13 December 2004

देशी घर के विदेशी कुत्ते की पहचान का संकट




सपनो की रंगीली दुनिया!


भला सोचिए, एक अच्छा खासा सुव्यवस्थित भारतीय एनआरआई परिवार कुत्ता क्योंकर पालेगा? खैर हर बात की तरह इस बात का भी कोई गंभीर कारण होना ही चाहिए| घर के अधेड़ वय वाले गंजेपन की ओर बढते गृहस्वामी के लिए यह एनआरआईकरण की तरफ होती प्रगति में एक और तमगा साबित हो सकता है| वैसा ही काल्पनिक तमगा जो वह घर खरीदने के बाद,या गैराज में बेंज अथवा लेक्सस कार खड़ी करने के बाद या अपने बेसमेंट में ३५ ईंच का टीवी रखने के बाद हासिल करता है| घर में पल रही बार्बी डाल (कन्या) के लिए बाहर कुत्ता टहलाना पड़ोस के स्मार्ट लड़कों से जानपहचान बड़ाने का अच्छा माध्यम हो सकता है| साथ ही यह एक अप्रवासी परिवार में पलने से उपजी हीनभावना को दूर करने में भी सहायक है| उस लड़की के छोटे भाई के लिए तो कुत्ता एक अमेरिकन ड्रीम है बिल्कुल x-box, playstaion और ford mustang हासिल करने के स्वप्न की तरह| अलबत्ता गृहस्वामिनी के लिए यह एक अनचाहा सरदर्द जरूर हो सकता है पर कूपमंडूक बनने के लाँछन से बचने के लिए वह कुकुर महाराज को घर का सदस्य बनने से नही रोकती| पर एक देशी घर में पलने वाले विदेशी कुत्ते (क्षमा कीजिए, हलाँकि यहाँ अमेरिकी परिप्रेक्ष्य में परिवार विदेशी है और कुत्ता देशी) की मनोदशा पर कभी किसी ने गौर किया है| फर्ज कीजिए कि इस कुत्ते का नाम बार्नी है और पड़ोस के गोरे परिवार में रहने वाले कुत्ते का नाम डेव है| आखिर जिस घर में बार्नी को ताउम्र रहना है उस घर को लेकर उसके भी कुछ अरमान होते हैं| एयरकंडीशनर कि ठंडी हवा में अलसाते बार्नी के मनमस्तिष्क में क्या कुछ घुमड़ता रहता है| हो सकता है उसे बहुत कुछ अखरता हो| हो सकता है कि शाकाहारी भोजन खाने पर मजबूर वह बेचारा बार्नी डेव को मिलने वाले पौष्टिक माँसाहार से रश्क करता हो| किचन में या पूजाघर में घुसने पर पड़ने वाली गृहस्वामिनी की फटकार उसके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाती होगी| हर शनिवार को डेव को उसकी छप्पन छुरी गोरी मालकिन के साथ फ्रिस्बी खेलते को देख कर बार्नी को अपनी मालकिन के साथ खेलने की हूक उठती होगी| पर बार्नी वह दिन भूल नहीं सकता जब वह अरमान भरे दिल से अपनी सोनी टीवी पर सास बहू का झोंटानुच्चवल वाला सीरीयल देख रही मालकिन के पास जाकर लड़ियाता था, उनके ध्यान न देने पर भौंका भी था पर बदले में बजाये फ्रिस्बी खेलने के, बेचारे बार्नी को मालकिन की चप्पल खानी पड़ी| हर सप्ताहाँत पर डेव को उसका मालिक अपने पिकअप ट्रक में फ्रंट सीट पर बैठा कर हवाखोरी के लिए जाता है| होमडिपो के बाहर ट्रक में अपने मालिक का ईंतजार करते हुए डेव ने कई बार अपने मालिक के खुले हुए पेप्सी के गिलास से चुस्कियाँ ली हैं और उसके मालिक को रत्ती भर भी नहीं पता चला| पर बेचारे बार्नी को यह सब नसीब नहीं| बार्नी को सबसे ज्यादा कोफ्त उस दिन होती है जब घर में कोई पार्टी होती है| एक बार ऐसी ही एक पार्टी में बार्नी एक काली सलवार पहने भीमकाय महिला को नया सोफा समझ कर उस पर कूद गया था| फिर जो बवाल हुआ तो पूछिए मत| वह दिन है और आजका दिन है, बार्नी को हर पार्टी वाले दिन बेसमेंट में नजरबंद कर दिया जाता है| पार्टी के बाद बचने वाले खाने को मजबूर किया जाना भी बार्नी को हरगिज पसंद नहीं| आखिर देशी मालिक अपनी फिक्र करें न करें बार्नी को अपनी फिगर का ख्याल रखना पड़ेगा वरना वह गारफील्ड की तरह बैडौल हो जायेगा| हलाँकि जैसा हम सोच रहे हैं, हो सकता है बार्नी ठीक उसका उल्टा सोच रहा हो| सुना है कि कुत्तों को पिछले जन्म की याद होती है| संभव है कि जब वह आरामदेह सोफे पर ठंडी हवा में पड़ा कुनमुना रहा हो तो उसके सपनों में पिछले जन्म की यादें तैर रहीं हो| तब उसका नाम शेरू था और वह मुजफ्फरनगर के शामली कस्बे में रहता था|इस जन्म में वह सिर्फ Sitaram Yechuri की तरह भौंकता है|शामली में शेरू भौंकनें के अलावा काटना भी जानता था| वह गलियों का राजा था और रात बेरात को किसी चोर उच्चके की हिम्मत नहीं होती थी कि उसकी गली में घुस जाये| भिखारियों, रद्दी बेचने वालों या राह भटके मुसाफिरों को दौड़ा कर उनके घर छोड़ना या किसी नाली में गिरा देना उसे अलौकिक आनँद की अनुभूति कराता था| इस नेक काम में उसके यार दोस्त मोती, कालू, पीलू , लालू , कजरा , झबरा ईत्यादि नाम के कुत्ते भरपूर साथ देते थे| अमेरिका की तरह वहाँ कोई बंदिश नहीं थी| यहाँ सिर्फ नाम की आजादी हासिल है| अदृश्य लक्ष्मण रेखाओं से घिरी है बार्नी की दुनियाँ| पिछले जन्म में शामली वाले शेरू को पूरी आजादी थी|जब चाहो भौंको , जिसको चाहो काटो, जहाँ चाहो घूमों| गली गली में शेरू का नाम था| उसके शायर दोस्त झबरा ने उसकी शान में एक बार क्या कसीदा पड़ा था|
शान हो तो ऐसी जैसी है शेरू भाई की शान!
जिस गली से भी निकल के जाते हैं,
पिल्ले चिल्लाते हैं अब्बा जान, अब्बा जान!!
यहाँ कि तरह वहाँ किसी से मिलने, अपाईंटमेंट लेकर नहीं जाना पड़ता था| किसी भी नयी कार या स्कूटर को दाँयी तरफ की पिछली टाँग उठा कर पवित्र करने का उसे जन्मसिद्ध अधिकार हासिल था|वहाँ कल्लू हलवाई का बचा खाना भी क्या लजीज और मसालेदार होता था, उस खाने को धर्मपाल दूधवाले की मरखनी गाय से बाँटना उसे बिल्कुल पसंद नहीं था| उस खबीस गाय को खदेड़ कर भगाने के बाद, वह खुद को सामने दीवार पर लगे पोस्टर में बंदूक लहराते मिथुन चक्रवर्ती से कम नहीं समझता था|सबसे ज्यादा तो उसे इस जन्म का कभी खत्म न होने वाला सन्नाटा सालता है| जब वह पिछले जन्म का शेरू था तो गली में बजने वाले लाउडस्पीकर पर आई एम ए डिस्को डाँसर सुनते ही उसका दिल बल्लियों उछलता था| अमेरिकी गाने तो खैर उसे कभी सुहाए नहीं, अब भारतीय फिल्म के गानों में भी वह बात नहीं रही| अमेरिका की तरह उसे वहाँ हर छमाही पर डाक्टर के यहाँ फालतू के चेकअप के लिए नहीं जाना पड़ता था|शामली में मुफलिसी थी पर जिंदादिली में कहीं से कमीं न थी| एक वह जिंदगी थी जो चलती रहती थी, जिसमें धक्के थे पर धड़कन भी थी| खींचतान थी पर रिश्तों,यार दोस्तों की खूशबू भी थी| दोस्त थे, यार थे जिनके बीच बोलने से पहले सोचना नहीं पड़ता था कि आखिर क्या बात की जाये|
अरे यह मैं क्या सोच रहा हूँ| हद है, सोंचते सोंचते स्थिति बड़ी शोचनीय हो गई है| सामने सोफे पर पड़े अलसाते कुत्ते के ख्यालों मे मैं भला क्यों अतिक्रमण कर रहा हूँ| सोंच रहा था कि सामने पड़ा बार्नी क्या सोच सकता है और सोंचते सोंचते मैंनें अपनी सोंच का घालमेल खामखाँ बार्नी की सोच से कर डाला|चाहे अमेरिका हो या भारत दोनों लोकताँत्रिक राष्ट्र हैं और मुझे कोई हक नहीं बार्नी पर अपनी सोंच लादने का| लगता है कि यह फलसफा दूर का ढोल बनता जा रहा है जो हमेशा दूर से ही सुहावना दिखता है| भारत में रह कर अमेरिका अच्छा लगता था या दूसरे शब्दों में सपना था या तो अमेरिका जाना या भारत में ही अपना एक अमेरिका बनाना| अब यहाँ आने के बाद जेब में भारतीय पासपोर्ट और मन में विलायती सपने! दोनों के मेल से एक नए देश, नई ज़मीन, नए माहौल में बसने की प्रक्रिया अपने आप में लंबी और जटिल है| किसी ने सच कहा है जब हम भारत की सरहद को छोड़ते हैं तो हमारा प्यारा भारत एक डिजिटल फोटो की तरह हमारे जेहन में चस्पां हो जाता है| फिर चाहे बालीवुड माधुरी दीक्षित से अंतरामाली तक पहुँच जायें, हमारे कानों में वहीं गीत(काँटा लगा कतई नहीं) गूँजते हैं, वही दृश्य घुमड़ते हैं जैसे हमने वतन छोड़ते वक्त देखे थे| हम वापस जाना चाहते हैं उसी भारत में जैसा छोड़ कर आये थे, और साथ ले जाना चाहते हैं वह सब जो अर्जित किया है| पर क्या कानपुर में I-285 जैसे हाईवे संभव हैं? खैर यह बहस तो दशकों से चल रही है और तब तक चलेगी जब तक अमरीकी जनता न्यूयार्क की 64th Street पर H1B के लिए लाईन लगाना शुरू न कर दे| फिलहाल मैं बार्नी के दिमाग से बाहर आता हूँ वरना लोग कहेंगेः

तेरे ईश्क, तेरी याद ने मुझे ईंसान से कुत्ता बना दिया|
यकीन न आये तो भौंक कर दिखाऊ, भौं भौं?

7 comments:

इंद्र अवस्थी said...

भौं-भौं की ज़रूरत नहीं, हम ऐसे ही बड़े 'गलिबल' हैं और फिर जोर दे रहे हो!

बार्नी के बहाने एन आर आई जमात की बड़ी मौज ली है, क्या अपने किसी पड़ोसी की सत्यकथा सुना रहे हो जितेन्दर की तरह?

सपने, 'नास्टेल्जिया',हकीकत आदि का मिश्रण बहुत ही कल्लू हलवाई की मिठाइयों की तरह स्वादिष्ट बना है.

अनूप शुक्ला said...

अपने बहाने कुत्ते का दर्द और कुत्ते के माध्यम से अपनी पीड़ा बड़ी खूबसूरती से बतायी आपने.दिन पर दिन आपके लेख ज्यादा पठनीय (दुबारा/ तिबारा भी)होते जा रहे हैं.इसी किसी अवसर के लिये ग़ालिबने कहा है:-

इश्क(परदेश)ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया,
वर्ना आदमी हम भी थे काम के.

Atul Arora said...

तारीफ के लिए आप सब का शुक्रिया| दिमाग की फैक्ट्री में विचार घुमड़ते रहते हैं| देर बस वक्त मिलने की होती है कि बस कब उनको पकड़ा जाये और शब्दों का रूप दिया जाये| कभी कभी दो तीन विचार आपस में गड्ड मड्ड हो जाते है और नतीजें में ऐसी ही व्यथाऐं निकलती हैं| पूरा लेख लिख डालने के बाद मैं यह फैसला नही कर पा रहा हूँ कि यह मसखरेपन की श्रेणी में आयेगा या कटाक्ष या फिर तमाम सारे विचारों का जमालघोटा कहलायेगा|

Kalicharan said...

" Muflisi main jindadili " in teen shabdon main aapne adhinkansh "NRI - Non Reliable Indians" ki nostalgic nabaz ko pakad liya Atul Ji.

485 retrogression http://www.murthy.com/nflash/nflash9.html ne depression main bhej diya Atul,
Upar se aap nostalgia ke geele sonte maar rahe ho.

Maaaa main aa raha hun Maaaaaa.

Jitendra Chaudhary said...

बेहतरीन लेख, जबरदस्त शैली और तीखे कटाक्ष......
एक अच्छे लेख के लिये बधाइया.

कुत्ते के बहाने, NRI कि दुखती रग पर हाथ रखा है आपने....
परेशानी तो यही है कि "हम वापस जाना चाहते हैं उसी भारत में जैसा छोड़ कर आये थे, और साथ ले जाना चाहते हैं वह सब जो अर्जित किया है| पर क्या कानपुर में I-285 जैसे हाईवे संभव हैं?"
हम जाने कब इस उधेड़बुन से बाहर निकलेंगे, या शायद क्या कभी निकल भी पायेंगे?

Steve Austin said...

I like yuor blog. Please check out my pet dog blog.

jon said...

I was searching for dog health info and found this post. I agree totally!

Paul