20 December 2005

अवकाश

प्रिय पाठकों व साथियों
कुछ अति महत्वपूर्ण योजनाओं को पूर्ण करने हेतु लेखन से अवकाश लेने का निर्णय लिया है। फुरसत मिलने पर रोजनामचा फिर हाजिर होगा। तब तक के लिये विदा। अब तक मेरे लेखन को प्रोत्साहन देने के लिये आप सबका मैं तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ।

सादर
अतुल

14 December 2005

अनुगूँज १६: (अति)आदर्शवादी संस्कार सही या गलत?


साथी चिठ्ठाकारो के विचार जानने से कुछ ऐसा विचार उभरता दिख रहा है कि मानो हमें बचपन में राजा बेटा बनने की घुट्टी जबरन पिला दी गयी हो। हमें तो मुन्ना भाई बनना चाहिये था। मेरे ख्याल से कमी वहाँ शुरू होती है जहाँ हम गाँधीवाद का पालन करते करते भीरू बन जाते हैं। कुछ उदाहरण काफी हैं:


  • बचपन से सिखाया जाता है कि एक अच्छे नागरिक को पँक्तिबद्धता का पालन करना चाहिये। जब हम किसी मुन्ना भाई या रामखिलावन सरीखे किसी छुटभैये नेता को राशन या टिकट खिड़की की लाईन को अँगूठा दिखाते दिखते हैं तो कहाँ चला जाता है समाज का आदर्शवाद। क्यों दिखाते हैं हम अत्याचारी को अपना दूसरा गाल एक और चाँटा मारने के लिये। अमेरिकी वालमार्ट की तरह इन लोगो की सामाजिक धुलाई क्यो नही कर देते।
  • कालेज में एडमिशन के लिये घूस का रोना रो सकते हैं पर एक विरोध प्रदर्शन करने में नानी क्यों मरती है हमारी?
  • नेताओं के भ्रष्टाचार पर रोना मचाते है तो फिर क्यों वोट देते समय जाति देखते हैं, तब कहाँ चला जाता है हमारा आदर्शवाद।

कुल मिलाकर मुझे लगता है कि कमी आदर्शवाद के पालन में नही उसके अधूरे पालन में है। सिर्फ एकला चलो नीति से भला होने वाला नही हमारे समाज का। एक और बात जो मुझे अब तक याद है "कि जैसे जैसे समाज में बेईमानो की बढ़ोतरी होगी, ईमानदारों की कीमत बढ़ती जायेगी।"

07 December 2005

क्या आपकी स्वतँत्रता भी किसी के हाथों बँधक है?


शिकागो के डैन मकॉली ने अपने सिर्फ उज्जड् बच्चों के नासमझ अभिभावको को खबरदार करने के लिये एक चेतावनी लगायी थी। यह अब उनके लिये चाहे अनचाहे एक शोहरत का सबब बन गयी है। दूर दूर से उन्हे इस कदम के लिये जहाँ बधाईयाँ भी मिल रही है वहीं अभिभावकों के कुछ सँघ कभी कभार उनके रेस्टोरेंट के बाहर जिंदाबाद मुर्दाबाद भी कर देते हैं।
दरअसल मकॉली सिर्फ यही चाहते थे कि उनके ग्राहकों को सबेरे कि चाय कॉफी कुछ सुकुन के साथ मयस्सर हो सके। कभी कभी कुछ ऐसे अभीभावक भी ग्राहको में शामिल होते हैं जो खुद को तो अखबार के पीछे छुपा लेते हैं और उनके उद्दँड बच्चे हुड़दँग मचा मचाकर बाकी लोगो की सुबह खराब कर देते हैं। डैन मकॉली ने अपने रेस्टोरेंट "टेस्ट आफ हैवान" के बाहर एक पोस्टर चिपका दिया जिसमें लिखा था कि "हर उम्र के बच्चों को यहाँ अनुशासित रहना होगा और नीची आवाज प्रयोग करनी होगी।" वैसे डैन मकॉली की बच्चों से कोई दुश्मनी नही है, उन्हे सिर्फ उन अभिभावको से परेशानी है जो अपने बच्चों का समुचित ध्यान नही रखते। उनके इस कदम से साफ तौर पर दो अभिमत तैयार हो गये हैं। एक वर्ग जाहिर तौर पर ऐसे अभिभावकों का है जो बच्चों के उधम से तँग आकर कुछ देर कि हवाखोरी के लिये बाहर आते हैं या फिर जिन्हें सवेरे सवेरे काम पर जाते हुये बच्चों को डे-केयर छोड़ना होता है। जाहिर है बच्चा तो सबेरे अपनी रात भर में इकठ्ठा ऊर्जा को कहीं तो खर्च करेगा। ऐसे अबिभावक सोचते हैं कि क्या उनका सबेरे की एक प्याला चाय पर भी हक नही? आखिर बच्चो को कितना रोका जाये? अगर वे न रूके तो आखिर वे क्या कर सकते हैं?" किसी ने इसका भोले से सवाल का बड़ा करारा जवाब लिखा है

आप बहुत कुछ कर सकते हैं। आपको रेस्टोरेंट , सिनेमा या सार्वजनिक स्थल पर अपने बच्चों की देखरेख को अपने व्यक्तिगत आनँद के ऊपर वरीयता देनी चाहिये। आपको शर्म महसूस करनी चाहिये अगर आपकी देखरेख बेअसर हो जाती है। आपको अपनी शर्मिंदगी को बच्चों को आज्ञाकारी बनाने में खर्च करना चाहिये। अगर आपके बच्चे "नीची आवाज में बोलो" जैसा सीधा और स्पष्ट निर्देश भी न समझ सकें तो अपना सामान और बच्चे बटोर कर वहाँ से फूट लीजिये।

एक और विचार देखिये इस विषय पर "बच्चो के साथ आप अपने हर कहीं जाने की स्वतँत्रता कुछ हद तक खो देते हैं। आपकी आजादी इन छोटे पर अनिश्चित प्रकृति के इँसानो पर निर्भर करती है। अब या तो आप इन अनिश्चित प्रकृति के इँसानो के व्यवहार को सार्वजनिक स्थल पर नियंत्रित रखे या फिर वे आपके स्वेछाचरण को नियंत्रित करेंगे।

मुझे इस रोचक खबर पर एक किस्सा याद आ गया। अपने पुराने मित्र दारजी का और हमारा परिवार पोकोनस पर्वत पर स्थित एक झरना देखने गये थे। बड़े बच्चे पूरी तीन मील की हाईकिंग करने को मचल गये। हम भी उनके पीछे पीछे वजन घटाने के लालच में चल पड़े। दारजी बराबर अपने छोटे पुत्तर के पीछे लगे थे जिसका ध्यान घूमने में कम और पानी में पत्थर फेंकने में ज्यादा था। तीन चौथाई रास्ता तय करने के बाद सब कुछ सुस्ताने को बैठ गये। दारजी को गुमसुम देख उनकी श्रीमती जी बोली "आप चुप क्यो बैठे हैं? एन्जवाय नही कर करे क्या?" दारजी फट पड़े " अगर एन्जवाय करूँ तो डाँटोगी कि बच्चे को क्यो नही देखते , बच्चे को देख रहा हूँ तो तकलीफ है कि एन्जवाय क्यो नही कर रहा? हद है यार, मतलब यह हुआ कि एक तरफ जाये तो दो तमाचे पड़ेंगे, दूसरी तरफ जाओ तो तीन तमाचे । आखिर जाऊँ किधर?" मैने चुहल की "जिधर कम पड़े उधर।" दारजी हँसते हुये बोले "यार यही तो नही पता रहता महिलाओ के साथ। " दारजी की पत्नी बोलीं "अगर शादी के दस साल बाद भी आपको यह नही पता कि किस तरफ के रास्ते में ज्यादा तमाचे पड़ेंगे तो आप हमेशा ऐसे ही उलझन में रहोगे और ज्यादा पेनाल्टी खाओगे।"

01 December 2005

ग्रान्ड कैनियन

देखिये , आसमान से लिया कोलोरेडो नदी का विहंगम दृश्य साथ ही ग्रान्ड कैनियन का वीडियो। काफी सुँदर नजारा दिखा वहाँ। नदी के हजारो वर्ष पहले रास्ता बदल लेने से पहाड़ पर बने कटावो के मनोहारी दृश्य बन गये हैं। तलहटी में जाने पर पूरा दिन लगता है और रात वही बितानी होती है साँय साँय करती हवाओ की आवाज के दरमियाँ।





30 November 2005

देखिये मेरा पहली (असली) वीडियो प्रविष्टि

यह वीडियो मैने वर्ष २००४ में लास वेगास में लिया था। एक जोकर की हरकते देख कर चारू खुश है जब्कि बाँके जी (नेपथ्य में) बुक्का फाड़ कर रो पड़े।





29 November 2005

प्रथम वीडियो ब्लाग प्रविष्टि

एलेनटाऊन में स्वामीनारायण संप्रदाय का भव्य मँदिर है। यहाँ हाल में जाना हुआ। नटखट टोली ने एक से बढ़कर एक पोज देने की ठान रखी थी। इन तस्वीरो को प्रायोगिक तौर पर वीडियो शो में परिवर्तित करके पेश करने की एक कोशिश की है। अगर इस वीडियो को पाठकगण बिना किसी असुविधा के देख सकते है तो फिर अपनी वीडियोग्राफी के नमूने भी पोस्ट करूँगा।




23 November 2005

हमारा नाम बाँके बिहारी ऐसे ही नही है!


दृश्य एक - स्थानः घर में खाने की मेज पर
बाँके बिहारीः डैड, ईसाबेला गेव मी हर बर्थडे कार्ड
हमः कौन ईसाबेला
बाँके बिहारीः डैड, ईसाबेला दैट लड़की ईन माई क्लास
हमः हूँ
(कुछ देर की चुप्पी)
बाँके बिहारीः डैड, ईसाबेला डिड दैट
हमः हूँ
(कुछ देर की चुप्पी)
बाँके बिहारीः डैड, ईसाबेला .. (आगे समझ नही आया क्या कहा)
बाँके बिहारीः डैड , यू नो ईसाबेला
हमः नही मेरे बाप! हम किसी ईसाबेला को नही जानते
बाँके बिहारीः बट ईसाबेला ईन माई क्लास
कुछ ही देर में बाँके बिहारी भाग कर क्लास की फोटो लाकर दिखाते हैं
बाँके बिहारीः डैड, दिस इस ईसाबेला
हमः ओये, ईसाबेला तेरी गर्लफ्रेंड है क्या?
बाँके बिहारीः No ooooooooooo
हमः तब क्या , तुम्हारी कोई गर्लफ्रेंड नही? है कोई तुम्हारी गर्लफ्रेंड है?
कुछ देर की चुप्पी
बाँके बिहारीः डैड!
हमः हूँ
बाँके बिहारीः निकोल इस माई गर्लफ्रेंड
हमारे दिल में बर्तन टूटने सरीखी आवाज आ रही है कि अब इसके दहेज में वह चावल मिल कैसे मिलेगी जिसमें हम रिटायर होके बैठने कि सोच रहे थे?


दृश्य दो - स्थानः घर के बाहर छोटा सा मैदान, हम अपनी कार साफ कर रहे हैं और बाँके अपनी साईकिल चला रहे हैं। तभी बाँके जोर से कहते हैं Wow। इसका मतलब है कि बाँके ने कोई बहुत ही जबरदस्त चीज देखी है। हम मुड़ कर देखते हैं तो सन्न रह जाते हैं. एक शोडषी बाला स्केटबोर्ड चलाते चलाते ठिठक कर रूक गयी है और हम दोनो को घूर रही है कि हम दोनो मे किसने Wow कहा? वह तो चल दी, पर अभी अभी बाहर निकली श्रीमती जी को पूरे आधे घँटे यह दलील हजम नही हुई कि शोडषी बाँके जी की हरकत पर ठिठकी थी। जब हमने बड़े प्यार से पूछा कि भैया "Wow तुमने कहा था?" तो बाँके जी का सिर हाँ में हिला। श्रीमती जी का जवाब था "बाप पर गया है।"


दृश्य तीनः बाँके जी अपने दादाजी के साथ बिस्तर पर सोने की तैयारी में
दादाजीः बेटा, सोने से पहले भगवान से प्रार्थना करते हैं।
बाँके बिहारीः व्हाट प्रार्थना दादा?
दादाजीः भगवान से माँगना है वह प्रार्थना से माँगो। माँगो, भगवान हमें बुद्धि दें।
बाँके बिहारीः ओके भगवान जी , बुद्दि दें।
दादाजीः और कुछ माँगो।
बाँके बिहारीः ओके भगवान जी , गिव मी डालर।
दादाजीः और कुछ माँगना है।
बाँके बिहारीः ओके भगवान जी , गिव मी सँतरा।
दादाजीः और थप्पड़ नहीं माँगोगे?
बाँके बिहारीःवह तो मम्मी देती हैं।

22 November 2005

कैसे जुड़े युवावर्ग प्रिंटमीडिया से?

प्रिंटमीडिया से पश्चिमी देशो में युवावर्ग का मोहभंग होता दिख रहा है। यहाँ किये गये शोध बताते है कि अधिकतर युवा समाचार या तो टीवी के माध्यम से सुनते है या फिर इंटरनेट के माध्यम से। वैसे इस विषय पर महाग्रंथ लिखे जा सकते हैं और लँबि लँबि बहसे आयोजित हो सकती है पर इस दिशा में एक आर्केडिया विश्वविद्यालय में एक अनूठा शोध किया गया। यहाँ यह पाया गया कि कई बड़े अखबारो जैसे न्यूयार्क टाईम्स या फिर बोस्टन ग्लोब जैसे अखबारो से युवा पाठक वर्ग के मोहभँग का कारण इन अखबारो द्वारा मुख्य वैचारिक स्तंभो में युवावर्ग की भागीदारिता की सरासर उपेक्षा है। ऐसा नही कि युवावर्ग को अखबारो में प्रतिनिधित्व नही मिलता। पर ज्यादातर खेल, मनोरंजन और शापिंग जैसे स्तंभ ही आरक्षित होते हैं युवावर्ग के प्रवेश के लिये। एक प्रयोग के तौर पर गँभीर राजनैतिक सामाजिक विषयों पर जब इस विश्वविद्यालय के छात्रों को लेख लिखने को दिये गये तो इन युवाओं की विचारों की पैठ और परिमार्जित भाषा ने समीक्षको को चकित कर दिया। अब फिलाडेल्फिया इंक्वायरर सरीखे अखबार अपने वैचारिक स्तंभो में बुजुर्ग लेखकों के साथ युवाओं को भी प्रमुखता से स्थान दे रहे हैं। इससे युवावर्ग का प्रिंटमीडिया जुड़ाव कुछ बढ़ा है। ब्लागमँडल ने भी एक समानाँतर मँच की व्यवस्था कर दी है। अब देखना है कि भारत जहाँ साठ बसँत देख चुके नेता भी युवा समझे जाते हैं वहाँ का मीडिया इस ब्लागमँडल की बढ़ती आँधी का किस तरह मुकाबला करता है?

साथ ही देखिये अखबारों से जुड़ी कुछ मजेदार तस्वीरें:












21 November 2005

बड़े बेआबरू होके तेरे सैलून से हम निकले!

जनाब कानपुर या फिर भारत का कोई भी शहर हो, वहाँ लोगबाग गुम्मा हेयर कटिंग सैलून में गुम्मे पर बैठकर बाल कटाने से लेकर फेसियल मसाज के चोंचलों तक की यात्रा कर चुके हैं। पहली बार फेसियल मसाज सुनकर कई कौतुहूल जागते हैं। शायद मशहूर व्यंग्यकार केपीसक्सेना कुछ यूँ कहते फेसियल के बारे में "अमाँ, यह सब तो उन औरतों के शौक हैं जो बुढ़ापे से ढीली पड़ती खाल को फेसियल की इस्तरी से कड़क बनाये रखना चाहती हैं। अमाँ कभी देखा है चेहरे पर आटे की परत लपेटे आँखो पर कटे खीरे के टुकड़े चपकाये उन औरतो को । बाखुदा बड़ा खौफनाक मँजर दिखता है। अजी लाहौल भेजिये इन चोंचलो को। खुदा गारत करें इन नाईयों को अच्छे खासे खानदानी चँपी के हुनर से किनाराकशी कर रहे हैं। आजकल के मर्दो को भी जाने क्या फितूर सवार है, मालिश-चँपी कराना छोड़कर चेहरे के खाल यूँ रगड़वाते हैं जैसे धोबी पायजामा निचोड़ रहा हो।"
खैर सक्सेना जी के विचारों और गुम्मा हेयर कटिंग सैलून से याद आती है वह वारदात जो ठीक दस साल पहले हम पर गुजरी। जनाब उस दिन हमारी शादी भी हुई थी। पर शादी की घोड़ी चढ़ने से पहले क्या हुआ यह राज बहुत कम को मालुम है। हमारी बीबी को कभी कभी शक हो जाता है कि हमारी शायद कोई माशूका वगैरह थी। शायद उसके न मिल पाने के गम में हम अपनी ही शादी में मजनू सरीखे दिख रहे थे। हमारी दाढ़ी तक नहीं बनी थी और शक्ल कुछ यूँ दिख रही थी कि गोया किसी ने पाँच-दस तमाचे रसीद किये हों। शादी के दौरान हमारी श्रीमती जी को उनकी भाभी ने कोंचा भी कि नौशा मियाँ इतने गमजदा क्यों दिख रहे हैं ? बाद में श्रीमती जी ने भरसक कोशिश की यह पता लगाने की कि वह कौन सी बेवफा थी जिसके गम में हमने सूरत लटका कर उनकी शादी के अलबम का सत्यानाश कर दिया। हमारी गैरमौजूदगी में हमारी तथाकथित डायरी तलाशने की कोशिश भी की। उनके शक को मेरे कुछ मसखरे चचेरे भाईयों ने यह कहकर भी पुख्ता करने की कोशिश की कि भाई बड़े दिलफेंक किस्म के हैं जरा सँभाल के रखियेगा। हलाँकि हमने भी उन्हें असल वजह नही बतायी तो नही बतायी। अमाँ अपना फजीता थोड़े ही कराना था। पर अब इंडीब्लागीज का तँबू फिर से तन गया है तो हमने भी सोचा कि दस साल से दफन इस राज को बेपर्दा कर ही दिया जाये एक हाल आफ फेम पोस्ट के जरिये। किसी भी सूरतेहाल में एशेज को अपने कब्जे में रखने की कोशिश करने में क्या हर्ज है?

तो जनाब इस किस्से के मुख्य किरदारों से आपका परिचय करा दिया जाये।


  • नायक हैं हम खुद
  • चरित्र भूमिका में हैं हमारे पिताश्री
  • सँकटमोचक मित्र की भूमिका थी हमारे बचपन के दोस्त टिंकू मियाँ की
  • सँकट का कारण बने अनूप फुरसतिया जी नही, अनूप हमारे छोटे भ्राताश्री का नाम भी है
  • सँकटकारक थे सभासद पन्नालाल जी और उनका चेला रामदुलारे

शादी से पहले हम अपने खानदान में कुछ कुछ नर्ड सरीखे बने रहने की कोशिश करते थे। हमेशा जीनियस दिखने की चाहत में फैशनपरस्ती से अदावत रखी। मन आया तो दाढ़ी बनी, नही आया तो नही बनी। क्लीनशेव न होने के चक्कर में एचबीटीआई में रैगिंग भी खूब हुई हमारी। लखनऊ में नौकरी के दिनों में भी हमारी दाढ़ी तभी बनती थी जब हमें किसी हाईफाई क्लाईंट के यहाँ जाना होता था। दाढ़ी बनने के बाद आफ्टरशेव लगाने से हमारी चिढ़ का यह आलम है कि इकलौती साली का दिया आफ्टरशेव कानपुर से अमेरिका आ गया पर खत्म न हुआ। तो हुआ यूँ कि शादी से एक महीने पहले सगाई की रस्म होनी थी। सगाई से एक दिन पहले हमने अपनी प्यारी साईकिल उठाई और चौराहे पर बने रँगीला सैलून जा पहुँचे, दाढ़ी बनवाई और अगले दिन सगाई के लिये तैयार हो गये। काम की अधिकता की वजह से किसी ने ध्यान नही दिया पर अगले दिन पिताश्री की भृकुटि तन गई कि क्या सगाई के दिन भी कँजूसी नही गई हमारी और महज चार रूपये में दाढ़ी बनवा के आ गये, यहाँ तक कि पड़ोस के अँकल भी हमसे ज्यादा स्मार्ट दिख रहे थे। हमारे भ्राताश्री अनूप मियाँ जिनका स्मार्टनेश पर पेटेंट कापीराईट हैं फौरन उवाचे "हमें तो पता था कि ये ऐसे ही चले आयेंगे। इनको तो फेशियल नाम की चिरैया का भी नाम न पता होगा।" पिताश्री ने अनूप को शादी में हमे स्मार्ट दिखने का ठेका सौंप दिया। अनूप न सिर्फ स्मार्ट हैं बल्कि हमसे ज्यादा व्यवहारिक भी हैं, मोहल्ले के परचूनिये से लेकर सभासद तक सब उन्हें जानते हैं। एक ऐसे ही सभासद पद के उम्मीदवार जो पेशे से नाई थे, उनकी दुकान पर अनूप हमें शादी से एक दिन पहले हमें ले गये। जाते ही नये बनने वाले देवर में जितनी होनी चाहिये उतनी ठसक के साथ भ्राताश्री ने पन्नालाल जी को तलब किया। उनके चेले रामदुलारे ने बताया सभासदजी परचार करने गये हैं। दरअसल कानपुर की नगरपालिका के चुनाव होने वाले थे, दुकान के मालिक नाई पन्नालाल सविता सभासद पद के दस हजार तीन सौ बारह उम्मीदवारों मे एक थे और चुनावप्रचार पर निकले थे। भ्राताश्री ने हुक्म सुनाया कि भाईसाहब कि कल शादी है, इनका फेशियल, शेव एकदम चकाचक होना चाहिये। रामदुलारे अचानक माडर्न बन गया। सलाह देने लगा कि भाई साहब, आज तो बिना शेव किये सिर्फ फेशियल होना चाहिये। कल शादी से दस बारह घँटे पहले अगर दाढ़ी बनेगी तो फोटू बहुत अच्छी आयेगी। भ्राताश्री इस समय बिल्कुल अटल जी के प्रधानसचिव ब्रजेशकड़कदार मिश्रा की भूमिका में थे और हमें फेशियल से चिढ़ को नजरअँदाज करते हुये उनकी सलाहरूपी आज्ञा का पालन करने के अतिरिक्त कोई चारा नही दिख रहा था। रामदुलारे कुर्सी के हत्थे पर एक पाँव टाँग कर, मुँह में गधाछाप तँबाकू की खैनी दबाकर जुट गया हमारे गाल रगड़ने में। हम सोच रहे थे कि क्या इसी रगड़ाई को फेसियल कहते हैं? दस मिनट बाद रामदुलारे ने सलाम ठोंका, अगले दिन बारह बजे आने कि ताकीद की और पचास रूपये झटक लिये। रात में कुछ ऐसा लग रहा था गाल पर चींटीयाँ काट रही हों। हमने मारे गुस्से के सबसे छोटे चचेरे भाई को हड़का दिया कि वह रसगुल्ला लेकर हमारे बिस्तर पर दिन में तो नही चढ़ा था। पर ऐसा कुछ नही हुआ था। कानपुर में जहाँ का विद्युत विभाग वोल्टेज का काँटा १८० के अँक की लक्षमण रेखा पार करने को धर्मविरुद्ध समझता है, मद्धम बल्लब की रोशनी इस कष्ट के कारण पर पर्याप्त रोशनी नही डाल पा रही थी। सबेरे होने पर दर्पण ने चुगली कि गाल पर चींटीयों ने नही काटा बल्कि छोटे छोटे लाल लाल दाने निकल आये हैं। अभी हमारे क्रोध का विस्फोट होता उससे पहले टिंकू मियाँ नमूदार हुये। फैशन के जिस स्कूल में अनूप छात्र हैं टिंकू उसके प्रिंसिपल हैं। उन्होनें तुरँत लेक्चर पिलाया कि आखिर हमें किसी टुच्ची दुकान से फेशियल कराने की क्या जरूरत थी। आखिर मालरोड के दमकते फैशन सैलून किस मर्ज की दवा हैं। हमने टिंकू के सवालो की बौछार को अनूप की ओर मोड़ दिया। अनूप ने भँगिमा बदली कि मालरोड का रुख करने से पहले पन्नालाल की नेतई की हवा निकालनी जरूरी है। पिताजी ने शादी के दिन किराये की कार हमारे हवाले की इस ताकीद के साथ कि बारह बजे तक अपना थोबड़ा कहीं से भी ठीक कराके आओ, उन्हें नये जूते खरीदने जाना था। पन्नालालजी दुकान में मौजूद थे, शायद चुनाव प्रचार थम गया था। पन्नालाजी अनूप को तो जानते थे पर साथ आयी फौज देखकर चौंके। अनूप ने जितनी डाँट सबेरे हमसे खाई थी उतनी पन्नालाल को पिलाने लगे। माजरा पता चलने पर पन्नालाजी ने पैंतरा बदला। रामदुलारे को तलब किया और कसके डाँटा "तुम्हे दस साल में भी अक्ल न आयेगी, भला बिना दाढ़ी बनाये मसाज करोगे तो बाल खिंचेंगे कि नहीं? बाल खिंचेंगे तो दाने निकलेंगे कि नही? अब अगले कि शादी है बताओ क्या होगा?" हम सब कुछ कहें उसके पहले ही पन्नालाल जी बर्फ से भरा बड़ा सा जग लेकर हाजिर हो गये और लगे मेरे गाल की बर्फ से सिंकायी करने। इस इलाज से मेरे दाने भी कुछ कम हुये और हम सबका गुस्सा भी। तभी अनूप के एक और दोस्त जिनका बगल में मेडिकल स्टोर था, एविल २५ की एक गोली लेकर हाजिर हो गये और पन्नालाल को लेक्चर पिलाया कि क्यो वह धँधा चेलो पर छोड़कर गायब रहता है और गोली हमें गटका दी कि इससे फायदा होगा। हम खाली पेट पन्नालाल की कुर्सी पर टँगे उनके अगले जलजले यानि कि तौलिया मुँह में ढाँप के स्टीम से सिंकाई कराते रहे। इस प्रक्रम के पूरा होने के बाद पन्नाला जी ने फिर से फेशियल कर मारा। पूरे दो घँटे में पेट पिचक गया था और कमर अकड़ गयी थी। पर अभी पन्नाला जी का आखिरी सितम बाकी था। पन्नालाल उस्तरें के साथ हाजिर थे। उनकी इल्तजा थी कि बर्फ से सिंकाई से दाने अस्सी प्रतिशत दब गये हैं, फेशियल से चेहरा निखर आया है अब थोड़ी तकलिफ जरूर होगी पर हमें उसे झेल कर दाढ़ि जरुर बनवा लेनी चाहिये। हमनें हल्का सा प्रतिरोध किया कि अब काफी तकलिफ हो रही है। पर अनूप की झिड़की , टिंकू की घुड़की और पन्नालाल की फुर्ती के आगे हमारी एक न चली। पन्नालाल का उस्तरा हमारे गाल पर यों लग रहा था जैसे कोई जालिम जख्मों पर नमक लगा कर धीरे धीरे छुरा घिस रहा हो। अचानक आँखो के आगे अँधेरा छा गया और जब आँखे खुली तो हम फर्श पर भीगे पड़े थे, अनूप जकड़े , टिंकू अकड़े और पन्नालाल हाथ जोड़े खड़े थे। दरअसल पन्नालाल के जुल्म और एविल २५ के सितम हमारा भूखा पेट झेल न पाया और हमें गश आ गया था। दुकान में मौजूद किसी झोलाछाप डाक्टर ने तुरँत हम पर पानी डालने की सलाह क्या दी पन्नालाल ने बर्फीले पानी से भरा जग हम पर भरे नवँबर की कड़कती ढँड में उलट दिया। हम अभी यह नही समझ पाये कि पिछले मिनट में हुआ क्या था पर खुद को पानी से भीगा देख और पन्नाला के हाथ में खाली जग देखकर हमारा पारा साँतवे आसमान पर चढ़ गया। हम दहाड़े "अबे हमारे पर ऊपर पानी क्यों डाला? " पन्नालाल के हाथ से जग गिर गया। अनूप और टिंकू पन्नालाल को खरीखोटी सुना रहे थे और उसकि दुकान के बाहर भीड़ लग गयी थी। सबको सभासद जी कि सार्वजनिक धुलाई से मजा आ रहा था और सब उनकी सँभावित पिटाई देखने को लालायित थे। पन्नालाल जी ने हाथ जोड़ कर टिंकू से कहा "मालिक इस दूल्हे की आज शादी है, भगवान की खातिर इसे घर ले जाओ और आराम करने दो जिससे शादी राजी खुशी निपट जाये।" टिंकू मियाँ मौके की नजाकत को भाँपते हुये हम सब को बटोर कर कार की ओर चले। कार उन्होनें अपने घर की ओर मुड़वा दी। उनकी दलील जायज थी कि हमें भीगे कपड़ों में देख कर बाराती न जाने क्या समझ बैंठे। अब रायते को और ज्यादा फैलने से रोकने के लिये हम उनके घर पहुँचे। अगले मिनट में हम टिंकू के घर तौलिये में बैठे रोटी दाल खा रहे थे, अनूप फोन पर कुछ बहाने बना कर थोड़ी ही देर में धर्मशाला जहाँ बारात ठहरी थी , पहुँचने की दुहाई दे रहे थे और टिंकू हमारे कपड़ो पर इस्त्री कर रहे थे।
अब कोई भलामानुष यह पूछ सकता है कि हम भीगे कपड़े भी तो पहन के धर्मशाला जा सकते थे, आखिर वहाँ हमें शाम के लिये शादी का सूट तो वैसे भी पहनना था। जी नहीं, टिंकू ने शादी भले न की थी पर बारातें बहुत देखी थी, बड़ी धाँसू दलील दी उसने कि "लोग तो बात का बतँगड़ बनाने में माहिर होते हैं, कहीं कोई यह न समझे कि हम अपनी शादी का कार्ड अपनी माशूका को देने जा पहुँचे हो और उसने हम पर पानी फेंक कर हमें भगा दिया।" चलो मान लिया कि हम इतने बेवकूफ नही थे कि भीगे कपड़ो में धर्मशाला जाते तो फिर टिंकू से कपड़े उधार लेकर भी तो पहन सकते थे। पर टिंकू के पास उसका भी जवाब था " यार यह उससे भी बुरा होगा, कही कोई यह अफवाह न उड़ा दे कि तू अपनी शादी का कार्ड अपनी माशूका को देने गया था और उसके भाईयों ने तेरे कपड़े फाड़ के तुझे भगा दिया।"
पूरे तीन घँटे देर से पहुँचने पर पिताश्री का गुस्सा भी झेला और जीजाश्री की हैरानगी भी कि हमने इतनी घटिया शेव कहाँ से बनवायी। सबसे मजेदार था अनूप को इसकी सफाई देते देखना कि यह ईटालियन स्टाईल से बनी शेव है जिसमें खिंची फोटू चमक उठती है। हलाँकि उसकी दलील बाद में न हमारी श्रीमती जी ने मानी न किसी घर वाले ने। अगर आपको इस कहानी पर यकीन न हो तो कुछ दिनों में अपनी शादी के वीडियो कैसेट से पिक्चर निकाल कर पोस्ट करता हूँ।

21 October 2005

फिलाडेल्फिया के सिटी हाल मे शोले का सजीव प्रदर्शन!


कल फिलाडेल्फिया के सिटी हाल पर एक वीरू चढ गया और सारा गाँव इकठ्ठा हो गया। बिल्कुल शोले की तरह। फर्क सिर्फ इतना था कि गाँव वालो की जगह दमकल,पुलिस, डाक्टर,नागरिक और नगर पालिका के तमाशबीन थे, मौसी की भूमिका थी एफबीआई की,वीरू थे एक नगर पार्षद श्री रिक मैरियानो और जय की भूमिका मे थे मेयर जान स्ट्रीट। यहाँ के नेताओ ने वाकई शोले की स्टोरी से प्रेरणा लेकर तमाशा खड़ा किया था। ट्विस्ट सिर्फ इतना था कि श्रीयुत मैरियानो जो एक बिजली कारीगर की हैसियत से नगर पार्षद तक का सफर तय कर चुके हैं अपने ऊपर एफबीआई द्वारा भ्रष्टाचार, कदाचार, अनाचार,व्यभिचार और न जाने कौन कौन से आचार जैसे असंख्य आरोपो की जाँच से त्रस्त होकर सिटी हाल के टावर पर चढ गये। जिस टावर से वह कूदने की धमकी देते रहे वहाँ ऐसा सुरक्षा घेरा बना है कि मैरियानो के फरिश्ते भी नही कूद सकते। कूद भी जाते तो दस पँद्रह फुट नीचे प्लेटफार्म पर गिरकर ज्यादा से ज्यादा हाथपैर कि हड्डी तुड़ा बैठते। पर जब दमकल वालो ने उन्हे जबरन नीचे उतारने के लिए सीढीयाँ लगाई तो जय भैया, यानि कि मेयर जान स्ट्रीट जिनकी गरदन पर खुद एफबीआई वालो का शिकँजा है, नमूदार हुए। जाने क्या उन्होनें वीरू को समझाया कि वीरू भाई नीचे आ गये। हाल-फिलहाल अपने वीरू भाई फिलाडेल्फिया के मानसिक चिकित्सालय मे अवसाद का ईलाज करा रहे हैं। जिस तरह से बालीवुड वाले हालीवुड से प्रेरणा लेते रहते हैं, उसी तरह से फिलाडेल्फिया के नेताओं ने हमारे बालीवुड की फिल्म शोले से स्टंट की प्रेरणा ले डाली है। अगर यह प्रेरणाचक्र आगे घूम कर कहीं भारत पहुँच गया तब तो हर शाख (इमारत) पे उल्लू (नेता) बैठ जायेगा। क्योकिं अपने यहाँ सारे नेता तो रिक मैरियानो के भी उस्ताद है। ऐसे में ऊँची अट्टालिकाओ की कमी पड़ सकती है और नेताओ में जाँच से बचने के लिए ऐसी ईमारतों पर चढने के लिए मारामारी भी हो सकती है। भारत सरकार को अब शाँति भँग होने से बचाने के लिए सभी ऊँची इमारतों की छते सील कर देनी चाहिए।

11 October 2005

जब हम जवाँ होंगे! जाने कहाँ होंगे?


एक दिन कुछ पुरानी फोटो पलटते हुऐ अपने बचपन को फिर से देखा तो इस पुराने गाने के बोल याद आ गये। याद तो और भी बहुत कुछ आया पर एक बात जो ख्याल बन कर जहन से चिपक गयी कि कानपुर की उन गलियों में रँग बिरंगी पापिन्स की गोलियाँ चूसते, एगफा कैमरे से श्वेत श्याम तस्वीर बिरहाना रोड के स्टूडियो में खिंचवाते, रविवार की छुट्टी चिड़ियाघर में बिताते , पिताजी के लेम्ब्रेटा स्कूटर के हेंडिल पर आगे ठुड्डी टिका कर घूमते, बिरहाना रोड और माल रोड की चकाचौंध को देखते, प्लास्टिक की गेंद को प्लास्टिक के बल्ले से पीटते, चाचा चौधरी और साबू के कामिक्स पढते हुऐ हमने कभी नही सोचा था कि कभी अपने उम्र के टुकड़े को हम हजारों मील दूर बैठ कर अत्याधुनिक तकनीकि से विश्चजाल पर चस्पां करेंगे। हम यह भी सोच रहे कि अगर हम अपनी इस उम्र के टुकड़े को वापस पाकर जिस तरह नोस्टालजिक हुए, इस चित्र के बाकी दो नमूने अपनी उम्र में ऐसी ही परिस्थिति आने पर क्या करेंगे? पता नही आज से बीस बरस बाद वैश्वीकरण के दौर में नोस्टालजिया नाम की चीज का नामोनिशां भी बचेगा कि नही? तकनीक, किंग आफ प्रशिया और कानपुर के बीच की दूरियाँ पाट देगी, शायद आर्थिक अँतर भी मिट जायें और जब आज मुझे अस्सी नब्बे के दशक वाला कानपुर सिर्फ सपनों मे दिखता है तो शायद सामाजिक अँतर भी तब तक मिट ही जायेगा। उस उम्र में शायद सब कुछ हैलोवीन के पंपकिन सरीखा होगा , खोखला। आज एक औसत अमरीकी को पूछो तो शायद ही कोई बता सके कि क्यों वह घर के बाहर नेटिविटी वाले खिलौने सजाता है , क्यो नारंगी कद्दू को काटके उसमें रोशनियाँ लगाता है , क्यों क्रिसमस पर खुशियाँ मनाता है, शायद इसलिये कि वार्षिक छुट्टी होती है, वार्षिक सेल लगी होती बस ! इससे ज्यादा जानकरी ढूढो तो खोखला कद्दू। वही कुछ भारत में भी हो रहा है, सब कुछ पैकेज्ड। हो रहा है वही कुछ पर धीरे धीरे, हमें होली के रंग , दीवाली के पटाखे तो याद हैं पर अब नही दिखता तो होली में घरों मे बेसन के लड्डू का बनना , लोगो का टोली बनाकर घर घर जाना, होली पर हास्य कवि सम्मेलन का होना। सब कुछ अब रस्मी सा क्यों लगने लगा है। अब तो होली दिवाली के ऐनीमेटेड कार्ड ईमेल पर देखकर भी झुँझलाहट होने लगी है उन यंत्रमानवों पर जो बाकी पूरे साल की तरह इन दो महापर्वो पर भी दो घड़ी बात करने की फुरसत नही निकाल सकते।


हैलोवीन के कद्दू

इस मशहूर गजले को याद करते हुऐः
दौलत भी ले लो यह शोहरत भी ले लो
कोई लौटा दे मुझको वह बचपन का सावन,
वह कागज की किश्ती वह बारिश का पानी!


कुछ लाईनें आज के परिप्रेक्ष्य में सूझी हैं:
टीवी भी ले लो यह डीवीडी भी ले लो,
भले तोड़ डालो तुम इस कंप्यूटर का मानीटर
मगर लौटा दो मुझको मेरा स्कूल का बस्ता
वह पापिन्स की गोली, वह साबू की कहानी

27 September 2005

क्या आप भी कान के कीड़े से परेशान हैं?


रोऊँ या हँसू

करूँ मैं क्या करुँ?
आप हैरान हों रहे होंगे कि यह किस कीड़े के बारे में बात हो रही है। हो सकता है आपको अब तक कई दिन से हो रही कान में हो रही खुजली के बारे में कौतूहुल हो गया हों। यह लेख किसी अतिसूक्ष्म बैक्टीरिया के बारे मे नही है न ही सद्दाम की लैब में बने उस कीड़े के बारे में जो उसके अमेरिकी सैनिको के कान में घुस कर बुश अँकल हाय हाय , चेनी गँजा हाय हाय के नारे लगाता। यह जिक्र है उस कीड़े के बारे में जो हमारे आपके कान में अक्सर घुसता है और कई-कई दिन तक नही निकलता। अरे आप कान में डालने के लिए कड़वा तेल की शीशी खोजने तो नही निकल पड़े। जनाब यह अदृश्य कीड़ा किसी तेल किसी दवाई से नही निकलता। याद कीजिए "हम" में अमिताभ बच्चन का डायलागः
"नाली की गँदगी के कीड़े को मारने के लिए बाजार में फिनिट मिलता है पर समाज की गँदगी के कीड़े को मारने के लिए फिनिट अब तक बना ही नही!"
यह कान का कीड़ा वास्तव में किसी फिल्मी या नान फिल्मी गाने की एक या दो लाईन होंती है जो बारंबार हमारे दिमाग में गूँजती रहती है। यह समस्या फिल्म प्रेमियों के साथ भी होती है और उनके साथ भी जो बाथरूम की सिटकनी ढीली होने के कारण उसमें गाते-गाते नहाने पर मजबूर होंते हैं। ऐसी जीवात्मा सबेरे उठते ही बेखुदी में जो भी गीत गुनगुनाती है उसकी एक दो लाइने अटक जाती है दिमाग में। फिर बार बार वैसे ही बजती रहती हैं दिमाग में जैसे पुराने जमाने में एचएमवी के ग्रामोफोन की सुई अटक जाती थी और आजकल आडवाणी जी की सुई जिन्ना के रिकार्ड पर अटक गई है। शुरू में तो अहसास नही होता पर धीरे-धीरे चिढ सी होने लगती है। यह एक प्रकार की दिमागी खुजली है जो दिमाग जितना खुजाता है उतनी ही बढती जाती है।
इस बारे में सिनसिनाटी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेम्स केलारिस ने

जेम्स केलारिस
बकायदा शोध भी कर रखा है। उनके अनुसार किसी भी समय , किसी भी स्थान पर सुना गया कोई भी गाना कान का कीड़ा बन सकता है। विदेशों मे यह सिर्फ बाजार या भीड़भाड़ वाली जगह हो सकता है, वही भारत में जगह जगह शादी बारात या देवी के जगराते में बजने वाले भोंपू इसमें सहायक होते हैं।
अमूमन इस तरह के गानों मे कुछ खासियत होती हैं जैसे कि:

  • यह आसान होते हैं जैसे कि कुचि कुचि रूकम्मा या जुम्मा चुम्मा आसानी से चिपकेगा बजाये रक्त से भरा गुब्बारा के।
  • इनमें दोहराये जाने वाले शब्द होते हैं जैसे कि चल छैयां छैयां में हैं जब्कि मेरा सामान लौटा दो कोशिश करके भी नहीं चढता जबान पर।
  • इनमें सुनने वाले को स्तंभित करने वाले तत्व जैसे कि एक निश्चित आवृति होती है उदाहरण के लिए Who Let the Dogs Out?
  • इस तरह के गाने आमतौर पर दिमाग में घँटो बने रहते हैं।

आमतौर पर इस कान के कीड़े का कोई ईलाज नही है पर कुछ आजमाऐ हुऐ नुस्खे हैं जिनसे आप अपने दिमाग को इस अनचाहे कीड़े से छुटकारा दिला सकते हैं।

  • ज्यादा चिंता न कीजिए वरना हो सकता है कि एक कीड़ा छूटे तो दूसरा कान के रास्ते दिमाग में घुस जाये।
  • किसी दूसरे तरह का सँगीत सुनिए जैसे कि शास्त्रीय सँगीत।
  • अपने आपको किसी काम में उलझाईयें, कुछ करने को न मिले तो हिंदी ब्लाग पड़िये और तब भी काम न बने तो उन पर टिप्पणियाँ करना शुरू कर दीजिए।
  • पूरा गाना गाने की कोशिश करिये, सिर्फ वह हिस्सा नही जो आपके दिमाग में अटका है।
  • अगर गाना न याद आये तो पूरा गाना तलाशिये। प्रोफेसर जेम्स केलारिस के अनुसार यह कान में जोंक की तरह गाने का चिपकना वास्तव में दिमाग का अधूरी जानकारी को ढूढनें का प्रयत्न है। जैसे ही आपको पूरा गीत मिलेगा, आपको कान के कीड़े से तात्कालिक मुक्ति मिल जायेगी।
  • कुछ लोगो को बबलगम चूसने से भी फायदा होता है।

अब कुछ मजेदार तथ्य कान के कीड़े के बारे में:

  • महिलाओं को पुरूषों की अपेक्षा कान के कीड़े से अधिक चिढ होती है।
  • अधिक संगीत सुनने वाले खासतौर पर वाकमैन या आईपॉड के प्रेमियों को यह समस्या अधिक होती है।
  • कान के कीड़े और दिमागी तनाव में सीधा सँबध है।

अब एक मजेदार व्यक्तिगत अनुभव, मैनें गानो के अलावा ब्लागउक्तियों को भी कान का कीड़ा बनते देखा है। उदाहरण भी दे देता हूँ:

  • सबरे साधू लगे हैं राममँदिर के निर्माण में
  • महारथियों सँभावनाऐ हैं
  • माले मुफ्त दिले बेरहम
  • बगल में बम, हाथ में बल्ला
आखिर में इस सतरँगिए को कान का कीड़ा शब्द ईजाद करने का श्रेय भी लगे हाथ दे देता हूँ। जहाँ कान का कीड़ा शब्द इस सतरँगिए ने ईजाद किया है वहीं सतरँगिया शब्द मैने ईजाद किया है। यह सतरँगिया "दुपट्टा मेरा सतरँगिया" वाला सतरँगिया नही है। यह तो ब्रदरली लव वाला सतरँगिया है। अब भी नही समझे तो याद कीजीए "हे ऐ... काँता बेन"। अब भी नही समझे तो स्वामी जी से समझिए। उन्होंने शायद कुछ शोध किया हो इस अनूठे विषय पर।

16 September 2005

शादी के बाद क्या!

बाखुदा इसे आप रेल पटरी के किनारे की दीवारो पर लिखा वैद्य चीवान चँद का मर्दानगी दुरुस्त करने का इश्तहार न समझ लीजिएगा । यहाँ मुद्दा कुछ दूसरा है। बात शुरू करूँ तो याद आती है कुछ दसेक साल पहले दूरदर्शन पर दीप्ती नवल अभीनीत एक सीरियल की। एक दृश्य में दीप्ति और उनके पति और उनके एक दोस्त शाम को चाय की चुस्कियों के बीच बीते दिन याद कर रहे हैं। दोस्त दीप्ति के पति से उनकी युवाववस्था के पेंटिग के शौक के बारे में दरयाफ्त करता है। दीप्ति के पति कहते हैं "हाँ यार पहले तो कुछ प्रदर्शनी वगैरह में भी शिरकत की, फिर शादी के बाद सब खत्म हो गया।" दीप्ति इस जवाब से भड़क जाती है और मामूली तकरार महायुद्ध में तब्दील हो जाती है। दीप्ति की आपत्ति थी कि शादी के बाद पति अपनी धनलिप्सा और व्यवसायिक व्यस्तता के हाथो हुए रचनाधर्मिता के खून को अपने ऊपर लेने के बजाए शादी नामक संस्था को कसूरवार क्यों ठहरा रहे थे। बात बिलकुल जायज लगती है। शादी के बाद और खासतौर से बच्चों के आगमन के बाद गिटार,पेंटब्रश ,कैमरे इत्यादि को टीवी,म्यूजिक सिस्टम आदि के लिए जगह बनाने की खातिर कबाड़खाने का रूख ही करना पड़ता है। जरा याद कीजिए घर के उस कोने में जब आप अपने शौक या हुनर को पहली बार रखते है तो इसी ख्याल के साथ कि कभी वक्त मिलने पर देखेंगे, फिलहाल तो ....। पर वक्त कब मिलता है? उस गिटार पर उस पेंटिग के कैनवास पर अगले साल पुरानी रजाई का गठ्ठर रख दिया जाता है, फिर अगले साल बच्चों के टूटी साइकिलें और आपका शौक कबाड़ के नीचे दबता जाता है। आपको फुर्सत ही नही मिलती। बच्चे जब तक छोटे होते हैं तो जिंदगी की जद्दोजहद से छुटकारा नही मिलता। अनिवासियों में एक समय-खाऊ शगल और मौजूद है "समोसा सम्मलेन"। नोस्टालजिया और एकरसता से बचने को हम नोस्टालजिया के मारे किसी और परिवार या परिवारों को ढूढ लेते हैं और फिर वही शुरू हो जाता है जिसे हम भारत में किटी पार्टी या दारू पार्टी या चाय पार्टी के नाम से जानते हैं। इनमे बुराई कुछ नही पर अच्छाई भी मोती चुनने के समान होती है। तिस पर कुछेक परनिंदाप्रिय जीव मिल गये तो हो गई कमी पूरी। खैर इन समोसा सम्मलेन पर विस्तार से फिर कभी, अभी मूल मुद्दे पर आते हैं। जब आपके बच्चे स्कूल जाने लायक होते हैं तब आपकी रचनाधर्मिता की शहादत आपके सिर पर चढ के बोलती है। इसमें दो-दो खून शामिल हैं। आपके शौक और अंतर्यामिणी के शौक दोनों के। याद कीजिए शादी के पहले आपको उसके आयल पेंटिग उसका सितार वादन वगैरह जितना सुहाता था आपके चिरंजीव के आगमन के बाद वह रसोई की बलि चढ गया। अब बच्चें जब बड़े हो गये और सारा दिन काऊच पोटेटो बने रहकर बॉब द बिल्डर या एमटीवी पर आँखे गड़ाये रहते हैं तो आपका खून उछाले मारता हैं। शुरू हो जाते हैं आपके लेक्चर "हम जब तुम्हारी उम्र के थे तो ये खेलते थे, वो सीखते थे, ये जानते थे वगैरह वगैरह।" ध्यान दीजीए अपने ही लफ्जों पर, बार बार आखिर में क्या सुनायी दे रहा है "थे .. थे !"। बच्चों का क्या कसूर है , वे भी तो आपको सबेरे से शाम मुद्रार्जन और शाम ढलते ही टीवी के समाने मूँग की दाल चाय के साथ टूँगते देखते हैं। माँ को टीवी के सामने लौकी काटते देखते हैं। उन्हें आप बार बार अपने अतीत का सुनहरा बाईस्कोप दिखाना चाहते हैं। जब्कि वे देखते हैं आपमें उनका सलोना टीवी टाईम हड़पने को तैयार मिस्टर मोगेंबो।
ठीक यहीं मुझे दिखता है शशि का खिताब।


बहुत खूब शशि!
निचली पंक्ति में बायें से पहले खिलाड़ी
शशि , मेरा एचबीटीआई का सहपाठी, दो प्यारे बच्चों का पिता और मेरी ही तरह कंप्यूटर के क्षेत्र में कार्यरत। शशि ने अभी टेनिस में कैलिफोर्निया में क्षेत्रीय स्तर की प्रतियोगिता जीती है। इस उम्र में जब कंप्यूटर पर आठ आठ घँटे बैठने से अकड़ी कमर के मालिक बीस किलो का बोझा उठाने से दहशत खाने लगते हैं, शशि ने फिर से टेनिस का रैकेट थामा और अपने स्थानीय कोर्ट से शहर और फिर राज्य स्तर का सफर तय कर डाला। शशि ने आपसी बातचीत में स्वीकार किया कि भले ही अभी आद्रेंय आगासी से पंजा लड़ाना दूर की कौड़ी हो पर अब की उपलब्धि भी कुछ कम नही। फायदों में बच्चो के "हम करते थे" की जगह करते हैं कहने की आजादी, उनके समक्ष खुद आदर्श बनने का अवसर, बेहतर स्वास्थय, सहकर्मियों में प्रतिष्ठा शामिल है। इसके लिए शशि को वीकेंड पर होने वाले समोसा सम्मेलनों को त्यागना पड़ा। शुरू में कुछेक उलाहने झेलने के बाद अब उसे अपने दोस्तों से भी शाबाशियाँ मिलती हैं, और उन महानआत्माओं से भी जो हर वीकेंड पर बच्चों के साथ टीवी के सामने या बीबी के साथ शापिंग माल में क्वालिटी टाईम बिताते हैं। मुझे शशि से "Walk the talk" की सीख जरूर मिल गयी। मुझे लगता है यह जरूरी नही की रोजाना के जरूरी काम छोड़ के फिर से तानपुरे पर राग भैरवी का आलाप शुरू कर दिया जाये। पर अगर समय से समय चुराना आ जाये तो हम अपने भीतर खो गये कलाकार को फिर से जिला तो सकते हैं। बच्चों के साथ फुटबाल खेलने, उन्हें नये हुनर सिखाने या उनके साथ प्रकृति की गोद में खोजी समय बिताने से अच्छा क्वालिटी टाईम भला और क्या होगा?

31 August 2005

सड़क पर शुतुरमुर्ग नाचा किसने देखा?

यह दृश्य हैं स्वर्णद्वार सेतु का। अगर आपको यह नाम कुछ अजीब सा लग रहा है तो मिर्ची सेठ शायद आपकी कुछ मदद कर सकें। खैर स्वर्णद्वार सेतु पर एक वैन में एक साहब दो शुतुरमुर्ग ले जा रहे थे। यहाँ लगे हाथ यह बता देना जरूरी है कि भले ही खुद अमेरिकी कुछ साल पहले तक भारत को मदारियों और सपेरो का देश समझते रहे हो (कालसेंटरों,आईटी विशेषज्ञों ने अब इनकी समझदानी का आकार थोड़ा बढा कर दिया है) पर यहाँ ऐसे खब्तियों की कमी नही जो अपने फार्म हाउस पर शेर चीते या फिर शुतुरमुर्ग सरीखे जीव पालते हैं। अगर आपको यकीन नही तो पहले बगल का चित्र देखिये। जब इन शुतुरमुर्ग साहब के मालिक ने वैन की ब्रेक लगायी तो झटका लगने से वैन की खिड़की खुल गयी और इन शुतुरमुर्ग साहब का मूड स्वर्णद्वार सेतु के नजारे देखने का हो गया। अब एक बार यह जनाब बाहर निकल के टहलकदमी करने लगे तो इन्हें पकड़ कर अँदर करने मे पुलिस के पसीने छूट गये।

अब सुनिए चीते की कहानी जो किसी के फार्म हाउस में नही बल्कि न्यूयार्क की एक बहुमँजिली इमारत में पाया गया। इनको पालने का शौक चर्राया था एंटोनी येट्स को। वह उसे काफी पहले लाया था जब यह चीता एक शावक था। आठ माह में चीता जवान होकर चारसौ पौंड का हो गया। येट्स के नीचे की मँजिल में रहने वाली पड़ोसन ने चीते की गुर्राहट और असह्य दुर्गधँ की शिकायत की। पर व्यक्तिगत गोपनीयता कानून की मजबूरियों के चलते बिल्डिंग प्रशासन खास कुछ पता नही लगा सका। एक दिन चीतेश्री का दिल येट्स की बिल्ली खाने को हो गया। येट्स साहब ने जब बिल्ली और चीते के बीच दीवार बनने की कोशिश कि तो चीतेश्री ने उन्हें घायल कर दिया। अस्तपताल में येट्स खुद को कुत्ते से कटा बताकर भर्ती हो गये। हलाँकि डाक्टरों को उनकी कहानी पर यकीन नही हुआ और उन्होनें पुलिस को इत्तला कर दी। पुलिस येट्स के अपार्टमेंट गयी और दरवाजे में झिरी से चार सौ पाउँड भारी चीतेश्री को चहलकदमी करते देख उनके होश उड़ गये। फिर पूरी कमाँडो कार्रवाई की गई, छत के रास्ते खिड़की के सामने लटक कर एक पुलिस अफसर ने नशे का इंजेक्शन विशेष बँदूक से दागा। चीतेश्री के बेहोश हो जाने के बाद उन्हें ससम्मान जँगल ले जाकर छोड़ दिया गया। पुलिस को अपार्टमेंट मे एक चीते का दोस्त एक तीन फुटा अजगर भी मिला था।
अब अगर आपको कोई भारत को मदारियों और सपेरो का देश कहता मिले तो उसे या तो यह लेख पढा दीजिए या फिर यह वाला।

29 August 2005

यह क्या हो रहा है?

तस्वीर देख कर बताईये कि यह क्या हो रहा है?



  1. कृष्ण जन्माष्टमी पर मुंबई में दहीहाँडी यानी की गोविंद आला रे महोत्सव मनाया जा रहा है।
  2. यह युवक महिलाओं द्वारा मटकी फोड़ने में पुरूषों का वर्चस्व नही टूटने देना चाहता।
  3. शायद यह मटकी फोड़ने में महिलाओं की मदद कर रहा है।
  4. यह निश्चय ही कोई सड़कछाप मजनू है जो पिटने से बचने के दौरान लटक गया है।
  5. यह रामगोपाल वर्मा की नयी पिक्चर "दुल्हन माँगे दहेज" का सीन है, जिसमें बिहार में दहेज विरोधी माफिया महिलाऐं नवयुवकों को जबरन पकड़ कर उसका दहेजरहित विवाह करवाती हैं।
  6. यह युवक राखी बँधवाने से बचने को लटक गया है।
  7. यह सारी लड़कियाँ वास्तव में रिलायँस टेलीकाम की सेल्सगर्ल टीम की सदस्याऐं है और इस युवक को कोई फोनप्लान बेचने की कोशिश कर रही हैं।
  8. इस लड़के नें दोस्ती डाट काम में एक साथ इन सबको डेट दी थी लेकिन इसके हैकर दोस्त (दुश्मन) ने सारी डेटस की डेट हैकिंग करके एक ही दिन सेट कर दी।
  9. इस लड़के का ब्लाग पड़ पड़कर यह लड़कियाँ पक गई हैं और यह लड़का उनकी कविताओं का ब्लाग पड़ने से ईंकार कर रहा है।

कृपया अपनी पसंद का जवाब टिप्पणी में दर्ज करिये, अगर आपको लगता है कि यहाँ इनमें से कुछ नही हो रहा तो अपनी बहुमूल्य राय देना न भूलें।

26 August 2005

इट हैप्पनस ओनली इन ईंडिया!

अखबारो से चुनी तीन विलक्षण तस्वीरें, भारत के तेजी से बदलते चेहरे की आदर्श नुमाईंदगी करती हैं।


नई तकनीक की सुविधा
पुराने स्वाद की चुस्कियों के साथ।
बरिस्ता के काउँटर चाँदनी चौक में देखकर भारत की तरक्की का अनुमान नही लग सकता। पर चाय के कुल्हड़ वाले स्टाल पर मोबाईल की मौजूदगी से इस तकनीक के हर वर्ग तक की पहुँच का सही पैमाना है।




अगर मोबाइल द्वापर में मौजूद होता तो?
मोबाइल गले की अनचाही घँटी बन चुकी है। क्या सुदामा अपनी पत्नी से पूछ रहें हैं कि कान्हा से क्या क्या माँगू?




आगाज ऐसा तो अँजाम खुदा जाने!
३३% आरक्षण की माँग करने में ही अगर पुलिस पिट रही है तो आरक्षण मिल जाने के बाद कौन कौन पिटेगा? यकीन मानिए, इस तस्वीर को देख कर पिहास या व्यंग्य नही कर रहा। सिर्फ यह सोच रहा हुँ कि अधिवेशन दर अधिवेशन महिंलाओं का अधिकार उन्हें आरक्षण बिल में नयी नयी पेचिदगियाँ निकाल कर वंचित कर दिया जाता है। अगर उनका गुस्सा इस तरह से नही फूटेगा तो शायद शासन सुनेगा भी नही।

23 August 2005

बड़े अखबारो को बुद्धु कैसे बनाऐं?


अरे दीवानो, मुझे पहचानो!
कहाँ से आया, मै हूँ कौन?
सीखिए इस नौजवान से। इन जनाब की राष्ट्रीयता जनाब जर्मन है। लंदन में सैर सपाटा करते वक्त शायद इनका पासपोर्ट खो गया। अब मुफ्त में वापस कैसे जायें? तो इन जनाब ने अपने कोट और बनियानों के सारे लेबल काट डाले, और लगे समुद्र तट पर चहलकदमी करने। पुलिस ने इन्हें पकड़ लिया तो इन्होनें कुछ ऐसे हाव भाव बनाये कि जैसे यह कोई सिरफिरे हैं और बोलना नही जानते। इनको मानसिक चिकित्सालय पहुँचाया गया। वहाँ भी इन्होनें अपने मुँह में दही जमाये रखा। किसी डाक्टर ने इनकी पहचान जानने के लिए इनको एक कागज दिया कि इसमें अपने देश का झँडा ही बना दो। इनके दिमाग में सबसे पहली जो चीज उसको इन्होनें कागज पर उकेर दिया। जाना चाहेंगे वह क्या था? एक पियानो। बस आनन फानन में इनके लिए कहीं से पियानो का जुगाड़ किया गया। यह जनाब उसकी एक ही कुँजी पीटते रहे और लोगो ने समझा यह कोई बड़े पियानोवादक है जिनका फिलहाल दिमाग सटक गया है। बस अखबारों में होड़ लग गयी। बीबीसी तक ने रिपोर्ट छाप दी कि इनकी संगीत पर गहरी पकड़ है और अस्तपताल का स्टाफ घँटो इनका संगीत सुन कर बेसुध हो जाता है। बस एक हेल्पलाईन सेटअप हो गयी इनकी पहचान जानने के लिए। इनकी तसवीरें टीवी पर दिखायी गयी ताकि इनका कोई मुरीद ही इन्हें पहचान ले। भाँडा तब फूटा जब किसी ने इनको चेक संगीतज्ञ थामस स्ट्रैंड समझ लिया। असली थामस स्ट्रैंड को चेक टीवी पर आकर खँडन करना पड़ा कि वे लंदन में नहीं पाये गये थे। जहाँ एक ओर लंदन के प्रतिष्ठित अखबार इनके अस्तपताल में संगीत प्रर्दशन के काल्पनिक दृश्य बुन रहे थे वहीं अस्तपताल वाले इनके एककुँजीवादन सुन सुन कर पक गये थे और अपना सिर धुन रहे थे। एक दिन किसी नर्स से यह जनाब खुद बोल पड़े और पता चला कि यह जर्मन हैं। इन्होने कभी मानसिक रोगियों के संस्थान में काम किया था और उन्ही के हावभावों को हूबहू कापी करके यह अस्पताल के डाक्टरों और नर्सों को उल्लू बनाते रहे और चार महीने तक आराम फरमाते रहें। अब अस्पताल और अखबारों ने व्यक्तिगत सूचना की सुरक्षा के कानूनो का हवाला देकर (झेंप मिटाने का इससे बेहतर तरीका और क्या हो सकता है?
) ज्यादा खुलासा करने से इंकार कर दिया है। वैसे इन जनाब को ससम्मान जर्मनी भेज दिया गया है।

22 August 2005

हद हो गई!

हद हो गई। सुबह आँख खुली तो कोई कानों में चिल्ला रहा था। आस पास देखा। श्रीमती जी सपनों में खोई थीं। बच्चे भी अभी नही जगे थे। कोई पड़ोसी भी नही था । शनिवार को सभी आलस्य का विश्व रिकार्ड तोड़ने की फिराक में रहते हैं। कहीं टेलीफोन की आंसरिग मशीन तो नही, शायद सवेरे सवेरे कोई मार्केंटिंग की काल हो। पर वह भी नही थी। नीचे गया तो कंप्यूटर खुला था और स्क्रीन पर रोजनामचा का मुख्यपृष्ठ दिख और बज रहा था। हैरानगी एक साथ तीन बातों पर थी।


  • मैंनें रात में कंप्यूटर खुला तो नही छोड़ा था।


  • ब्लागनाद का शट फिलहाल अगली सूचना तक बँद हैं।


  • मैनें आज तक फकत एक ही लेख को बोलने की इजाजत दी है।


हद हो गई, अब यह दिन भी देखना बदा था जब अपना ही चिठ्ठा हमें खुद उलाहना दे रहा था। आप भी सुनिए कि हमने क्या क्या सुना ?

मालिक तुम तो यही भूल गये कि तो यही भूल गये कि तुमने रोजनामचा कब शुरू किया था। हमारा जन्मदिन तो पिछली २४ अप्रैल को ही निकल गया और तुम फिलडेल्फिया की गुनगुनी गर्मी के गुलछर्रे उड़ाते रहे। मैं (रोजनामचा) बेचारा चीखता रहा कि अरे मेरे रचयिता मेरे जन्मदिवस पर कम से कम एक लेख तो रच दो। शायद दोचार टिप्पणियाँ खाने को मिल जायें। नही तो कम से कम नया टेंपमलेट ही चढा दो। कम से कम पंकज बाबू से सीखो, कुछ लिखे चाहे न लिखे हाँ भाई को नये कपड़े पहनाने में कँजूसी नही करते। कभी मिर्च के रंग दिखते हैं तो कभी मँगल गृह के। अब बेतरतीब यादें देख-देख कर हमें अपने अस्तित्व और तुम्हारी अलाली पर रंज हो रहा है। अरे यार और कुछ नही तो मेरा पन्ना के रचयिता से ही सीख लो। देखो कैसे अपनी गैर हाजिरी में भी गजल की मशीन फिट करके गये थे मेरा पन्ना पर। जब शटर बँद होने की नौबत आ गयी तो उन्होने अपनी गजल की मशीन कूड़े में फेंक कर पुरानी कलम रूपी तलवार पर सान चढा ली है। फिर पुरानी धार लौट आयी है। देखो, नये नये जबरदस्त चिठ्ठाकार आ गये हैं मैदान में। इसलिए हे मेरे रचयिता चाहे भैंसकथा पर लिखो चाहे साँडकथापर, पर लिखो जरूर वरना तुम्हारे साईट काऊँटर की विकास दर को हिंदू विकास दर का दर्जा दे दिया जायेगा और तुम्हे ठलुहा और अनकही के साथ क्लास से बाहर कान पकड़ के एक टाँग पर खड़ा कर दिया जायेगा।


तो फुरसतिया जी की वजह से हमारे चिठ्ठे की आदत बिगड़ गयी है। जन्मदिन की लालीपॉप का हिसाब माँग रहा है। खैर फुरसतिया जी को जन्मदिवस पर हार्दिक शुभकामनाऐं। हमें हाल आफ फेम टिप्णियों और लेखों पर उनके लेख का बेकरारी से इँतजार रहेगा।

09 August 2005

डोगा यानि श्वान योगा यानि कि कुत्तासन!

आपने कर्मयोग सुना होगा, हटयोग सुना होगा ,पावर योगा तक सुन रखा होगा लेकिन डोगा नही सुना होगा, जो पशुओं और उनके स्वामियों के लिए मोक्ष के द्वार खोल देता है।


यह है नया योगा यानि कि डोगा
जनाब न तो मै ठिठोली कर रहा हूँ न ही कोई नया शगूफा फिर से छेड़ रहा हूँ। यह सब करने से पहले हजार बार सोचना पड़ता है कि कहीं कूपमँडूक आस्तिको की धार्मिक भावनाओं, आस्थाओं, संस्कारों और न जाने कहाँ-कहाँ चोट,ठेस वगैरह लग सकती है। उसके बाद घँटा थाली बजने से लेकर त्रिशूल तक बँट सकते हैं, ईंटरनेट के मैसेज बोर्ड पर धर्मपरायण और धर्मनिरपेक्षों के मध्य युद्ध छिड़ सकता है और तो और अनगिनत याचिकाऐं दायर हो सकती है।
यहाँ जिक्र हो रहा है एनीमल प्लेनेट परअगली पँद्रह अगस्त से प्रातः ११:३० पर शुरू होने वाले कार्यक्रम K9 Karma का। यह अमेरिका में प्रसारित होने वाला है। भारत में अगर आप एकता कपूर के सासबहू के झोंटानुचव्वल सीरियलो या फिर दैनंदिन पॉप त्वचा प्रदर्शन से आजिज आ चुके हो, तो अपने केबिल आपरेटर को यह चैनल शुरू करने के लिए तुरंत हड़काईये।













आईये आपको मिलवाते हैं इस कार्यक्रम के किरदारो से। इस कार्यक्रम की सूत्रधार हैं कॉरी हेरेनडॉर्फ। घुटने की शल्य चिकित्सा से उपचार के दौरान कॉरी का योग से परिचय हुआ। वे लंबे समय से पशु चिकित्सालाय मे तकनीशियन के रूप में कार्य कर रही हैं। पंरतु पिछले आठ साल से उन्होने योगशिक्षा और पिछले ६ सालो से पशु योगशिक्षा को पेशा बना लिया है।


चार्ली पाँच वर्षीय काला श्वान है। उसे एक हाईवे पर अवारा घूमते पकड़ा गया था, वहाँ से उसे पशु संरक्षणालय लाया गया जहाँ कॉरी ने उसे देखा।

मिलिए डोगी (योगी) महाराज चार्ली से

कॉरी के अनुसार बाकी सब अब इतिहास है। कॉरी के अनुसार चार्ली ने ही डोगा का अविष्कार किया है। एक दिन घर पर योगाभ्यास के दौरान चार्ली उनकी चटाई पर लेट गया और उसने मानो आँखो से कहा "मैं योगा हूँ।" कॉरी के अनुसार श्वान योग जानते हैं। वे सूर्य नमस्कार और पीठ के बल लेटकर शवासन करना पहले से जानते हैं। लोग योग संतुलना साधने के लिए करते हैं जब्कि श्वान यह सब पहले से जानते हैं। कॉरी कहती हैं कि डोगा आपकी ओर से आपके श्वान के बँधन को मजबूती प्रदान करता है, क्योकि श्वान तो पहले ही आपसे शतप्रतिशत वफादार है।










आपकी जानकारी के लिए यहाँ कुछ तस्वीरे दिखाई गयी हैं। यह वे आसन हैं जिन्हें आप अपने श्वान के साथ घर पर कर सकते हैं। इन आसनों को मूल आसन मुद्राओं मे साधारण हेरफेर से तैयार किया गया है ताकि इन्हें श्वान के साथ किया जा सके। ज्यादा जानकारी के लिए तो आपको K9 Karma का इंतजार करना होगा।

अगर अभी भी आपके ज्ञानचक्षु न खुले हों और आप कुत्ते के नाम से नाकभौं सिकोड़ रहे हो तो जरा इन तथ्यों पर नजर डालिए।

मित्र तुम कितने भले हो


  • पालतू पशु रक्तचाप सामान्य रखने में सहायक हैं। यह सिद्ध हुआ है न्यूयार्क के बफैलो स्थित विश्वविद्यालय में हुए एक अध्ययन से।
  • पालतू पशु तनाव कम रखने में सहायक हैं। ब्रिटेन के वालथॉम पशु पुष्टाहार संस्थान के जोसेफ विल्स का मानना है कि पशुओ के साथ टहलने से नसों का तनाव कम होता है।
  • पालतू पशुओं की मदद से हदृयरोग कम होते हैं। ऐसा होता है पशुओ के विश्वसनीय रिश्ते से मिली मानसिक शांति से, जो हदृयरोग से बचाती है।
  • पालतू पशु अवसाद कम रखने में सहायक हैं। पशु एकाकीपन दूर करते हैं जिससे एक सुरक्षा की भावना का विकास होता है।

किसी महानुभाव के उर्वर दिमाग में यह प्रश्न भी उठ सकता है कि

मैं और योगा? कभी नही!
यदि डोगा यानि कि श्वानयोग हो सकता है तो बिलौटायोग क्यों नही हो सकता। आखिर बिल्लियाँ भी पालतू जीव हैं और लोकतँत्र के नियमानुसार उन्हें भि योग करने पर कोई रोक नही होनी चाहिए। कॉरी के अनुसार बिल्लियाँ भी योगसाधकों को मदद दे सकती हैं पर वे घर से बाहर बिल्ली योग साधना को प्रोत्साहन नहीं देती। क्योकि बिल्लियाँ घर से बाहर निकलते ही सनक जाती हैं और एकाग्रचित्त नही रह सकतीं। शायद इसीलिए कहते हैं कि बिल्लियाँ नाक पर मक्खी भी नही बैठने देतीं।

08 August 2005

पंजाबी पुत्तर !

पंकज भाई की याददाश्त दा जवाब नही। यह लेख मैने तब लिखा था जब रोजनामचा शुरू भी नही किया था और लाईफ ईन ए को पुस्तक का कलेवर देने का ख्याल भी नही आया था। बाद में इसे रोजनामचा पर डालना भूल गया शायद। द्विवेदी जी ने पंकज से पूछा है कि


बढ़िया तो लिखते ही हो...मेर मतबल ये कि...अगर नरूला...अरोड़ा इतनी बढ़्या हिन्दी लिखेंगे तो तिवारी शुक्ला द्विवेदी वगैरह का क्या होगा!!

पंकज भाई का जवाब हाजिर है

नरुला जी तो खालिस पंजाबी हैं पर अरोड़ा जी नाम से पंजाबी लगते हैं व पंजाबी कहे जाने पर बुरा भी नहीं मानते। उन्होंने इस बात पर एक प्रविष्टि भी लिखी थी जो कि पता नहीं कहाँ खो गई। उन्हें भी कॉपी कर रहाँ हूँ शायद वही उस प्रविष्टि का पता बता दें।

इसलिए पंकज भाई की फरमाईश पर यह पुराना आलेख यहाँ हाजिर है। ताकि आगे से हिंदी-पंजाबी मुद्दे पर इसका उल्लेख किया जा सके।

माननीय पंकज जी ने अपने हाँ भाई पर मुझे पंजाबी पुत्तर के संबोधन से नवाजा तो यह लेख लिखने की प्रेरणा मिली| अरोरा नाम से पंजाबी या सिख होने का आभास होता है| वैसे मुझे इस संबोधन पर कोई आपत्ति नही है, पर मेरी बेगम को अपने यूपी वाले खत्री होने पर दीवानगी की हद तक गर्व है | उसे पंजाबी समझने की गलती करने वाले को वह यह समझाये बिना नही छोड़ती कि पंजाबी खत्री एवं यूपी खत्री दोनों अलग-अलग प्रजातियाँ है| यह बात मेरे गैर उत्तर भारतीय मित्रों को उदरस्थ नहीं होती कि आखिर हम अरोरा होने के बावजूद न पंजाबी बोलते है न ही चिकन खाते हैं| मेरा ऐसी हर विकट स्थिती पर एक ही जवाब होता है कि भाई हमारे पूर्वज संभवतः पंजाब से आये थे , हमारा कुटुंब शायद कुछ पहले आ गया होगा और स्थानीय भाषा व खानपान को आत्मसात कर लिया , जो बाद में आने वालों ने अपेक्षाकृत कम किया| वैसे जाति से चिपकना सिर्फ हम भारतीयों का ही शगल नही है , अमेरिकी भी फैमिली ट्री की जड़े खोदते रहते हैं| इस काम के लिए सौ डालर तक के साफ्टवेयर तक मिलते हैं |

04 August 2005

शहर की पहचान

मान लीजिए कि किसी दिन आपको अत्यधिक रोमांच की सूझे और आप हवा के गुब्बारे में सैर के लिए या फिर पैराशूट जंप के लिए निकल पड़े। अचानक तेज हवा चलने से आप अपनी मँजिल की जगह किसी दूसरे शहर में कूद पड़ते हैं। अब आपको कैसे पता चलेगा कि आप किस शहर में हैं? जाहिर है आप यही जवाब देंगे न कि किसी से पूछ लेंगे, या फिर साईनबोर्ड पड़ेंगे। मान लीजिए वहाँ के साईनबोर्ड में शहर का नाम ही न लिखा हो या फिर लोग कोई दूसरी बोली बोलते हों तब? चलिए आपको एक आसान सा तरीका बताते हैं। अपना गुब्बारा या पैराशूट लपेट कर रख दीजिए और चल पड़िए उस शहर में चहलकदमी करने। ढूढिए कोई ऐसा नजारा जहाँ दो लोग लड़ रहे हों। इसमें चकित होने की कोई जरूरत नही, आपकी बदनसीबी ही होगी अगर आप नवाबों के शहर लखनऊ में टपक पड़े हों जहाँ कोई लड़ता नहीं वरना पूरे हिंदुस्तान में ऐसा कोई शहर नही जहाँ आपको कम से कम दो झगलाड़ू न मिल जायें। बस शहर की पहचान आसान है। अब आप यह देखिए कि अगर:

  • दो लोग लड़ रहे हैं। तीसरा आकर उस झगड़े में शामिल हो जाता है। फिर चौथा भी आकर बहस करता है कि कौन सही है। तो समझ जाईये बाबू मोशाय कि आप निश्चित ही कलकत्ता में हैं।
  • दो लोग लड़ रहे हैं। तीसरा आकर उन्हे देखता है और चला जाता है। तो समझ जाईये कि यह है मुँबई मेरी जान।
  • दो लोग लड़ रहे हैं। तीसरा आकर बीचबचाव करने की कोशिश करता है। दोनो अपना झगड़ा छोड़कर तीसरे को पीटने लगते हैं। तो समझ जाईये कि यह है बेदिल दिल्ली।
  • दो लोग लड़ रहे हैं। भीड़ तमाशा देखने जुट जाती है। तीसरा आकर चुपचाप चाय की दुकान खोल लेता है। केमछो, आप अहमदाबाद में मजा मा हैं।
  • दो लोग लड़ रहे हैं।तीसरा आकर कंप्यूटर प्रोग्राम लिखता है ताकि झगड़ा रूक जाये। पर प्रोग्राम मे बग होने की वजह से झगड़ा नही रूकता। तो फिकर नक्को करो, जनाब आप हैदराबाद में हैं।
  • दो लोग लड़ रहे हैं। भीड़ तमाशा देखने जुट जाती है। तीसरा आकर कहता है "अम्मा को यह मूर्खता नही सुहाती।" शांति हो जाती है। यह चेन्नई है।
  • दो लोग लड़ रहे हैं। तीसरा आकर बीयर की पेटी खोलता है। सब साथ मिलबैठकर बीयर पीते है। एक दूसरे को गरियाते है, और दोस्त बनकर घर जाते हैं। यह है गोवा।
  • दो लोग लड़ रहे हैं। झगड़े के बीच समय निकालकर दोनो मोबाईल से अपने दोस्तो को एसएमएस करते हैं। अब पचास लोग लड़ रहे हैं। पाप्पे तुसी लुधियाना विच टपक पड़े हो।
  • दो लोग लड़ रहे हैं। तीसरा आकर बीचबचाव करने की कोशिश करता है। उसके पान की पीक पहले वाले के कुर्ते पर गिर जाती है। भीड़ तमाशा देखने जुट जाती है। बातचीत में पता चलता है, कि तीसरा और दूसरा एक धर्म के हैं और पहला उन दोनो के हिसाब से काफिर या अधर्मी हैं। भीड़ भी झगड़े में शामिल हो जाती है। सांप्रदायिक दँगा हो जाता है। कर्फ्यू लग जाता है। गुरू, तुमको टपकने के लिए कानपुर ही मिला था?
  • दो लोग लड़ रहे हैं। आपको अचरज होता है कि पूरे बाजार में कोई उनकी ओर ध्यान नही दे रहा है। आप बीचबचाव की कोशिश करते हैं तो आपको जवाब मिलता है "क्या के रे हो मियाँ, हम तो इनसे यूँ ही दर्जी की दुकान का पता पूछ रिये थे, मियाँ इस शहर का नाम भोपाल, ये भई ऐसे ई नी हैं"।
  • दो लोग लड़ रहे है, लेकिन गाली गलौच के बीच बीच मे "पहले आप" "पहले आप" कर रहें है, तीसरा बन्दा बीच मे आकर दोनो को पान की गिलौरिया थमाता है, और तीनो झगड़ा खत्म करके, टुन्डे नवाब के कबाब खाने चले जाते है। तो यकीं मानिये जनाब आप शाने अवध लखनऊ मे है।
  • दो लोग झगड़ रहे है, खूब गाली गलौच होता है, कट्टे वगैरहा निकल आते है, इस बीच तीसरा बन्दा आता है और दोनो से बीच सड़क पर लड़ने का रंगदारी टैक्स वसूलता है. तो हमरा कहा मनिये ना, आप बिहार मे ही है भई। हम तो पहले ही कह रहा हूँ, कौनो सुने तब ना।
  • दो लोग लड़ रहे हैं। दोनो घर जाकर इंटरनेट पर बैठ जाते हैं। एक मैसेजबोर्ड पर बड़ी सी पोस्ट लिख मारते हैं। फिर टिप्पणियों में एक दूसरे को गरियाते हैं। बीसियों हजारो लोग उस पर कमेंट करते चले जाते हैं। आप यहाँ , यहाँ या यहाँ हो सकते हैं।

लखनऊ और बिहार की पहचान जीतू के सौजन्य से!

08 July 2005

क्योंकि भैंस को दर्द नही होता! [भाग ४]

इस बार छोटा सा नान-कामर्शियल ब्रेक थोड़ा सा लंबा हो गया। इस विलंब की वजह मैं नही बल्कि हिंदी ब्लाग जगत के महान स्तंभ श्री फुरसतिया जी महाराज हैं। मेरी कथा के प्रमुख पात्र नारद जी को ही अगवा कर लिया और उन्हें विष्णु जी को हिंदी ब्लाग लिखना सिखाने में लगा दिया। बेचारे नारद जी लाख मनुहार करते रहे कि सारा लेखन पाठन का काम देवी सरस्वती का है पर विष्णु जी तो सिर्फ फुरसतिया जी की ही बात मानते हैं। आप लोग यह मत समझ लीजिएगा कि मुझे रामानँद सागर से किसी सीरियल लेखन का काँट्रेक्ट वगैरह मिला है जो मेरे इस लेख में पहले शँकर जी और अब नारद जी आने वाले हैं। नारद जी इस कथा के मुख्य पात्र हैं और भैंस भी। पर अभी आप को बताना कहानी की भ्रूणहत्या होगा। इसलिए जैसे आप अस्सी के दशक वाले दूरदर्शन के "रूकावट के लिए खेद है" को बर्दाश्त करते रहे हैं वैसे ही इसे भी करिए। वैसे आपकी याददाश्त ताजा करने के लिए इस वृताँत का एकताकपूरकरण करना यानि कि पिछले अँको की छोटी सी झलक देना मेरे और आपके ब्लागज्ञान की तौहीन होगी अतः लेख के अँत में दी कड़ियों का उपयोग करिए।

तो हम लोग चलते है झींझक जिले के गाँव सिठमरा स्थित उसी मँदिर में जहाँ अमला,कमला और विमला और शिवलिंग के मध्य वाकयुद्ध की दुदुंभी बज चुकी है। चूँकि यह गर्मी की उमस भरी दुपहर है अतः गाँव के कोने पर स्थित इस मँदिर के आस पास कोई परिंदा तक नही दिख रहा। वह तो विश्वकर्मा जी के डिपार्टमेंट मे किसी ने तकनीकि गड़बड़ी कर दी और शँकर जी की प्रार्थना सुनने वाली हाटलाईन इस सिठमरा गाँव के शिवलिंग से जुड़ गयी वरना अबतक तीनो सखियाँ शिवपूजा करके अपने घर जाकर "क्योंकि सास भी .. " देख रही होती और शिवशँकर जी हमेशा कि तरह राष्ट्रीय और अँतराष्ट्रीय स्तर के मुद्दे सुलझा रहे होते। हाल फिलहाल तो वे मजबूर हैं जब तक यह तीनो सहेलियाँ उनसे सँतुष्ट न हो जायें , आखिर भक्ति की मर्यादा का सवाल है। अमला और कमला जिनकी राजनैतिक महत्वाकाँक्षाए नही थी उन्हें विमला का शँकर जी से दनादन सवाल करना नागवार गुजरने लगा। बात सीधी सी थी, शँकर जी से साक्षात रूबरू होने का मौका तो करोड़ो में किसी किसी को ही मिलता है अतः उनसे केबीसी के पहले इनाम जैसा वरदान झटक लेने की जगह गाँव समाज की समस्याओं पर झक करना अमला और कमला को अखर रहा था। अरे जब बड़े बड़े नेता देश और समाज की चिंता नही करते तो इस विमला को महत्वपूर्ण अवसर को यूँ ही जाया कर देने की क्या पड़ी है? आखिर कमला से रहा न गया और उसने विमला को धीरे से कोंचा "अरी सुन तो जरा!"
विमला के भृकुटी तानने पर कमला ने कहा "अरी तेरी समझदानी मे छेद हो गवा है का? भगवान शँकर विराजै है हमरे मँदिर मा, तो कुछ आशीष वरदान ही माँग लेव, काहे को झक लड़ावत है, कहीं शाप दै दिया तो का होगा?"
विमला "अरे जब ई शँकर जी खुदै अन्याय करत है तो हमका शाप कैसे दे सकत हैं? जब गरीबो और अमीरो की भक्ति में फर्क नही तो उनकी प्रार्थनाओ को सुनने की व्यवस्था मे भगवान क्यो फर्क करते हैं?"
शिवलिंग से फिर गर्जना हुई " क्योंकि प्रार्थनाए सुनने वाला मेंटिनेंस डिपार्टमेंट विष्णु जी का है। मेरा तो डिस्ट्रक्शन डिपार्टमेंट है। मैं अपना काम ठीक से करता हूँ चाहे अफगानिस्तान हो या इराक, अमेरिकियो के बम मेरा काम आसान कर देते हैं। वह तो ब्रह्मा जी के कांसट्रक्शन डिपार्टमेंट की गुजारिश थी कि ज्यादा काम न बढाया जाये वरना कारगिल में मेरा तीसरा नेत्र परमाणु बम कम से कम दो बार जरूर खुलता।"
विमला: शिव शिव! प्रभू आप का नेत्र खुलता तो अनर्थ हो जाता।
शिवलिंग: विनाश के बाद सृष्टि प्रकृति का नियम है। वैसे भी तुम लोग हमारे प्रसाद का लेबल लगालगा कर आबादी बढाते रहोगे तो धरती का बोझ बढने से रोकने के लिए हमे कुछ तो करना पड़ेगा।
विमला तो क्या हरेक को मालुम है कि ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, विष्णु जी पालन करते हैं और शिव जी संहार करते हैं। विमला को जिज्ञासा यह हो गयी थी कि प्रार्थनाए सुनने वाले मेंटिनेंस डिपार्टमेंट जो विष्णु जी का है उसमें शँकर जी क्या कर रहे हैं? शायद यह अफरा तफरी इसी वजह से तो नही मची है? विमला ने अब चतुर राजनीतिज्ञ की तरह भोले शँकर को वाकजाल में फाँसने का निश्चय कर लिया। उसके दिमाग में एक मास्टर प्लान आ गया था। उसने इशारे से कमाल और अमला को चुप रहने को कहा और खुद बोलती रही।
विमला: प्रभू, आप तो बड़े भोले हैं, सबकी सुनते हैं। तो फिर क्या राजा और रँक में भेद करने की नीति कही विष्णु जी की है?
शिवलिंग: नहीं तो और क्या? जैसा आपरेशनल मैनुएल मे लिखा है, वैसा ही करना पड़ता है।
विमला: प्रभु तो विष्णु जी आप को अपने डिपार्टमेंट का काम थमाकर खुद कहाँ चले गये हैं? क्या उन्होने धरती पर अपराध बढ जाने पर अवतार ले लिया है?
यह प्रश्न सुनकर जहाँ अमला और कमला के चेहरे खिल गये वही शँकर जी का जवाब सुनकर उतर भी गये।
शिवलिंग: अवतार कैसा, वह तो आजकल हिंदी में ब्लाग लिखने की सोच रहे हैं। उनका मानना है कि जब अमरसिंह ब्लाग लिख सकते हैं तो वे खुद क्यो नही लिख सकते? इसिलिए मुजे अपना डिपार्टमेंट आउटसोर्स कर दिया है।

यह जवाब सुनकर विमला चकरा गयी। मेरे बाकी दोस्तो की तरह उसे इँटरनेट किस चिड़िया का नाम है यह तो पता था पर ब्लाग क्या है यह उस गरीब को नहीं पता था। शँकर जी को उन तीनो को ब्लागमहिमा समझाने में समय लगेगा तब तक के लिए लेते हैं एक छोटा सा नान-कामर्शियल ब्रे..........क|

भाग १|भाग २|भाग ३

24 June 2005

अनुगूँज- माज़रा क्या है?

Akshargram Anugunj
पटौदी करे खुल्लमखुल्ला शिकार
अँधे हो गये जँगल के पहरेदार
भईये आखिर माजरा क्या है?



भईये आखिर माजरा क्या है?

मेंहदी पकड़े कबूतर तो मचाए शोर अखबार
पटौदी हुए फरार तो गूँगे हुए पत्रकार
भईये आखिर माजरा क्या है?

भूखी डाँस बार बालाऐं मचाती गुहार
हवलदार फाड़े सबकी सलवार
कान मे डाल के तेल है बैठी
जनता की सरकार
भईये आखिर माजरा क्या है?

कहीं गुड़िया कहीं इमराना कहीं भँवरी कहीं अनारा
कठमुल्लों की अदालतो के चैनल कराते दीदार
भईये आखिर माजरा क्या है?

सूखी धरती सिकुड़े दरिया खाली बाल्टी सूनी नजरिया
फिर भी मल्टीप्लेक्स में बहती पेप्सी की धार
भईये आखिर माजरा क्या है?

चले थे करने मुँडा को नँगा बाबू यशवंत सिन्हा सरे बाजार
उल्टे पड़ गयी सच बोलने पर अडवाणी की फटकार
भईये आखिर माजरा क्या है?

बाँटे त्रिशूल गर तोगड़िया तो मचता कम्यूनल‍ कम्यूनल का हल्ला गुल्ला
लेकिन बन गये नान कम्यूनल राम विलास जपते मुख्यमंत्री मुल्ला मुल्ला
भईये आखिर माजरा क्या है?

बीस मोस्ट वांटेड की लिस्ट को दिखाके ठेंगा मियाँदाद पहने दाऊद के हार
बार्डर पर नो एन्ट्री का बोर्ड लगाके खड़े हैं हमारे छक्के अफसर हवलदार
भईये आखिर माजरा क्या है?

सीना ठोंक के कैंप चलाए शेख सरहद के पार
फिर भी पीस प्रोसेस पे डटी हमरी हिजड़ी सरकार
भईये आखिर माजरा क्या है?

पाकेटमारो पर चटकाते डंडे, छुटभैये चोरो पे होती जूतो की बौछार
ताजमहल बेच दलित की बेटी फिरती, बीच बजरिया पहने नोटो के हार
भईये आखिर माजरा क्या है?

वोटिंग के दिन तो सोते तान के चादर
फिर बजट पे क्यूँ मचाते सब बवाल
भईये आखिर माजरा क्या है?

हाथ पिट गया हथौड़े से
कमल की बहकी चाल
भईये आखिर माजरा क्या है?

13 June 2005

नरेंद्र चँचल














प्रसिद्ध भजन गायक श्री नरेंद्र चँचल कल न्यूजर्सी के दुर्गा मँदिर में पधारे। बकौल श्री चँचल वे हर बार अमेरिका भ्रमण की शुरूआत इसी मँदिर से करते हैं। इस बार मेरे पार्किंग की मारामारी , मंदिर की भीड़भाड़ या फिर देर रात तक बच्चो को जगाये रखने की विवशता का कोई भी तर्क श्रीमती जी के आगे नही चला। रात बारह बजे से सुबह चार बजे तक चँचल जी की भजन गायकी का साक्षात आनँद लिया। साथ ही दो स्थानीय कलाकारो ने राधा कृष्ण और शिव पार्वती के रुप में सुँदर नृत्य प्रस्तुत किये। शँकर जी का डमरू और जटाओ से निकलती हाईटेक गँगा की धारा बाके बिहारी के लिए कौतूहूल का विषय बना। बाँके बिहारी कार्यक्रम के बीच लाल कुर्ते वाले अँकल (नरेंद्र चँचल) से दौड़ कर हाई फाईव भी कर आये। बाँके बिहारी की पूरे कार्यक्रम पर एक टिप्पणी मे प्रतिक्रिया थी "Dad, I like Radha Rani"।
भजन गायन के बीच संचालको से पंजाबी में मीठी नोकझोक, किसी भी बच्चे द्वारा उन तक पहुँच कर आटोग्राफ या फोटो लेने की स्वतंत्रता, श्रोतागणों से सीधे संवाद चँचल जी के सरल व्यक्तित्व की झलक दे रहे थे। "बेशक मँदिर मस्जिद तोड़ो" और "तूने मुझे बुलाया शेरांवालिये" जैसा प्रसिद्ध गीत गाने वाले चँचल जी का समीप से दर्शन मँदिर संचालको की कुशल व्यवस्था से सुखद साबित हुआ।
कुछ बानगियाँ चँचल जी की जिंदादिल शख्सियत की :
  • एक व्यवस्थापक द्वारा अंग्रेजी में उदघोषणा करने पर उनका उसकी पीठ पर धौल जमाकल टोकना कि "ओये मैनू नी आंदी अँग्रेजी वंग्रेजी, तू पँजाबी क्यूँ नी बोलता।"
  • किसी दानकर्ता की नाम हैरी होने पर कहना "यहाँ आकर हीरा भी हैरी हो जाता है!"

और दानकर्ताओं की टुच्चई की भी हद है, ऊपरवाले ने हमे जो कुछ दिया है वही तो हम मँदिर मे चढाते है तो फिर उसमे अपने नाम का बोलबाला क्यो करवाना चाहते हैं। क्यो अपने नाम की पर्चियाँ भेजकर सौ दो सौ डालर अर्पन करने की डुगडुगी दर्शको के बीच पिटवाते हैं? एक बानगी देखिए "१०१ डालर from टुच्चाचँद-चवन्नीछाप phone dealer. Best quality cheapest phone cards in USA"

06 June 2005

I don't want that stupid toy!


lallo
कनफ्यूजियाईये नही, हम हैं लालू!
हमारे Bob the builder और Thomas Train के शौकीन, नखरीले एबीसीडी बाँके बिहारी यह जुमला हमे रसीद कर सकते हैं अगर हम यह लालू जी वाला खिलौना जो आजकल भारत में बिक रहा है, कौतूहूलवश उठा लाये औ‌र बाँके बिहारी को पेश करने की खता करें। पता नही भारत में यह खिलौना बच्चे खेलेंगे या वहाँ भी आजकल अमेरिकी दफ्तरो कि तरह लोगबाग अपने क्यूबिकल में फिगर ट्वाय सजाने का प्रचलन शुरू कर चुके हैं। मुझे तो यह लालू की लोकप्रियता भुनाने का हथकँडा लगता है। बच्चे तो शायद वही खिलौने पसंद करते हैं जो कार्टून फिल्मो में दिखते हैं। खैर कोई यह शायद पहली बार है जब भारत मे किसी नेता की शख्सियत टीवि के पर्दे से खिलौनो की अलमारी तक का सफर तय कर सकी है। वैसे इस खिलौने में सिर्फ लालू जी के बालो की स्टाईल और चुनाव चिन्ह कापी किया गया है। विदेशी चेहरे मोहरे वाले इस खिलौने को निर्माताओं द्वारा लालू जैसा चेहरा न देने के पीछे क्या मजबूरी हो सकती है? गोरी चमड़ी के मोहपाश में बँधी उपभोक्तावर्ग की मानसिकता या फिर राष्ट्रीय जनता दल द्वारा मुकदमा ठोंके जाने का डर?

10 May 2005

बाँके बिहारी Go Cart पर!














वृंदावन वाले बाँके बिहारी के जन्मदिन पर मिलता है सुस्वादु प्रसाद और पंचाअमृत, जब्कि हमारे बाँके बिहारी मनाते है अपना जन्मदिन अमेरिकी स्टाईल में। इस बार बाँके बिहारी और उनके भक्तो (मेरे मित्रो) की इच्छा थी कि कुछ हटके किया जाये। वैसे बात वाजिब भी है, पेंसिलवेनिया में अक्टूबर से मार्च तक ६ माह तो ठंड ही घर के अँदर दुबका रहने को मजबूर कर देती है। बचे ६ माह में कुल जमा २४-२५ सप्ताहाँत होते है जिसमे से कम से कम दो चार वर्षा में ही धुल जाते हैं। ऐसे में बचे खुचे बीसेक सप्ताहाँत में अगर कोई बर्थडे या शादी की वर्षगाँठ सरीखे आयोजन करे तो मेरे सरीखे घुमँतु के लिए यह किसी सजा से कम नही। मेरा एक आबजर्वेशन है, ऐसे समारोहो में जनता ईंडियन स्टैडंर्ड टाईम को फालो करती है यानि की नियत समय से एक दो घंटे देर से आना। फिर बातचीत के विषय भी टाईप्ड होते हैं। जरा मुलाहिजा फरमाईये

  • और भाई क्या चल रहा है?
  • यार आज तो बारिश होने वाली थी?
  • तुम्हारा प्रोजेक्ट कब तक चलेगा?
  • लेबर (हरे पत्ते वाला, नौ महीने के बाद वाला नही) कहाँ तक पहुँचा?
  • यार मेरे लायर ने कहा है कि अब एकसाथ I140 और I485 फाईल नही हो सकते।
  • भाईसाहब कौन सी वैन ठीक रहेगी?
  • और आपने घर फाईनल कर लिया?
  • आजकल मार्टगेज बहुत सस्ता है।
  • और घास काटी कि नही इस हफ्ते? (यह मजाक नही, अमेरिकी गृहस्वामित्व के साथ मिलने वाला अनचाहा झमेला है)
  • मुझे अपने बेसमेंट मे फिनिशिंग करनी है।
  • यार मार्केट (शेयर) तो बिल्कुल बैठ गया है, कन्ज्यूमर रिपोर्ट तो ठीक ठाक थी>

सवालो से अँदाजा लग सकता है कि कौन अमेरिका मे कितना जम चुका है और किस दौर से गुजर रहा है? शायद इसीलिए मुझे सब के सब एचओवी लेन में दौड़ते लगते हैं, सबकी जिंदगी एक ही रास्ते पर दौड़ रही है बस सब अलग अलग लेन में हैं। एन्ट्री लेन वाला अभी एच १ ट्रांसफर को लेकर हैरान है। वह लेन चेंज कर चुका व्यक्ति अब I140 के चक्कर में फँस चुका है। उससे बगल की लेन वाला अब घर ढूड़ रहा है या अपने घर की घास काटने को लेकर हैरान है। उससे ऊपर की लेन वाला नासाडेक की डुबकी पर ग्रीनस्पान को कोस रहा है। जब्कि एचओवी लेन में वेटेरन है यानि जो सारे घाटो का पानी पी चुका है और अपने शागिर्दो को गुरुमंत्र दे रहा है।

तो जनाब हमने सोचा कि हम परउपदेश बहुकूल तेरे वाली स्थिति नही आने देते और इस बार सबको बाँके बिहारी जन्मदिवस पर सबको Go cart से परिचय कराते हैं। प्रयोग सफल रहा, बाँके बिहारी भी खुश, मित्र भी खुश। न किसी ने किसी से घर की घास की चिंता व्यक्त करी न किसी ने किसी को शेयर के भाव बताये। और तो और मातृ दिवस पर माताऐ भी पीछे नही रही और उन्होने भी और उन्होने जेसीपेनी और मेसीज की सेल की चिंता छोड़कर Go cart का आनंद लिया।

06 May 2005

क्योंकि भैंस को दर्द नही होता! [भाग ३]

कमला,विमला और अमला की विशलिस्ट एक औसत मध्यमवर्गीय महिला का प्रतिनिधित्व करती है और इसमें परालौकिक तत्व की उपस्थिति के कारण अपनी राजनैतिक,सामाजिक महत्वाकांक्षाए घुसेड़ने का साहस मुझमें नही था। वैसे यहाँ यह बता देना जरूरी है कि जैसे मैं २० साल में साईकिलिंग की जगह ब्लागिंग करने लगा हूँ वैसे ही कमला,विमला और अमला भी बदलते भारतीय समाज और जीवनशैली के परिवर्तनों से अछूती नही रही है। उनके गाँव में भी स्टारटीवी और आजतक जैसे चैनल आते हैं, वे भी ईंटर पास हैं, उनके पोते भी अब ब्रिटेनिया बिस्कुट के रैपर पर छपा कूपन का नंबर लेकर पीसीओ में केबीसी की हमेशा ईंगेज रहने वाली लाईन से भिड़े रहते है, अपनी तकदीर का ताला खोलने और बिगबी के दीदार का चांस पाने के लिए। कमला,विमला और अमला भी अब कपड़े धोने के लिए पीले रंग की ५०१ नं वाली चौकोर बट्टी से सुपर रिन, नीम की दातून से कोलगेट की चमकार और दशहरे के मेले से रेव ३ तक का सफर तय कर चुकी हैं। यहाँ मेवालाल गुप्ता और विशंभर यादव का जिक्र भी लगे हाथ कर देना जरूरी है। दरअसल मेवालाल गुप्ता गाँव की पंचायत का सरपंच है और विमला उसी पंचायत में महिला कोटे से पंच है। दोनो की बिल्कुल नही बनती क्योकि विमला को लगता है कि मेवालाल उस ब्लाक के बीडीओ विशंभर यादव की मिलीभगत से विकास का पैसा हड़प कर जाता है। वैसे कुछेक साल पहले विशंभर यादव भरी पँचायत के सामने विमला के हाथो जलील हुआ था। न जाने कहाँ से उसने सुन लिया था कि Bill Clinton भारत दौरे के दौरान झींझक भी आने वाले हैं। पँचायत में उसकी और विमला की कुछ ईस प्रकार से नोंक झोंक हुई थी।
रामबदन यादव (पंच नं १): अरे विशंभर भईया ई कलीनटन कौनसे करनल है जो हमरे हियाँ आय रहे हैं?
जग्गू चौधरी (गाँव का थानेदार): अरे ऊ हमरे राषटरपति हैं शायद।
विशंभर: अरे नही, तुम सबको कुछ नही मालुम। ऊ तो अमरीका के राषटरपति ठहरे। ऊ हमरे हियाँ महिला परगति की रिपोरट देखे आय रहे हैं। गाँव वालो , यह हमरी ईज्जत का सवाल है, सिर्फ हमरी और मेवालाल की बीबी ही बीए पास हैं अतः केवल वहीं कलीनटन साहेब की आरती करिहैं और उनके साथ फोटू खिंचवईये।
विमला: काहे हम तो महिला पँच है, हम काहे नही खिँचवा सकते फोटू?
विशंभर: देखौ विमला, तुमको कछु तो मालुम है नही कि कौन है कलीनटन, फिर काहे उनके सामने कुछ उलटा सीधा बोलि के हम सबकी हुज्जत करईहौ?
विमला: मालुम है , सबै मालुम है ऊ वही है न लिंसकी Monika Levinsky वाला?
अब विशंभर की बीबी उसके पीछे पड़ गई कि बताओ यह Monika Levinsky कौन है? विमला ने जब पूरा लिंसकी प्रकरण उसके कान में बखान किया तो वह रणचंडिका बन गई। साफ ऐलान करके के बोली कि उसे किसी छलिया की अगवानी नही करनी न उसके साथ फोटूओटू खिंचवानी है।
शायद इसीलिए गाँव की ईकलौती सोडियम लाईट भी मेवालाल के घर के बाहर लगी है। विमला अक्सर कमला और अमला के साथ मिलकर गाँव की भलाई के लिए जो भी योजना बनाती है वह या तो मेवालाल विशंभर प्रसाद एंड कंपनी की चांडाल चौकड़ी के अड़ंगो का शिकार होती है या फिर उसके बजट का ९५ प्रतिशत हिस्सा वे दोनो बिना डकार लिए हजम कर जाते हैं। शायद ईसिलिए इनकी विशलिस्ट में ८ और ९ नंबर की ईच्छाऐं जुड़ी हैं। पर कुछ भी हो कमला,विमला और अमला की शँकर जी की अनन्य भक्ति में लेश मात्र की कमी नही आई। वैसे उनको अक्सर यह दुविधा जरूर होती थी कि उनकी विश लिस्ट में सिर्फ पहले दो नंबर की माँगो के अलावा शँकर जी ने बाकी की माँगो पर आज तक विचार क्यो नही किया? पिछले कुछ महीने पहले एक सोमवार को तीनो सखियाँ हमेशा की तरह शँकर जी के मँदिर पहुँची नियमित पूजा के लिए।

शिव मंदिर
सिठमरा गाँव का शिवमंदिर
उस दिन सवेरे से खासी उमस भरी गर्मी थी। घरों के बाहर बहुत कम लोग थे, मँदिर भी जिस नहर के पास था वहाँ सन्नाटा था। पूजा के दौरान कमला का जल चड़ाने वाला लोटा हाथ से जमीन पर गिर गया और टन्न की जोरदार आवाज हुई। साथ ही एक कड़कती हुई भारीभरकम हुँकार के साथ किसी ने पूछा "कौन है?" तीनो सखियाँ चौंक कर आस पास देखने लगीं। अमला बोली, "अरे कमला यह तो शोले सनीमा जईसा हुइ गवा। ऊ फिलम में भी बसँती पर मँदिर में संकर भगवान चिल्लावत हैं।" कमला ने पलट कर जवाब दिया " अरी विमला, ऊ फिलम मां तो धरमिन्दर चुहलबाजी करत रहे, अब ईस बुड़ौती मे कौन्हो हमसे काहे को चुहल करिहै?" तभी फिर से वही भारी आवाज आई "अरे कौन हो तुम लोग, अरे विश्वकर्मा श्री, यह कौन सी लाईन कनेक्ट हो गई है?" अब तीनो सखियाँ चौंक कर आस पास देखने लगी कि यह आवाज कहाँ से आ रही है, पर दस मिनट की ढुड़ाई का कोई फायदा न होते देख विमला ने पूछ ही लिया "आप कौन हैं और कहाँ से बोल रहे है?" यह पूछते हुए विमला के दिमाग मे अँदेशा था कि शायद रात बिरात टेलिफोन वाले गलती से मँदिर में तो फोन नही लगा गये पर फोन की आवाज इतनी जोर से तो आती नही। तभी उसको अमला ने कोंचा, अमला का चेहरा फक्क पड़ चुका था। दोनो ने जब अमला के हाथ के इशारे को देखा तो उनके विस्मय की सीमा नही रही, आवाज शिवलिंग से आ रही थी। अत्यधिक रोमांच के चलते तीनो सखियाँ धम्म से शिवलिंग के सामने बैठ गयी और लगी फिर से जल चड़ाने और जोर जोर से मत्था रगड़ने। कमला ने तो जोर जोर से मँदिर का घँटा बजाना शुरू कर दिया कि तभी शिवलिंग से गर्जना हुई " अरे यह क्या बेहूदगी है? तुम लोग क्या कभी ढँग के मंदिर में नहीं गयी जहाँ लिखा होता है कि शिंवलिंग को रगड़ना मना है? और बंद करो यह घँटनाद। मेरा इस समय इसे सुनने का कोई मूड नही हैं। "
शिवलिंग
यही है वह शिवलिंग!
विमला ने चिंचियाई सी आवाज मे कहा "प्रभु! अ आप?" शिंवलिंग से फिर आवाज आयी "हाँ , यह हम है स्वंय भोलेशँकर, हम प्रभातकाल में अँतराष्ट्रीय स्तर की जटिल समस्या पर विचार कर रहे थे कि पता नही कैसे तुम्हारे मँदिर से हमारी वीआईपी हाटलाईन जुड़ गई। सवेरे सवेरे हमारे मेडिटेशन में खलल डाल दिया।"
विमला: हाटलाईन?
शिवलिंग: हाँ, हाटलाईन, हर प्रार्थना हम तक शिवलिंग से एक विशेष सँदेश लाईन के द्वारा आती है।
विमला :परंतु प्रभु सँदेश लाईन और वीआईपी हाटलाईन अलग अलग होती है क्या?
शिवलिंग: हाँ, सामान्य जनता के लिए सँदेश लाईन और नेतागण, अभिनेतागण और आईएएस जिन्हे तुमने क्रीमी लेयर का नाम दे रखा है उनके लिए हाटलाईन जब्कि राष्ट्रीय, अँतराष्ट्रीय स्तर के महत्वपूर्ण व्यक्ति जिनकी सुरक्षा मे कम से कम बीस पचीस ब्लैक कैट कमाँडो लगे हो उनके लिए वीआईपी हाटलाईन।
विमला: पर प्रभु, यह तो अन्याय हुआ, हमने तो सुना है कि भगवान तो सबके लिए बराबर हैं।
शिवलिंग: अरे तुम पंच हो या तरूण तेजपाल, हमारा ही तहलका करने पर अमादा हो गई? यह सँदेश लाईन के अपग्रेड सैम पित्रोदा ने हमें सुझाये थे, बड़ा काबिल बँदा है। अरे अगर यह कैटेगराईजेशन न हो तो हर मिनट दो मिनट में तुम्हारे सरीखा भक्त टन्न से घँटा बजा के दो रूपल्ली के बताशे हाजिर कर देता है। पूछने पर एक ही जवाब कि भगवान हाउ डू यू डू करने चले आये थे। फिर हाजिर हो जाती है विशलिस्ट, वही पुरानी फटीचर माँगे कि मेरे लड़के का ट्राँसफर करा दो, दुकान की बिक्री बड़वा दो वगैरह वगैरह।
विमला: लेकिन प्रभू, यह तो सरासर अन्याय है, आपके करोड़ो भक्त हैं जो रातदिन आपका ध्यान करते हैं पर आप उनका ध्यान रखने की जगह सिर्फ हाटलाईन और वीआईपीलाईन पर ही प्रार्थनाऐ सुनेगे तो आपमे और भारत सरकार में फर्क क्या रह जायेगा।
शिवलिंग: जैसी सरकार चुनोगे वैसा शासन भोगोगे। जाति देखकर वोट देने को क्या मैने कहा था? और पहले की बात और थी, तब आबादी की वजह से प्रार्थनाओं की प्रोसेसिंग क्यू छोटी होती थी। अब तो छोटे छोटे बच्चे प्रार्थना करते हैं कि पापा केबल न कटवाये नहीं तो काँटा लगा देखने को नही मिलेगा।
विमला: लेकिन प्रभु बच्चे तो आपका ही प्रसाद हैं।
शिवलिंग: प्रसाद पर भी कोई राशन होता है कि नही? भड़काया जयप्रकाशनारायण ने कि "डरो नही हम जिंदा है" तो खत्म हो गया डर सँजय गाँधी की नसबँदी का और बड़ाते गये आबादी। अब सुदर्शन बहका रहा है तुम सबको कि हिंदू कम पड़ गये, बड़ाओ आबादी। लगता है उसका जल्दी ईंतजाम करना होगा।
इसके बाद अगले दो घँटे तक विमला और शँकर जी की नोंकझोंक चलती रही। अब विमला भले ही अटल जी की तरह कुशल वक्ता न हो पर पँच होने के नाते उसे सवाल जवाब खूब आते थे और उसने शँकर जी की इस वर्गभेद आधारित प्रार्थना सुनने की प्रणाली की धज्जियाँ उड़ाने में कोई कसर नही छोड़ी। बहस का तापमान जैसे जैसे बड़ रहा था, तीनो सहेलियों को समझ आ गया था कि क्यों आम जनता त्रस्त है और क्यो शासक वर्ग मालामाल हैं। क्यों बड़े बड़े घोटालेबाज नेता महायज्ञ वगैरह कराकर फिर से सत्तासुख भोगते हैं। खैर आप सब सुधी पाठकजन है ज्यादा डिटेल दिये बिना आप समझ गये होंगे कि इस बहस के मुद्दे क्या रहे होंगे। बहस का नतीजा अगले भाग में। तब तक के लिए लेते हैं एक छोटा सा नान-कामर्शियल ब्रे..........क|

03 May 2005

क्योंकि भैंस को दर्द नही होता! [भाग २]

हाँ तो जनाब बात हो रही थी झींझक की। झींझक में एक गाँव है सिठमरा। यहाँ की तीन महिलाओं की दासतान इस आलेख के जरिए आप तक पहुँचायी जाने वाली है। यह तीनो महिलाऐं गाँव के मध्यम आयवर्ग का प्रतिनिधित्व करती है। इनके में से एक का पति खेती करती है, दूसरी का पति ग्वाला है और तीसरी के पति की परचून की दुकान है।


परचून की दुकान
परचून की दुकान
हाँ, मुझे मालुम था कि आप में से कुछ जरूर पूछेंगे कि परचून की दुकान में चूना बिकता है कि चूरन, तो जवाब यह है कि दोनो बिकते हैं। यह भारत के आदर्श गाँव का वालमार्ट है। अब अगर आपकी जिज्ञासा की पिपासा शाँत हो गयी हो यह भी बता दूँ कि इन तीनो महिलाओं का नाम है कमला,विमला और अमला। नाम से यह तीनो बहने लगती है पर इस लेख के लिए यह महत्वपूर्ण नही है। यह तीनो काफी अच्छी सखियाँ हैं और जिस जमाने में मैं हाफपैंट पहन कर कानपुर शहर के श्याम नगर में साईकिल से किदवई नगर ट्यूशन पड़ने जाता था, तब से यह एक दूसरे के पड़ोस में रह रही हैं। उस समय तो मैनें अमेरिका की सूरत सिर्फ हिंदी फिल्म के गानो में देखी थी जिसमें राजकपूर,अमिताभ बच्चन या धर्मेद्र विदेशो की गलियों में ठुमके लगा रहे होते थे जब्कि

कमला,विमला और अमला
कमला,विमला और अमला
कमला,विमला और अमला इंतजार कर रही थीं कि कब ज्ञानी जैल सिंह उनके गाँव के बाहर लगी दूरदर्शन की छतरी का उदघाटन करने आयें। और वे सखियाँ भी देखे टीवी पर गब्बर सिंह को बसंती पर चिल्लाते हुए कि "अरी ओ छमियाँ, जरा हमको भी तो दिखाओ दो चार ठुमके!" यह तीनो सखियाँ पति सेवा, सास सेवा, गृह सेवा के अतिरिक्त प्रतिदिन शिव मंदिर की सेवा भी करती थी जो इनके पड़ोस वाली गली से बाहर जाने पर बहने वाली नहर के किनारे स्थित है। हर सोमवार को यह तीनों निर्विघ्न रूप से व्रत भी रखती आ रही हैं। अब इनके द्वारा की जाने वाली सेवाओं में से सास एवं गृह सेवा का काम बहूसोर्स हो गया है। अरे चौंकिए नही, यह कोई नही गुत्थी नही है। मैने तो सिर्फ एक नया शब्द इजाद करने की कोशिश की है। जैसे अमेरिकी कंपनियाँ अपने ऊबाऊ काम को चीन और भारत में आऊटसोर्स करते हैं वैसे इन तीनों सखियों की पदोन्नति हो चुकी है और यह सासे बन चुकी है। अतः सास एवं गृह सेवा का काम अब ईनकी बहुऐं करती हैं। तो बताईये कि यह कर्तव्य का हस्तांतरण बहूसोर्सिंग नहीं कहलायेगा तो क्या लाजिकल प्रोसेस माडलिंग कहलायेगा? खैर तब इनकी शिवशँकर जी से प्रार्थनाओं की लिस्ट बहुत छोटी थी। आप जानना चाहे तो लिस्ट हाजिर है

  • पति की लंबी आयु
  • तीन बेटे
  • अच्छी आमदनी
  • सूदखोर महाजन की याददाश्त चली जाये
  • सास की कर्कश बोलती बँद हो जाये

इन तीनो की शिवशँकर सेवा हलाँकि अब भी बदस्तूर जारी है और आज की तारीख में भी इस विशलिस्ट में कुछ खास बदलाव नही आया है। मेरे ख्याल से गोविंदाचार्य और के सी सुदर्शन यह सूची देख कर खुश हो सकते हैं कि कम से कम सेटेलाईट अपसंस्कृति ने भारतीय ग्रामीण समाज को ज्यादा चौपट नही किया है।

  • पति की लंबी आयु
  • नौ पोते
  • अच्छी आमदनी
  • सूदखोर महाजन की याददाश्त चली जाये
  • तीनो बहुओं की कर्कश बोलती बँद हो जाये
  • सचिन की पैतीसवीं सेंचुरी जल्दी पूरी हो जाये
  • राहुल गाँधी की किसी हिंदी फिल्म की हिरोइन से शादी हो जाये
  • मेवालाल गुप्ता की लुटिया थाली डूब जाये
  • विशंभर यादव का तबादला हो जाये

आगे का वृतांत अगले भाग में। तब तक के लिए लेते हैं एक छोटा सा नान-कामर्शियल ब्रे..........क|

02 May 2005

क्योंकि भैंस को दर्द नही होता! [भाग १]

क्या आपको यह शीर्षक अटपटा लगता है? अँदाज लगाईये इस अटपटे लेख की विषयवस्तु क्या हो सकती है?


  1. कहीं मैं किसी पशुविज्ञानी से टकरा गया?
  2. या फिर मुझे पशुसंररक्षण पर लिखने की सूझी है?
  3. या फिर नयी बोतल में पुरानी शराब परोस रहा हूँ यानि कि फिर से नोस्टालजिया प्रलाप इस बार कुत्ते के बजाय भैंस के बहाने।
  4. या फिर किसी अंग्रेजी ब्लाग पर गाय-भैंस पर कुछ लिखा देखा है उसे यहाँ टीप रहा हूँ कुछ हिंदी फिल्म निर्माताओं जैसे हटके वाले अँदाज में?
  5. और सबसे महत्वपूर्ण यह भाग १ क्या बला है, शायद आपको कई दिन बोर करने की ठानी है?

अगर आपका अँदाज नं १ से ४ तक में कोई भी है तो आपको निराशा हाथ लगने वाली है। हाँ इस बार मेरे इस निठल्ले चितंन को एकाधिक भागो का विस्तार जरूर मिलने वाला है , पर कितना यह मुझे भी नही पता| यह सिर्फ तब बंद होगा जब मेरी ख्याली पुलावों की खिचड़ी पूरी तरह पक जायेगी या फिर आप सब इसे सुन सुन कर पक जायेगें और कहेंगे कि बस बहुत हो गया।

subashghai
कुछ याद आया? टाईटल उड़ाया फिल्मी डायलाग से
और तोहमत हमपे कि हम फिल्में हटके बनाते हैं!
तो चलिए देखते हैं कि इस भैंस कथा का माजरा क्या है? बात आजकल के दौर की ही है पर बिलकुल सत्य घटना पर आधारित है। उत्तर प्रदेश में एक शहर है कानपुर देहात। अब आप कहेंगे कि कानपुर देहात भला शहर कैसे हो सकता है? जहाँ तक मुझे मालुम है सरकार ने प्रशासनिक कारणों से जो कि आमतौर पर जनता जनार्दन की समझ से परे पर जनता के भले के लिए होते हैं, कानपुर का कानपुर शहर और कानपुर देहात नाम के दो शहरों में १९७७ में विभाजन किया था। फिर १९७९ में वापस मिला दिया शायद जनता की भलाई की मलाई खट्टी हो गई होगी और फिर १९८१ में अलग कर दिया। पर जनाब यह लेख इस विभाजन की पोस्टमार्टम रिपोर्ट नही है। यह तो आपको बस एक छोटा सा बैकग्राऊँड बता रहा था बिलकुल वैसे ही जैसे कल हो न हो के ओपेनिंग सीन में प्रीति जिंटा ब्रुकलिन से मैनहैटन तक (बाप रे! शायद तभी वह इतनी स्लिम ट्रिम है) मार्निंग वाक के दौरान न्यूयार्क की देशी लाईफ के बारे में बताती हैं। तो साहब कानपुर देहात में एक कस्बा है झींझक। अब यह मत कहिएगा कि यह किसी जगह का नाम कैसे हो सकता है? अरे जब पथनमथिट्टा हो सकता है , झझ्झर हो सकता है तो झींझक क्यो नही हो सकता। फिर भी आपको कोई कष्ट है तो शहरों, कस्बो और मुहल्लो के नामों के विशेषज्ञ से पूछिए वे आपकी जिज्ञासा शांत कर देंगे ऐसा मुझे विश्वास है| पर भाई मुझे आप लोग विषय से बार बार सवालो की टँगड़ी मार के भटका क्यो देते हो यार? पूरा मूड खराब हो गया। अभी आगे का वृतांत अगले भाग में। तब तक के लिए लेते हैं एक छोटा सा नान-कामर्शियल ब्रे..........क|

21 April 2005

जुड़वाँ होने का (ना)जायज फायदा!

आजकल की भागदौड़ की जिंदगी में क्या आपका दिल नहीं करता कि काश या तो दिन ३६ घंटे का हो जाये या फिर आपका कोई क्लोन पैदा हो जाये| वैसे इस तरह का प्रयोग करने से पहल जनाब डग कीनी का क्या हुआ यह जरूर जान लीजिएगा| लेकिन सैन एंटोनियो के मेयर पद के प्रत्याशी श्रीमान जूलियन कैस्ट्रो ने तो कमाल ही कर दिया| उनके चुनाव संचालको ने शायद उनकी एक मुलाकात उसी समय तय कर दी जिस समय उन्हें एक चुनावी रैली में भाग लेने था| पर आड़े वक्त पर अगर भाई वह भी जुड़वाँ न काम आयेंगे तो क्या पड़ोसी काम आयेंगे? जूलियन साहब के जुड़वाँ भाई जोक्विन कैस्ट्रो रैली में लोगो का अभिवादन और फूलमालाऐं स्वीकर करते रहे जब्कि उसी समय जूलियन साहब अपनी मीटिंग निपटाते रहे| एक अन्य प्रत्याशी फिल हार्डबर्गर ने फरमाया कि लड़कपन में किसी माशुका के पास अपना जुड़वाँ भाई भेज देना लड़कपन का मजाक हो सकता है पर लाखो लोगो के सामने इस तरह अपनी जगह अपने जुड़वाँ भाई को भेजना धूर्तता है| अब विरोधी उम्मीदवारों को बुरा लगे तो लगता रहे पर यह दोनो भाई तो गा रहे हैं कि

जलने वाले तो जलते रहेंगे|
हाथो को अपने मलते रहेंगे|
मिल के करेगे हम धमाल|

13 April 2005

क्या आप इस धर्माधँ को थप्पड़ मारके जगा सकते हैं ?

इस व्यक्ति का मानना है कि यह बिहार के लाखो लोगों का सच्चा प्रतिनिधि है|



तमाशे में हम किसी से कम नहीं
वैसे इनकी पार्टी को तमाम वोट भी मिले हैं और सीटे भी| पर यहाँ उठाया गया मुद्दा भिन्न है| अगर कोई एक नेता हिंदुवादी होने का दंभ भरकर ताजमहल पर कब्जे की बात करे या फिर गुजरात में क्रिया प्रतिक्रिया का नया नियम प्रतिपादित करे तो दस नेता , एक हजार अखबार और कम से कम दस हजार ब्लाग उस की धज्जियाँ उड़ाने में पीछे नहीं रहेंगे| अगर पड़ताल करें तो हिंदु धर्म के उन तथाकथित ठेकेदारों की मिट्टी पलीद करने वाले ज्यादातर सज्जन स्वंय हिंदु होते हैं| यह दर्शाता है कि एक विभाजन और सैकड़ो दंगो के बाद भी हमारा धर्मनिरपेक्ष चरित्र अभी क्षतविक्षत नही हुआ और हम किसी भी धर्म के ठेकेदार को बता सकते हैं कि त्रिशूल चमकाने से कोई सच्चा हिंदू नहीं बन जाता | पर इसका उल्टा मुझे क्यो नहीं दिखता | जरा रामविलास पासवान जद (यू) से गठजोड़ हेतु रखी गई शर्तों पर नजर डालिए|

  • पहली शर्त है नीतिश और शरद भाजपा जैसी सांप्रदायिक पार्टी का साथ छोड़े|
  • दूसरी शर्त है बिहार का अगला मुख्यमंत्री मुस्लिम हो|

भाजपा सांप्रदायिक है या नहीं यह विवाद का विषय हो सकता है| भाजपा को सांप्रदायिक मानने वाले ऐसा इसलिए मानते हैं कि वह हिंदुओ की हितैषी है| पर किसी राज्य का प्रतिनिधि होने की शर्त उसका सुयोग्य,ईमानदार,कुशल प्रशासक होने की जगह धर्म विशेष (चाहे वह कोई भी धर्म का हो) होने का माँग करने से रामविलास जी क्या खुद सांप्रदायिक नहीं हैं? मुझे ताज्जुब सिर्फ यह है कि इस पर दस नेता नहीं बोले, न ही बोले एक हजार अखबार| बोली तो सिर्फ एक वेब साईट| मुझे नहीं पता कि मेरा ब्लाग, मेरा कोई मुस्लिम भाई पड़ता है कि नहीं| पर अगर पड़ता है तो यह टिप्पणी जरूर करे कि अगर नरेंद्र मोदी सांप्रदायिक हैं तो रामविलास को आप क्या दर्जा देंगे? क्या उसने कभी मुस्लिम समाज के उत्थान के लिए स्कूल कालेज खुलवाने की, गरीब मुस्लिम छात्रो को छात्रवृति देने की (आरक्षण की भीख नहीं), गरीब मुस्लिमों के मुफ्त ईलाज की पहल की है| अगर आप कम्युनिस्ट कांग्रेसी या गैर सांप्रदायिक विचारधारा से प्रेरित हैं या फिर मुस्लिम हैं तो बतायें कि रामविलास की इस तरह की माँग को सांप्रदायक क्यो ना माना जाये| अगर नहीं तो कृपया मेरी आँखे खोलिए कि मुझे रामविलास क्यो मुस्लिमो को उल्लू बनाते नजर आ रहे हैं और कोई भी मुस्लिम या धर्मनिरपेक्षी उन्हें वैसे ही जवाब नही दे रहा जैसे नरेंद्र मोदियों ,प्रवीण तोगड़िया और बाल ठाकरे को दिया जाता है|
वैसे मैं यह भी जोड़ना चाहूँगा कि यह वही रामविलास है जिसने पाकिस्तान में मुशर्रफ मियाँ को खुद का परिचय सबसे ज्यादा मतों से जीतने वाले पर गुजरात के दंगो के विरोध में मंत्रीपद को लात मारने वाले शख्स की हैसियत से दिया था| वह बात अलग है कि उनको खुद मुशर्रफ मियाँ ने घास नही डाली| गुजरात हमारा अँदरूनी मामला है|मैं मानता हूँ कि हमारे मुस्लिम भाईयो को देशप्रेमी होने के लिए ठाकरे या मोदी के सर्टिफिकेट की कतई जरूरत नही| तो फिर रामविलास को धर्मनिरपेक्ष होने के लिए गैर मुल्क के तानाशाह से सर्टिफिकेट लेने की क्या जरूरत थी| अगर उन्हे कोई ऐसा सर्टिफिकेट मुशर्रफ मियाँ दे देते तो क्या हिंदुस्तानी मुस्लिम भाई उसे मँजूर कर लेते? मुझे यह भी मालुम है कि इरफान पठान ईंजमाम उल हक की गिल्लियाँ बिखेरते यह नहीं सोचते कि वे खुद या ईंजमाम मुस्लिम हैं, न ही किसी मुस्लिम हिंदुस्तानी फौजी के हाथ काँपते हैं जब दुश्मन के रूप में पाकिस्तानी फौजी सामने होता है| तो फिर पराये मुल्क के तानाशाह के सामने अपने घर के झगड़े का खुलासा करना कहाँ की समझदारी है? अपने फायदे के लिए अपने ही मुल्क की दो कौमों के बीच जहर बोने वाले ऐसे शख्स को अगर मुस्लिम ही जवाब दें तो मजा आ जाये|