03 November 2004

दो सबसे बड़े लोकतंत्रों की चुनावी चकल्लस

आखिरकार अमेरिका में चुनाव संपन्न हो गया|मुझे विश्व के दो सबसे बड़े लोकतंत्रों (अमेरिका एवं भारत) में चुनाव के अदांज में कुछ अंतर दिखे| हम भारतीय ईनसे कुछ सीख ले सकते हैं| आप भी देखिए कुछ बुनियादी भिन्नताऐं हमारी चुनावी चकल्लस और अमरीकी इलेक्शन कैम्पेन में
१: अमेरिका में मतदान के दिन भी कोई अवकाश नहीं| कई लोग तड़के ही लाईन में लग कर मतदान करने गये और काम पर समय से हाजिर| या फिर शाम को लाईन में लगे| रात आठ बजे के बात समय सीमा समाप्त होने के बाद भी लोग लाईन में थे| प्रशासन भी व्यवहारिक है, आठ बजे के पहले आने वाले हर व्यक्ति को मतदान करने दिया गया चाहें रात के बारह क्यों न बज जायें| भारत में छुट्टी भी होती है, चुनाव आयोग का डंडा न हो तो सब चुनावी पार्टीयों की सवारी गाँठ कर ही वोट डालने जायेंगे, तब भी मतदान पचास प्रतिशत से हमेशा नीचे और चुनावी बहसें और मुद्दों पर चिंताए ड्राईगरूम और पान की दुकान से आगे नहीं बड़ पाती|
२: टीवी न्यूज में दिखाया कि दो महिलाऐं जो वर्षों से अच्छी मित्र हैं अलग अलग पार्टीयों को समर्थन दे रही हैं, और स्वस्थ बहस करते हुए साथ साथ काफी पी रही हैं| ऐसे दृश्य यहाँ अमेरिका में आम हैं| भारत में लोग चुनाव के बहाने व्यक्तिगत खुन्नस निकालने के फेर में ज्यादा रहते हैं| नतीजा हर बार पहले से ज्यादा चुनावी हिंसा|
३: अमेरिका में किस पार्टी ने कितना चुनावी चंदा ईकठ्ठा किया यह खुली किताब की तरह सबको पता होता है| बकायादा चुनावी चंदा ईकठ्ठा करने के लिए अभियान, पार्टियाँ और उत्सव होते हैं| जहाँ तक मेरी जानकारी है भारत में चुनावी चंदा का एकत्रीकरण काला धन सफेद करने का सबसे अच्छा जरिया है|
४: अमेरिका में उम्मीदवारों के बीच राष्ट्रीय स्तर पर टीवी पर बहस लोकतंत्र के स्वस्थ होने का परिचायक है| मुद्दो पर गंभीरता से बहस होती है और दोनो उम्मीदवार अच्छे स्कूली बच्चों की तरह बहस के नियमों का पालन करते हैं| क्या हमें हनुमान जी को अंडे का केक खिलाने और ऐसे ही अगंभीर मुद्दों को उठाने वालों को तूल देना बंद नहीं कर देना चाहिए?
बाकि अमरीकी इलेक्शन की कहानी चित्रो की जबानी|










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