28 March 2005

ऊँची छलाँग,महाचीख और पागलपन














यह सारे नाम हैं लास वेगास में बने स्ट्रेटोस्फियर टावर में ९०० फुट की ऊँचाई पर खुली हवा में बने झूलों के जिन पर बैठते ही या तो आपको अपने पेट में तितलियाँ उड़ती महसूस होंगी या दिन में तारे दिखेंगे| मेरे जैसे रोमांच को दूर से देखने वाले जीवो के लिए महज ६ वर्ष पहले रोमांच की परिभाषा थी "ऊपर चलता रेल का पहिया , नीचे बहती गँगा मईया!" या फिर दशहरे के मेले में लगा सौ फुट की ऊँचाई वाला मँथर गति से चलता झूला| पर जब स्ट्रेटोस्फियर का नजारा देखा तो रोमांच की पिछली परिभाषाऐं छिन्न भिन्न हो गयीं| अब पेट में तितलियाँ उड़े या दुनिया घूमती नजर आये , इस तरह के ओखली में सिर देना ही पड़ता है क्योकिं मुझे अपने दिल से भारतीय और दिमाग से अमरीकी नन्हे शैतानों के सामने फजीहत नही करानी होती | दोनो भाई बहन इस तरह के रोमांचकारी पर सिर के बाल खड़े कर देने वाले झूले देखते ही चीखते हैं "Dad! thats amazing, lets roll on it!". मेरे जमाने में लोग यह देखते ही बच्चों को "उई बाबा!" करके दुबका लेते थे| अब बीसवीं शताब्दी में जन्मे पर ईक्कसवीं शताब्दी में बाप बने Dad की खैर नहीं | मैने तो सशरीर झेला है अब आप तस्वीरों के माध्यम से झेलिए|

इस फ्लैश में बने फोटो एलबम में आडियो कमेन्ट्री का भी प्रावधान है| Next बटन दबाकर आगे के चित्र देखिए और चित्रों का विवरण सुनते जाईये| अगर आपको भी यह एलबम अपने ब्लाग पर उपयोग करना हो,तो जल्द ही यह सर्वज्ञ पर उपलब्ध होगा|

7 comments:

Tarun said...

when we went to vegas, we stayed in the same hotel aur bhaiyaa apni to himmat nahi hui isme bhaitne ki.....

Manoj Agarwal said...

Your audio commentary is more interesting than the pictures itself ;-)

Jitendra Chaudhary said...

अरे गजब! का चीज है यार!
और आडियो कमेन्ट्री तो बहुत कमाल का आइटम है, और साथ मे शराफत अली की आवाज बहुत चकाचक है.हमरि तो यही पर ही चीख निकल रही है, अच्छा झूला है,
लेकिन आप ये बताइये, कि आपके कैमरे ने सिर्फ झूले की फोटो ही खींची या लास वेगास के दूसरे नजारो की भी? दूसरे आइटम भी लगाइये.

प्रेम पीयूष said...

अतुलजी ,
आविष्कारी बलागिंग कोई आपसे सीखे । अतिसुंदर ।

Raman Kaul said...

जीतू भाई, कहा जाता है, "व्हाट हैपन्ज़ इन वेगस, स्टेज़ इन वेगस"। इसलिए अतुल बाहर बाहर के नज़ारे दिखा रहे हैं।

Anonymous said...

atulji, hamaare samay main to aise jhule bacchon ko daraanke ke kaam aaya karte the. Mujhe to abhi bhi sochker hi dar lag reha hai.

Arvind said...

अतुल जी,

इन झूलोँ मेँ मैँ भी बैठ चुका हूँ, कसम से बडी ही मजेदार चीज है| मेरी धर्मपत्नी की तो हिम्मत नहीँ हुई बैठने की लेकिन मैँने भरपूर आनन्द उठाया| यदि किसी को रोमान्च जरा भी पसन्द एक बार ट्राय जरुर करना|