02 May 2005

क्योंकि भैंस को दर्द नही होता! [भाग १]

क्या आपको यह शीर्षक अटपटा लगता है? अँदाज लगाईये इस अटपटे लेख की विषयवस्तु क्या हो सकती है?


  1. कहीं मैं किसी पशुविज्ञानी से टकरा गया?
  2. या फिर मुझे पशुसंररक्षण पर लिखने की सूझी है?
  3. या फिर नयी बोतल में पुरानी शराब परोस रहा हूँ यानि कि फिर से नोस्टालजिया प्रलाप इस बार कुत्ते के बजाय भैंस के बहाने।
  4. या फिर किसी अंग्रेजी ब्लाग पर गाय-भैंस पर कुछ लिखा देखा है उसे यहाँ टीप रहा हूँ कुछ हिंदी फिल्म निर्माताओं जैसे हटके वाले अँदाज में?
  5. और सबसे महत्वपूर्ण यह भाग १ क्या बला है, शायद आपको कई दिन बोर करने की ठानी है?

अगर आपका अँदाज नं १ से ४ तक में कोई भी है तो आपको निराशा हाथ लगने वाली है। हाँ इस बार मेरे इस निठल्ले चितंन को एकाधिक भागो का विस्तार जरूर मिलने वाला है , पर कितना यह मुझे भी नही पता| यह सिर्फ तब बंद होगा जब मेरी ख्याली पुलावों की खिचड़ी पूरी तरह पक जायेगी या फिर आप सब इसे सुन सुन कर पक जायेगें और कहेंगे कि बस बहुत हो गया।

subashghai
कुछ याद आया? टाईटल उड़ाया फिल्मी डायलाग से
और तोहमत हमपे कि हम फिल्में हटके बनाते हैं!
तो चलिए देखते हैं कि इस भैंस कथा का माजरा क्या है? बात आजकल के दौर की ही है पर बिलकुल सत्य घटना पर आधारित है। उत्तर प्रदेश में एक शहर है कानपुर देहात। अब आप कहेंगे कि कानपुर देहात भला शहर कैसे हो सकता है? जहाँ तक मुझे मालुम है सरकार ने प्रशासनिक कारणों से जो कि आमतौर पर जनता जनार्दन की समझ से परे पर जनता के भले के लिए होते हैं, कानपुर का कानपुर शहर और कानपुर देहात नाम के दो शहरों में १९७७ में विभाजन किया था। फिर १९७९ में वापस मिला दिया शायद जनता की भलाई की मलाई खट्टी हो गई होगी और फिर १९८१ में अलग कर दिया। पर जनाब यह लेख इस विभाजन की पोस्टमार्टम रिपोर्ट नही है। यह तो आपको बस एक छोटा सा बैकग्राऊँड बता रहा था बिलकुल वैसे ही जैसे कल हो न हो के ओपेनिंग सीन में प्रीति जिंटा ब्रुकलिन से मैनहैटन तक (बाप रे! शायद तभी वह इतनी स्लिम ट्रिम है) मार्निंग वाक के दौरान न्यूयार्क की देशी लाईफ के बारे में बताती हैं। तो साहब कानपुर देहात में एक कस्बा है झींझक। अब यह मत कहिएगा कि यह किसी जगह का नाम कैसे हो सकता है? अरे जब पथनमथिट्टा हो सकता है , झझ्झर हो सकता है तो झींझक क्यो नही हो सकता। फिर भी आपको कोई कष्ट है तो शहरों, कस्बो और मुहल्लो के नामों के विशेषज्ञ से पूछिए वे आपकी जिज्ञासा शांत कर देंगे ऐसा मुझे विश्वास है| पर भाई मुझे आप लोग विषय से बार बार सवालो की टँगड़ी मार के भटका क्यो देते हो यार? पूरा मूड खराब हो गया। अभी आगे का वृतांत अगले भाग में। तब तक के लिए लेते हैं एक छोटा सा नान-कामर्शियल ब्रे..........क|

2 comments:

अनूप शुक्ला said...

तो ये है शेखचिल्ली टाईप आईडिया !पर कहां फूट लिये?वैसे मुझे जो लगता है वह इन विकल्पों में है नहीं.मुझे तो यह लगता है किसी ने पता नहीं किन मजबूरियों के तहत तुम्हारी अकल की तारीफ की होगी जिसे तुम भैंस से बड़ा साबित करना चाहते हो.इस लिये तुम्हें तलाश है एक अदद भैंस की.खैर हम सच जानने के लिये ब्रेक के ब्रेक.

होने के इंतजार के अलाव कर भी क्या सकते हैं?

Pratik said...

अनूप जी, कानपुर देहात की बात कर मेरे बचपन के दिन याद दिला दिऐ। कानपुर देहात को साइबर स्‍पेस पर पाना बहुत ही अच्‍छा लगा। अपने जीवन के 19 बरस औरैया में निकाले। बहुत सारे कानपुर देहाती मेरे साथ के पढे हुए हैं। चुन्‍नी गंज में मेरा वैसे बहुत आना जाना था :-)