16 September 2005

शादी के बाद क्या!

बाखुदा इसे आप रेल पटरी के किनारे की दीवारो पर लिखा वैद्य चीवान चँद का मर्दानगी दुरुस्त करने का इश्तहार न समझ लीजिएगा । यहाँ मुद्दा कुछ दूसरा है। बात शुरू करूँ तो याद आती है कुछ दसेक साल पहले दूरदर्शन पर दीप्ती नवल अभीनीत एक सीरियल की। एक दृश्य में दीप्ति और उनके पति और उनके एक दोस्त शाम को चाय की चुस्कियों के बीच बीते दिन याद कर रहे हैं। दोस्त दीप्ति के पति से उनकी युवाववस्था के पेंटिग के शौक के बारे में दरयाफ्त करता है। दीप्ति के पति कहते हैं "हाँ यार पहले तो कुछ प्रदर्शनी वगैरह में भी शिरकत की, फिर शादी के बाद सब खत्म हो गया।" दीप्ति इस जवाब से भड़क जाती है और मामूली तकरार महायुद्ध में तब्दील हो जाती है। दीप्ति की आपत्ति थी कि शादी के बाद पति अपनी धनलिप्सा और व्यवसायिक व्यस्तता के हाथो हुए रचनाधर्मिता के खून को अपने ऊपर लेने के बजाए शादी नामक संस्था को कसूरवार क्यों ठहरा रहे थे। बात बिलकुल जायज लगती है। शादी के बाद और खासतौर से बच्चों के आगमन के बाद गिटार,पेंटब्रश ,कैमरे इत्यादि को टीवी,म्यूजिक सिस्टम आदि के लिए जगह बनाने की खातिर कबाड़खाने का रूख ही करना पड़ता है। जरा याद कीजिए घर के उस कोने में जब आप अपने शौक या हुनर को पहली बार रखते है तो इसी ख्याल के साथ कि कभी वक्त मिलने पर देखेंगे, फिलहाल तो ....। पर वक्त कब मिलता है? उस गिटार पर उस पेंटिग के कैनवास पर अगले साल पुरानी रजाई का गठ्ठर रख दिया जाता है, फिर अगले साल बच्चों के टूटी साइकिलें और आपका शौक कबाड़ के नीचे दबता जाता है। आपको फुर्सत ही नही मिलती। बच्चे जब तक छोटे होते हैं तो जिंदगी की जद्दोजहद से छुटकारा नही मिलता। अनिवासियों में एक समय-खाऊ शगल और मौजूद है "समोसा सम्मलेन"। नोस्टालजिया और एकरसता से बचने को हम नोस्टालजिया के मारे किसी और परिवार या परिवारों को ढूढ लेते हैं और फिर वही शुरू हो जाता है जिसे हम भारत में किटी पार्टी या दारू पार्टी या चाय पार्टी के नाम से जानते हैं। इनमे बुराई कुछ नही पर अच्छाई भी मोती चुनने के समान होती है। तिस पर कुछेक परनिंदाप्रिय जीव मिल गये तो हो गई कमी पूरी। खैर इन समोसा सम्मलेन पर विस्तार से फिर कभी, अभी मूल मुद्दे पर आते हैं। जब आपके बच्चे स्कूल जाने लायक होते हैं तब आपकी रचनाधर्मिता की शहादत आपके सिर पर चढ के बोलती है। इसमें दो-दो खून शामिल हैं। आपके शौक और अंतर्यामिणी के शौक दोनों के। याद कीजिए शादी के पहले आपको उसके आयल पेंटिग उसका सितार वादन वगैरह जितना सुहाता था आपके चिरंजीव के आगमन के बाद वह रसोई की बलि चढ गया। अब बच्चें जब बड़े हो गये और सारा दिन काऊच पोटेटो बने रहकर बॉब द बिल्डर या एमटीवी पर आँखे गड़ाये रहते हैं तो आपका खून उछाले मारता हैं। शुरू हो जाते हैं आपके लेक्चर "हम जब तुम्हारी उम्र के थे तो ये खेलते थे, वो सीखते थे, ये जानते थे वगैरह वगैरह।" ध्यान दीजीए अपने ही लफ्जों पर, बार बार आखिर में क्या सुनायी दे रहा है "थे .. थे !"। बच्चों का क्या कसूर है , वे भी तो आपको सबेरे से शाम मुद्रार्जन और शाम ढलते ही टीवी के समाने मूँग की दाल चाय के साथ टूँगते देखते हैं। माँ को टीवी के सामने लौकी काटते देखते हैं। उन्हें आप बार बार अपने अतीत का सुनहरा बाईस्कोप दिखाना चाहते हैं। जब्कि वे देखते हैं आपमें उनका सलोना टीवी टाईम हड़पने को तैयार मिस्टर मोगेंबो।
ठीक यहीं मुझे दिखता है शशि का खिताब।


बहुत खूब शशि!
निचली पंक्ति में बायें से पहले खिलाड़ी
शशि , मेरा एचबीटीआई का सहपाठी, दो प्यारे बच्चों का पिता और मेरी ही तरह कंप्यूटर के क्षेत्र में कार्यरत। शशि ने अभी टेनिस में कैलिफोर्निया में क्षेत्रीय स्तर की प्रतियोगिता जीती है। इस उम्र में जब कंप्यूटर पर आठ आठ घँटे बैठने से अकड़ी कमर के मालिक बीस किलो का बोझा उठाने से दहशत खाने लगते हैं, शशि ने फिर से टेनिस का रैकेट थामा और अपने स्थानीय कोर्ट से शहर और फिर राज्य स्तर का सफर तय कर डाला। शशि ने आपसी बातचीत में स्वीकार किया कि भले ही अभी आद्रेंय आगासी से पंजा लड़ाना दूर की कौड़ी हो पर अब की उपलब्धि भी कुछ कम नही। फायदों में बच्चो के "हम करते थे" की जगह करते हैं कहने की आजादी, उनके समक्ष खुद आदर्श बनने का अवसर, बेहतर स्वास्थय, सहकर्मियों में प्रतिष्ठा शामिल है। इसके लिए शशि को वीकेंड पर होने वाले समोसा सम्मेलनों को त्यागना पड़ा। शुरू में कुछेक उलाहने झेलने के बाद अब उसे अपने दोस्तों से भी शाबाशियाँ मिलती हैं, और उन महानआत्माओं से भी जो हर वीकेंड पर बच्चों के साथ टीवी के सामने या बीबी के साथ शापिंग माल में क्वालिटी टाईम बिताते हैं। मुझे शशि से "Walk the talk" की सीख जरूर मिल गयी। मुझे लगता है यह जरूरी नही की रोजाना के जरूरी काम छोड़ के फिर से तानपुरे पर राग भैरवी का आलाप शुरू कर दिया जाये। पर अगर समय से समय चुराना आ जाये तो हम अपने भीतर खो गये कलाकार को फिर से जिला तो सकते हैं। बच्चों के साथ फुटबाल खेलने, उन्हें नये हुनर सिखाने या उनके साथ प्रकृति की गोद में खोजी समय बिताने से अच्छा क्वालिटी टाईम भला और क्या होगा?

5 comments:

Raman Kaul said...

अतुल, आप ने बहुत ही ज़रूरी मुद्दे पर उंगली रखी है। सब के साथ यही होता है, जब कि यह भी संभव बनाया जा सकता है कि जो पहले न कर पाए वह अब करें। बस अपने समय को सही प्रयोग करने की ज़रूरत है, जो हम नहीं कर पाते हैं -- टीवी और इंटरनेट समय के बहुत बड़े दुश्मनों में से है। तो फिर कब उठा रहे हैं टेनिस का रैकेट, या फिर गिटार, या पेंटब्रश? शशि को हमारी ओर से भी मुबारकबाद दें।

अनूप शुक्ला said...

'गजनट'लेख लिखा हॆ.शुरु कर दो समय से समय
चुराना.शशि को मुबारक बाद.रमण की बात पर अमल किया जाये.

Jitendra Chaudhary said...

बहुत सही, काफ़ी दिन बाद आये हो, लगातार लिखते रहो, तभी मजा आता है.एक और बात, जब भी "लाइफ़ इन.." पर पन्न जोड़ो, रोजनामचा मे इन्फ़ार्म जरूर करो.

आलोक said...

इस प्रेरक लेख के लिए धन्यवाद।

Kalicharan said...

samay se samay churana. Bahut khub. Bhai humari samasya dusri rahi, yahan tennis, cricket, biking, studying ke maare samay nahi hai. Internet to office ke bahane ho jaata hai, tv 1 mahine se on nahi kiya hai.