26 August 2005

इट हैप्पनस ओनली इन ईंडिया!

अखबारो से चुनी तीन विलक्षण तस्वीरें, भारत के तेजी से बदलते चेहरे की आदर्श नुमाईंदगी करती हैं।


नई तकनीक की सुविधा
पुराने स्वाद की चुस्कियों के साथ।
बरिस्ता के काउँटर चाँदनी चौक में देखकर भारत की तरक्की का अनुमान नही लग सकता। पर चाय के कुल्हड़ वाले स्टाल पर मोबाईल की मौजूदगी से इस तकनीक के हर वर्ग तक की पहुँच का सही पैमाना है।




अगर मोबाइल द्वापर में मौजूद होता तो?
मोबाइल गले की अनचाही घँटी बन चुकी है। क्या सुदामा अपनी पत्नी से पूछ रहें हैं कि कान्हा से क्या क्या माँगू?




आगाज ऐसा तो अँजाम खुदा जाने!
३३% आरक्षण की माँग करने में ही अगर पुलिस पिट रही है तो आरक्षण मिल जाने के बाद कौन कौन पिटेगा? यकीन मानिए, इस तस्वीर को देख कर पिहास या व्यंग्य नही कर रहा। सिर्फ यह सोच रहा हुँ कि अधिवेशन दर अधिवेशन महिंलाओं का अधिकार उन्हें आरक्षण बिल में नयी नयी पेचिदगियाँ निकाल कर वंचित कर दिया जाता है। अगर उनका गुस्सा इस तरह से नही फूटेगा तो शायद शासन सुनेगा भी नही।

5 comments:

अनूप शुक्ला said...

यही तस्वीरें बताती हैं कि विकास का कोई तय रास्ता नहीं होता.जिस पर बढ़ लो कौनौ मंजिल तो मिलबै करी.

Ankur Gupta said...

India is way ahead in communication than even the western worls,,with our very low call rates.

I wish these angrez cud taste the fresh curd in the mud cups rather than the yogurt in plastic cups.

it happens only in india coz india does not joins any line...

Like the famous line,,,,,hum jahan pe khade hot hain,,line wahan se shuru hoti hai:-)

Sunil Deepak said...

वाह अतुल जी, फोटो तो सुंदर हैं ही, उन को इस तरह जोड़ कर उनको जोड़ने वाले तार को देख पाना और भी सुंदर है. सुनील

masijeevi said...

इस छविक्रम ने आपकी इन तस्‍वीरों को एक छवि निबन्‍ध बना दिया है। बधाई

इंद्र अवस्थी said...

Bole to ekdum solid!
majaa aa gya photo aur comments mein.

Where do you get these?