27 December 2004

एक आदर्श पार्किंग लाट की तलाश में!


parking

जो जमीन सरकारी है! वह जमीन हमारी है!


मान लीजिए कि आप छुट्टी वाले दिन परिवार के साथ खरीदारी करने शापिंग माल, या किसी मशहूर जगह, या यूँ ही कहीं घूमने फिरने जाते हैं| आप देखते हैं कि पार्किंग लाट ठसाठस भरा है| कार की पिछली सीट पर कारसीट में पिछले एक घंटे से बँधे बच्चों के सब्र का बाँध अब टूट चुका है और उन्होंने अपनी चिल्लपों से आपकी कार गुलजार कर रखी है| या फिर आपको कार पार्क करने की जल्दी लघुशंका,दीर्घशंका या फिर किसी और ही शंका (शायद आपने अपने कालेज के जमाने की किसी शोख नाजनीन को किसी कार से उतर कर जाते हुए देखा है) की वजह से है| आपके दो तीन पंक्तियों में व्यर्थ घूमने के बाद अचानक आपकी पत्नी आपको अगली पंक्ति के आखिरी लाट की ओर ईशारा करती है जो अभी तक खाली है| आप उस ओर जय बजरंगबली कहते हुए कार भगाते हैं कि अचानक दूसरी तरफ से एक कार आती है और वह खाली लाट को आपके मुँह से निवाले की तरह छीन लेती है| हैरान न होइये, आपका पाला अभी-अभी पार्किंग लाट के लुटेरे से पड़ा है| ऐसी घटनाऐं अक्सर होती हैं| इन घटनाओं ने मुझे पार्किंग स्थल पर एक छोटा सा शोध करने की प्रेरणा दी|
प्रस्तुत है पार्किंग स्थल पर एक छोटा सा शोध :
पार्किंग लाट में चार तरह के जीव पाये जाते हैं|
खोजी शिकारी: ऐसे कारचालक आदर्श पार्किंग लाट मिलने तक उसे नारायण की तरह ढूँड़ने में यकीन रखते हैं| आदर्श पार्किंग लाट को लेकर इनके अपने मापदंड होते हैं , जैसे कि जो पार्किंग लाट छाँव में हो, जिससे गंत्वय तक सबसे कम चलना पड़े , या फिर जिसके बगल में कोई भी खटारा गाड़ी पार्क न हो| ईच्छानुसार पार्किंग लाट मिलने तक यह व्याकुल आत्माऐं पार्किंग लाट की तीन चार पंक्तियों के चक्कर लगाती रहतीं हैं| ऐसा कारचालक पार्किंग लाट अपने आगे पीछे दिखने पर उससे दूरी बनाये रखने में ही भलाई है|
धैर्यशाली चिड़ीमार: ऐसे कारचालक पहली श्रेणी के कारचालकों से थोड़े ज्यादा मात्रा में आलसी होते हैं| पसंद तो इनकी भी होती है पर यह उसके लिए चक्कर लगाने कि जगह किसी कोने में बगुला भगत की तरह खड़े रहते हैं और मनचाहा लाट मिलने पर तुरंत झपट्टा मारते हैं| इस श्रेणी की एक उपश्रेणी पैदा हो गई है, देशी चिड़ीमार| ऐसे जंतु, व्यस्त भारतीय बाजारों (विदेशों में गिने चुने शहरों में जहाँ एक साथ कई भारतीय दुकाने हों) में पाये जाते हैं| चूँकि इनकी प्रतिस्पर्धा देशी लोगों से ही होती है अतः विशुद्ध देशी तरीका ईजाद किया है इन लोगों ने| बाजार पहुँचने पर यह लोग किसी कोनें में कार खड़ी कर अपने साथ आये माता,पिता,सास,ससुर या फिर बीबी को पार्किंग स्थल पर भेज देते हैं, जो कोई भी पार्किंग लाट खाली होते ही उसके बीच में अँगद के पाँव की तरह जम जाते हैं और अपनी कार को आने का ईशारा कर देते हैं| अब नजदीक खड़ा कारवाला बेचारा टापता रह जाता है और दूर खड़ा इस अँगद के पाँव का रिश्तेदार शान से चेहरे पर अमरीशपुरी स्टाईल वाली मुस्कान लिए कार पार्क करने आ जाता है|
जासूस: यह लोग ताक में रहते हैं दुकान से थैले लेकर बाहर निकलते ग्राहकों के| यह अपनी कार से उनका पीछा उनके वाहन के पार्किंग लाट तक करते हैं| इन्हें आप चोर या लुच्चा लफंगा न समझे| यह तो बस आपके पार्किंग लाट को खाली करने के ताक में रहते हैं , तब तक इनके पीछे वाहनों की कतार भी लग जाये , इनके कानों पर जूँ नहीं रेंगती| इनकी वजह से वह लोग भी परेशान होते हैं, जो अपनी कार में तसल्ली से सामान रखना चाहते हैं| अब यहाँ सिक्के के दो पहलुओं की तरह दो तरह के लोग हो सकते हैं| एक तो वह जिसे थैलो से लंदे फंदे , अपनी कार में पहुँचने पर न सिर्फ सामान सलीके से रखना है, बल्कि अपने झगड़े पर ऊतारू दोनों बच्चों को भी शांत करके बैठाना है| इस व्यक्ति की मुश्किलों का कहीं अंत नहीं, क्योकि कार के बाहर एक धैर्यहीन आत्मा उसके पार्किंग लाट से हटने के ईंतजार में रास्ता रोको आंदोलन किये है और धैर्यहीन आत्मा के पीछे की सारी कारें हार्न बजा बजा कर आसमान सिर पर उठायें हैं, जब्कि कार के अंदर बच्चे गदर काटे हैं कि उनका कोई प्रिय सामान जल्दबाजी में डिक्की (trunk) में रख दिया गया है और बच्चे घर पहुँचने तक सब्र करने को कतई तैयार नहीं | वहीं सिक्के का दूसरा पहलू भी हो सकता है| ऐसा मेरे साथ अक्सर देशी मार्केट में ही हुआ है , जब किसी मशहूर और बड़े ईंडियन स्टोर के बाहर मैं अपनी कार में बैठा किसी ग्राहक को पार्किंग लाट तक जाते देखता हूँ तो तसल्ली से कार उसके पीछे लगा देता हूँ कि वह भाईसाहब चैन से अपना सामान रखकर बाहर निकलें और मैं अपनी कार लगाऊँ| पर कई बार ऐसे भाईसाहब पूरी बेफिक्री से सामान रखते हैं फिर कार का दरवाजा बंद कर बगल के डोसे वाली दुकान ओर चल देते हैं | वह सीन बिल्कुल हिंदी फिल्म के सीन की तरह होता है, वह लापरवाह भाईसाहब जो आपको पहले ईशारा करने की जहमत उठा सकते थे , आपको किसी बेवकूफ की तरह ईंतजार करता रहने देते हैं और फिर कादर खान की तरह नजर फेर कर चल देते हैं क्योकि उनमें आपसे नजर मिलाने का साहस नहीं| आपकी स्थिति रस्सी से बँधे, गुस्से से फड़फड़ाते शोले के धर्मेंद्र की तरह है जो कुछ कर नहीं सकता, जब्कि उन बदतमीज भाईसाहब की श्यामवर्णा बीबी आपकी ओर कनखियों से अरूणा ईरानी की तरह व्यंग्य भरी कुटिल नजर फेंकना नहीं भूलती|
बेपरवाह: इस तरह के लोग हमेशा सबसे दूर वाले पार्किंग लाट में गाड़ी लगाना पसंद करते हैं| यह लोग पाँच तरह के हो सकते हैं

  • कुवाँरे

  • बिना बच्चों वाले युवा दंपत्ति

  • मस्तमौला

  • वजन घटाने पर अमादा व्यक्ति जिसे ज्यादा से ज्यादा पैदल चलने की सलाह दी गई हो

  • ऐसा खब्ती जिसे हमेशा किसी अनाड़ी ड्राईवर के द्वारा अपनी प्यारी कार ठोंक दिये जाने या फिर खरोंच लगने का फितूर सवार रहता है


यहाँ पार्किंग में होने वाले दो झमेलों का जिक्र करना प्रासंगिक रहेगा| बड़े शहरों में खासतौर पर न्यूयार्क में, गैराज में पार्क करना खासा महँगा पड़ता है जब्कि स्ट्रीट पार्किंग सस्ती होती है| पर स्ट्रीट पार्किंग में चवन्नी डालने का झंझट है| अक्सर आपके पास समुचित मात्रा में रेजगारी नहीं होती| ऐसी स्थिति में आपको आसपास की दुकान से खाँमखा में च्यूईंगम वगैरह खरीदना पड़ता है| दूसरा झमेला अमेरिका में बने कुछ मंदिरों का है| इनके व्यवस्थापक या तो पचास साल पहले भारत से आये होंगे या फिर यह लोग जरूर भारत सरकार के किसी योजना मंत्रालय में काम कर चुके होंगे| जिस तरह भारत में कोई भी सरकारी योजना बनाते हुए जनता की सुविधा सबसे बाद में देखी जाती है , उसी तरह यह व्यवस्थापक भी सस्ती जमीन और अपने घर से मंदिर की निकटता पहले देखते हैं , चाहे वहाँ फकत दस बीस पार्किग लाट बनाने की जगह ही मिल पाये| अक्सर ऐसी जगह कार दूर गली में कार लगानी पड़ती हैं| लौटने के बाद अक्सर कार पर खरोंच या कोई शीशा चटका मिलता है या हो सकता है अवैध स्थल पर पार्किग करने की वजह से आपकी कार ही क्रेन से उठा ली गयी हो| आप भले ही जुर्माना अदा करने के बाद नास्तिक बन दुबारा मंदिर न आनें की कसम खा लें, पर मंदिर के हमेशा जारी रहने वाले निर्माणकार्य के लिए चंदे वाले गुजारिशी पत्र आपके घर पर अनवरत पहुँचते रहेंगे|

व्यस्त स्थलों पर पार्किंग लाट के लिए मगजमारी को एक अमेरिकी महिला ने ईन सटीक शब्दों मे व्यक्त किया "व्यस्त स्थलों पर पार्किंग लाट मिलना बिल्कुल अच्छा जीवन साथी पुरूष तलाश करने के बराबर है| जितने भी ढंग के होंगे वह पहले ही किसी के हो चुके होंगे| बचे हुए तो ज्यादातर disabled ही मिलते हैं जो अपने किसी काम के नही| "

6 comments:

Anonymous said...

अतुल जी,

बहुत बढ़िया। आप को तो किसी शोध संस्थान में काम ढूंढना चाहिए। देसी बाजार के बाहर रास्ता रोके हुए पार्किंग लॉट का इंतजार और फिर कार निकालने वाले व्यक्ति का डोसा खाने निकल जाने वाला किस्सा बड़ा पंसद आया।

पंकज

अनूप शुक्ला said...

पत्नियां तुलनात्मक अध्ययन में कहना शुरु कर सकती हैं-मेरे ये तो इतने स्मार्ट हैं कि आजतक कभी ऐसा नहीं हुआ जब मुझे कभी नीचे खड़े होकर गाड़ी पार्क करने के 'वेट'करना पड़ा हो.लड़कियां कह सकती हैं-हालांकि मेरा व्बायफ्रेंड देखने में बेवकूफ सा लगता है 'बट'पार्किगलाट 'ग्रैब'करने में 'ही इज सो परफेक्ट दैट आय कान्ट इवेन
इमेजिन लिंविंग बिदाउट हिम'.बधाई.

अनूप शुक्ला said...

पत्नियां तुलनात्मक अध्ययन में कहना शुरु कर सकती हैं-मेरे ये तो इतने स्मार्ट हैं कि आजतक कभी ऐसा नहीं हुआ जब मुझे कभी नीचे खड़े होकर गाड़ी पार्क करने के 'वेट'करना पड़ा हो.लड़कियां कह सकती हैं-हालांकि मेरा व्बायफ्रेंड देखने में बेवकूफ सा लगता है 'बट'पार्किगलाट 'ग्रैब'करने में 'ही इज सो परफेक्ट दैट आय कान्ट इवेन
इमेजिन लिंविंग बिदाउट हिम'.बधाई.

Jitendra Chaudhary said...

बहुत सही बरखुरदार....सही नब्ज पर हाथ रखा है.
एकदम सही और सटीक वर्णन...
हम भी पार्किंग प्रोबलम से जूझते है, पार्किंग से ज्यादा अनाड़ी ड्राइवरो से.......जो किसी तरह से गाड़ी घुसेड़ तो देते है, लेकिन गाड़ी निकालने मे अगल बगल की गाड़ी वालों को हनुमान चालीसा पढने पर मजबूर कर देते है.

Arun Kulkarni said...

सही है भिडू

Raman said...

अतुल जी,

धीरे धीरे सारे हिन्दी चिट्ठों को पढ़ रहा हूं .. आपका ये मनोरंजक लेख पढ़ के हंस हंस के मज़ा आ गया .. आपकी भाषा मुहावरेदार और तीखे, तेजतरार्र शब्दों से भरपूर है ...