28 December 2004

लालू प्रसाद यादव...


Akshargram Anugunj



फिल्म ताल के एक दृश्य में, मीता वशिष्ठ जो आलोक नाथ की बहन बनी है कहती हैं "भाई साहब, विक्की भले ही शातिर दिमाग हो पर दिल से बिल्कुल देहाती है|" दरअसल आलोक नाथ को विक्की में ईक्कसवीं सदी के शातिर भारतीय युवक के सारे लक्षण मौजूद होने के कारण उन्हें विक्की अपनी बेटी से शादी के लिए पसंद नहीं है, पर मीता वशिष्ठ के अकाट्य तर्क से वह हथियार डाल देते हैं| यही इस आलेख का सूत्रवाक्य है| हम भारतीय चाहे दिल से कितने भी आधुनिक क्यों न हों, सादगीपूर्ण व्यक्तित्व ही पसंद करते हैं| जब कस्बे और गाँवों में रहने वाला समाज अपने नेतृत्व को हाथ में सेलफोन , बगल में लैपटाप दबाये फीलगुड, पोटा ईत्यादि चीखते हुए देखता है तो उसे अपने से कटा हुआ महसूस करता है| उसकी समस्याऐं पचास साल में भी बदली नहीं है वही रोटी, वही पानी वही सड़क और वही समाज के उच्च वर्ग द्वारा शोषण| लालू प्रसाद रोटी सड़क दें या न दें, शोषण के खिलाफ मजलूमों को आवाज जरूर दे देंते हैं और यही उनकी सफलता के कारणों में एक है| सामान्य जनता का मन अभी भी अपने नेता में राजा हरीशचंद्र की छवि ढूढता है जो वेष बदल कर राज्य का पुरसाहाल लेता था|




यही ईमेज चलती है जनता के बीच!

जाहिर है एक ओर अगर रेलों में ईंटरनेट जैसी विशुद्ध अमेरिकी सुविधाऐं देने की बात करने वाले नेता हो दूसरी ओर रेलवे स्टेशन पर छापे मारने के सस्ते परंतु लोकप्रिय लालूवादी तरीके, तो भले ही दोनों जनता का धन लूटने के मामलें में एक ही थैली के चट्टे बट्टे हों, जनता जुड़ाव तो राजा हरीशचंद्र से ही करेगी बिल गेट्स से नही| चाहे लालू हों या मायावती दोनो समाज के शोषित वर्ग को समाज के उच्च वर्ग के खिलाफ खड़ा होने का हौसला देते हैं और इसीलिए उनके सर्वेसर्वा बने बैठे हैं| उदाहरण साफ है, जब मोहल्ले के पंडित और ठाकुर त्रिशूल यात्रा निकालते हैं तो कभी दलित वर्ग उनके साथ खड़ा होता है, नहीं| क्योकि उन्हे समझा दिया गया है कि रामजन्मभूमि के मलबे में कोई ऊँची जातवाला दबके नहीं मरा, वह सब तो बस नीचे खड़े नारे लगाते रहे| इसीलिए यह वर्ग महारैला में सवर्णों को लाठी चमका कर ही खुश हो लेता है, फिर चाहे पाँच साल भ्रष्टाचार में पिसता रहे| लालूश्री देहाती ही बने रहना चाहते हैं और वैसे ही दिखना चाहते हैं जैसा कि उनका वोटरवर्ग है| अगर उन्होनें हेयरस्टाईल या बोलने का लहजा बदला तो जनता कोई और लालू ढूढ लेगी| अभिजात्य वर्ग, जो राल्फ लारेन पहनना और वर्सेज लगाना सीख चुका है, अब देहाती भारतीयों को लाफिंग मैटर समझता है, इसीलिए उसे लालू भी विदूषक लगते हैं| अब जरा विषय को हल्के अँदाज की ओर मोड़ते हुए एक सच्ची परंतु मनोरंजक घटना का जिक्र करता हूँ| कुछ साल पहले जब शरद यादव केंद्रीय मंत्री थे ‌और लालू विपक्ष में, तब लालू जी ने "यह आईटी वाईटी क्या होता है?" कह कर एक नयी बहस को जन्म दे दिया| दिल्ली के प्रगतिमैदान में आईटी मेला लगा था और एक दिन लालू अपने चेले चपाटों के साथ मेले में पहुँच गये | आयोजकों को किसी हंगामें का डर सताने लगा| पर लालू चहलकदमी करते हुए वेबदुनिया के स्टाल पहुँच गये| हिंदी में चलती वेबदुनिया की साईट से उन्हे कौतूहूल हुआ| वेबदुनिया के संचालक जोश में आकर लालू जी के प्रश्नों का उत्तर देने लगे| किसी ने उन्हे बहुभाषी ईमेल सुविधा के बारे में बताया| लालूजी को यह जानकर निराशा हुई कि भोजपुरी वेबदुनिया की सूची में शामिल नहीं थी| पर उन्होनें एक ईमेल एकाउँट खोला और देवनागरी का प्रयोग करके पटना के किसी प्रशासनिक अधिकारी को भोजपुरी में ईमेल भेज मारी| पंडाल के बाहर संवाददाताओं के सवालो की बौछार का उन्होनें अपनी चिरपरिचित शैली में जवाब दिया "देखिए, हम आईटी का इसलिए विरोध करता हूँ क्योकि ई सब कंपूटर अंग्रेजी में चलता है| इससे गरीब गुरबा का क्या भला होगा? पर ई वेबदुनिया वाले अच्छा काम किये हैं, अभी हिंदी में कंपूटर चालू हैं, वादा किये हैं कि भोजपुरी भी लायेंगे कंपूटर पर| हम इस चीज से बहुत खुश हूँ|" खैर अगले दिन लालूजी की फोटो छपी पेपरों में ईमेल करते हुए और आईटी के पुरोधाओं ने चैन की साँस ली|




कंपूटर चालू हैं
पर उसी दिन माननीय केंद्रीय मंत्री शरद यादव प्रगतिमैदान पहुँचे| विभिन्न कंपनियों के स्टालो का अवलिकन करने के दौरान उन्हें कोई वेबदुनिया के स्टाल खींच ले गया यह कह कर कि कल लालू वहाँ गये थे और रंग जमा गये अपना| शरद यादव भी फोटो खिंचाते रहे | तभी किसी चमचे ने कहा "मंत्री जी, कल लालूजी ने ईमेल करी थी, आप भी करिए|" शरद जी ताव में कंप्यूटर कंप्यूटर के सामने बैठ गये और तामील किया वेबदुनिया के संचालक को कि "हमें भी ईमेल करनी है|" संचालक ने कहा "मंत्रीजी, पहले आप एकाउँट खोलिए|" यह सुनते ही शरद जी किंकर्तव्यविमूढ हो गये और उन्होने अपने सचिव को तलब किया| उन्होंने बड़े भोलेपन से सचिव से कहा , "भाई, यह कह रहे हैं कि ईमेल करने के लिए एकाउँट खोलना जरूरी है| पर मेरे पास इस वक्त कैश नहीं है, अब ईमेल कैसे करूँ?"

27 December 2004

एक आदर्श पार्किंग लाट की तलाश में!


parking

जो जमीन सरकारी है! वह जमीन हमारी है!


मान लीजिए कि आप छुट्टी वाले दिन परिवार के साथ खरीदारी करने शापिंग माल, या किसी मशहूर जगह, या यूँ ही कहीं घूमने फिरने जाते हैं| आप देखते हैं कि पार्किंग लाट ठसाठस भरा है| कार की पिछली सीट पर कारसीट में पिछले एक घंटे से बँधे बच्चों के सब्र का बाँध अब टूट चुका है और उन्होंने अपनी चिल्लपों से आपकी कार गुलजार कर रखी है| या फिर आपको कार पार्क करने की जल्दी लघुशंका,दीर्घशंका या फिर किसी और ही शंका (शायद आपने अपने कालेज के जमाने की किसी शोख नाजनीन को किसी कार से उतर कर जाते हुए देखा है) की वजह से है| आपके दो तीन पंक्तियों में व्यर्थ घूमने के बाद अचानक आपकी पत्नी आपको अगली पंक्ति के आखिरी लाट की ओर ईशारा करती है जो अभी तक खाली है| आप उस ओर जय बजरंगबली कहते हुए कार भगाते हैं कि अचानक दूसरी तरफ से एक कार आती है और वह खाली लाट को आपके मुँह से निवाले की तरह छीन लेती है| हैरान न होइये, आपका पाला अभी-अभी पार्किंग लाट के लुटेरे से पड़ा है| ऐसी घटनाऐं अक्सर होती हैं| इन घटनाओं ने मुझे पार्किंग स्थल पर एक छोटा सा शोध करने की प्रेरणा दी|
प्रस्तुत है पार्किंग स्थल पर एक छोटा सा शोध :
पार्किंग लाट में चार तरह के जीव पाये जाते हैं|
खोजी शिकारी: ऐसे कारचालक आदर्श पार्किंग लाट मिलने तक उसे नारायण की तरह ढूँड़ने में यकीन रखते हैं| आदर्श पार्किंग लाट को लेकर इनके अपने मापदंड होते हैं , जैसे कि जो पार्किंग लाट छाँव में हो, जिससे गंत्वय तक सबसे कम चलना पड़े , या फिर जिसके बगल में कोई भी खटारा गाड़ी पार्क न हो| ईच्छानुसार पार्किंग लाट मिलने तक यह व्याकुल आत्माऐं पार्किंग लाट की तीन चार पंक्तियों के चक्कर लगाती रहतीं हैं| ऐसा कारचालक पार्किंग लाट अपने आगे पीछे दिखने पर उससे दूरी बनाये रखने में ही भलाई है|
धैर्यशाली चिड़ीमार: ऐसे कारचालक पहली श्रेणी के कारचालकों से थोड़े ज्यादा मात्रा में आलसी होते हैं| पसंद तो इनकी भी होती है पर यह उसके लिए चक्कर लगाने कि जगह किसी कोने में बगुला भगत की तरह खड़े रहते हैं और मनचाहा लाट मिलने पर तुरंत झपट्टा मारते हैं| इस श्रेणी की एक उपश्रेणी पैदा हो गई है, देशी चिड़ीमार| ऐसे जंतु, व्यस्त भारतीय बाजारों (विदेशों में गिने चुने शहरों में जहाँ एक साथ कई भारतीय दुकाने हों) में पाये जाते हैं| चूँकि इनकी प्रतिस्पर्धा देशी लोगों से ही होती है अतः विशुद्ध देशी तरीका ईजाद किया है इन लोगों ने| बाजार पहुँचने पर यह लोग किसी कोनें में कार खड़ी कर अपने साथ आये माता,पिता,सास,ससुर या फिर बीबी को पार्किंग स्थल पर भेज देते हैं, जो कोई भी पार्किंग लाट खाली होते ही उसके बीच में अँगद के पाँव की तरह जम जाते हैं और अपनी कार को आने का ईशारा कर देते हैं| अब नजदीक खड़ा कारवाला बेचारा टापता रह जाता है और दूर खड़ा इस अँगद के पाँव का रिश्तेदार शान से चेहरे पर अमरीशपुरी स्टाईल वाली मुस्कान लिए कार पार्क करने आ जाता है|
जासूस: यह लोग ताक में रहते हैं दुकान से थैले लेकर बाहर निकलते ग्राहकों के| यह अपनी कार से उनका पीछा उनके वाहन के पार्किंग लाट तक करते हैं| इन्हें आप चोर या लुच्चा लफंगा न समझे| यह तो बस आपके पार्किंग लाट को खाली करने के ताक में रहते हैं , तब तक इनके पीछे वाहनों की कतार भी लग जाये , इनके कानों पर जूँ नहीं रेंगती| इनकी वजह से वह लोग भी परेशान होते हैं, जो अपनी कार में तसल्ली से सामान रखना चाहते हैं| अब यहाँ सिक्के के दो पहलुओं की तरह दो तरह के लोग हो सकते हैं| एक तो वह जिसे थैलो से लंदे फंदे , अपनी कार में पहुँचने पर न सिर्फ सामान सलीके से रखना है, बल्कि अपने झगड़े पर ऊतारू दोनों बच्चों को भी शांत करके बैठाना है| इस व्यक्ति की मुश्किलों का कहीं अंत नहीं, क्योकि कार के बाहर एक धैर्यहीन आत्मा उसके पार्किंग लाट से हटने के ईंतजार में रास्ता रोको आंदोलन किये है और धैर्यहीन आत्मा के पीछे की सारी कारें हार्न बजा बजा कर आसमान सिर पर उठायें हैं, जब्कि कार के अंदर बच्चे गदर काटे हैं कि उनका कोई प्रिय सामान जल्दबाजी में डिक्की (trunk) में रख दिया गया है और बच्चे घर पहुँचने तक सब्र करने को कतई तैयार नहीं | वहीं सिक्के का दूसरा पहलू भी हो सकता है| ऐसा मेरे साथ अक्सर देशी मार्केट में ही हुआ है , जब किसी मशहूर और बड़े ईंडियन स्टोर के बाहर मैं अपनी कार में बैठा किसी ग्राहक को पार्किंग लाट तक जाते देखता हूँ तो तसल्ली से कार उसके पीछे लगा देता हूँ कि वह भाईसाहब चैन से अपना सामान रखकर बाहर निकलें और मैं अपनी कार लगाऊँ| पर कई बार ऐसे भाईसाहब पूरी बेफिक्री से सामान रखते हैं फिर कार का दरवाजा बंद कर बगल के डोसे वाली दुकान ओर चल देते हैं | वह सीन बिल्कुल हिंदी फिल्म के सीन की तरह होता है, वह लापरवाह भाईसाहब जो आपको पहले ईशारा करने की जहमत उठा सकते थे , आपको किसी बेवकूफ की तरह ईंतजार करता रहने देते हैं और फिर कादर खान की तरह नजर फेर कर चल देते हैं क्योकि उनमें आपसे नजर मिलाने का साहस नहीं| आपकी स्थिति रस्सी से बँधे, गुस्से से फड़फड़ाते शोले के धर्मेंद्र की तरह है जो कुछ कर नहीं सकता, जब्कि उन बदतमीज भाईसाहब की श्यामवर्णा बीबी आपकी ओर कनखियों से अरूणा ईरानी की तरह व्यंग्य भरी कुटिल नजर फेंकना नहीं भूलती|
बेपरवाह: इस तरह के लोग हमेशा सबसे दूर वाले पार्किंग लाट में गाड़ी लगाना पसंद करते हैं| यह लोग पाँच तरह के हो सकते हैं

  • कुवाँरे

  • बिना बच्चों वाले युवा दंपत्ति

  • मस्तमौला

  • वजन घटाने पर अमादा व्यक्ति जिसे ज्यादा से ज्यादा पैदल चलने की सलाह दी गई हो

  • ऐसा खब्ती जिसे हमेशा किसी अनाड़ी ड्राईवर के द्वारा अपनी प्यारी कार ठोंक दिये जाने या फिर खरोंच लगने का फितूर सवार रहता है


यहाँ पार्किंग में होने वाले दो झमेलों का जिक्र करना प्रासंगिक रहेगा| बड़े शहरों में खासतौर पर न्यूयार्क में, गैराज में पार्क करना खासा महँगा पड़ता है जब्कि स्ट्रीट पार्किंग सस्ती होती है| पर स्ट्रीट पार्किंग में चवन्नी डालने का झंझट है| अक्सर आपके पास समुचित मात्रा में रेजगारी नहीं होती| ऐसी स्थिति में आपको आसपास की दुकान से खाँमखा में च्यूईंगम वगैरह खरीदना पड़ता है| दूसरा झमेला अमेरिका में बने कुछ मंदिरों का है| इनके व्यवस्थापक या तो पचास साल पहले भारत से आये होंगे या फिर यह लोग जरूर भारत सरकार के किसी योजना मंत्रालय में काम कर चुके होंगे| जिस तरह भारत में कोई भी सरकारी योजना बनाते हुए जनता की सुविधा सबसे बाद में देखी जाती है , उसी तरह यह व्यवस्थापक भी सस्ती जमीन और अपने घर से मंदिर की निकटता पहले देखते हैं , चाहे वहाँ फकत दस बीस पार्किग लाट बनाने की जगह ही मिल पाये| अक्सर ऐसी जगह कार दूर गली में कार लगानी पड़ती हैं| लौटने के बाद अक्सर कार पर खरोंच या कोई शीशा चटका मिलता है या हो सकता है अवैध स्थल पर पार्किग करने की वजह से आपकी कार ही क्रेन से उठा ली गयी हो| आप भले ही जुर्माना अदा करने के बाद नास्तिक बन दुबारा मंदिर न आनें की कसम खा लें, पर मंदिर के हमेशा जारी रहने वाले निर्माणकार्य के लिए चंदे वाले गुजारिशी पत्र आपके घर पर अनवरत पहुँचते रहेंगे|

व्यस्त स्थलों पर पार्किंग लाट के लिए मगजमारी को एक अमेरिकी महिला ने ईन सटीक शब्दों मे व्यक्त किया "व्यस्त स्थलों पर पार्किंग लाट मिलना बिल्कुल अच्छा जीवन साथी पुरूष तलाश करने के बराबर है| जितने भी ढंग के होंगे वह पहले ही किसी के हो चुके होंगे| बचे हुए तो ज्यादातर disabled ही मिलते हैं जो अपने किसी काम के नही| "

13 December 2004

देशी घर के विदेशी कुत्ते की पहचान का संकट




सपनो की रंगीली दुनिया!


भला सोचिए, एक अच्छा खासा सुव्यवस्थित भारतीय एनआरआई परिवार कुत्ता क्योंकर पालेगा? खैर हर बात की तरह इस बात का भी कोई गंभीर कारण होना ही चाहिए| घर के अधेड़ वय वाले गंजेपन की ओर बढते गृहस्वामी के लिए यह एनआरआईकरण की तरफ होती प्रगति में एक और तमगा साबित हो सकता है| वैसा ही काल्पनिक तमगा जो वह घर खरीदने के बाद,या गैराज में बेंज अथवा लेक्सस कार खड़ी करने के बाद या अपने बेसमेंट में ३५ ईंच का टीवी रखने के बाद हासिल करता है| घर में पल रही बार्बी डाल (कन्या) के लिए बाहर कुत्ता टहलाना पड़ोस के स्मार्ट लड़कों से जानपहचान बड़ाने का अच्छा माध्यम हो सकता है| साथ ही यह एक अप्रवासी परिवार में पलने से उपजी हीनभावना को दूर करने में भी सहायक है| उस लड़की के छोटे भाई के लिए तो कुत्ता एक अमेरिकन ड्रीम है बिल्कुल x-box, playstaion और ford mustang हासिल करने के स्वप्न की तरह| अलबत्ता गृहस्वामिनी के लिए यह एक अनचाहा सरदर्द जरूर हो सकता है पर कूपमंडूक बनने के लाँछन से बचने के लिए वह कुकुर महाराज को घर का सदस्य बनने से नही रोकती| पर एक देशी घर में पलने वाले विदेशी कुत्ते (क्षमा कीजिए, हलाँकि यहाँ अमेरिकी परिप्रेक्ष्य में परिवार विदेशी है और कुत्ता देशी) की मनोदशा पर कभी किसी ने गौर किया है| फर्ज कीजिए कि इस कुत्ते का नाम बार्नी है और पड़ोस के गोरे परिवार में रहने वाले कुत्ते का नाम डेव है| आखिर जिस घर में बार्नी को ताउम्र रहना है उस घर को लेकर उसके भी कुछ अरमान होते हैं| एयरकंडीशनर कि ठंडी हवा में अलसाते बार्नी के मनमस्तिष्क में क्या कुछ घुमड़ता रहता है| हो सकता है उसे बहुत कुछ अखरता हो| हो सकता है कि शाकाहारी भोजन खाने पर मजबूर वह बेचारा बार्नी डेव को मिलने वाले पौष्टिक माँसाहार से रश्क करता हो| किचन में या पूजाघर में घुसने पर पड़ने वाली गृहस्वामिनी की फटकार उसके आत्मसम्मान को चोट पहुँचाती होगी| हर शनिवार को डेव को उसकी छप्पन छुरी गोरी मालकिन के साथ फ्रिस्बी खेलते को देख कर बार्नी को अपनी मालकिन के साथ खेलने की हूक उठती होगी| पर बार्नी वह दिन भूल नहीं सकता जब वह अरमान भरे दिल से अपनी सोनी टीवी पर सास बहू का झोंटानुच्चवल वाला सीरीयल देख रही मालकिन के पास जाकर लड़ियाता था, उनके ध्यान न देने पर भौंका भी था पर बदले में बजाये फ्रिस्बी खेलने के, बेचारे बार्नी को मालकिन की चप्पल खानी पड़ी| हर सप्ताहाँत पर डेव को उसका मालिक अपने पिकअप ट्रक में फ्रंट सीट पर बैठा कर हवाखोरी के लिए जाता है| होमडिपो के बाहर ट्रक में अपने मालिक का ईंतजार करते हुए डेव ने कई बार अपने मालिक के खुले हुए पेप्सी के गिलास से चुस्कियाँ ली हैं और उसके मालिक को रत्ती भर भी नहीं पता चला| पर बेचारे बार्नी को यह सब नसीब नहीं| बार्नी को सबसे ज्यादा कोफ्त उस दिन होती है जब घर में कोई पार्टी होती है| एक बार ऐसी ही एक पार्टी में बार्नी एक काली सलवार पहने भीमकाय महिला को नया सोफा समझ कर उस पर कूद गया था| फिर जो बवाल हुआ तो पूछिए मत| वह दिन है और आजका दिन है, बार्नी को हर पार्टी वाले दिन बेसमेंट में नजरबंद कर दिया जाता है| पार्टी के बाद बचने वाले खाने को मजबूर किया जाना भी बार्नी को हरगिज पसंद नहीं| आखिर देशी मालिक अपनी फिक्र करें न करें बार्नी को अपनी फिगर का ख्याल रखना पड़ेगा वरना वह गारफील्ड की तरह बैडौल हो जायेगा| हलाँकि जैसा हम सोच रहे हैं, हो सकता है बार्नी ठीक उसका उल्टा सोच रहा हो| सुना है कि कुत्तों को पिछले जन्म की याद होती है| संभव है कि जब वह आरामदेह सोफे पर ठंडी हवा में पड़ा कुनमुना रहा हो तो उसके सपनों में पिछले जन्म की यादें तैर रहीं हो| तब उसका नाम शेरू था और वह मुजफ्फरनगर के शामली कस्बे में रहता था|इस जन्म में वह सिर्फ Sitaram Yechuri की तरह भौंकता है|शामली में शेरू भौंकनें के अलावा काटना भी जानता था| वह गलियों का राजा था और रात बेरात को किसी चोर उच्चके की हिम्मत नहीं होती थी कि उसकी गली में घुस जाये| भिखारियों, रद्दी बेचने वालों या राह भटके मुसाफिरों को दौड़ा कर उनके घर छोड़ना या किसी नाली में गिरा देना उसे अलौकिक आनँद की अनुभूति कराता था| इस नेक काम में उसके यार दोस्त मोती, कालू, पीलू , लालू , कजरा , झबरा ईत्यादि नाम के कुत्ते भरपूर साथ देते थे| अमेरिका की तरह वहाँ कोई बंदिश नहीं थी| यहाँ सिर्फ नाम की आजादी हासिल है| अदृश्य लक्ष्मण रेखाओं से घिरी है बार्नी की दुनियाँ| पिछले जन्म में शामली वाले शेरू को पूरी आजादी थी|जब चाहो भौंको , जिसको चाहो काटो, जहाँ चाहो घूमों| गली गली में शेरू का नाम था| उसके शायर दोस्त झबरा ने उसकी शान में एक बार क्या कसीदा पड़ा था|
शान हो तो ऐसी जैसी है शेरू भाई की शान!
जिस गली से भी निकल के जाते हैं,
पिल्ले चिल्लाते हैं अब्बा जान, अब्बा जान!!
यहाँ कि तरह वहाँ किसी से मिलने, अपाईंटमेंट लेकर नहीं जाना पड़ता था| किसी भी नयी कार या स्कूटर को दाँयी तरफ की पिछली टाँग उठा कर पवित्र करने का उसे जन्मसिद्ध अधिकार हासिल था|वहाँ कल्लू हलवाई का बचा खाना भी क्या लजीज और मसालेदार होता था, उस खाने को धर्मपाल दूधवाले की मरखनी गाय से बाँटना उसे बिल्कुल पसंद नहीं था| उस खबीस गाय को खदेड़ कर भगाने के बाद, वह खुद को सामने दीवार पर लगे पोस्टर में बंदूक लहराते मिथुन चक्रवर्ती से कम नहीं समझता था|सबसे ज्यादा तो उसे इस जन्म का कभी खत्म न होने वाला सन्नाटा सालता है| जब वह पिछले जन्म का शेरू था तो गली में बजने वाले लाउडस्पीकर पर आई एम ए डिस्को डाँसर सुनते ही उसका दिल बल्लियों उछलता था| अमेरिकी गाने तो खैर उसे कभी सुहाए नहीं, अब भारतीय फिल्म के गानों में भी वह बात नहीं रही| अमेरिका की तरह उसे वहाँ हर छमाही पर डाक्टर के यहाँ फालतू के चेकअप के लिए नहीं जाना पड़ता था|शामली में मुफलिसी थी पर जिंदादिली में कहीं से कमीं न थी| एक वह जिंदगी थी जो चलती रहती थी, जिसमें धक्के थे पर धड़कन भी थी| खींचतान थी पर रिश्तों,यार दोस्तों की खूशबू भी थी| दोस्त थे, यार थे जिनके बीच बोलने से पहले सोचना नहीं पड़ता था कि आखिर क्या बात की जाये|
अरे यह मैं क्या सोच रहा हूँ| हद है, सोंचते सोंचते स्थिति बड़ी शोचनीय हो गई है| सामने सोफे पर पड़े अलसाते कुत्ते के ख्यालों मे मैं भला क्यों अतिक्रमण कर रहा हूँ| सोंच रहा था कि सामने पड़ा बार्नी क्या सोच सकता है और सोंचते सोंचते मैंनें अपनी सोंच का घालमेल खामखाँ बार्नी की सोच से कर डाला|चाहे अमेरिका हो या भारत दोनों लोकताँत्रिक राष्ट्र हैं और मुझे कोई हक नहीं बार्नी पर अपनी सोंच लादने का| लगता है कि यह फलसफा दूर का ढोल बनता जा रहा है जो हमेशा दूर से ही सुहावना दिखता है| भारत में रह कर अमेरिका अच्छा लगता था या दूसरे शब्दों में सपना था या तो अमेरिका जाना या भारत में ही अपना एक अमेरिका बनाना| अब यहाँ आने के बाद जेब में भारतीय पासपोर्ट और मन में विलायती सपने! दोनों के मेल से एक नए देश, नई ज़मीन, नए माहौल में बसने की प्रक्रिया अपने आप में लंबी और जटिल है| किसी ने सच कहा है जब हम भारत की सरहद को छोड़ते हैं तो हमारा प्यारा भारत एक डिजिटल फोटो की तरह हमारे जेहन में चस्पां हो जाता है| फिर चाहे बालीवुड माधुरी दीक्षित से अंतरामाली तक पहुँच जायें, हमारे कानों में वहीं गीत(काँटा लगा कतई नहीं) गूँजते हैं, वही दृश्य घुमड़ते हैं जैसे हमने वतन छोड़ते वक्त देखे थे| हम वापस जाना चाहते हैं उसी भारत में जैसा छोड़ कर आये थे, और साथ ले जाना चाहते हैं वह सब जो अर्जित किया है| पर क्या कानपुर में I-285 जैसे हाईवे संभव हैं? खैर यह बहस तो दशकों से चल रही है और तब तक चलेगी जब तक अमरीकी जनता न्यूयार्क की 64th Street पर H1B के लिए लाईन लगाना शुरू न कर दे| फिलहाल मैं बार्नी के दिमाग से बाहर आता हूँ वरना लोग कहेंगेः

तेरे ईश्क, तेरी याद ने मुझे ईंसान से कुत्ता बना दिया|
यकीन न आये तो भौंक कर दिखाऊ, भौं भौं?

07 December 2004

चोला बदल कर पहचान छुपाने का अचूक मंत्र



शेर के लिए लोमड़ी की खाल पेश है!


११ सितंबर २००१ के बाद दुनिया काफी बदल गयी है अमेरिकी नागरिकों के लिए| अमरीकी सरकार की सारी कारगुजारियों का दंश झेलना पड़ता है अमेरिकी नागरिकों को, खासतौर से पयर्टकों को| एक तो खड़ूसपने की हद तक किए गये सुरक्षा ईंतजाम उसपर से ईराक में हुई कारगुजारियाँ| यूरोप में अक्सर अमेरिकी प्रतीक चिन्हों वाले कपड़े धारण किये यह पयर्टक किसी न किसी अनचाही राजनीतिक बहस में घसीट लिए जाते हैं| उनपर फिकरेबाजी होना, होटल या बार में प्रवेश न मिलना भी आम बात हो गई है| लेकिन अब अमेरिकी नागरिकों को अब यूरोप भ्रमण के दौरान जलालत झेलने से बचने का अचूक नुस्खा मिल गया है| भला हो एक कंपनी का जिसने go canadian पैकेज ईजाद कर दिया है| अब अमेरिकी नागरिक कैनेडियन प्रतीक चिन्हों वाले कपड़े धारण कर शान से यूरोप विचरण कर सकते हैं| ईस पैकेज में टीशर्ट, टूरिस्ट बैग पर लगाने के लिए प्रतीक चिन्ह और कैनेडियन स्टाईल वाली ईंगलिश बोलना सिखाने How to Speak Canadian, Eh की किताब है| जय हो उपभोक्तावाद की| वैसे मौके का फायदा उठा के अमेरिकीयों को भारत भ्रमण के लिए भी खींचा जा सकता है| जब हमें विदेशी कांग्रेस अध्यक्ष स्वीकार्य है तो अमरीकी पयर्टकों की विदेशी मुद्रा तो शिरोधार्य होनी चाहिए| कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना पड़ेगा|
  • फील गुड का स्लोगन पयर्टन विभाग से उड़ाकर चुनाव प्रचार की सामग्री न बनायी जाये|

  • वैसे अमेरिकी हर किस्म का माँस खाते हैं पर छिपकली शायद ही पसंद करें|

  • लखनऊ के कठमुल्लों को कोई जाकर समझा दे कि परायी आग में यह लोग हमेशा अपना घर जलाने क्यों दौड़ पड़ते हैं?