22 August 2005

हद हो गई!

हद हो गई। सुबह आँख खुली तो कोई कानों में चिल्ला रहा था। आस पास देखा। श्रीमती जी सपनों में खोई थीं। बच्चे भी अभी नही जगे थे। कोई पड़ोसी भी नही था । शनिवार को सभी आलस्य का विश्व रिकार्ड तोड़ने की फिराक में रहते हैं। कहीं टेलीफोन की आंसरिग मशीन तो नही, शायद सवेरे सवेरे कोई मार्केंटिंग की काल हो। पर वह भी नही थी। नीचे गया तो कंप्यूटर खुला था और स्क्रीन पर रोजनामचा का मुख्यपृष्ठ दिख और बज रहा था। हैरानगी एक साथ तीन बातों पर थी।


  • मैंनें रात में कंप्यूटर खुला तो नही छोड़ा था।


  • ब्लागनाद का शट फिलहाल अगली सूचना तक बँद हैं।


  • मैनें आज तक फकत एक ही लेख को बोलने की इजाजत दी है।


हद हो गई, अब यह दिन भी देखना बदा था जब अपना ही चिठ्ठा हमें खुद उलाहना दे रहा था। आप भी सुनिए कि हमने क्या क्या सुना ?

मालिक तुम तो यही भूल गये कि तो यही भूल गये कि तुमने रोजनामचा कब शुरू किया था। हमारा जन्मदिन तो पिछली २४ अप्रैल को ही निकल गया और तुम फिलडेल्फिया की गुनगुनी गर्मी के गुलछर्रे उड़ाते रहे। मैं (रोजनामचा) बेचारा चीखता रहा कि अरे मेरे रचयिता मेरे जन्मदिवस पर कम से कम एक लेख तो रच दो। शायद दोचार टिप्पणियाँ खाने को मिल जायें। नही तो कम से कम नया टेंपमलेट ही चढा दो। कम से कम पंकज बाबू से सीखो, कुछ लिखे चाहे न लिखे हाँ भाई को नये कपड़े पहनाने में कँजूसी नही करते। कभी मिर्च के रंग दिखते हैं तो कभी मँगल गृह के। अब बेतरतीब यादें देख-देख कर हमें अपने अस्तित्व और तुम्हारी अलाली पर रंज हो रहा है। अरे यार और कुछ नही तो मेरा पन्ना के रचयिता से ही सीख लो। देखो कैसे अपनी गैर हाजिरी में भी गजल की मशीन फिट करके गये थे मेरा पन्ना पर। जब शटर बँद होने की नौबत आ गयी तो उन्होने अपनी गजल की मशीन कूड़े में फेंक कर पुरानी कलम रूपी तलवार पर सान चढा ली है। फिर पुरानी धार लौट आयी है। देखो, नये नये जबरदस्त चिठ्ठाकार आ गये हैं मैदान में। इसलिए हे मेरे रचयिता चाहे भैंसकथा पर लिखो चाहे साँडकथापर, पर लिखो जरूर वरना तुम्हारे साईट काऊँटर की विकास दर को हिंदू विकास दर का दर्जा दे दिया जायेगा और तुम्हे ठलुहा और अनकही के साथ क्लास से बाहर कान पकड़ के एक टाँग पर खड़ा कर दिया जायेगा।


तो फुरसतिया जी की वजह से हमारे चिठ्ठे की आदत बिगड़ गयी है। जन्मदिन की लालीपॉप का हिसाब माँग रहा है। खैर फुरसतिया जी को जन्मदिवस पर हार्दिक शुभकामनाऐं। हमें हाल आफ फेम टिप्णियों और लेखों पर उनके लेख का बेकरारी से इँतजार रहेगा।

2 comments:

Jitendra Chaudhary said...

अतुल भाई,
आपके ब्लाग के एक वर्ष पूरा होने पर बहुत बहुत बधाई, लगातार लिखते रहो....कुछ भी करों...लेकिन ब्लाग जरूर लिखो...जितना ज्यादा कन्टेन्ट उतने ज्यादा अच्छा...अब तो ब्लागर भाई भी बढ रहे है, आपके लिखने से उनको प्रोत्साहन मिलेगा.

अब लगे हाथों एक काम भी कर डालो,बगल मे एक मिनीब्लाग बना दो...जिसमे पिछले वर्ष इसी दिन या इसी हफ्ते लिखे ब्लाग के बारे मे कुछ शब्द हो और उसका लिंक भी हो....शीर्षक दे सकते है "पिछले वर्ष इसी
रोजनामचे पर"

अनूप शुक्ला said...

वो कहा गया है कि जब जागो तब सबेरा। सो चौथे महीने में पड़ने वाला जन्मदिन चार महीने बाद भी मनाया जा सकता है। २४ अप्रैल की शुभकामनायें २४ अगस्त तक बटोरी जा सकती हैं। सो भकामनायें
रोजनामचा के जन्मदिन के लिये। बाकी जहां तक 'बूमरैंग' वाली बात है तो बच्चे हमें बताया मतलब लौट जाने वाला खिलौना( ये फायदा होता है कान्वेंट एजुकेशन का) । सो सच है। खिलौना
लौट आया सही-सलामत शुक्र मनाओ। ये ठेलुहे जो हैं वो नुक्ताचीनी की तरह परफेक्शनिस्ट खेमा ज्वाइन कर लिये हैं। यह भ्रम पाल लिये हैं कि ठोक बजा के लिखेगें तो बढ़िया लिख लेंगे। कौन समझाये कि ऐसा नहीं न होता है।बकिया लिखा जायेगा समय झटक के। थोड़ा कहा बहुत समझना।लिखो चाहे जितना ,चहकते रहना।