27 September 2005

क्या आप भी कान के कीड़े से परेशान हैं?


रोऊँ या हँसू

करूँ मैं क्या करुँ?
आप हैरान हों रहे होंगे कि यह किस कीड़े के बारे में बात हो रही है। हो सकता है आपको अब तक कई दिन से हो रही कान में हो रही खुजली के बारे में कौतूहुल हो गया हों। यह लेख किसी अतिसूक्ष्म बैक्टीरिया के बारे मे नही है न ही सद्दाम की लैब में बने उस कीड़े के बारे में जो उसके अमेरिकी सैनिको के कान में घुस कर बुश अँकल हाय हाय , चेनी गँजा हाय हाय के नारे लगाता। यह जिक्र है उस कीड़े के बारे में जो हमारे आपके कान में अक्सर घुसता है और कई-कई दिन तक नही निकलता। अरे आप कान में डालने के लिए कड़वा तेल की शीशी खोजने तो नही निकल पड़े। जनाब यह अदृश्य कीड़ा किसी तेल किसी दवाई से नही निकलता। याद कीजिए "हम" में अमिताभ बच्चन का डायलागः
"नाली की गँदगी के कीड़े को मारने के लिए बाजार में फिनिट मिलता है पर समाज की गँदगी के कीड़े को मारने के लिए फिनिट अब तक बना ही नही!"
यह कान का कीड़ा वास्तव में किसी फिल्मी या नान फिल्मी गाने की एक या दो लाईन होंती है जो बारंबार हमारे दिमाग में गूँजती रहती है। यह समस्या फिल्म प्रेमियों के साथ भी होती है और उनके साथ भी जो बाथरूम की सिटकनी ढीली होने के कारण उसमें गाते-गाते नहाने पर मजबूर होंते हैं। ऐसी जीवात्मा सबेरे उठते ही बेखुदी में जो भी गीत गुनगुनाती है उसकी एक दो लाइने अटक जाती है दिमाग में। फिर बार बार वैसे ही बजती रहती हैं दिमाग में जैसे पुराने जमाने में एचएमवी के ग्रामोफोन की सुई अटक जाती थी और आजकल आडवाणी जी की सुई जिन्ना के रिकार्ड पर अटक गई है। शुरू में तो अहसास नही होता पर धीरे-धीरे चिढ सी होने लगती है। यह एक प्रकार की दिमागी खुजली है जो दिमाग जितना खुजाता है उतनी ही बढती जाती है।
इस बारे में सिनसिनाटी विश्वविद्यालय के प्रोफेसर जेम्स केलारिस ने

जेम्स केलारिस
बकायदा शोध भी कर रखा है। उनके अनुसार किसी भी समय , किसी भी स्थान पर सुना गया कोई भी गाना कान का कीड़ा बन सकता है। विदेशों मे यह सिर्फ बाजार या भीड़भाड़ वाली जगह हो सकता है, वही भारत में जगह जगह शादी बारात या देवी के जगराते में बजने वाले भोंपू इसमें सहायक होते हैं।
अमूमन इस तरह के गानों मे कुछ खासियत होती हैं जैसे कि:

  • यह आसान होते हैं जैसे कि कुचि कुचि रूकम्मा या जुम्मा चुम्मा आसानी से चिपकेगा बजाये रक्त से भरा गुब्बारा के।
  • इनमें दोहराये जाने वाले शब्द होते हैं जैसे कि चल छैयां छैयां में हैं जब्कि मेरा सामान लौटा दो कोशिश करके भी नहीं चढता जबान पर।
  • इनमें सुनने वाले को स्तंभित करने वाले तत्व जैसे कि एक निश्चित आवृति होती है उदाहरण के लिए Who Let the Dogs Out?
  • इस तरह के गाने आमतौर पर दिमाग में घँटो बने रहते हैं।

आमतौर पर इस कान के कीड़े का कोई ईलाज नही है पर कुछ आजमाऐ हुऐ नुस्खे हैं जिनसे आप अपने दिमाग को इस अनचाहे कीड़े से छुटकारा दिला सकते हैं।

  • ज्यादा चिंता न कीजिए वरना हो सकता है कि एक कीड़ा छूटे तो दूसरा कान के रास्ते दिमाग में घुस जाये।
  • किसी दूसरे तरह का सँगीत सुनिए जैसे कि शास्त्रीय सँगीत।
  • अपने आपको किसी काम में उलझाईयें, कुछ करने को न मिले तो हिंदी ब्लाग पड़िये और तब भी काम न बने तो उन पर टिप्पणियाँ करना शुरू कर दीजिए।
  • पूरा गाना गाने की कोशिश करिये, सिर्फ वह हिस्सा नही जो आपके दिमाग में अटका है।
  • अगर गाना न याद आये तो पूरा गाना तलाशिये। प्रोफेसर जेम्स केलारिस के अनुसार यह कान में जोंक की तरह गाने का चिपकना वास्तव में दिमाग का अधूरी जानकारी को ढूढनें का प्रयत्न है। जैसे ही आपको पूरा गीत मिलेगा, आपको कान के कीड़े से तात्कालिक मुक्ति मिल जायेगी।
  • कुछ लोगो को बबलगम चूसने से भी फायदा होता है।

अब कुछ मजेदार तथ्य कान के कीड़े के बारे में:

  • महिलाओं को पुरूषों की अपेक्षा कान के कीड़े से अधिक चिढ होती है।
  • अधिक संगीत सुनने वाले खासतौर पर वाकमैन या आईपॉड के प्रेमियों को यह समस्या अधिक होती है।
  • कान के कीड़े और दिमागी तनाव में सीधा सँबध है।

अब एक मजेदार व्यक्तिगत अनुभव, मैनें गानो के अलावा ब्लागउक्तियों को भी कान का कीड़ा बनते देखा है। उदाहरण भी दे देता हूँ:

  • सबरे साधू लगे हैं राममँदिर के निर्माण में
  • महारथियों सँभावनाऐ हैं
  • माले मुफ्त दिले बेरहम
  • बगल में बम, हाथ में बल्ला
आखिर में इस सतरँगिए को कान का कीड़ा शब्द ईजाद करने का श्रेय भी लगे हाथ दे देता हूँ। जहाँ कान का कीड़ा शब्द इस सतरँगिए ने ईजाद किया है वहीं सतरँगिया शब्द मैने ईजाद किया है। यह सतरँगिया "दुपट्टा मेरा सतरँगिया" वाला सतरँगिया नही है। यह तो ब्रदरली लव वाला सतरँगिया है। अब भी नही समझे तो याद कीजीए "हे ऐ... काँता बेन"। अब भी नही समझे तो स्वामी जी से समझिए। उन्होंने शायद कुछ शोध किया हो इस अनूठे विषय पर।

4 comments:

अनूप शुक्ला said...

बिना किसी कीड़े के काटे लिख रहे हैं कि लेख मजेदार है।

ई-स्वामी said...

कान के कीडों से ज्यादा मै परेशान रहता हूं खोए हुए गानों के ना मिलने से.

नेपस्टर और आडियो गेलेक्सी के जमाने मे बहुत से ऐसे गाने हाथ लगे थे जो नायाब थे और अब वो खो गए हैं - हमारी एक हार्ड डिस्क क्या बैठी कुछ साल पहले, सब ले बैठी!

अब उनमे से कुछ याद आ जाते हैं सुनने का मन होता है पर गाना गायब है. कभी कभी गाने के बारे मे पता होता है - गायक का नाम या गीतकार का नाम या फ़िल्म/एल्बम का नाम, धुन याद आती है और गाने का संदर्भ पर पहली लाईन गायब है. बहुत खलता है.

बस ऐसे मे यही सोच कर खुद को समझा लेते हैं -

किस किस को याद, कीजिए किस किस को रोईये
आराम बडी चीज है, मूंह ढंक के सोईये!!

आशीष said...

मै तो कान के इस कीड़े से परेशान रहता हुं, सुबह सुबह एक बार कोई गाना सुन लिया पूरे दिन मुन्ह पर रहता है.
हद तो उस दिन हो गयी थी, जब देवांग पटेल को सुन लिया था, पूरा दिन
"पिछाडी पर कुत्ता काटा" चलता रहा. उस पर से तुर्रा ये मै बुरा नही गाता, बहुत ही बुरा गाता हुं

आशीष

Kalicharan said...

Now you didn't have to list all those "Kaan ka kida" songs in there, i got the song Jumma chumma going over and over and over again. Grrrrrrrrrrrrrrrrrrr.