08 April 2004

कुछ खरी खरी

मेरे कुछ मित्रो को भारत उदय कविता पर एतराज था| उन्हें यह कांग्रेसी रंग में रंगी लगती है| खैर मेरा सोचना है शिकवा उसी से कर सकते हैं जिससे कोई उम्मीद हो|लालू जयललिता या खूसट वामपंथीयों एवं विकासशीलता में जनम जनमाँतर का बैर लगता है, रही कांग्रेस तो क्रैश डाईटिंग से वजन घटाते, वाटररैफटिंग से गर्मी भगाते और आक्सफोर्डी हिंगलिश बोलने वाले नेताओं के नौनिहाल क्या खाक जानेंगे भूख से आँते कैसे अकड़ती है? फील गुड उन को हो सकता है जो बिजली चुरा कर फैक्ट्री चलाते हैं, या जो लाल नीली बत्तती वाली कार में घूमते हैं| दिल्ली , बैंगलोर के एयरकंडीशंड आफिस या शेयरमार्केट में भी आप भारत को चमकता देख सकते हैं| मुंबई या किसी महानगरीय डिस्कोथेक,बुटिक और बालिंग सेंटर भी आपको फील गुड कर सकते हैं| पर यह चमक सिर्फ क्रीमी लेयर तक ही है| जिस देश के प्रशासकीय अधिकारीयों लाल नीली बत्तती की कार के द्वारा जनता में धौंस बना कर रखने की मानसिकता रखते हों वहाँ उनके हरामखोर व बिगड़ैल सपूत नशे में गरीब फुटपाथियों को टोयोटा क्वालिस से रौदेंगे भी और राह चलती लड़कियों का चीरहरण कर फीलबैड भी करायेंगे| अगर प्रगति वाकई हुई है तो शत प्रतिशत न सही बीस पच्चीस प्रतिशत भारतीय तो फील गुड करें| जरूरी नही सारी सड़के अटलाँटा का २८५ बन जायें , या ईंडिया में अमेरिकन ९११ जैसा नंबर काम करने लगे, पर कम से कम ट्रैफिक जाम में मरीज दम तो न तोड़े, आये दिन रात बिरात बिजली तो न गुल हो, हर साल बजट लोगों की कमर तो न तोड़े| सत्ता भाषा बदल देती है चाहे कांग्रेस हो या भाजपा| पूछना है तो पेंशनरत बुजुर्गो से पूछिये हर साल जब उनकी जमा पूँजी पर ब्याज घटता और मँहगाई बड़ती है तो उन्हें कैसा फील होता है| चतुर सुजान वित्त मंत्री यह जरूर बताते हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में तो ब्याज सिर्फ २‍ या ३ प्रतिशत है हमनें तो सिर्फ १० से ६ प्रतिशत की है, पर मंत्री जी यह तथ्य हजम कर जाते हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भारत के मुकाबले मुद्रास्फीती कितनी कम है| मैं कभी दक्षिण में रहा नही ईसलिये वहाँ कि जमीनी हकीकत भी नही मालुम, पर हैदराबाद एवं बैंगलोर की उन्नति की खबर के साथ, अपने यहाँ तथाकथित गरीब की बेटी और किसानपुत्रों द्वारा की जा रही खुल्लमखुल्ला लूटखसोट, शहर में लोटते सुअर, बंद मिलें,टूटी सड़कें, अपहरण और बेरोजगारों की अंतहीन कतारें देख कर मुझे फील गुड कतई नहीं होता| ये निठ्ठले धर्म के लफंगे ठेकेदार सिर्फ मंदिर बना देने या पाकिस्तान को गाली दे लेने से हमारी संस्कृति का उत्थान कैसे करा देंगे यह तो ईनका भगवान भी नही जानता होगा| दहेज में जलती बहुएँ देख कर यह केसरिया झंडे वाले दहेज पिपासुओं का सामजिक बहिष्कार करवाने आगे क्यों नही आते? रामचँद्र जी की जय ओर सीता द्रौपदी को भूल गये? अगर मीरा नायर द्वारा काशी की विधवाओं का चित्रण बर्दाशत नहीं तो दुष्कर्मी व बलात्कारियों की बीच चौराहे पे जूतमपैजार करने में बजरंग दल आगे क्यों नही आता| ऐसा करें तो फिर है किसी वामपंथी की हिम्मत जो ईन्हें हिंदू तालीबानी कहे| बाकि बानगी चित्रों की जबानी|

भारत उदय शायद यहाँ दिख जाये
दमघोंटू डिब्बे में फील गुड करो तो जानूँ


यह कोई विदेशी गुड़ है क्या?
कहाँ गई ईडिंया की शाईन?


फील गुड करों बच्चा
फील गुड बोले तो?


मेरी पीठ से पूछो फील गुड
अट्टालिका पर फील गुड लेकिन स्लम में फील बैड