11 October 2005

जब हम जवाँ होंगे! जाने कहाँ होंगे?


एक दिन कुछ पुरानी फोटो पलटते हुऐ अपने बचपन को फिर से देखा तो इस पुराने गाने के बोल याद आ गये। याद तो और भी बहुत कुछ आया पर एक बात जो ख्याल बन कर जहन से चिपक गयी कि कानपुर की उन गलियों में रँग बिरंगी पापिन्स की गोलियाँ चूसते, एगफा कैमरे से श्वेत श्याम तस्वीर बिरहाना रोड के स्टूडियो में खिंचवाते, रविवार की छुट्टी चिड़ियाघर में बिताते , पिताजी के लेम्ब्रेटा स्कूटर के हेंडिल पर आगे ठुड्डी टिका कर घूमते, बिरहाना रोड और माल रोड की चकाचौंध को देखते, प्लास्टिक की गेंद को प्लास्टिक के बल्ले से पीटते, चाचा चौधरी और साबू के कामिक्स पढते हुऐ हमने कभी नही सोचा था कि कभी अपने उम्र के टुकड़े को हम हजारों मील दूर बैठ कर अत्याधुनिक तकनीकि से विश्चजाल पर चस्पां करेंगे। हम यह भी सोच रहे कि अगर हम अपनी इस उम्र के टुकड़े को वापस पाकर जिस तरह नोस्टालजिक हुए, इस चित्र के बाकी दो नमूने अपनी उम्र में ऐसी ही परिस्थिति आने पर क्या करेंगे? पता नही आज से बीस बरस बाद वैश्वीकरण के दौर में नोस्टालजिया नाम की चीज का नामोनिशां भी बचेगा कि नही? तकनीक, किंग आफ प्रशिया और कानपुर के बीच की दूरियाँ पाट देगी, शायद आर्थिक अँतर भी मिट जायें और जब आज मुझे अस्सी नब्बे के दशक वाला कानपुर सिर्फ सपनों मे दिखता है तो शायद सामाजिक अँतर भी तब तक मिट ही जायेगा। उस उम्र में शायद सब कुछ हैलोवीन के पंपकिन सरीखा होगा , खोखला। आज एक औसत अमरीकी को पूछो तो शायद ही कोई बता सके कि क्यों वह घर के बाहर नेटिविटी वाले खिलौने सजाता है , क्यो नारंगी कद्दू को काटके उसमें रोशनियाँ लगाता है , क्यों क्रिसमस पर खुशियाँ मनाता है, शायद इसलिये कि वार्षिक छुट्टी होती है, वार्षिक सेल लगी होती बस ! इससे ज्यादा जानकरी ढूढो तो खोखला कद्दू। वही कुछ भारत में भी हो रहा है, सब कुछ पैकेज्ड। हो रहा है वही कुछ पर धीरे धीरे, हमें होली के रंग , दीवाली के पटाखे तो याद हैं पर अब नही दिखता तो होली में घरों मे बेसन के लड्डू का बनना , लोगो का टोली बनाकर घर घर जाना, होली पर हास्य कवि सम्मेलन का होना। सब कुछ अब रस्मी सा क्यों लगने लगा है। अब तो होली दिवाली के ऐनीमेटेड कार्ड ईमेल पर देखकर भी झुँझलाहट होने लगी है उन यंत्रमानवों पर जो बाकी पूरे साल की तरह इन दो महापर्वो पर भी दो घड़ी बात करने की फुरसत नही निकाल सकते।


हैलोवीन के कद्दू

इस मशहूर गजले को याद करते हुऐः
दौलत भी ले लो यह शोहरत भी ले लो
कोई लौटा दे मुझको वह बचपन का सावन,
वह कागज की किश्ती वह बारिश का पानी!


कुछ लाईनें आज के परिप्रेक्ष्य में सूझी हैं:
टीवी भी ले लो यह डीवीडी भी ले लो,
भले तोड़ डालो तुम इस कंप्यूटर का मानीटर
मगर लौटा दो मुझको मेरा स्कूल का बस्ता
वह पापिन्स की गोली, वह साबू की कहानी

3 comments:

अनूप शुक्ला said...

बचपन लौटाना तो मुश्किल है। बचपने से काम चलाओ। तुम इतना नास्टल्जिया रहे हो तो चलो मेला घुमा लाते हैं। रावण दिखा लाते हैं। बढ़िया लेख लिखने पर झूला झुला लाते हैं।

Jitendra Chaudhary said...

बहुत सुन्दर अतुल भाई,
सचमुच दिल की बात कही है। अब वो बात नही रही त्योहारों में, हिन्दुस्तान मे भी त्योहार जैसे मल्टीनेशनल क्म्पनियों की प्लान्ड मार्किटिंग की तरह लगता है। अब विदेश मे कहाँ वो होली और कहाँ द्शहरा दीवाली। यहाँ तो हर दिन एक सा होता है, बस वीकेन्ड होता है। जो शापिंग मे ही निकल जाता है। फ़िर भी मै समझता हूँ कि मै यूएस,कनाडा मे बसे भाइयों से बेहतर स्थिति मे हूँ, कम से कम जब दिल ज्यादा जोश मारे, उठाओ टीन टामड़ा और पहुँच जाओ इन्डिया चार घन्टे में।

रेलगाड़ी said...

चार साल पहले मैं भारत वापस गया था..बचपन का भारत ढूंढ़्ने...पर वहाँ तो सिर्फ इंडिया ही इंडिया दिखा..वापस आ गया इसीलिये...कोई लौटा दे मेरे..बीते हुए दिन..!