25 January 2005

हे भगवान, विप्रो और ईंफोसिस का धंधा चौपट कर दो!

चौंकिए नहीं| यह मेरी दुआ कतई नही है| मैं नान रिलायबल ईंडियन(NRI) भले ही हूँ पर हूँ तो ईंडियन ही|तो फिर नामचीन भारतीय कंपनियों के लिए बददुआ क्यों माँगूगा| हाँ जिन ग्रीनकार्डधारकों और भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिकों की नौकरी पर आऊटसोर्सिंग की तलवार लटकी है वह कमोबेश ऐसा सोचने के लिए स्वतंत्र हैं| लेकिन यह दुआ कर्नाटक के छोटे से गाँव के एक मामूली किसान नागप्पा की है| नागप्पा अकेला नही है, विप्रो और ईंफोसिस से चिढने वालो में, उसके जैसे हजारों किसान आपको बैंगलोर के बाहर गाँवो में मिल जायेंगे| कारण स्पष्ट है, दिन दूनी रात चौगुनी बढती साफ्टवेयर कंपनियों को समाहित कर पाना अब बैंगलोर, मुम्बई जैसे महानगरों के बूते से बाहर होता जा रहा है| नतीजा आसपास के ग्रामों की जमीन का अधिग्रहण कर नये टेक्नोलोजी पार्कों का विकास है| पर लगता है यह विकास कर्ज में डूबे किसानो की जमीनों पर हो रहा है| कई बार सरकार विकास के नाम पर औने पौने दामों पर भी किसानो की जमीनों का अधिग्रहण कर रही है|

ऐसा ही दृश्य लखनऊ के सहारा शहर के बाहर दिखता है| ऊँची चहारदीवारियों से घिरा एक उपनगर जहाँ बसने की औकात सिर्फ धनाढ्यों की ही है| औसत नागरिक वहाँ सिर्फ दूध और अखबार सपलाई करने ही जा सकता है| भारत का विकास हो रहा है पर खाईयाँ चौड़ी हो रही हैं| आशीष के शब्दों में हर सामर्थ्यवान जो खुद अमेरिका नहीं जा सकता, अपने चारों ओर अमेरिका का निर्माण कर रहा है| उसको आसपास के मध्यवर्गीय,निम्नमध्यवर्गीय और शोषित समाज से सरोकार नही है| हम समाजो को खाँचो में बाँटने पर तुले हैं| दो अलग तरह के समाज बन रहे हैं| पहला समाज जिसके पास सबकुछ है जिसे हासिल करने के लिए सही गलत हर तरह के तरीके ईस्तेमाल किए गये हैं| इनमें उद्योगपति, धनाढ्य, नेता, प्रशासनिक अधिकारी,डाक्टर , वकील और कमाऊ पेशे वाले लोग शामिल हैं, चाहे हाई स्पीड ईंटरनेट हो या चंद्रयान, चाहे राष्ट्रीय राजमार्ग हो या नये हवाई अड्डे, चाहे उच्चस्तरीय सुरक्षा हो या अत्याधुनिक चिकित्सा प्रणालियाँ सब ईसी १०-१५ % वर्ग को उपलब्ध है| बाकि ८०% को सिर्फ वोटबैंक के तौर पर ईस्तेमाल किया जा रहा है| दंगे में भी यही लोग मरते है और महामारी फैलने पर भी| उदारीकरण के नाम पर बंद हो रही फैक्ट्रियों से होने वाली बेरोजगारी का दंश यही वर्ग झेलता है. जब्कि इन फैक्ट्रियों की जमीन औने पौने दाम पर खरीद कर उदरीकरण होता है सिर्फ उच्चवर्ग का|

एक कल्पना कीजिए, एक छोटे शहर में ४० साल पुरानी फैक्ट्री तोड़ कर मल्टीप्लेक्स बना दिया गया है, शहर में बिजली गायब है पर मल्टीप्लेक्स रोशनी से सराबोर है|फैकट्ररी में ही काम करने वाला मजदूर जो अब बेरोजगार है मल्टीप्लेक्स के बाहर खड़ा है| मल्टीप्लेक्स के अंदर किसी साईबर कैफे की रंगीनियों में मल्टीप्लेक्स खरीदने वाले उद्योगपतियों और मल्टीप्लेक्स बेचने वाले नेताओं ,अफसरों के साहबजादें रंगीनियाँ मना रहे हैं,मल्टीप्लेक्स के बाहर खड़े मजदूर की बेटी के साथ| जनाब यह कोई अनैतिक धंधा नहीं कर रहे, बल्कि बकाया www.दोस्ती.काम वगैरह से डेट सेट की गई है और मजदूर बाहर अँधेरे में खड़ा लड़की की राह देख रहा है|यह दृश्य कपोल कल्पना नही है, कानपुर,नागपुर, भोपाल, गुड़गाँव, नोएडा, जैसे किसी भी शहर को उठा कर देख लीजिए मिलती जुलती कहानियाँ मिल जायेंगी|

इंतजार सिर्फ उस दिन का है जब मल्टीप्लेक्स के बाहर खड़ा मजदूर समझ जायेगा दलित की बेटी जैसों की वजह से वह फैक्ट्री से बाहर है और उसकी बेटी मल्टीप्लेक्स में| उसके पास कि पान की दुकान वाला चौरसिया समझ जायेगा कि सावरकर की जय बोलने वाले और तिरंगा उठाकर चिल्लाने वालों के भाई ही उससे गुंडा टैक्स वसूलते हैं| मजदूर को उधार पर दूध बेचने वाला समझ जायेगा कि कैसे उसे लाठी महारैला में उसे ले जाने वाले उसे ही बेवकूफ बना रहे हैं| और एक दिन यह सब लोग हाथ में ईंट पत्थर उठा लेंगे और मंदिर मस्जिद तोड़ने की जगह मल्टीप्लेक्स तोड़ डालेंगे| मैं सोच रहा हूँ कि उस दिन का ईंतजार करने के लिए रामचंद्र जी के भक्त, मार्क्स के चेले, गाँधी जी के सपूत, लक्ष्मीउपासक, तथाकथितजनसेवक , नारायणमूर्ति और ईक्कीसवीं सदी के विकासपुरूष,लौहपुरूष ईत्यादि सिर्फ हाथ पर हाथ धरे ईंतजार करते रहेंगे क्या?

4 comments:

eSwami said...

आज अमेरिका मे भी लोग आपने इलाकों मे वाल-मार्ट बना देखना नही चाहते क्योंकि इस से छोटे व्यवसाई के पेट पे लात पडती है. महाजन और नायडू का हश्र देखा ही है आपने - विकासपुरुष बनने चले थे और मूलभूत ढान्चा गोल है. बिना मूलभूत ढंचा बनाये मल्टिप्लेक़्स कितने दिन चलेगी? कृषि-प्रधान अर्थ व्यवस्थाओँ को चाहे कितनी ही हेय दृष्टी से देखा जाता हो मगर १०० करोड का पेट कैसे भरेगा? वास्तविकता से रू-ब-रू होने मे ज्यादा समय नही लगा है, अभी और खुलेंगी आंखें. रही बात आउट-सोर्सिंग की - घरेलू बाजारों के बिना और घरेलू उत्पादों के बिना ये चार दिन कि चाँदनी ना साबित हो तो कहियेगा, कभी कभी दुःस्वप्न आता है, १०० करोड हैं हम, इतने प्रोग्रामर हो जायेंगे के रेहडी-ठेले पे वेब-साईट कि दुकान खोल के बैठे होंगे, सारी उंची तनख्वाहें नादारद होंगी!

Jitendra Chaudhary said...

देखो भइया, अभी भी भारत की हिस्सेदारी दुनिया की आइटी जगत मे बहुत ज्यादा नही है, हम लोग इसी बात से उछलने लगे है कि हमारे बन्दे दुनिया मे जगह जगह पर काम कर रहे है. लेकिन इतने से काम नही होगा. मेरे विचार से भारत को अपनी ताकत और कमजोरी का एहसास होना चाहिये...जो खुशकिस्मती या बदकिस्मती से कहो जनसंख्या ही है. हमारे पास ह्यूमन रिसोर्सेस तो बहुत है लेकिन नयी चीजे अपनाने मे हम अभी भी पिछड़े है. हमे ध्यान देना होगा कि रिसर्च,तकनीकी,कृषि आधारित रोजगार,ऊर्जा के स्रोते का विकास औ‌र मूलभूत ढाँचे को बनाने मे ज्यादा ध्यान दे.
अटलबिहारी की सरकार अच्छा काम कर रही थी जैसे राष्ट्रीय राजमार्ग वगैरहा..... लेकिन राजनीतिक फायदे के लिये पिछली सरकार के सारे कामो पर ताला लटक गया है

हमारे लिये सही दिन तब आयेगा जब दुनिया भर की रिसर्च लैब्स यहाँ पर ही होंगी, और हम भारत मे बैठे बैठे ही दुनिया भर की साफ्टवेयर इन्डस्ट्री को कन्ट्रोल करेंगे.

आशीष said...

जो नारायण मूर्ति बड़े बड़े आदर्शों की बात करते हैं उन्होंने ज़मीन खरीदते समय शायद उन गरीबों के बारे में नहीं सोचा जिनकी कौड़ियों के भाव खरीदी गयी ज़मीन पर वो अपनी इमारत बनाने चले थे। भारत में आज यही आलम हर जगह है। काश हमारे धनाढ़य वर्ग और हम जैसों को को गरीबों की हाय लगे तभी अकल आयेगी। हमने करोड़ों अरबों आई आई टी जैसे संस्थान बनाने में फ़ूंके हैं जिनका कि भारत को योगदान नगण्य है और हमने अनदेखा किया उस किसानों को जिनकी वजह से देश खाना खाता है (और उनके खुद के बच्चे भूखे रहते है) और मज़दूर समाज को जिनकी वजह से हम बहुत से काम कर पाने में सक्षम हैं और हमारे सर पर छत है। लानत है हम पर। एक दिन क्रांति आना ज़रूरी है जब ये have nots लोग haves के सर फोड़ेंगे।

Anonymous said...

अतुल भाई, मुझे लिखते हुऐ बडा दुख हो रहा है कि आपकी विचारधारा बेहद सन्कीण्णॅ है केवल भारत की बडी कम्प्यूटर कम्पनियोँ के बारे मेँ, आपको बहुत कुछ जानने की जरुरत है टी सी ऐस, ईन्फोसिस और विप्रो के बारे मे'। आप खुद ही असुरक्षित महसूस करते है ईन कम्पनियोँ से। दुनिया मे ऍक महेश भाई से मिलकर आप किसी कम्पनी के बारे मे विचार कैसे बना सकते है। आपका ब्लाग पढकर कोफ्त हुई। आपकी विचारधारा विरोधाभासी है। दूसरी बात यह है कि हर जगह आप अपने आप को बेहद साफ सुथरा साबित करते रहते है और दूसरो का मजाक उडा कर ब्लाग को सस्ती लोकप्रियता दिलाने की कोशिश की है आपने। उम्मीद है कि निन्दक नियरे राखिये की तर्झ पर ध्यान देन्गे।