूँ वरना लोग कहेंगेः

तेरे ईश्क, तेरी याद ने मुझे ईंसान से कुत्ता बना दिया|
यकीन न आये तो भौंक कर दिखाऊ, भौं भौं?

07 December 2004

चोला बदल कर पहचान छुपाने का अचूक मंत्र



शेर के लिए लोमड़ी की खाल पेश है!


११ सितंबर २००१ के बाद दुनिया काफी बदल गयी है अमेरिकी नागरिकों के लिए| अमरीकी सरकार की सारी कारगुजारियों का दंश झेलना पड़ता है अमेरिकी नागरिकों को, खासतौर से पयर्टकों को| एक तो खड़ूसपने की हद तक किए गये सुरक्षा ईंतजाम उसपर से ईराक में हुई कारगुजारियाँ| यूरोप में अक्सर अमेरिकी प्रतीक चिन्हों वाले कपड़े धारण किये यह पयर्टक किसी न किसी अनचाही राजनीतिक बहस में घसीट लिए जाते हैं| उनपर फिकरेबाजी होना, होटल या बार में प्रवेश न मिलना भी आम बात हो गई है| लेकिन अब अमेरिकी नागरिकों को अब यूरोप भ्रमण के दौरान जलालत झेलने से बचने का अचूक नुस्खा मिल गया है| भला हो एक कंपनी का जिसने go canadian पैकेज ईजाद कर दिया है| अब अमेरिकी नागरिक कैनेडियन प्रतीक चिन्हों वाले कपड़े धारण कर शान से यूरोप विचरण कर सकते हैं| ईस पैकेज में टीशर्ट, टूरिस्ट बैग पर लगाने के लिए प्रतीक चिन्ह और कैनेडियन स्टाईल वाली ईंगलिश बोलना सिखाने How to Speak Canadian, Eh की किताब है| जय हो उपभोक्तावाद की| वैसे मौके का फायदा उठा के अमेरिकीयों को भारत भ्रमण के लिए भी खींचा जा सकता है| जब हमें विदेशी कांग्रेस अध्यक्ष स्वीकार्य है तो अमरीकी पयर्टकों की विदेशी मुद्रा तो शिरोधार्य होनी चाहिए| कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना पड़ेगा|
  • फील गुड का स्लोगन पयर्टन विभाग से उड़ाकर चुनाव प्रचार की सामग्री न बनायी जाये|

  • वैसे अमेरिकी हर किस्म का माँस खाते हैं पर छिपकली शायद ही पसंद करें|

  • लखनऊ के कठमुल्लों को कोई जाकर समझा दे कि परायी आग में यह लोग हमेशा अपना घर जलाने क्यों दौड़ पड़ते हैं?
  • 24 November 2004

    बाँके बिहारी का अनोखा कारनामा



    यही दृश्य बना बवाल की जड़!


    गत शनिवार को तीन चार परिवार पोलर एक्प्रेस फिल्म देखने पहुँचे| कुल ६ व्यस्क और ६ बच्चे| एक पूरी लाईन घेर कर सब बैठ गये और पिक्चर का आनँद लेने लगे| बाँके बिहारी यानि कि मेरे तीन साल ६ माह के पुत्ररत्न का यह सिनेमाहाल का पहला पहला अनुभव था| भाईजान अपनी बहन और बहन की सहेलियों के साथ बीच में बैठे एकटक पिक्चर देख रहे थे| बाँकेजी को कुल मिलाकर पिक्चर अच्छी लगी और मुझे संतोष था कि मुझे उसको गोद में बैठा कर कमेंट्री नहीं करनी पड़ रही | मुझे कानपुर के हीरपैलेस की याद है जहाँ एक दंपत्ति अपने नवजात शिशु के साथ पिक्चर देख रहे थे और बीच पिक्चर में बच्चा यकायक बुक्का फाड़ के रोने लगा| माँ ने बाप को कोंचा कि हफ्ते भर मैं बच्चा सम्भालती हूँ ईसलिए अभी तुम इसे बाहर ले जाकर चुप कराओ, बाप माधुरी दीक्षित का दिल धक धक करने लगा छोड़ कर नही जाना चाहता था| उधर बच्चे का क्रंदन बदस्तूर जारी था| उस दंपत्ति के अड़ियल रूख से आजिज आकर पीछे से कोई मनचला चिल्लाया "बच्चे के मुँह में निप्पल दे" | बाप तैश में पीछे मुड़कर "चीखा कौन है बे?" अँधेरे में आवाज आई "एक निप्पल इसके मुँह में भी दे"| खैर यहाँ अमेरिका में ऐसा कुछ न हो इसलिए हमने तीन साल से हाल में पिक्चर देखने की जहमत नही उठाई| पहला अनुभव अब तक सही जा रहा था कि अचानक बाँके बिहारी सिसकियाँ लेकर रोने लगे| मेरी मेमसाहब ने मुझे घुड़का इसे बाहर ले जाओ| बाहर लाने पर बाँके बिहारी फिर से अँदर हाल में जाने को लेकर पसड़ गये| मेरी आँखो में कानपुर का दृश्य तैर रहा था| मेरे लिए पहेली अबूझ थी कि आखिर छुटकऊ चाहते क्या हैं? बाहर रहना नही चाहते , अँदर जाते ही फूट फूट कर रोने लगते हैं| परेशानी की वजह अगर तेज आवाज वाले विराट दृश्य होते तो वह तो कबके निकल चुके| पर्दे पर जो दृश्य चल रहा था उसमें कुछ बच्चे उपहारों की भीमकाय थैली में जा गिरते हैं , जैसा कि चित्र में दिखाया है, फिर सेंटा क्लाज से मिलते हैं| मैनें चाहा कि बाँके बिहारी मेरी तरफ मुँह करके बैठै रहे , शायद सेंटा क्लाज से डर रहे हो| तभी मेरी मेमसाहब को माजरा समझ में आ गया और उन्होनें मुझे बताया कि जबसे स्क्रीन पर उपहारों के डिब्बे दिखने शुरू हुए हैं , बाँके बिहारी का मूड उखड़ गया है|बाँके बिहारी को सारी तकलीफ यही थी कि सेंटा क्लाज ने सारे बच्चों को तो गिफ्ट बाँट दिये पर बाँके बिहारी को क्यों छाँट दिया ? मैनें बाँके बिहारी से स्वर में यथासंभव नरमी लाते हुए पूछा "भईये, क्या गिफ्ट लेना है"? भईये की गर्दन तुरंत रजामँदी में नब्बे डिग्री के कोण पर हिली | बाकि कि पिक्चर उन्होनें पिक्चर से निकलते ही ट्वायसआरअस जाने के आश्वासन पर देखी | आगे क्या हुआ कहने की जरूरत नहीं क्योकि समझदार को ईशारा काफी है|

    17 November 2004

    क्या है भारतीय संस्कृति?


    Akshargram Anugunj



    ईस विषय पर सारे के सारे लिक्खाड़ एक से बड़ कर एक लेख लिखने में लगे हैं या लिख चुके होंगे| मैं ज्यादा गंभीर लिखने से बचकर कुछ शार्टकट लगाने की कोशिश करता हूँ| जो कुछ कहना है चित्रों को बोलने देता हूँ|




    यह भारतीय संस्कृति की छोटी सी झलक है|





    यह सब भारतीय संस्कृति पर लगे बदनुमा दाग हैं|



    16 November 2004

    स्वास्थ्य से जुड़ी कुछ भ्रांतियाँ और स्पष्टीकरण




    खाओ, पियो और ऐश करो प्यारे!

    आजकल हर शख्स स्वास्थ्य और अपनी काया के आकार को लेकर चिंतित है| कोई ट्रेडमिल पर अपना तेल निकाल रहा है तो किसी ने अच्छा खासा खानापीना छोड़ कर हरे पत्ते यानि कि सलाद पर मुँह मारना शुरू कर दिया है| जिम, व्यायामशाला और तरूणतालों के दिन बहुर आयें हैं| बाडी फैट, फैट बर्निंग, कोलेस्ट्राल, लोकैलोरी-डाईट, कार्डियोवस्कुलर एक्सरसाईज जैसे शब्द अब ड्राईंग रूम की बहस पर हावी हो गये हैं| बहुत से आरामतलब लोग इस आपाधापी में हैरान हैं कि आखिर वजन घटाओ अभियान कितना जरूरी है| अतः जनसामान्य के लाभ के लिए डा. झटका से इस विषय में किया गया एक ज्ञानवर्धक वार्तालाप प्रस्तुत है|
    प्रश्न १: डा. साहब, यह कहाँ तक सत्य है कि कार्डियोवस्कुलर एक्सरसाईज लंबे जीवन के लिए जरूरी हैं|
    डा. झटका: दिल को रोज कुछ देर के लिए तेज धड़काने से भला आप ज्यादा दिन कैसे जी जायेंगे? हर चीज देरसवेर घिसती ही है| यह तो वही बात हुई कि तेज चलाने से आपकी कार के ईंजन की लाईफ बढ जायेगी| ज्यादा दिन जिंदा रहना है तो दिल की धड़कनों को फालतू खर्च मत करिए और चैन की नींद सोईये|
    प्रश्न २: क्या माँसाहार खाना कम करके फल सब्जियाँ ज्यादा खाना फायदेमंद है?
    डा. झटका: एक तीर से दो शिकार करना सीखिए| गाय,भैंस बकरे क्या खाते हैं - हरा चारा, हरी पत्तियाँ जो कि आखिरकार सब्जियाँ ही हैं| मुर्गा अनाज के दाने खाता है|इसलिए गोश्त और चिकन खाने से दोहरा फायदा होगा, माँस तो आप खायेंगे ही, जानवरो की खायी सब्जियाँ,अनाज और वनस्पति भी आपको फायदा पहुँचायेगी|
    प्रश्न ३: क्या शराब कम पीना स्वास्थ्य के लिए अच्छा है?
    डा. झटका: बिल्कुल नही| वाईन फलों से बनती है| ब्रांडी तो वाईन का परिष्कृत स्वरूप है| बियर अनाज के दानों से बनती है| वास्तव में यह सारी चीजें फलों से फालतू पानी निकाल कर बनाया गया परिष्कृत दृव्य है| इन सबको छोड़ना फलों से मुँह मोड़ने के बराबर है|
    प्रश्न ४: नियमित व्यायाम के क्या फायदे हैं?
    डा. झटका: शरीर में नियमित दर्द के अलावा कुछ नहीं हासिल होता |
    प्रश्न ५: क्या उठक बैठक (sit-ups) लगाने से कमर की चर्बी कम हो जाती है?
    डा. झटका: कतई नही| माँस पेशियों का आकार व्यायाम से हमेशा बढता ही है, आपको ज्यादा बड़ा पेट विकसित करना है तो शौक से उठक बैठक (sit-ups) लगाईये|
    प्रश्न ६: तैराकी से क्या शरीर सुगठित हो जाता है?
    डा. झटका: अगर ऐसा है तो व्हेल मछलियों जो जिंदगी भर तैरती रहती हैं, उनके बेडौल शरीर के बारे में क्या ख्याल है आपका?
    प्रश्न ७: चाकलेट क्या स्वास्थ्य के लिए बुरी है?
    डा. झटका: अजी चाकलेट कोको-बीन्स से बनी है, इससे बेहतरीन खाद्य पदार्थ हो ही नही सकता|
    प्रश्न ८: क्या फास्ट फूड जो कि तेल में फ्राई होते हैं जैसे कि चिप्स,फ्रेंच फ्राई वगैरह स्वास्थ्य के लिए बुरे हैं?
    डा. झटका: आप ध्यान नही दे रहे| यह सब खाद्य पदार्थ वेजीटेबल आयल यानि कि सब्जियों से बने तेल में पकते हैं| ज्यादा सब्जियाँ खाना नुकसानदायक कैसे हो सकता है|

    उम्मीद है कि ईस साक्षात्कार ने आपके भोजन और आहार के विषय में बहुत से भ्रम दूर कर दिये होंगे| याद रखिए कि जिंदगी जिंदादिली का नाम है, मुर्दे भी क्या खाक जिया करते हैं|

    10 November 2004

    भारत यात्रा ‍२००४













    वर्ष २००४ का ग्रीष्मावकाश भारत में बीता| पूरे चार वर्ष बाद जाने का सुअवसर मिला| चार साल में गंगा में काफी पानी बह चुका है| अपने शहर कानपुर के अलावा लखनऊ और कुल्लू मनाली देखने का मौका मिला| कानपुर और लखनऊ दोनों की शक्लोसूरत कल्पना से ज्यादा बदल चुकी है|
    कानपुरः औद्योगिक परिवेश जिस तरह से रसातल में जा रहा है , हर मध्यमवर्गीय छोटा मोटा कामधंधा करके बेरोजगारी से जूझने को विवश है| आमदनी सीमित है पर डीवीडी , वाशिंगमशीन और नाना प्रकार की वस्तुऐं सबको चाहिए| मेरी एक चाचीजी के शब्दों में "सब निन्यानबे के फेर में पड़े हैं, कोल्हू के बैल की तरह"| छोटे छोटे रेस्टोरेंट भी पैकेजिंग पर ज्यादा जोर देने लगे हैं| सड़के छोटी होती जा रही हैं पर कारें बेहिसाब बड़ रही है| बच्चें तक पावर पफ गर्ल्स , जान कैरी और हारले डेविडसन से वाकिफ हैं| हलाँकि दैनिक बिजली कटौती से अँधेरे पड़े साईबर कैफे मुझे जतला रहे थे कि छह साल पहले उत्तर प्रदेश छोड़ कर मैने कोई गलती नहीं की|
    लखनऊः इस शहर को प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र और राजधानी होने का फायदा मिला है| जगह जगह मैकडोनाल्ड और पिजा की दुकानें उग आई हैं| फ्लाईओवर और नई सड़के बन जाने से यातायात सुगम हो गया है| उपनगर योजनाबद्ध तरीके से बस रहे हैं| पर सहारा सिटी जैसे चारदीवारी से घिरे क्षेत्र पूरे शहर की बीच अमीरों के लिए बने टापू जैसे लगते हैं| यह दीवारे आगे चलकर वर्गसंर्घष का कारण बनेंगे,इसके आसार तो अभी से दिखने लगे हैं| युवाओं के बीच बढ्ते अपराध,अपहरण उघोग पैसे को किसी भी तरह से हासिल करके सहारा सिटी में बसने का टिकट पाने की जद्दोजहद नहीं तो और क्या है? पुराना लखनऊ अब भी नवाबियत समेटे है| पर जीर्ण शीर्ण होते ऐतिहासिक स्मारक देख कर समझ नहीं आता कि पुरात्तव विभाग की तोंद कितनी बड़ी और कुंभकर्णी नींद कितनी गहरी है|
    कुल्लू-मनालीः आधुनिकता तो यहाँ भी पैर पसार रही है पर प्राकृतिक सुंदरता ने दिल चुरा लिया| सवेरे पहाड़ो से झाँकते बदल, सैकड़ो प्रचीन मंदिर, पीठ पर सेबों की टोकरी लादे पहाड़ी किसान और तेज आवाज के साथ बहती व्यास नदी , मेरे दिमाग पर अमिट छाप छोड़ चुके हैं| हमारी चारूजी ने यह प्राकृतिक सुंदरता देख कर जो कुछ फरमाया उसका सार यह है कि "काश अमेरिका की कार, अमेरिका वाला स्कूल (भारत में होमवर्क बहुत मिलता है), अमेरिका के सारे खिलौने , पीजा वगैरह और पापा की जाब (डालर भी जरूरी हैं) यदि कुल्लु-मनाली में एक साथ मिल जाये तो मजा आ जाये|"


    09 November 2004

    हाक माउन्टेन की विहंगम दृश्यावली













    पेंसिलवेनिया राज्य प्राकृतिक रूप से काफी सुंदर और समृद्ध है| मई २००४ में हाक माउन्टेन जिसकी उँचाई ४०० फुट है और एशलैन्ड कोयले की खदान के दर्शन करने का अवसर मिला| हाक माउन्टेन पर पक्षी विज्ञानी बाज और कई अन्य पक्षियों का अध्ययन करने आते हैं| आप भी देखिए इस मनोरम वादी को|


    03 November 2004

    दो सबसे बड़े लोकतंत्रों की चुनावी चकल्लस

    आखिरकार अमेरिका में चुनाव संपन्न हो गया|मुझे विश्व के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों (अमेरिका एवं भारत) में चुनाव के अदांज में कुछ अंतर दिखे| हम भारतीय ईनसे कुछ सीख ले सकते हैं| आप भी देखिए कुछ बुनियादी भिन्नताऐं हमारी चुनावी चकल्लस और अमरीकी इलेक्शन कैम्पेन में
    १: अमेरिका में मतदान के दिन भी कोई अवकाश नहीं| कई लोग तड़के ही लाईन में लग कर मतदान करने गये और काम पर समय से हाजिर| या फिर शाम को लाईन में लगे| रात आठ बजे के बात समय सीमा समाप्त होने के बाद भी लोग लाईन में थे| प्रशासन भी व्यवहारिक है, आठ बजे के पहले आने वाले हर व्यक्ति को मतदान करने दिया गया चाहें रात के बारह क्यों न बज जायें| भारत में छुट्टी भी होती है, चुनाव आयोग का डंडा न हो तो सब चुनावी पार्टीयों की सवारी गाँठ कर ही वोट डालने जायेंगे, तब भी मतदान पचास प्रतिशत से हमेशा नीचे और चुनावी बहसें और मुद्दों पर चिंताए ड्राईगरूम और पान की दुकान से आगे नहीं बड़ पाती|
    २: टीवी न्यूज में दिखाया कि दो महिलाऐं जो वर्षों से अच्छी मित्र हैं अलग अलग पार्टीयों को समर्थन दे रही हैं, और स्वस्थ बहस करते हुए साथ साथ काफी पी रही हैं| ऐसे दृश्य यहाँ अमेरिका में आम हैं| भारत में लोग चुनाव के बहाने व्यक्तिगत खुन्नस निकालने के फेर में ज्यादा रहते हैं| नतीजा हर बार पहले से ज्यादा चुनावी हिंसा|
    ३: अमेरिका में किस पार्टी ने कितना चुनावी चंदा ईकठ्ठा किया यह खुली किताब की तरह सबको पता होता है| बकायादा चुनावी चंदा ईकठ्ठा करने के लिए अभियान, पार्टियाँ और उत्सव होते हैं| जहाँ तक मेरी जानकारी है भारत में चुनावी चंदा का एकत्रीकरण काला धन सफेद करने का सबसे अच्छा जरिया है|
    ४: अमेरिका में उम्मीदवारों के बीच राष्ट्रीय स्तर पर टीवी पर बहस लोकतंत्र के स्वस्थ होने का परिचायक है| मुद्दो पर गंभीरता से बहस होती है और दोनो उम्मीदवार अच्छे स्कूली बच्चों की तरह बहस के नियमों का पालन करते हैं| क्या हमें हनुमान जी को अंडे का केक खिलाने और ऐसे ही अगंभीर मुद्दों को उठाने वालों को तूल देना बंद नहीं कर देना चाहिए?
    बाकि अमरीकी इलेक्शन की कहानी चित्रो की जबानी|










    02 November 2004

    लिटमस टेस्ट भाग-दो



    खबरदार, जो मुझे देशी कहा!

    लिटमस टेस्ट भाग-एक नयी उम्र के एनआरआई तबके पर फिट बैठता है| अब चूंकि मेरी उम्र के या मुझसे उम्रदराज एनआरआई लोग सींग कटाकर बछड़ों में शामिल होने से रहे, तो उनके लिए पेश है लिटमस टेस्ट भाग-दो| यह लिटमस टेस्ट भाग-एक की सफलता से भी प्रभावित है|

    हर प्रश्न से एक विकल्प चुनिए और देखिए आप कितने परफेक्ट एनआरआई बन चुके हैं|
    प्रश्न १ : अपने उन्नत मध्यप्रदेश (यानि कि आपकी तोंद) को कम करने के लिए आप क्या करते हैं ?
    क) आपने जिम, हेल्थ क्लब या फिर क्रैश डाईटिंग प्रोग्राम ज्वाईन कर रखा है |
    ख) किसी स्टोर या गैराज सेल से ट्रेडमिल लाकर रखी है, जो दोचार महीने बाद जोश ठंडा होने की वजह से तौलिए सुखाने के काम आ रही है|
    ग) ईन सब चीजों को आप समय व पैसे की बर्बादी मानते हैं और ऐसे फालतू चोंचलों से दूर ही रहना पसंद करते हैं|

    प्रश्न २ : आप ग्रैंड कैनियन या वैसा कोई अन्य मशहूर पर्यटन स्थल किस तरीके से देखना पसंद करेंगे?
    क) बकायदा AAA से यात्रा संबधी सहायक पुस्तकें, नक्शे लेंगे| ईंटरनेट पर छानबीन करेंगे| पहले से होटल, टूर वगैरह बुक करके यात्रा का कायदे से आनंद लेंगे| ग्रान्ड कैन्यन ही नहीं आसपास के अन्य आकर्षण भी देख डालेंगे|
    ख) चिन्नास्वामी या श्रीमान चौरसिया को फोन करेंगे जो १९८४ में वहाँ जा चुके हैं| उनसे दो घंटे माथापच्ची करके पूरी जानकारी लेंगे| अंत में किसी दोस्त या पड़ोसी को साथ चलने के लिए पटाने के कोशिश करेंगे जिससे खर्चे व परेशानी दोनों आधे बँट जायें| सिवाय ग्रान्ड कैन्यन के और कहीं झाकेंगे भी नहीं क्योकि उनके बारे में चिन्नास्वामी या चौरसिया को भी कुछ नहीं पता|
    ग) अपने शिकागोवासी दोस्त के लासएंजेल्स निवासी दोस्त को फोन लगायेंगे| उसके यहाँ रात में ठहरेंगे| सवेरे सात घंटे ३०० माईल्स ड्राईव करके ग्रान्ड कैन्यन जायेंगे| एक घंटे ग्रान्ड कैन्यन देखकर फ्रैंच फ्राई खाते हुए अपने शिकागोवासी दोस्त के लासएंजेल्स निवासी दोस्त के यहाँ रात को दो बजे खिचड़ी खायेंगे और उससे नयी अमरीकन वीसा पालिसी पर माथापच्ची करेंगे|

    प्रश्न ३ : आपके हाटमेल या याहू ईमेल बाक्स पर अयप्पा स्वामी (या फिर संतोषी माता) का चमत्कार विषय की ईमेल आयी है| ईमेल में किसी तथाकथित चमत्कार का वर्णन है, साथ ही लिखा है कि अगर आपने उसे पचीस लोगो को फारवर्ड न किया तो आपका बेड़ागर्क हो जायेगा| आप क्या करेंगे?
    क) आप ईमेल का जवाब लिखेंगे कि आपको ऐसी बेसिरपैर की कहानियों पर कोई यकीन नहीं| साथ ही यह जोड़ना नहीं भूलेंगे कि आईंदा कोई आपको ऐसी बेहूदा ईमेल भेज कर कामके वक्त परेशान न करें| ईमेल भेजने वाले को जलील करने के लिए आप रिप्लाई आल का बटन दबा देंगे| (एक यक्ष प्रश्न: कामके वक्त आप हाटमेल या याहू ईमेल देखते ही क्यो हैं? )
    ख) आप बिना पड़े सीधे ईमेल डिलीट कर देंगे|
    ग) आप दन्न से अपनी पूरी ईमेल ऐडरेस बुक (चाहे उसमें Clint Eastwood भी शामिल हो) को वह ईमेल फारवर्ड कर देंगे|

    प्रश्न ४ : आपकी, अपनी मित्रमंडली को फोनकाल पालिसी क्या है?
    क) सुबह दस बजेतक सोने के मुकाबले आप हरहफ्ते मित्रमंडली से गपशप को तुच्छ कोटि का कार्य समझते हैं|
    ख) जरूरत पड़ने पर ही साल दो साल में काल करते है| काल करते ही मित्रों को काल न करने के लिए कोसते हैं| उनके शिकायत करने पर अतिव्यस्तता का बहाना बनाकर अपनी जिम्मेदारी से साफ मुकर जाते हैं|
    ग) कोई करे न करे नियम से, हर शनिवार सुबह आठ बजे से दस बजे तक मित्रमंडली में सबका दिमाग चाटते हैं|

    प्रश्न ५ : आपकी सेलफोन (मोबाईल) पालिसी क्या है?
    क) जब खुद को जरूरत पड़े तभी आन करते हैं| हरेक ऐरे गैरे नत्थूखैरे को अपना मोबाईल नंबर भी शान के खिलाफ समझते हैं|
    ख) कालर आई देखकर सिर्फ काम की काल्स या काम के लोगों की काल्स रिसीव करते हैं| पर मुफ्त के वीकेंड मिनट गप्पबाजी में खर्च कर डालते हैं|
    ग) मोबाईल फोन गैर जरूरी समझ कर लिया ही नहीं, चाहे किसी जगह जाने पर मैपक्वेस्ट से छापा रास्ता भटक जानेपर दस पेट्रोलपंपो से रास्ता क्यों न पूछना पड़े|

    प्रश्न ६ : आपकी कमीज के कालर पर लेबल में क्या लिखा होता है?
    क) Calvin Klein, Claiborne , Hilfiger या Kenneth Cole |
    ख) Izod,Van Heusen या Bye One Get one free वाले ब्रांड्स|
    ग) खालसा टेलर्स या रहमान टेलर्स|

    प्रश्न ७ : आपके प्रिय विस्मयसूचक शब्द अब क्या हैं?
    क) Oh Okey, Jesus Christ!, Boy o Boy!, Oh Sh@#t!
    ख) अंग्रेजो के सामने: Oh Okey, Jesus Christ!, Boy o Boy!, Oh Sh@#t! हिंदुस्तानियों के सामने: हे भगवान!, अरे गजब ईत्यादि
    ग) हिंदुस्तानियों के सामने: हे भगवान!, अरे गजब ईत्यादि, अंग्रेजो के सामने: विस्मय करने से बचेंगे|

    प्रश्न ८ : आपको एक मित्र की फोनकाल आती है कि संप्रग सरकार राजग सरकार की स्वर्णिम चतुर्भज योजना पलटने वाली है| मित्र आपको एक घंटा चाटने के मूड में है| आपका कैसी प्रतिक्रिया जाहिर करेंगे?
    क) आप कंधे उचका कर कह देंगे कि संप्रग या राजग किस चिड़िया का नाम है यह भी आपको नहीं पता| दरअसल आप हिंदुस्तानी वेबसाईट या न्यूज चैनल नहीं देखते| पर आप गे-राईट्स या ऐसा कोई भी विषय जिस पर फोन करने वाले मित्र की जानकारी जीरो बटे सन्नाटा है, बात करने को सर्हष तैयार हैं| आपके ताजा जानकारी के हिसाब से अभी नरसिंहराव प्रधानमंत्री हैं |
    ख) आपको पिछले महीने से किसी हिंदुस्तानी वेबसाईट देखने का मौका नहीं मिला| वैसे भी हिंदुस्तान का कुछ नहीं हो सकता|
    ग) आपको तो यह भी पता है कि रामगोपाल वर्मा की आने वाली फिल्म की हिरोईन का क्या नाम है|

    परिणाम विश्लेषण
    १) अगर आपके सारे जवाब (क) हैं तो
    शत शत बधाई| आप अप्रवासी भारतीयों के पद्म विभूषण हैं| आपको एनआरआई श्रेणी में उच्च स्थान प्राप्त होने के कारण आपको कोई देशी कहने से पहले दस बार सोचेगा|
    २) अगर आपके कुछ जवाब (ख) मगर ज्यादातर जवाब (क) हैं तो
    आप काफी प्रगति कर चुके हैं| कुछेक साल डालरलैंड में रहने और दोचार सुपरबाऊल टूर्नामेंट देखने के बाद आप अप्रवासी भारतीय पद्म विभूषण पदक पर अपना दावा ठोंक सकते हैं|
    ३) अगर आपके कुछेक जवाब (ग) हैं तो
    आप प्रगतिपथ पर हैं, भारतीय मंदिर जाना छोड़ कर YMCA की मेम्बरशिप ले लीजिऐ, अच्छे एनआरआई बन जायेंगे|
    ४) अगर आपके सारे जवाब (ग) हैं तो
    आप यहाँ खामखाँ झक मार रहे हैं, आपकी कूपमंडूकता शिकागो में रहने से भी नहीं जायेगी चाहे आप इससे तो आप शिकोहाबाद में ही भले थे|

    19 October 2004

    मुझे भी कुछ कहना है|

     



    क्यों खफा हैं, जनाब?

    अगर यही बात आपकी प्यारी बिल्ली या आपके पालतू कुत्ते ने कही हो तो? अरे भाई वे भी अपनी पसंद नापसंद जाहिर करना चाहते हैं| यकीन नही आता तो जरा दिमाग पर जोर डाल कर देखिए कि आपका प्यारा कुत्ता अब क्यो बाहर जाते ही हर दूसरे जानवर पर टूट पड़ता है? यकायक आपकी बिल्ली क्यों घर की चीजे उलट पुलट करने लगी है या फिर आपका तोता अब मेहमानों से रामराम या हैलो कहने की जगह चीखता क्यो है? अमेरिका में पशुमनोविज्ञानियों का काम ऐसी ही गुत्थियों को सुलझाना है| चौंकिए मत, यह कोई पैसे ऐंठने का नया तरीका नही है| पशुमनोचिकित्सकों की बकायदा web sites हैं| वे पहले आपसे आपके पालतू पशु की तस्वीर,जन्मकुडंली यानि कि वह आपके घर कब आया और उसके खानपान,व्यवहार,उसके बाकी संगीसाथियों का ब्यौरा और संक्षेप में समस्या का वर्णन मँगाते हैं| फिर वे टेलीपैथी का ईस्तेमाल करते हैं और बकायदा आपके पालतू पशु के साथ दोचार मीटिंग में उन्ही की भाषा में बातचीत करते हैं| नतीजे कई बार आपको दंग भी कर सकते हैं, जैसे कि आपके कुत्ते या बिल्ली को कोई खास किस्म का खाना या शैंपू नापसंद हो सकता है| या हो सकता है कि उन्हें आपका नये म्यूजिक सिस्टम की तेज आवाज नागवार गुजरती हो| कई बार तो जानवरों को आपके रहने की जगह भी नापसंद होती है| जानवर बेजुबान जरूर होते है पर अपनी भावनाऐं अपनी हरकतों से व्यक्त कर सकते हैं|अगर आपको यकीन न हो तो गूगल पर "Pet Psychic" की सर्च करके देखिए, दर्जनों web sites खुल जायेंगी| मुझे अपने चचेरे भाई सचिन का कुत्ता रेक्सी याद आता है| रेक्सी गुरू गर्मी की नींद का मजा ले रहे थे और सचिन भाई हर दस पद्रंह मिनट में रेक्सी के पास से जब भी गुजरते तो आवाज देते "रेक्सी, सो रहे हो?" बेचारे रेक्सी की नींद में खलल पड़ रहा था| जब सचिन की यह हरकत रेक्सी की बर्दाश्त से बाहर हो गई तो उसने खौखिया कर सचिन को दौड़ा लिया और कमरे में दुबकने पर मजबूर कर दिया| जब भी सचिन बाहर निकलने की कोशिश करते, रेक्सी यमदूत की तरह रौद्ररूप धारण कर उन्हे अंदर जाने पर मजबूर कर देता| पूरे दो घंटे नजरबंद रहने के बाद सचिन भैया ने चाचाजी से मदद की गुहार लगायी| चाचाजी जब चमड़े की बेल्ट लेकर आये तभी रेक्सी मियाँ का पारा कम हुआ|

    14 October 2004

    आदर्श अनिवासी भारतीय (एनआरआई) होने का लिटमस टेस्ट : भाग-एक

    हर प्रश्न से एक विकल्प चुनिए और देखिए आप कितने परफेक्ट एनआरआई बन चुके हैं|




    Are you a perfect NRI?

    प्रश्न १ : आपका प्रिय दोस्त भारत से अपनी नवविवाहित पत्नी के साथ वापस आया है और उसने आपको मित्रदल सहित रात्रिभोज पर बुलाया है| आपको अच्छी तरह पता है कि भोजन के साथ आपको उसका शादी का तीन घंटे का वीडियो कैसेट भी झेलना पड़ेगा| सुस्वादु भोजन के लालच एवं महाबोर कैसेट की पीड़ा के अतंर्द्वद के बीच फंसे आप क्या करेंगे?
    क) मित्र के घर जायेंगे और मौका पाकर शादी का कैसेट वीसीआर से निकाल कर चुपके से खिड़की के बाहर उछाल देंगे|
    ख) डिनर के बाद लेकिन कैसेट चलने से पहले असह्य पेट दर्द का बहाना बनाकर फूट लेंगे|
    ग) पूरी तनमयता से वीडियो कैसेट देखेंगे, यहाँ तक कि शादी में आयी दोस्त की बीबी की चचेरी ननद की खाला की सास का नाम भी आपको याद रहेगा|

    प्रश्न २ : आप, डा. गुप्ता जो कि स्थानीय भारतीय समाज मंच के महासचिव हैं, उनके घर पर निमंत्रित हैं , और भोजन के बाद उनका भारतीय संस्कारो पर निरर्थक प्रलाप सुन रहे हैं| तभी उनका चार साल का बेटा प्लास्टिक के बेसबाल बैट से खेल खेल में आपको मारना शुरू कर देता है| नाकाबिले बर्दाश्त हो जाने पर आप क्या करेंगे?
    क) बच्चे से बेसबाल बैट छीनकर आप उसी बैट से बच्चे एवं डा. गुप्ता दोनो की धुनाई कर डालेंगे|
    ख) रसोई से मिसेज गुप्ता को बुलाकर उन्हें लेक्चर पिला देंगे कि उनका बेटा महाशैतान है और बच्चा पालने की अकल गुप्ता दंपत्ति को कतई नहीं है|
    ग) बच्चे की हरकत प्यार से झेलते रहेंगे और ऐसी हरकतो को पारिवारिक संस्कार समझ कर गुप्ता जी के यहाँ यदा कदा जाते रहेंगे|

    प्रश्न ३ : आपको अगले हफ्ते भारत जाना हैं और आप रिश्तेदारों के लिए क्या लेजाऊँ की दुविधा से ग्रस्त हैं| आप क्या करेंगे?
    क) डालरस्टोर से हर माल एक डालर वाली चीजें खरीदेंगे पर भारत जाकर लम्बी हाँकेंगे कि यह बड़े महँगे तोहफे हैं|
    ख) सब कुछ भारत जाकर किसी फुटपाथिया मार्केट जहाँ कस्टम में जब्त माल मिलता हो वहाँ से खरीदेंगे|
    ग) बाय वन गेट टू फ्री सेल का ईंतजार करेंगे|

    प्रश्न ४ : पहले कभी आपने अपने दोस्त को अपने शास्त्रीय स्गीत का प्रेमी होने की शेखी मारी थी| आज वह आपको अपनी कार में उस्ताद शाहरूख अली खान के कंसर्ट में ले आया है जो पाँच घंटे बाद भी गाना बंद करने का नाम नही ले रहे| वापस आपको दोस्त की ही गाड़ी में जाना है जो उस्ताद के गायन में ईतना खोया हुआ है कि उसे गुमान नहीं कि आपका धैर्य चुक चुका है| अब आप क्या करेंगे?
    क) मंच पर जाकर तबलची के एक झापड़ रसीद करेंगे और तबला फाड़ कर सुनिश्चित कर लेंगे कि गाना दुबारा न शुरू हो जाये|
    ख) अँधेरे का फायदा उठा कर उस्ताद पर आधा खाया केला उछाल देंगे|
    ग) ताली बजा बजा कर "वाह, कमाल कर दिया" की दाद उछालते रहेंगे और वापस जाते हुए हाल के बाहर लगे स्टाल से उस्ताद के दो साल पुराने कंसर्ट की सीडी ले जाना नहीं भूलेंगे|

    प्रश्न ५ : आप भारत समाज (या कोई भी ब्राह्मण समाज,तमिल समाज या गुजराती समाज) के सम्मिलन समारोह में दोस्तो से बैठे गप्प लड़ा रहे हैं| अचानक आपको अध्यक्ष महोदय वार्षिक चंदा एकत्र करते हुए अपनी तरफ आते दिखते हैं| आप क्या करेंगे?
    क) "आग,आग" चिल्लाते हुए भाग जायेंगे|
    ख) सफेद झूठ बोल देंगे कि आप संस्था के आजीवन सदस्य हैं|
    ग) अपनेआप को पाकिस्तानी बताकर पीछा छुड़ा लेंगे|

    प्रश्न ६ : आप जानते हैं हर दोस्त भारत दौरे से या तो शादी करके लौटता है या सगाई करके| पर आपके परिवार वालों के कान पर आपकी मिन्नतों से भी जूँ नहीं रेंगी| वापस लौटने पर मित्रमंडली में होने वाली फजीहत से कैसे बचेंगे?
    क) सबको सफेद झूठ कह देंगे कि आपकी नम्रता शिरोडकर से सगाई हो गई है और उसकी सारी अधूरी पिक्चरों की शूटिंग पूरी होने के बाद आप दोनो परिणय सूत्र में बँधने वाले हैं|
    ख) सबको सफेद झूठ कह देंगे कि सारे आने वाले रिश्तों में दहेज मिलने की शर्त थी, और आप जैसा आदर्शवादी उन्हें ठुकराकर आ गया|
    ग) सबको सफेद झूठ कह देंगे कि आपने ईस्कान की सदस्यता के साथ साथ आजन्म ब्रह्मचर्य का व्रत ले लिया है, ताकि आप निर्बाध रूप से समाज सेवा कर सकें|

    प्रश्न ७ : शब्द "मल्टी" का उच्चारण कैसे करेंगे?
    क) कार्यस्थल पर और अंग्रेजो के बीच "मल्टाई", देशियों के बीच "मल्टी"|
    ख) ठीक उल्टा, यानि कि देशियों खासतौर पर बिहारियों,यूपी वाले और मद्रासियों के सामने "मल्टाई" जब्कि अंग्रेजो के बीच "मल्टी"|
    ग) "मल्टी" और इसके जैसे अन्य विवादास्पद शब्दों जैसे एन्टी,रूट और सेमी के प्रयोग से यथासंभव बचेंगे|

    प्रश्न ८ : आखिरकार आप एक हिंदुस्तानी स्वपनसुंदरी को व्यक्तिगत रात्रिभोज पर महँगे भारतीय रेस्टोरेंट में लेजाने में कामयाब हो जाते हैं| आपके अनुरोध पर वह खासा महँगा डिनर और मैंगो लस्सी आर्डर करती है| आपके पर्स को और चूना लगाते हुए वह केसर कुल्फी भी मँगा लेती है और बातो के दरम्यान आपसे पीछा छुड़ाने के लिए वह आपने एक ब्वायफ्रेंड का जिक्र करती है जो भारत में है| उस वक्त आप क्या करेंगे?
    क) हँगामा करते हुए तमाशा खड़ा कर देंगे| उसे कह देंगे यह सरासर खुदगर्जी है| उसे कम से कम बिल चुकाने के लिए राजी करेंगे| उसके न मानने पर उसकी केसर कुल्फी झपट लेंगे|
    ख) एक अभिजात्य की तरह पेश आयेंगे, और बाथरूम जाने के बहाने बिना बिल चुकाये फूट लेंगे और फिर कभी उसके सामने नहीं पड़ेगे|
    ग) उसको चुनौती देंगे| उसे अपने ब्वायफ्रेंड की वास्तविकता साबित करने को मजबूर कर रक्षात्मक रूख अपनाने पर मजबूर करेंगे| अपने को विकल्प के रूप में पेश करेंगे|

    परिणाम विश्लेषण
    १) अगर आपके सारे जवाब (क) हैं तो
    शत शत बधाई| आप अप्रवासी भारतीयों के पद्म विभूषण हैं| आपको एनआरआई श्रेणी में उच्च स्थान प्राप्त होने के कारण कोई भी ऊलजलूल हरकत करके साफ बच निकलने की पूरी लाईसेंसी छूट हासिल है|
    २) अगर आपके कुछ जवाब (ख) मगर ज्यादातर जवाब (क) हैं तो
    आप काफी प्रगति कर चुके हैं| कुछेक साल डालरलैंड में रहने और दोचार सुपरबाऊल टूर्नामेंट देखने के बाद आप अप्रवासी भारतीय पद्म विभूषण पदक पर अपना दावा ठोंक सकते हैं|
    ३) अगर आपके कुछेक जवाब (ग) हैं तो
    आप प्रगतिपथ पर हैं, भारतीय वेबसाईट एवं मैसेजबोर्ड देखना बंद कर बेएरिया में मूव हो जाईये, अच्छे एनआरआई बन जायेंगे|
    ४) अगर आपके सारे जवाब (ग) हैं तो
    आप यहाँ खामखाँ झक मार रहे हैं, इससे तो आप भारत में ही भले थे|

    13 October 2004

    पर्यावरण समर्थक आतंकवादी!

    Schuylkill Expressway
    अखबार के मुखपृष्ठ पर खबर थी कि पृथ्वी मुक्ती संगठन की कारगुजारी से कल हमारे फिलाडेल्फिया में I-76 (Schuylkill Expressway) पर लंबा जाम लग गया| हजारो लोग फँस गये| एक बम की अफवाह थी| बम निरोधक दस्ता घंटो लगा रहा पर बम नकली निकला|भाई लोगों ने पर्यावरण विरोधी किसी सरकारी नीति के विरोध में नकली बम लगाकर हँगामा खड़ा कर दिया| इस संगठन का पर्यावरण की रक्षा के लिए सरकार को झिंझोड़ने का अंदाज निराला है| इनका एजेंडा तेल फूँकने वाली मँहगी गाड़ियों एवं पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली सरकारी नीतियों का विरोध है| भारत में कुंभकर्णी नींद सोने वाले शासन व पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाले उद्योगों, नदियों में कचरा फेंकने वाली टेनरियों को क्या ऐसे ही जगाना पड़ेगा? क्योकि सब चलता है वाली मानसिकता ने हमारे वन विलुप्त कर दिए हैं, नदियाँ प्रदूषित कर दी हैं, सड़कों पर कचरा है और साँसो में धुँए का जहर जा रहा है| पर धरना प्रर्दशन से अब तक हासिल क्या हुआ है?

    05 October 2004

    लखनऊ का नया चेहरा


    मायावती द्वारा बनवाया गया करोड़ो का अंबेदकर स्मारक| अब मुलायम सरकार द्वारा उपेक्षाकृत होकर धूल खा रहा है| काश अंबेदकर के साथ गाँधी , नेहरू ,भगत सिंह वगैरह को भी जगह दे दी होती तो यह दिन न देखना पड़ता|

    20 September 2004

    सबके फटे में टाँग अड़ाने की आदत पुरानी यानी हम हिंदुस्तानी







    अभी अभी भारत भ्रमण से लौटा हूँ| एक बात हालीया राजनीति से ताल्लुक रखती है जिसको बताने के लिए इंतजार नाकाबिले बर्दाश्त हो रहा है| क्या लखनऊ के मशहूर स्कूल श्रंखला संस्थापक श्री जगदीश गाँधी अमेरिकी नागरिक हैं, यदि हाँ तो बाकी जनता को जान केरी को जगदीश गाँधी के समर्थन से क्या लेना देना? यादि नहीं तो जगदीश गाँधी घरेलू मामले छोड़ कर दूसरे देश की अंदरूनी राजनीति में टाँग अड़ा कर क्या प्रर्दशित कर रहे हैं कि उनसे बड़ा कोई बुध्दिजीवी पूरे शहर में नही है|


    18 August 2004

    या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थितः

    नागपुर में एक बदनाम मवाली अक्कू यादव को दो सौ महिलायों के झुंड ने भरी अदालत से खींच कर यमलोक पहुँचा दिया| यह कृत्य कतई अराजक नहीं कहलाना चाहिए क्योंकि अक्कू यादव पर हत्या,बदचलनी और जबरन वसूली के दो दर्जन से अधिक मुकदमें होने के बावजूद वह छुट्टा साँड़ की तरह घूम रहा था| पिछली जनवरी में क्रुद्ध भीड़ द्वारा उसका घर जमींदोज कर दिये जाने के बाद उसने खुद को असुरक्षित जान कर आत्मसमर्पण कर दिया था| हमारी कानून व्यवस्था पर रोज लाखों करोड़ो भुक्तभोगी लानत भेजते है पर लगता है उस की गैंडा खाल पर ऐसी बर्छियों से ही असर होगा| जज साहब ने ईस घटना में बंदी पाँच महिलाओं को सामाजिक संस्थाओं के पुरजोर विरोध एवं दो सौ महिलाओं द्वारा आरोप सामूहिक रूप से अपने सिर पर लेने पर अड़ जाने के बाद ही जमानत दी| जज साहब को समझना होगा कानून जनता के लिए बना है , जनता कानून के लिए नही| लगता है नेताओं, पुलिस और शासकों की कारगुजारियों का घड़ा अब धीरे धीरे भर रहा है| करोड़ो लोगो का शांत गुस्सा जब लावा बन कर फूटेगा तो पापी नेताओं, पुलिस और शासकों की सरेआम जूतमपैजार होनी तय है|

    व्यवस्था ईस हद तक सड़ चुकी है कि घरेलू औरतें कानून अपने हाथ लेने को मजबूर हो गई| ईस देवीशक्ति रूप को शतः शतः नमनः|

    इस समाचार के साथ एक और पुलिसिया काहिली का मुद्दा उठाता हूँ| मेरे शहर कानपुर और उसके आसपास पिछले दोतीन साल से अपहरण उद्योग पनप रहा है| बीहड़ के डाकू अब मोबाईल से लैस होकर माडर्न बन गये है| शहर के धनाड्यों को छुटभैये अपराधी अगवा करके बीहड़ में ले जाकर डाकूओं को बेच देते हैं| डाकू बिचौलिओं की मदद से फिरौती वसूल कर अपहृत को पुलिस के हवाले कर देते हैं| पुलिस अगले दिन अखबारों में मूँछो पर ताव देती हुई फर्जी मुठभेड़ के किस्सों के बीच (जिसमें कभी कोई डाकू न मरता है न पकड़ा जाता है) मुक्त अपहृत के साथ फोटोसेशन करवाती है| कई बार किसी राजनेता , वीआईपी या पुलिसिया रिश्तेदार के चंगुल में फंस जाने पर ही पुलिस बड़ी वीरता के साथ डाकुओं के ही किसी रिश्तेदार को पकड़ कर मोलभाव करती है| आमजनता के लिए पुलिस की सलाह है कि जेब ढ़ीली करो और अपना रिश्तेदार छुड़ाओं| पुलिस के पास ट्रको और राहगीरो से वसूली जैसे और भी महत्वपूर्ण काम है अतः वह किसी मजलूम को डकैतों से रिहाई जैसे टुच्चे काम में समय क्यो जाया करे|

    04 August 2004

    जान केरी,विकसित भारत और चुनौतियाँ

    जनाब जान केरी साहब ने अपनी चुनावी रणनीति पर एक पुस्तक जारी की है अमेरिका के लिए हमारी योजना भारत का जिक्र ईसमें सात बार है| तीन बार हमारे पड़ोसियो से हमारे चिरकालीन टंटे के बारे में , एक बार औद्योगिक खतरों से सुरक्षा चर्चा में यूनियन कार्बाईड का जिक्र और तीन बार जिक्र है आउटसोर्सिंग नाम के जिन्न का| अब तक हमने यही सुना और पड़ा है कि वे आउटसोर्सिंग करने वाली कंपनियों पर टैक्स ठोंकने के मूड में हैं और भारत सरकार शुतुरमुर्ग की तरह गर्दन रेत में डाले है कि यह तो होने वाला नहीँ |
    मैंनें इसके पक्ष में कई दलीले पड़ी और सुनी है, बानगी पेश है-


    • अगर केरी साहब ईन बड़ी बड़ी कंपनियों पर टैक्स की गाज गिरायेंगे तो अगले चुनाव में उन्हें चँदा कौन देगा?
    • बहुराष्ट्रीय कंपनिया एक ही सिद्धाँत का पालन करती है "ना बाप बड़ा ना भईया सबसे बड़ा रूपइया", और टैक्स बचाने के लिए जब वे काम बाहर भेज सकते हैं तो समूची कंपनी बाहर भेजने में वे कोताही नहीं करेंगे
    • डबलूटीओ किस मर्ज की दवा है?

    और तो और अरूण शौरी सरीखे दिग्गज हमारी अपार मानव संसाधन संपदा के बल पर विकसित भारत का फील गुड २०२० तक कराने का स्वपन देख चुके हैं| उनकी दलील भी अचूक है कि २०२० तक हमारी आबादी २५‍ से ३५ साल के सुशिक्षित युवाओं की फौज से लैस होगी जो काल सेंटर व सेवा उद्योग जैसे महाउद्योगों की आवश्यक्तापूर्ती के लिए तैयार होगी, हम चीन को भी अपने अंग्रेजियत के ब्रह्मास्त्र से परास्त कर देंगे|

    पर दिल बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है, कुछ प्रश्न सहसा दिमाग में आते हैं, क्या चीन अंग्रेजी पर जोर नही दे रहा जहाँ तक मुझे पता है वह पूरी कोशिश में लगा है| एक और तथ्य कि दक्षिण पूर्व एशिया में मलेशिया जैसे देशों को धौंसपट्टी में लाकर वह हमें धीरे धीरे उस क्षेत्र से खदेड़ कर दम लेगा| मलेशिया में ईंजिनियरों से र्दुव्यवहार और भारत सरकार का दब्बूपन अभी तक भूला नही है चाहे मलेशिया हो या फ्लोरिडा के रेंडोल्फ एयरबेस प्रोजेक्ट में चालीस भारतीय कंप्यूटर प्रोग्रामर्स को एक मामूली कागजी गड़बड़ी के लिए हथकड़ी लगाकर गिरफ्तार करना जिसमें कुछ गर्भवती महिलाऐं भी थी, हर ऐसे मामले में भारत सरकार का रवैया एक सा होता है| अब तो भारत सरकार की प्रतिकिया किन कदमों में होगी ईसकी भविष्यवाणी भी संभव है-

    • पहले दो दिन टीवी और अखबारों में ऐसी घटना के चित्र छपने के बावजूद सरकार के नुमाईंदो को अधिकारिक तौर पर कोई सूचना नही होती|
    • तीसरे दिन सरकार संबद्ध देश के विदेश विभाग से ईस ईँटरनेट के जमाने में भी कागजी पत्राचार करती है|
    • चौथे दिन सरकार औपचारिक विरोध दर्ज करने की हिमाकत करती है|
    • पाँचवे दिन सरकार का कोई मंत्री कोई ऊल जलूल बयान दे देता है और उसके बाद देश में ही पक्ष विपक्ष और मीडिया के बीच जूतमपैजार चलती रहती है तब तक जब तक कि जनता असली मुद्दा ही न भूल जायें|
    शायद यहीं वजह है कि छपास की पीड़ा से पीड़ित प्रवासी भारतीयों के अलावा बाकि मेहनतकश भारतीय ऐसी कटु घटनाओं के प्रति भारत सरकार का निकम्मापन देखकर डालर को रूपये से उपर जाते ही देखना चाहते हैं|
    खैर मुख्य मुद्दे की ओर लौटते हुए देंखे जनाब जान केरी साहब की चुनावी रणनीति की पुस्तक से कुछ अँश एक जगह कहा गया है "Government research at the Defense Advanced Research Projects Agency (DARPA) led to the creation of the Internet and the government has an important but temporary role to play in catalyzing the extension of broadband to our entire nation. It is especially important in creating new opportunities in areas of America—especially rural areas and some of our inner cities—that are now all but cut off from the economy of tomorrow.The same Internet technologies that make it possible to export technology and services jobs to India can make it possible to create similar jobs in rural areas here in America, which often enjoy a combination of low business costs and high quality of life." यानि कि अगली अमेरिकी सरकार कस्बों में उच्च तकनीकि पहुँचा कर मानव श्रम की लागत कम करने को कटिबद्ध है|
    एक और बानगी "Today, Americans compete with workers on every continent. Information flows across oceans. High-wage jobs are more dependent than ever on high-level skills. In America, 60,000 engineers graduate a year—about one-tenth the number produced by India and China. No wonder we are falling behind in the competition for high-skill jobs." मतलब साफ है श्रमशक्ति के बल पर भारत २०२० तक विकसित तो हो जायेगा पर शिखर पर पहुँचने के बाद वहाँ टिके रहने के लिए कुछ और भी करना होगा| एक और बात , २०२० तक वह अमेरिकी जो १९९० से २००० के बूम के दरम्यान आये भारतीयों के वंशज है भारतीयों से ही होड़ लेने के तैयार होंगे यानि कि मेरी बिल्ली और मुझ से ही म्याऊँ, और ऐसे एबीसीडी लाखों मे होंगे|

    07 May 2004

    विदेशी शहर के खालिस देशी मेयर का घोषणापत्र

    आज जीवन के ३४ बसंत पूरे हो गये| सवेरे से बधाईयों का ताँता लगा है| मेरी खुशनसीबी कि ईतने चाहने वाले हैं| जो चले गये ईस जहाँ से उनकी जगह खाली ही रहेगी पर जो है उसका ही आनंद उठाया जाये| सवेरे एक भाभीजी का बधाई का फोन आया तो सूझी मसखरी और बोला कि काश खुदा से कुछ और माँगा होता| उन्होनें पूछने पर कि मेरी मुराद क्या है मेरा जवाब था कि काश मैं अटलाँटा का मेयर बन जाता| यह आरजू है या ख्याली खुराफात यह तो नीचे लिखा विदेशी शहर के देशी मेयर का घोषणापत्र ही बता सकता है|
    विदेशी शहर के खालिस देशी मेयर का घोषणापत्र

  • सारी केबल कंपनियों को दूरदर्शन दिखाना आवश्यक|

  • हर रविवार सुबह ९ बजे से १२ बजे तक हर मंदिर के टेलीफोन पर ईंडिया काल की सुविधा फ्री| कारण आर्थिक नहीं महज हिंदुस्तानियों को फ्री काल के लिए हुल्लड़ करते देखने की चाह जो यहाँ कभी देखने को नही मिलता|

  • देशियों के लुँगी एवं निक्कर पहनने पर पचास डालर का फाईन कारण न तो भारतीय महिलाऐं निक्कर में संस्कृति की दलील देती सुहाती हैं न ही मर्द| लुँगी पर प्रतिबंध सिर्फ सुरक्षात्मक कारणो से ताकि किसी अमेरिकी का कुत्ता लुँगीधारी पर कतिपय कारणों से मेहरबान होकर पीछे दौड़ ले तो भागते समय गिरने का डर न रहे|

  • हर हाईवे फ्रीवे या जो कोई भी वे हो उस पर स्पेशल १० मील प्रतिघंटा की अधिकतम गतिसीमा वाली लेन का निर्माण जहाँ मेरी बीबी या अन्य भारतीय महिलाऐं हार्न बजाने वालो से बेपरवाह होकर सुकुन से कार चला सकें| कभी कभी हम भी उस पर वेस्पा पियाजियो चला सके|

  • हर हाईवे के एक्जिट वाले रैंप पर एक पान की दुकान को लाईसेंस|

  • हर ऐसी साफ्टवेयर कंपनी जो आठ घंटे से ज्यादा काम कराये और मोरल एलिवेशन के नाम पर संडे को ६ डालर का बासी ईंडियन बुफे खिलाए साथ में टीम भावना पर भाषण भी दे उस पर ३०० प्रतिशत सर्विस टैक्स|

  • जेसीपेनी , सियर्स, मेसीज और बाकि स्टोर्स द्वारा हर सप्ताहाँत पर सेल के ईश्तिहार लगाने पर सख्त प्रतिबंध| आखिर ईन्हें हमारे जैसे कंजूसो की भावनाओं का कुछ तो ख्याल रखना चाहिए|
  • 29 April 2004

    आखिर हम अपना हाथ कितनी बार बढाऐंगे?

    हमारे कविमन प्रधानमंत्री ने कल रहस्योदघाटन किया कि कारगिल युद्ध के दौरान बुश अंकल के फटकारने पर उन्होनें पाकिस्तान के हिस्से की जमीन वापस कर दी (यह शेखी मारना वे नहीं भूले कि हमने पहले अपने हिस्से की जमीन वापस ली|)! उनके श्रीमुख से "सारी दुनिया ने भारत के इस कदम की तारीफ करी|" Stunned! भाई मैं तो अवाक रह गया इस अदा पर|कुछ प्रश्न जो मेरे दिमाग को मथ रहे हैं, वे बिंदुवार पेश हैं‌‌‌‌‌

  • उनके हिस्से की जमीन वापस करी, तो क्या पाक अधिकृत कश्मीर तथाकथित रोडमैप के हिसाब से पाक पर न्यौछावर हो चुका है सिर्फ घोषणा बाकी है?

  • संभवतः १९७० युद्ध के बाद ईंदिरा जी द्वारा अपने कब्जे की जमीन लौटाये जाने कविराज अटल जी ने आपत्ति की थी, उन्ही के शब्दों में "स्वर्ण सिहं जी, आपके अनुसार हम जमीन लौटाकर उनकी ओर शांति का हाथ बढा रहे हैं, यही हाथ पिछले दो युद्धोपरांत भी हम बढा चुके हैं| आखिर हम अपना हाथ कितनी बार बढाऐंगे?" आज यही यक्ष प्रश्न आपके सामने हाजिर है, अटल जी आखिर हम अपना हाथ कितनी बार बढाऐंगे?

  • सारी दुनिया ने कब हमारी तारीफ की? या तो मैं बहरा हूँ या मैं अखबार नहीं पढता‌ कम से कम मैंने तो किसी को भारत की पीठ ठोंकते देखा नही कि भाई वाह क्या बात है, कितने अच्छे बच्चे हैं आप कि एक ही डाँट में मान गये|

  • सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न, कि अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर की महत्वपूर्ण घोषणा करने की अपने यहाँ कोई नीति नही है क्या| किसी भी मंच से हमारे नेता मंत्री घोषणा,रहस्योदघाटन कर देते हैं और ताकि बाद में पत्रकारों पर बयान मरोड़ने की तोहमत लाद कर आलोचना से बचा जा सके| पत्रकार सम्मेलन या विभागीय स्थल तभी उपयोग किये जाते हैं जब मंत्री जी स्कूली बच्चे की तरह भली भाँति तैयार होते हैं, लिखे बयान व सूचनाओं के साथ|
  • 20 April 2004

    क्या वर्ष २०२० में भी विदेशी मूल का मुद्दा रहेगा?



    दो नन्हे नेताओं की शिष्टाचार भेंट
    मालुम पड़ता है भविष्य के मुलायम सिंह व लालू यादव तैयार हो रहे हैं भारत का भविष्य संभानले को| पर मेरे बाँके बिहारी को भी विदेशी नागरिकता वाले मुद्दे का सामना करना पड़ा तो? कहिए आप की क्या राय है?


    08 April 2004

    कुछ खरी खरी

    मेरे कुछ मित्रो को भारत उदय कविता पर एतराज था| उन्हें यह कांग्रेसी रंग में रंगी लगती है| खैर मेरा सोचना है शिकवा उसी से कर सकते हैं जिससे कोई उम्मीद हो|लालू जयललिता या खूसट वामपंथीयों एवं विकासशीलता में जनम जनमाँतर का बैर लगता है, रही कांग्रेस तो क्रैश डाईटिंग से वजन घटाते, वाटररैफटिंग से गर्मी भगाते और आक्सफोर्डी हिंगलिश बोलने वाले नेताओं के नौनिहाल क्या खाक जानेंगे भूख से आँते कैसे अकड़ती है? फील गुड उन को हो सकता है जो बिजली चुरा कर फैक्ट्री चलाते हैं, या जो लाल नीली बत्तती वाली कार में घूमते हैं| दिल्ली , बैंगलोर के एयरकंडीशंड आफिस या शेयरमार्केट में भी आप भारत को चमकता देख सकते हैं| मुंबई या किसी महानगरीय डिस्कोथेक,बुटिक और बालिंग सेंटर भी आपको फील गुड कर सकते हैं| पर यह चमक सिर्फ क्रीमी लेयर तक ही है| जिस देश के प्रशासकीय अधिकारीयों लाल नीली बत्तती की कार के द्वारा जनता में धौंस बना कर रखने की मानसिकता रखते हों वहाँ उनके हरामखोर व बिगड़ैल सपूत नशे में गरीब फुटपाथियों को टोयोटा क्वालिस से रौदेंगे भी और राह चलती लड़कियों का चीरहरण कर फीलबैड भी करायेंगे| अगर प्रगति वाकई हुई है तो शत प्रतिशत न सही बीस पच्चीस प्रतिशत भारतीय तो फील गुड करें| जरूरी नही सारी सड़के अटलाँटा का २८५ बन जायें , या ईंडिया में अमेरिकन ९११ जैसा नंबर काम करने लगे, पर कम से कम ट्रैफिक जाम में मरीज दम तो न तोड़े, आये दिन रात बिरात बिजली तो न गुल हो, हर साल बजट लोगों की कमर तो न तोड़े| सत्ता भाषा बदल देती है चाहे कांग्रेस हो या भाजपा| पूछना है तो पेंशनरत बुजुर्गो से पूछिये हर साल जब उनकी जमा पूँजी पर ब्याज घटता और मँहगाई बड़ती है तो उन्हें कैसा फील होता है| चतुर सुजान वित्त मंत्री यह जरूर बताते हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में तो ब्याज सिर्फ २‍ या ३ प्रतिशत है हमनें तो सिर्फ १० से ६ प्रतिशत की है, पर मंत्री जी यह तथ्य हजम कर जाते हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भारत के मुकाबले मुद्रास्फीती कितनी कम है| मैं कभी दक्षिण में रहा नही ईसलिये वहाँ कि जमीनी हकीकत भी नही मालुम, पर हैदराबाद एवं बैंगलोर की उन्नति की खबर के साथ, अपने यहाँ तथाकथित गरीब की बेटी और किसानपुत्रों द्वारा की जा रही खुल्लमखुल्ला लूटखसोट, शहर में लोटते सुअर, बंद मिलें,टूटी सड़कें, अपहरण और बेरोजगारों की अंतहीन कतारें देख कर मुझे फील गुड कतई नहीं होता| ये निठ्ठले धर्म के लफंगे ठेकेदार सिर्फ मंदिर बना देने या पाकिस्तान को गाली दे लेने से हमारी संस्कृति का उत्थान कैसे करा देंगे यह तो ईनका भगवान भी नही जानता होगा| दहेज में जलती बहुएँ देख कर यह केसरिया झंडे वाले दहेज पिपासुओं का सामजिक बहिष्कार करवाने आगे क्यों नही आते? रामचँद्र जी की जय ओर सीता द्रौपदी को भूल गये? अगर मीरा नायर द्वारा काशी की विधवाओं का चित्रण बर्दाशत नहीं तो दुष्कर्मी व बलात्कारियों की बीच चौराहे पे जूतमपैजार करने में बजरंग दल आगे क्यों नही आता| ऐसा करें तो फिर है किसी वामपंथी की हिम्मत जो ईन्हें हिंदू तालीबानी कहे| बाकि बानगी चित्रों की जबानी|

    भारत उदय शायद यहाँ दिख जाये
    दमघोंटू डिब्बे में फील गुड करो तो जानूँ


    यह कोई विदेशी गुड़ है क्या?
    कहाँ गई ईडिंया की शाईन?


    फील गुड करों बच्चा
    फील गुड बोले तो?


    मेरी पीठ से पूछो फील गुड
    अट्टालिका पर फील गुड लेकिन स्लम में फील बैड

    01 April 2004

    भारत उदय

    सुबह से दोपहर शाम तक
    बाल्टी और ब्रश लिए हुए
    एक लंबी कतार दिखाई पड़ती है
    आपके घर पर सफेदी पोतने के लिए
    न मालुम कहाँ से आए हैं यह लोग
    किस फैक्ट्री से निकले है यह लोग
    और दिन भर सख्त मेहनत करने के बाद
    अब यह सुस्ता रहे हैं
    मेरा भारत चमक रहा है
    मैने टीवी पर चाय का बगीचा देखा
    और सैकड़ो कर्मचारी काम करते हुए
    मनुष्य से ज्यादा भूत लग रहे थे
    मैने एक सोती दुकान देखी
    ग्राहकों से खाली
    दुकानदार समझदार था
    टूटी फूटी डिस्पेंसरी, बंद प्राइमरी स्कूल
    और पीछे की दीवार पर पोस्टर था
    इसमें मुस्कुराते हुए वोटर से कुछ कहा गया था
    मैं देख सकता हूँ कि फील गुड लिखा है
    इस बीच मेरा बिजली का बिल तीन गुना बड़ गया
    है और मैं चुपचाप बड़बड़ा रहा हूँ
    मेरा भारत चमक गया है|
    - दैनिक जागरण पर खुशवंत सिंघ जी के कालम से साभार

    आज आपने फील गुड किया या नही?

    सवेरे उठती हैलो हाय छोड़िये जय माता की बोलिए की चीत्कार
    साथ में गुरुद्वारा और मस्जिद और काँटा लगा का मिला जुला शोर
    बोर्ड परीक्षार्थीयों एवं उनींदे बच्चों को जबरन फील गुड कराता है
    आज आपने फील गुड किया या नही? मैं तो कर रहा हूँ
    नलों की टोटियाँ तीन दिन से सिसक रही हैं जल संस्थान का टैंकर भी नदारद है
    शायद कार्पोरेटर महोदय की भतीजी के विवाह समारोह में लगा है
    ईडियट बाक्स बताता है जल सँकट भूगर्भजलस्तर के रूठने से छाया है
    कोक पेप्सी जैसी फैक्ट्रीयाँ दिनप्रतिदिन पातालतोड़ जलदोहन करती हैं
    और भूगर्भजलस्तर फिल्मी हिरोईन के मानिंद शर्मा गया
    पर आप ईससे फीलबैड की खता न करिए
    और कीटनाशकों से भलीभाँति स्वच्छ किए गये मिरांडा का स्वाद लिजिए
    सरकार ने क्लीन चिट दी है इसलिए नाहक चिंता न कीजिए
    आपने अभी तक फील गुड किया या नही? मैं तो कर रहा हूँ
    हमें दिल जीतना आता है और सिर्फ दिल ही जीतना आता है
    बगल से कुछ सिरफिरे हमारे सिर पर चड़ कर बंदूक दाग जायें
    जम्मू में मासूम बच्चें गोलियों से छलनी कर दिये जायें
    या अनगिनत कश्मीरी अपने अपने घरौंदे से बेदखल होकर टेंट में रहें
    पर हम मासूम खाड़कुओं के घावों पर हीलिंग टच देते रहेंगे
    ऐसा नही कि हम बेगैरत हैं दब्बू हैं या साफ्ट स्टेट हैं
    भाई अलबर्ट पिंटो की तरह हमें भी गुस्सा आता है
    हम भी कभी कभी जबानी गोलीबारी कर लेते हैं
    लेकिन पावेल साहब या टोनी अंकल की डपट से हमारी पैंट ढीली हो जाती है
    अब कहीं वो हमारा राशन पानी बंद कर दें तो आप सब फील बैड ही करेंगे
    भाई नेताजी खुद मिनरल वाटर पीकर पब्लिक को एक टाईम भूखा रहने की सीख नही दे सकते
    तभी तो हमारी क्रिकेट टीम भी नटखट पड़ोसियों को फील गुड करा रही है
    लगता है आपको हर बात में मीन मेख निकालने की आदत है
    अरे भाई आपको तो स्वर्णिम चतुर्भज से भी शिकायत है
    क्या हुआ जो वह आपके शहर से दूर से निकल जाता है
    आपके शहर में तंग सड़के ही सही पर बेंज और टोयोटा की डीलरशिप तो है
    मर्सिडीज चलाईये डीवीडी देखिये दोसौ का बरगर खाकर फील गुड करिए
    नौकरी न मिलने की रट छोड़िए , एमवे के प्रोडक्ट बेचिए चाहे घर घर रूमाल की फेरी लगाईये
    कुछ न मिले तो किडनैपिंग का धंधा जाम लीजिए , फिल्में सब सिखा देंगी
    कुछ भी करिए पर फील गुड जरूर करिए
    नहीं तो पड़ोस का लड़का जो अब तक लंपट बन के घूमता था
    कल त्रिशूल थामे आयेगा और आप जैसे नास्तिक दुकनदारों से चंदा वसूली करेगा
    दिन भर आप के पैसे से आप ही को कानफोड़ू लाउडस्पीकर पर धार्मिक शोर सुनाएगा
    और रात में मंदिर के बाहर चबूतरे पर काँटा लगा चिल्ला चिल्ला कर लौडाँ डाँस दिखाएगा
    ईसलिए कहता हूँ कि शाँति व्यवस्था में सहयोग दीजिए और पेट्रोल गैस के दाम बड़ने दीजीए
    अब तक नपुंसक रहे हैं तो अब भी अपने दड़बे में घुसे रहिए,
    बेवाच देखिए चाहे फैशन चैनल देखिए, पर फील गुड करिए और ईंडिया को शाईन करने दीजिए|

    एक अखबार से कुछ कतरनें

    शीर्षक है हिंदी पाकी भाई भाई
    ३० मार्च २००४, उड़ीसा
    उड़ीसा के पाकिस्तानी हाई कमिश्नर कार्यालय के बाहर सूखाग्रस्त जिलों से हजारों नागरिक पाकिस्तानी वीजा के आवेदन हेतु मजमा लगाये हैं| ऐसे एक समूह के बुजुर्ग नेता ने पूछने पर बताया कि उसके गाँव कालाहाँडी में वर्षों से पानी नहीं बरसा और वहाँ कुछ खाने को नही है| यह पूछे जाने पर कि सूखे और क्रिकेट हेतु वीजा का क्या संबध है ग्रामीणों ने क्रिकेट के बारे में पूर्णतः अज्ञानी होना स्वीकार किया| उन्होनें संवाददाता को पाकिस्तानीयों द्वारा भारतीय क्रिकेट दर्शकों को मुफ्त भोजन एवं आवासीय सुविधा उपलब्ध कराये जाने के किस्सो के बारे में बताया| एक युवा ने कहा "हम ऐसे स्वर्ग के दर्शन जरूर करना चाहेगे| हम आम के छिलके खाने पर मजबूर हैं| हमें उम्मीद ही नही पूरा विश्वास है कि पाकिस्तानी भाई हम भारतीयों को मुफ्त कबाब जरूर खिलायेगे|"

    २६ मार्च , लाहौर
    मशहूर अनारकली मार्केट के रेस्टोरंट मालिक उन पाकिस्तानियों के समूह के बारे में शिकायत कर रहे हैं जो गाँधी टोपी व धोती का वेशधारण कर भारतीय होनें का नाटक करते हैं| एक होटल मालिक ने बताया " वे अलीगड़ एवं हैदराबाद की जिंदगी के बारे में जोर जोर से बात करके हमारा ध्यानाकर्षण करते हैं| कई प्लेट कवाब सफाचट करने के बाद उनकी लुभावनी बातों मे आकर होटल मालिक बिल माफ कर देते हैं| " होटलवालो ने इस धोखाधड़ी का भेद कुछ भारतीयों की मदद से खोला| भारतीयों ने बताया कि आजकल हिंदुस्तान में सिवाय नेताओं के गाँधी टोपी व धोती कोई नही पहनता| एक वेटर ने तो पुलिस को भी ईस बारे में आगाह किया था| लेकिन वे गलती से एक सिखो के समूह को मुफ्तखोर अफगानी समझ कर उठा ले गये|

    २६ मार्च , पेशावर
    मोटा राजन ने कहा "व्यापार, शांति की राह है|" श्री राजन मुंबई से पेशावर ऐसी व्यापारिक संभावनाए तलाशने आए हैं जो दोनो शहरो को एक सूत्र में पिरो सकें| पेशावर की एक मशहूर बंदूक की दुकान के आगे खड़े श्री राजन, उपलब्ध माल की गुणवत्ता से चकित थे| उन्होने कहा कि "मुंबई में हमें यूपी एवं बिहार की दोयम दर्जे की बंदूको पर गुजर करनी पड़ती है| यहाँ कि बंदूक कही बेहतर हैं| उन्होनें चमकती आँखो से आगे कहा "जरा सोचिए,एक बार ईन क्लाशिन्कोव राईफल एवं राकेट लाँचर मिलने पर हम अपने विरोधियों का क्या हश्र करेंगे|" श्री राजन पठानों के पारंपरिक सत्कार से आह्वलादित थे| अपनी जेब से हेरोईन का पैकेट दिखाते उन्होनें कहा "देखिए उन्होनें मुझे क्या तोहफा बख्शा है|" उनके विचार से पाकिस्तानी पुलिस का व्यवहार हिंदुस्तानी पुलिस से हजार दर्जे बेहतर है| पाकिस्तानी पुलिस उन्हें देख बारंबार मुस्कुराती है और हिंदुस्तानी पुलिस को पाकिस्तानी पुलिस से सीख लेनी चाहिए|

    २८ मार्च , मुल्तान
    पाकिस्तानी पुलिस, अलकायदा प्रमुख लादेन एवं जवाहिरी को पकड़ने के स्वर्णिम अवसर हाथ से निकल जाने से हताश है| एक पाकिस्तानी खुफिया अफसर ने बताया "हमने उन्हें वाना कस्बे में घेर लिया था| पर उन दोनो ने बेमिसाल तरकीब भिड़ाई| अपनी दाढी मूँछ मुढा कर व पारंपरिक अफगानी छोड़ भारतीय कपड़े पहन कर वे हमारे चंगुल से निकल गये|" शहर में छुट्टा घूमते अनगिनत भारतीय क्रिकेट दर्शकों के बीच किसी ने उन्हें नही पहचाना| वे मैच देखने जा रहे है ऐसा सोच कुछ भलेमानुष पाकिस्तानियों ने उन्हें लिफ्ट दे दी| खुफिया अफसर ने आगे कहा "मुल्तान में उन्हें मैच का फ्री टिकट भी मिला और उनहोनें पहले दिन का खेल देखा|" एक पाकिस्तानी दर्शक जो उनके बगल में बैठा था उसके अनुसार उनमे से एक तिरंगा लिए था व दूसरा प्राऊड टू बी ईंडियन लिखी शर्ट पहने था| उस दर्शक को तब दाल में काला लगा जब उन दोनो ने हर बार उसके बातचीत शुरू करने के प्रयास पर निगाहें फेर ली| दर्शक ने कहा "मैं समझा वे बजरंग दल से हैं|"

    २८ मार्च , कराँची
    एक कराँचीवासी भारतीय, पाकिस्तानियों द्वारा भारतीयों को दी जा रही शानदार मेहमानवाजी से कतई अप्रभावित है| इन सज्जन का कहना है "इसमें खास क्या है, वे बरसों से मेरा खास ख्याल रख रहे हैं|" यह पूछे जाने पर कि वे मुंबई छोड़ कराँची में क्यों बसे, उन्होने बताया कि वे वहाँ काफी अच्छी जिंदगी बसर कर रहे हैं, पाकिस्तानियों ने उन्हें न सिर्फ अच्छा घर दिया बल्कि सुरक्षाकर्मियों भी मुफ्त उपलब्ध कराये| ये भारतीय सज्जन जिनका शुभनाम दाऊद ईब्राहिम है मुबंई को तहेदिल से याद करते हैं| उनके अनुसार उन्हें मुंबई अपने लिए अभी भी व्यापारिक संभावनाओं से परिपूर्ण लगता है|