24 November 2004

बाँके बिहारी का अनोखा कारनामा



यही दृश्य बना बवाल की जड़!


गत शनिवार को तीन चार परिवार पोलर एक्प्रेस फिल्म देखने पहुँचे| कुल ६ व्यस्क और ६ बच्चे| एक पूरी लाईन घेर कर सब बैठ गये और पिक्चर का आनँद लेने लगे| बाँके बिहारी यानि कि मेरे तीन साल ६ माह के पुत्ररत्न का यह सिनेमाहाल का पहला पहला अनुभव था| भाईजान अपनी बहन और बहन की सहेलियों के साथ बीच में बैठे एकटक पिक्चर देख रहे थे| बाँकेजी को कुल मिलाकर पिक्चर अच्छी लगी और मुझे संतोष था कि मुझे उसको गोद में बैठा कर कमेंट्री नहीं करनी पड़ रही | मुझे कानपुर के हीरपैलेस की याद है जहाँ एक दंपत्ति अपने नवजात शिशु के साथ पिक्चर देख रहे थे और बीच पिक्चर में बच्चा यकायक बुक्का फाड़ के रोने लगा| माँ ने बाप को कोंचा कि हफ्ते भर मैं बच्चा सम्भालती हूँ ईसलिए अभी तुम इसे बाहर ले जाकर चुप कराओ, बाप माधुरी दीक्षित का दिल धक धक करने लगा छोड़ कर नही जाना चाहता था| उधर बच्चे का क्रंदन बदस्तूर जारी था| उस दंपत्ति के अड़ियल रूख से आजिज आकर पीछे से कोई मनचला चिल्लाया "बच्चे के मुँह में निप्पल दे" | बाप तैश में पीछे मुड़कर "चीखा कौन है बे?" अँधेरे में आवाज आई "एक निप्पल इसके मुँह में भी दे"| खैर यहाँ अमेरिका में ऐसा कुछ न हो इसलिए हमने तीन साल से हाल में पिक्चर देखने की जहमत नही उठाई| पहला अनुभव अब तक सही जा रहा था कि अचानक बाँके बिहारी सिसकियाँ लेकर रोने लगे| मेरी मेमसाहब ने मुझे घुड़का इसे बाहर ले जाओ| बाहर लाने पर बाँके बिहारी फिर से अँदर हाल में जाने को लेकर पसड़ गये| मेरी आँखो में कानपुर का दृश्य तैर रहा था| मेरे लिए पहेली अबूझ थी कि आखिर छुटकऊ चाहते क्या हैं? बाहर रहना नही चाहते , अँदर जाते ही फूट फूट कर रोने लगते हैं| परेशानी की वजह अगर तेज आवाज वाले विराट दृश्य होते तो वह तो कबके निकल चुके| पर्दे पर जो दृश्य चल रहा था उसमें कुछ बच्चे उपहारों की भीमकाय थैली में जा गिरते हैं , जैसा कि चित्र में दिखाया है, फिर सेंटा क्लाज से मिलते हैं| मैनें चाहा कि बाँके बिहारी मेरी तरफ मुँह करके बैठै रहे , शायद सेंटा क्लाज से डर रहे हो| तभी मेरी मेमसाहब को माजरा समझ में आ गया और उन्होनें मुझे बताया कि जबसे स्क्रीन पर उपहारों के डिब्बे दिखने शुरू हुए हैं , बाँके बिहारी का मूड उखड़ गया है|बाँके बिहारी को सारी तकलीफ यही थी कि सेंटा क्लाज ने सारे बच्चों को तो गिफ्ट बाँट दिये पर बाँके बिहारी को क्यों छाँट दिया ? मैनें बाँके बिहारी से स्वर में यथासंभव नरमी लाते हुए पूछा "भईये, क्या गिफ्ट लेना है"? भईये की गर्दन तुरंत रजामँदी में नब्बे डिग्री के कोण पर हिली | बाकि कि पिक्चर उन्होनें पिक्चर से निकलते ही ट्वायसआरअस जाने के आश्वासन पर देखी | आगे क्या हुआ कहने की जरूरत नहीं क्योकि समझदार को ईशारा काफी है|

2 comments:

अनूप शुक्ला said...

जैसे बांकेबिहारी के दिन बहुरे वैसे सबके बहुरें.

आलोक said...

हूँ, मज़ा आ गया।