22 November 2005

कैसे जुड़े युवावर्ग प्रिंटमीडिया से?

प्रिंटमीडिया से पश्चिमी देशो में युवावर्ग का मोहभंग होता दिख रहा है। यहाँ किये गये शोध बताते है कि अधिकतर युवा समाचार या तो टीवी के माध्यम से सुनते है या फिर इंटरनेट के माध्यम से। वैसे इस विषय पर महाग्रंथ लिखे जा सकते हैं और लँबि लँबि बहसे आयोजित हो सकती है पर इस दिशा में एक आर्केडिया विश्वविद्यालय में एक अनूठा शोध किया गया। यहाँ यह पाया गया कि कई बड़े अखबारो जैसे न्यूयार्क टाईम्स या फिर बोस्टन ग्लोब जैसे अखबारो से युवा पाठक वर्ग के मोहभँग का कारण इन अखबारो द्वारा मुख्य वैचारिक स्तंभो में युवावर्ग की भागीदारिता की सरासर उपेक्षा है। ऐसा नही कि युवावर्ग को अखबारो में प्रतिनिधित्व नही मिलता। पर ज्यादातर खेल, मनोरंजन और शापिंग जैसे स्तंभ ही आरक्षित होते हैं युवावर्ग के प्रवेश के लिये। एक प्रयोग के तौर पर गँभीर राजनैतिक सामाजिक विषयों पर जब इस विश्वविद्यालय के छात्रों को लेख लिखने को दिये गये तो इन युवाओं की विचारों की पैठ और परिमार्जित भाषा ने समीक्षको को चकित कर दिया। अब फिलाडेल्फिया इंक्वायरर सरीखे अखबार अपने वैचारिक स्तंभो में बुजुर्ग लेखकों के साथ युवाओं को भी प्रमुखता से स्थान दे रहे हैं। इससे युवावर्ग का प्रिंटमीडिया जुड़ाव कुछ बढ़ा है। ब्लागमँडल ने भी एक समानाँतर मँच की व्यवस्था कर दी है। अब देखना है कि भारत जहाँ साठ बसँत देख चुके नेता भी युवा समझे जाते हैं वहाँ का मीडिया इस ब्लागमँडल की बढ़ती आँधी का किस तरह मुकाबला करता है?

साथ ही देखिये अखबारों से जुड़ी कुछ मजेदार तस्वीरें:












2 comments:

अनुनाद सिंह said...

यनी जब प्रिन्ट मेडिया युवा वर्ग से जुडेगा , तो युवावर्ग स्वत: प्रिन्ट मेडिया से जुड जायेगा |

Jitendra Chaudhary said...

मेरे विचार से युवावर्ग को प्रिन्ट मीडिया से मोहभंग का सबसे बड़ा कारण इन्टरनैट ही है, क्योंकि युवावर्ग को ब्लॉगिंग मे अपने लेखों पर त्वरित प्रतिक्रिया मिलती है जो प्रिन्ट मीडिया नही दे सकता। रही बात टीवी की तो वहाँ भी चैनलों की अन्धाधुन्ध बढती आबादी है,यानि डिमान्ड कम सप्लाई ज्यादा है। जिसमे सच्चाई कंही गुम सी हो जाती है।
लेख अच्छा लिखे हो, मेरी एक राय है, एक विचार श्रृंखला शुरु की जाय, भारत सम्बंधित विषयों पर, क्या विचार है?