08 July 2005

क्योंकि भैंस को दर्द नही होता! [भाग ४]

इस बार छोटा सा नान-कामर्शियल ब्रेक थोड़ा सा लंबा हो गया। इस विलंब की वजह मैं नही बल्कि हिंदी ब्लाग जगत के महान स्तंभ श्री फुरसतिया जी महाराज हैं। मेरी कथा के प्रमुख पात्र नारद जी को ही अगवा कर लिया और उन्हें विष्णु जी को हिंदी ब्लाग लिखना सिखाने में लगा दिया। बेचारे नारद जी लाख मनुहार करते रहे कि सारा लेखन पाठन का काम देवी सरस्वती का है पर विष्णु जी तो सिर्फ फुरसतिया जी की ही बात मानते हैं। आप लोग यह मत समझ लीजिएगा कि मुझे रामानँद सागर से किसी सीरियल लेखन का काँट्रेक्ट वगैरह मिला है जो मेरे इस लेख में पहले शँकर जी और अब नारद जी आने वाले हैं। नारद जी इस कथा के मुख्य पात्र हैं और भैंस भी। पर अभी आप को बताना कहानी की भ्रूणहत्या होगा। इसलिए जैसे आप अस्सी के दशक वाले दूरदर्शन के "रूकावट के लिए खेद है" को बर्दाश्त करते रहे हैं वैसे ही इसे भी करिए। वैसे आपकी याददाश्त ताजा करने के लिए इस वृताँत का एकताकपूरकरण करना यानि कि पिछले अँको की छोटी सी झलक देना मेरे और आपके ब्लागज्ञान की तौहीन होगी अतः लेख के अँत में दी कड़ियों का उपयोग करिए।

तो हम लोग चलते है झींझक जिले के गाँव सिठमरा स्थित उसी मँदिर में जहाँ अमला,कमला और विमला और शिवलिंग के मध्य वाकयुद्ध की दुदुंभी बज चुकी है। चूँकि यह गर्मी की उमस भरी दुपहर है अतः गाँव के कोने पर स्थित इस मँदिर के आस पास कोई परिंदा तक नही दिख रहा। वह तो विश्वकर्मा जी के डिपार्टमेंट मे किसी ने तकनीकि गड़बड़ी कर दी और शँकर जी की प्रार्थना सुनने वाली हाटलाईन इस सिठमरा गाँव के शिवलिंग से जुड़ गयी वरना अबतक तीनो सखियाँ शिवपूजा करके अपने घर जाकर "क्योंकि सास भी .. " देख रही होती और शिवशँकर जी हमेशा कि तरह राष्ट्रीय और अँतराष्ट्रीय स्तर के मुद्दे सुलझा रहे होते। हाल फिलहाल तो वे मजबूर हैं जब तक यह तीनो सहेलियाँ उनसे सँतुष्ट न हो जायें , आखिर भक्ति की मर्यादा का सवाल है। अमला और कमला जिनकी राजनैतिक महत्वाकाँक्षाए नही थी उन्हें विमला का शँकर जी से दनादन सवाल करना नागवार गुजरने लगा। बात सीधी सी थी, शँकर जी से साक्षात रूबरू होने का मौका तो करोड़ो में किसी किसी को ही मिलता है अतः उनसे केबीसी के पहले इनाम जैसा वरदान झटक लेने की जगह गाँव समाज की समस्याओं पर झक करना अमला और कमला को अखर रहा था। अरे जब बड़े बड़े नेता देश और समाज की चिंता नही करते तो इस विमला को महत्वपूर्ण अवसर को यूँ ही जाया कर देने की क्या पड़ी है? आखिर कमला से रहा न गया और उसने विमला को धीरे से कोंचा "अरी सुन तो जरा!"
विमला के भृकुटी तानने पर कमला ने कहा "अरी तेरी समझदानी मे छेद हो गवा है का? भगवान शँकर विराजै है हमरे मँदिर मा, तो कुछ आशीष वरदान ही माँग लेव, काहे को झक लड़ावत है, कहीं शाप दै दिया तो का होगा?"
विमला "अरे जब ई शँकर जी खुदै अन्याय करत है तो हमका शाप कैसे दे सकत हैं? जब गरीबो और अमीरो की भक्ति में फर्क नही तो उनकी प्रार्थनाओ को सुनने की व्यवस्था मे भगवान क्यो फर्क करते हैं?"
शिवलिंग से फिर गर्जना हुई " क्योंकि प्रार्थनाए सुनने वाला मेंटिनेंस डिपार्टमेंट विष्णु जी का है। मेरा तो डिस्ट्रक्शन डिपार्टमेंट है। मैं अपना काम ठीक से करता हूँ चाहे अफगानिस्तान हो या इराक, अमेरिकियो के बम मेरा काम आसान कर देते हैं। वह तो ब्रह्मा जी के कांसट्रक्शन डिपार्टमेंट की गुजारिश थी कि ज्यादा काम न बढाया जाये वरना कारगिल में मेरा तीसरा नेत्र परमाणु बम कम से कम दो बार जरूर खुलता।"
विमला: शिव शिव! प्रभू आप का नेत्र खुलता तो अनर्थ हो जाता।
शिवलिंग: विनाश के बाद सृष्टि प्रकृति का नियम है। वैसे भी तुम लोग हमारे प्रसाद का लेबल लगालगा कर आबादी बढाते रहोगे तो धरती का बोझ बढने से रोकने के लिए हमे कुछ तो करना पड़ेगा।
विमला तो क्या हरेक को मालुम है कि ब्रह्मा सृष्टि करते हैं, विष्णु जी पालन करते हैं और शिव जी संहार करते हैं। विमला को जिज्ञासा यह हो गयी थी कि प्रार्थनाए सुनने वाले मेंटिनेंस डिपार्टमेंट जो विष्णु जी का है उसमें शँकर जी क्या कर रहे हैं? शायद यह अफरा तफरी इसी वजह से तो नही मची है? विमला ने अब चतुर राजनीतिज्ञ की तरह भोले शँकर को वाकजाल में फाँसने का निश्चय कर लिया। उसके दिमाग में एक मास्टर प्लान आ गया था। उसने इशारे से कमाल और अमला को चुप रहने को कहा और खुद बोलती रही।
विमला: प्रभू, आप तो बड़े भोले हैं, सबकी सुनते हैं। तो फिर क्या राजा और रँक में भेद करने की नीति कही विष्णु जी की है?
शिवलिंग: नहीं तो और क्या? जैसा आपरेशनल मैनुएल मे लिखा है, वैसा ही करना पड़ता है।
विमला: प्रभु तो विष्णु जी आप को अपने डिपार्टमेंट का काम थमाकर खुद कहाँ चले गये हैं? क्या उन्होने धरती पर अपराध बढ जाने पर अवतार ले लिया है?
यह प्रश्न सुनकर जहाँ अमला और कमला के चेहरे खिल गये वही शँकर जी का जवाब सुनकर उतर भी गये।
शिवलिंग: अवतार कैसा, वह तो आजकल हिंदी में ब्लाग लिखने की सोच रहे हैं। उनका मानना है कि जब अमरसिंह ब्लाग लिख सकते हैं तो वे खुद क्यो नही लिख सकते? इसिलिए मुजे अपना डिपार्टमेंट आउटसोर्स कर दिया है।

यह जवाब सुनकर विमला चकरा गयी। मेरे बाकी दोस्तो की तरह उसे इँटरनेट किस चिड़िया का नाम है यह तो पता था पर ब्लाग क्या है यह उस गरीब को नहीं पता था। शँकर जी को उन तीनो को ब्लागमहिमा समझाने में समय लगेगा तब तक के लिए लेते हैं एक छोटा सा नान-कामर्शियल ब्रे..........क|

भाग १|भाग २|भाग ३

1 comment:

अनूप शुक्ला said...

भइये मातृश्री सुना,सहाराश्री सुना,भारतश्री सुना ।अब ये स्तम्भश्री भी पढ़ लिया। स्तम्भश्री बोले तो खम्भा महाराज। नारदजी का इंतजार है। वैसे ये सब लोग हर एक के पास मुफ्त सेवा के लिये हाजिर पाये जाते हैं। बस जरूरत है जोर से हल्ला मचाने की।