13 January 2005

अब आपका गुस्सा ठंडा हुआ कि नही?


Grrrrr!

माफी माँगते हो कि भेजूँ एक लाख ईमेल?


फिलाडेल्फिया के रेडियो स्टेशन ९९ एफ एम ने बर्र का छत्ता छेड़ दिया| पूरा किस्सा यहाँ पढिये | दो खुराफाती रेडियो उदघोषको ने भारतीय काल सेंटर की कर्मचारी पर गालियों की बौछार करते एक अमेरिकी उपभोक्ता की रिकार्डेड काल न सिर्फ रेडियो पर प्रसारित की बल्कि ईंटरनेट पर भी ठोंक दी| उस पर हिंदुस्तानी प्रतिक्रिया भी हुई और रेडियो स्टेशन को १३० ईमेल पहुँच गये| रेडियो स्टेशन ने चट से माफी माँग ली और कूटनीतिक अँदाज में उदघोषको को छोटी मोटी सजा और ईंटरनेट पर रिकार्डिंग डालने वाले कर्मचारी को प्रशिक्षण पर भेजने की घोषणा कर दी| अब आप सब चाहे हाथ मलिए या फिर ईंटरनेट पर याचिका दायर कर दो तीन लाख ईमेल ईकठ्ठा कीजीए और भेज मारिए कोफी अन्नान को , अब इस मसले पर और कुछ कार्यवाही होने वाली नहीं |
यह रेडियो स्टेशन मैक्जिम पत्रिका से कम चतुर है जिसने बकायदा गाँधी जी को लतियाया और कुछ दिन तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे| खूब आंदोलन हुए , किस्सा जंगल की आग की तरह फैल गया| आखिर में पत्रिका ने माफी माँग ली| हम हिंदुस्तानी अब उस पत्र को फ्रेम में मढ कर खुश है जब्कि मैक्जिम पत्रिका अपना सर्कुलेशन बढ जाने से| खैर अपना प्रचार प्रसार करने का सबसे सटीक तरीका है पहले भड़काऊ आईटम बाजार में उतारो, उसे पब्लिक में फैलाओ, बाद में माफी माँग कर, जो वर्ग नाराज है उसका गुस्सा ढंडा कर दो| माफी माँगने में क्या घिसता है| बाद में आंदोलनकारी यह देखने वापस नही आयेंगे कि भड़काऊ आईटम बाजार में लाने वालो नें कितनी मलाई काटी| यह गुर हम भारतीयों को भी आता है, याद है आपको मनीषा कोईराला और उनके शशिलाल नायर की नूरा कुश्ती| हलाँकि बाद में ऐसा ही ड्रामा राजा बुंदेला करने भोपाल गये थे| अपनी किसी फटीचर फिल्म के प्रीमियर का नाटकीय विरोध अपने कांग्रेसी दोस्तों को भगवा कपड़े पहनवा कर करवाया| अगले दिन जब खाकी पैंट वालो ने समाचार में यह विरोध देखा तो पुलिस के पास पहुँच गये कि हमे तो इस फिल्म का नाम भी नही मालुम, फिर विरोध किया किसने, पकड़िये इन नकली बंजरंगियों को| पुलिस ने भी कार्रवाई की और राजा बुंदेला एक दिन के लिए चारसौबीसी में अंदर हो गये अपने नकली बंजरंगी दोस्त के साथ|
अब जरा इस रेडियो स्टेशन वाले मुद्दे पर वापस आते हैं| बात सिर्फ नस्लभेद की नही हैं| अमेरिकी पिनके हुऐ हैं जाब आऊटसोर्सिंग से| पर इन मोटी बुद्धि वालो को यह बताना जरूरी है कि आऊटसोर्सिंग कोई आज से नही हो रही| आप किसी भी दुकान से कोई भी सामान उठा लो, मेड ईन चाईना ही लिखेगा मिलेगा| मेरे पिताजी का कहना है, अमेरिका में सिवाय बंदूको और हथियारों के बनता क्या है? खैर बनता है बैंगलोर में और मार्केट होता है सियेटल से| बिल्लू भईया शान से बिलियन डालर पीटते है फिर चंद मिलियन हमारे यहाँ टीकाककरण कार्यक्रम में देकर फोटो भी खिंचवाते हैं और वाहवाही भी पाते हैं| जब्कि हम खाते हैं गालियाँ| अब ईनफोसिस और टीसीएस ने अमेरिका में, अमेरिकी नागरिकों का भर्ती अभियान शुरु कर और स्कालरशिप देकर एक अच्छी शुरूआत की है| हमें अपनी छवि सिर्फ डालर बटोरू जैसी नहीं बनाये रखनी चाहिए| मनमोहन सिंह बधाई के पात्र हैं , सुनामी के लिए अमेरिकी और विश्वबैंक की मदद विनम्रतापूर्वक ठुकराने के लिए| हमें अपनी छवि बनाने पर भी ध्यान देना होगा| पर आईंदा ऐसी कोई भी मसखरी हो तो विरोध गाँधीवादी अंदाज में न कर विशुद्ध अमेरिकी अंदाज में करिए| ठोंक दीजिए एक दो मिलियन डालर का मुकदमा , हमारे हजारो एनआरआई वकील किस दिन काम आयेंगे? एक बार ऐसा मुकदमा जीत गये तो भविष्य में कोई ऐसी उज्ड्डता नहीं करेगा| वरना हम सिर्फ याचिका दायर करते रहेंगे या फिर जैसा मैं कर रहा हूँ, ब्लाग छाप छाप कर खुश होंगे, प्रतिक्रिया माँगेगे, प्रतिक्रियाओं पर प्रतिक्रियाऐं लिखेंगे और ईंटरनेट ट्रैफिक का बेड़ागर्क कर डालेंगे| जब्कि औसत अमरिकी हमे लाल पीला होते देख कर हँसते रहेंगे| एक नमूना पेश है , यहाँ किसी मसखरे ने बालीवुड फिल्मो के दृश्य इस चेतावनी के साथ दर्शाये हैं कि इन्हें चौबीसों घंटे Guantánamo Bay के कैदियों को दिखादिखा कर तड़पाया जाता है|

5 comments:

अनूप शुक्ला said...

बंधुवर, ऐसे लेख जनता की संपत्ति होते हैं.हमने नामांकन किया तुमने वापस ले लिया.बात बराबर हो गयी.अब आगे कुछ और अंग्रेजी मत लिखना.लेख बढ़िया लगा.पूरा लेख एक ही पैराग्राफ में लिखने बजाये दो-तीन पैराग्राफ में लिखना शायद ज्यादा ठीक हो.अभिव्यक्ति में सागर के उस पार कृष्ण बिहारी के संस्मरण तथा अभिजात के संस्मरण अगर न पढें हों तो पढ़ लेना .शायद कुछ काम आयें.

eSwami said...

अन्ततोगत्वा आपने सिर्फ लिख कर बैठ जाने के बजाया और मेलोड्रामेतिक होने के बजाए ईन्ट का जवाब पत्थर से देने की बात की - आप को पता नही है मुझे कितनी खुशी हुई ये पढ के. एक मौका है हाथ मे, अभी अपने जीतु पेल्वानजि ने वो पोस्ट मारी थी जन गण मन से छेडछाड के बारे मे - हिला दो हर मन्त्रालय, हर अखबार, हर टीवी का दफ्तर. पी एच पी का एक प्रोग्राम लिख के ३०-४० सर्वर से चला दो - पिच्च पिच्च के थूके ई-मेल ... मर्दाना तरीके से गुस्सा निकालने का एक ही तरीका है फोड के रख दो. अगर कोई अट्टेन्शन चाह रहा है साले को ऐसी अट्टेन्शन दो कि नानी याद आ जाये. फिर कौन लिख रहा है कोड?

Jitendra Chaudhary said...

हमारा खुद भी यही मानना है कि लोग बाग सस्ती पब्लिसिटी पाने के लिये कोई ना कोई नामाकूल हरकत करते है, सो इन रेडियो वालों ने किया, और सफल हुए, बाद की किसको टेंशन है, माफी मांग लेंगे...शब्दो से,लिखित मे और जैसे चाहो...पब्लिसिटी का खर्चा तो बच गया.इन भद्रजनो को कोई अभद्र तरीका ही टिकाना पड़ेगा, तभी सुधरेंगे.

ईस्वामी भाई, अब यार इमेल लिखकर भी क्या कर लोगे...यहाँ तो लोगो के पास यूनीकोट फोन्ट ही नही होता...सबको ईमेल मे चील बिल्लौवा दिखेगा, तो उसका भी वही हाल होगा जो बाकी इमेल का होता है, यानि कि कूड़े का डब्बा. कोई और झन्नाटेदार तरीका ढूँढो. हम तो लगे ही पड़े है.

Mihir said...

mujhe maloom nahin tha ki hindi main likh sakte hain

Raviratlami said...

अतुल भाई,
इंडीब्लॉगी अवॉर्ड के लिए बधाई.
अब आप मुझे अपना पोस्टल पता बताएँ ताकि आपको रू. 500/- की किताबें पुरस्कार रूप में भेज सकूँ. (पता अगर भारत का हो तो बेहतर नहीं तो फिर सोने से गढ़ावन मंहगा वाला किस्सा हो जाएगा - यानी कि पोस्टल खर्च ज्यादा हो जाएगा... :))

धन्यवाद और एक बार फिर बधाई सहित,
रवि