04 August 2004

जान केरी,विकसित भारत और चुनौतियाँ

जनाब जान केरी साहब ने अपनी चुनावी रणनीति पर एक पुस्तक जारी की है अमेरिका के लिए हमारी योजना भारत का जिक्र ईसमें सात बार है| तीन बार हमारे पड़ोसियो से हमारे चिरकालीन टंटे के बारे में , एक बार औद्योगिक खतरों से सुरक्षा चर्चा में यूनियन कार्बाईड का जिक्र और तीन बार जिक्र है आउटसोर्सिंग नाम के जिन्न का| अब तक हमने यही सुना और पड़ा है कि वे आउटसोर्सिंग करने वाली कंपनियों पर टैक्स ठोंकने के मूड में हैं और भारत सरकार शुतुरमुर्ग की तरह गर्दन रेत में डाले है कि यह तो होने वाला नहीँ |
मैंनें इसके पक्ष में कई दलीले पड़ी और सुनी है, बानगी पेश है-


  • अगर केरी साहब ईन बड़ी बड़ी कंपनियों पर टैक्स की गाज गिरायेंगे तो अगले चुनाव में उन्हें चँदा कौन देगा?
  • बहुराष्ट्रीय कंपनिया एक ही सिद्धाँत का पालन करती है "ना बाप बड़ा ना भईया सबसे बड़ा रूपइया", और टैक्स बचाने के लिए जब वे काम बाहर भेज सकते हैं तो समूची कंपनी बाहर भेजने में वे कोताही नहीं करेंगे
  • डबलूटीओ किस मर्ज की दवा है?

और तो और अरूण शौरी सरीखे दिग्गज हमारी अपार मानव संसाधन संपदा के बल पर विकसित भारत का फील गुड २०२० तक कराने का स्वपन देख चुके हैं| उनकी दलील भी अचूक है कि २०२० तक हमारी आबादी २५‍ से ३५ साल के सुशिक्षित युवाओं की फौज से लैस होगी जो काल सेंटर व सेवा उद्योग जैसे महाउद्योगों की आवश्यक्तापूर्ती के लिए तैयार होगी, हम चीन को भी अपने अंग्रेजियत के ब्रह्मास्त्र से परास्त कर देंगे|

पर दिल बहलाने को गालिब ख्याल अच्छा है, कुछ प्रश्न सहसा दिमाग में आते हैं, क्या चीन अंग्रेजी पर जोर नही दे रहा जहाँ तक मुझे पता है वह पूरी कोशिश में लगा है| एक और तथ्य कि दक्षिण पूर्व एशिया में मलेशिया जैसे देशों को धौंसपट्टी में लाकर वह हमें धीरे धीरे उस क्षेत्र से खदेड़ कर दम लेगा| मलेशिया में ईंजिनियरों से र्दुव्यवहार और भारत सरकार का दब्बूपन अभी तक भूला नही है चाहे मलेशिया हो या फ्लोरिडा के रेंडोल्फ एयरबेस प्रोजेक्ट में चालीस भारतीय कंप्यूटर प्रोग्रामर्स को एक मामूली कागजी गड़बड़ी के लिए हथकड़ी लगाकर गिरफ्तार करना जिसमें कुछ गर्भवती महिलाऐं भी थी, हर ऐसे मामले में भारत सरकार का रवैया एक सा होता है| अब तो भारत सरकार की प्रतिकिया किन कदमों में होगी ईसकी भविष्यवाणी भी संभव है-

  • पहले दो दिन टीवी और अखबारों में ऐसी घटना के चित्र छपने के बावजूद सरकार के नुमाईंदो को अधिकारिक तौर पर कोई सूचना नही होती|
  • तीसरे दिन सरकार संबद्ध देश के विदेश विभाग से ईस ईँटरनेट के जमाने में भी कागजी पत्राचार करती है|
  • चौथे दिन सरकार औपचारिक विरोध दर्ज करने की हिमाकत करती है|
  • पाँचवे दिन सरकार का कोई मंत्री कोई ऊल जलूल बयान दे देता है और उसके बाद देश में ही पक्ष विपक्ष और मीडिया के बीच जूतमपैजार चलती रहती है तब तक जब तक कि जनता असली मुद्दा ही न भूल जायें|
शायद यहीं वजह है कि छपास की पीड़ा से पीड़ित प्रवासी भारतीयों के अलावा बाकि मेहनतकश भारतीय ऐसी कटु घटनाओं के प्रति भारत सरकार का निकम्मापन देखकर डालर को रूपये से उपर जाते ही देखना चाहते हैं|
खैर मुख्य मुद्दे की ओर लौटते हुए देंखे जनाब जान केरी साहब की चुनावी रणनीति की पुस्तक से कुछ अँश एक जगह कहा गया है "Government research at the Defense Advanced Research Projects Agency (DARPA) led to the creation of the Internet and the government has an important but temporary role to play in catalyzing the extension of broadband to our entire nation. It is especially important in creating new opportunities in areas of America—especially rural areas and some of our inner cities—that are now all but cut off from the economy of tomorrow.The same Internet technologies that make it possible to export technology and services jobs to India can make it possible to create similar jobs in rural areas here in America, which often enjoy a combination of low business costs and high quality of life." यानि कि अगली अमेरिकी सरकार कस्बों में उच्च तकनीकि पहुँचा कर मानव श्रम की लागत कम करने को कटिबद्ध है|
एक और बानगी "Today, Americans compete with workers on every continent. Information flows across oceans. High-wage jobs are more dependent than ever on high-level skills. In America, 60,000 engineers graduate a year—about one-tenth the number produced by India and China. No wonder we are falling behind in the competition for high-skill jobs." मतलब साफ है श्रमशक्ति के बल पर भारत २०२० तक विकसित तो हो जायेगा पर शिखर पर पहुँचने के बाद वहाँ टिके रहने के लिए कुछ और भी करना होगा| एक और बात , २०२० तक वह अमेरिकी जो १९९० से २००० के बूम के दरम्यान आये भारतीयों के वंशज है भारतीयों से ही होड़ लेने के तैयार होंगे यानि कि मेरी बिल्ली और मुझ से ही म्याऊँ, और ऐसे एबीसीडी लाखों मे होंगे|

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