10 March 2005

अनुगूँज 7 - मुन्ना कबाड़ी और पत्थर से टक्कर!

Akshargram Anugunj
मेरे उस दोस्त मुन्ना का असली नाम शायद ही किसी को मालुम हो| यहाँ तक कि घर के लोग भी उसका असली नाम भूल चुके थे| हाँ कबाड़ी उपनाम हम सबने सिर्फ स्नेहवश ही नहीं जोड़ा था| दरअसल मुन्ना कबाड़ी को स्कूली दिनों मे इलेक्ट्रानिक का शौक चर्राया था और वह अक्सर विद्युतचालित घंटियाँ, रिमोट और न जाने क्या क्या शगूफे ईजाद करने के फेर में कबाड़ से स्प्रिंग, लोहा ईत्यादि ढूड़ा करता था|



पत्थर से टक्कर!

हम सब गर्मी की छुट्टियों में फुटबाल खेलते थे| क्रिकेट के खेल में तो कभी कभी बड़े लोग भी घुसपैठ बना लेते थे| पर फुटबाल का खेल ज्यादा दमखम माँगता है, अतः कोई व्यस्क सींग कटाकर हम बछड़ो की टोली में शामिल नहीं होता था| कुछ दिन बाद न जाने कहाँ से एक हट्टा कट्टा युवक हम लोगो की फुटबाल टीम में खेलने आ गया| पता चला कि वह कोई फौजी था और छुट्टियों मे घर आया था| लड़को को फुटबाल खेलते देख वह भी शामिल हो गया| हम सब भी खुश कि कोई एक्सपर्ट मिल गया| लेकिन खुशी जल्द ही जलन में बदल गयी| फौजी भाई पेशेवर खिलाड़ी थे और उनके साथ फुटबाल खेलने में हमारे नाको चने चब जाते थे| विपक्षी टीम हमेशा दस पंद्रह गोल से हारती थी| एकदिन हम लोग डट कर खेले और खेल खत्म होने से कुछ देर पहले मामला बराबरी पर चल रहा था| हमारी तरफ से मुन्ना कबाड़ी गोलची बने थे| मुन्ना भाई ज्यादा कवायद से बचने को हमेशा गोलची ही बनते थे| अचानक आखिरी क्षणों में फौजी भाई की टीम को पेनाल्टी किक मिल गई| अब रोमांच चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया| मुन्ना भाई गोल के एक कोने से दूसरे कोने तक दीवारघड़ी के पेंडुलम की तरह डोल रहे थे| सामने फौजी भाई पेनाल्टी किक के लिए तैयार थे और हम सब समवेत स्वर में चीख रहे थे "मुन्ना ईज्जत का सवाल है गोल मत होने देना"| मुन्ना कबाड़ी के डोलने की आवृति छण प्रतिक्षण बड़ती जा रही थी और साथ साथ हम सबकी उसको चने के झाड़ पर चड़ाती चीखें भी| हल्ला गुल्ला समझ कर मोहल्ले वाले भी खिड़की दरवाजों से झाँकने लगे कि लड़को में मारपीट तो नहीं हो गई| पर मैदान का महौल देख कर सब साँस थामें देखने लगे| तभी मुन्ना भाई की नजर उनके ईकतरफा ईश्क पर पड़ी जो ईमली वाले के ठेले के पास खड़ी चूरन लगी इमली खा रही थी और टकटकी बाँधे मुन्ना भाई पर अपनी सखियों के साथ नजरे गड़ाये थी| अब वाकई मुन्ना भाई की ईज्जत का सवाल था| फौजी भाई को भी ताव आ गया और उन्होने एक दनदनाती पेनाल्टी शाट मारी| हम सब चीखें "मुन्ना बाल गोल के बीच में जा रही रही है"| मुन्ना कबाड़ी गोल के कार्नर से बीच में कूदे | उधर फुटबाल तोप के गोले की तरह उनके सिर से टकरा कर नब्बे डिग्री के कोण पर ऊपर की उछल गयी और ईधर हम सब हिप हिप हुर्रे करते हुए मुन्ना भाई की ओर दौड़ पड़े| गोल पर जाकर देखा तो मुन्ना भाई चित्त पड़े थे और उनकी आँखे लट्टू की तरह घूम रहीं थी| उनको होश में लाने पर जब बधाई दी गयी तो उन्होनें कबूला कि वास्तव में उन्हे फुटबाल दिखी तक नहीं थी| वह तो न जाने कैसे गोलपोस्ट और फुटबाल के बीच में आ गये थे और उन्हे ऐसा लगा था कि किसी ने उनके सर पर आलू से भरा बोरा घसीट के दे मारा हो| खैर हमने उनकी ईज्जत की खातिर यह राज किसी को नहीं बताया और आप भी किसी से मत कहियेगा|

7 comments:

आशीष said...

बहुत सही बन्धु, एक और मुन्ना, मुन्ना भाई एम बी बी एस के बाद।

प्रेम पीयूष said...

आपने तो मुन्ना कबाङी का कबाङा ही निकाल दिया, वो भी इमली की चटनी चटाकर। मिलता-जुलता चित्र डालने पर और भी प्रभावी हुआ लेख। पक्का आपके महाशय दोस्त नहीं पढ रहे है , इस लेख को ।

अनुनाद सिंह said...

वाह भाई वाह ! मैच की तरह ही उसका वर्णन भी कम रोमान्चकारी नही है ।

अनूप शुक्ला said...

पता चला है कि दोस्त लोग गाना गा रहे थे--मुन्ना भाई की गाड़ी चली,पम-पम-पम.

Brijesh Goswami said...

Atul Bhiya,

jai ho atul bhaiya ...dialog dilevery mein tumhara jabab nahee. Thoree phursat milee to socha kee Rojnamcha padha jay. Aur ab mein padh kar sunday evening mein office mein aakela thahake laga rahe hoo. Khair kaun mai ka lal mujhe hasne se rok sakta he.

Jai ho ..aur lage raho.

Brijesh Goswami said...

Atul Bhiya,

jai ho atul bhaiya ...dialog dilevery mein tumhara jabab nahee. Thoree phursat milee to socha kee Rojnamcha padha jay. Aur ab mein padh kar sunday evening mein office mein aakela thahake laga rahe hoo. Khair kaun mai ka lal mujhe hasne se rok sakta he.

Jai ho ..aur lage raho.

Anonymous said...

अतुल बहुत बहुत धन्यवाद एसी मनोरंजक लघु कथायें लिखने के लिये. सच में हास्य से ओत प्रोत तुम्हारे लेखकों को पढ़ कर वर्षों पूर्व लखनऊ और प्रतापगढ़ में बिताये गये दिनों की यादें ताजा हो गयीं. ऐसा प्रतीत होता है कि तुमने अपने लेखों के पात्रों को मेरे जीवन की घटनाओं से ही उठाया है. ऐसे ही लिखते रहो.. वैसे मेर नाम भी अतुल है और मैं भी उ.प्र. वासी (लखनऊ) हूं. और हाँ मैं भी तुम्हारी ही तरह अमेरिका में हूँ. अंतर मात्र इतना ही है कि मैं पश्चिमी तट पर हूँ.

- अतुल श्रीवास्तव (email: Shriatku@yahoo.com)