14 December 2005

अनुगूँज १६: (अति)आदर्शवादी संस्कार सही या गलत?


साथी चिठ्ठाकारो के विचार जानने से कुछ ऐसा विचार उभरता दिख रहा है कि मानो हमें बचपन में राजा बेटा बनने की घुट्टी जबरन पिला दी गयी हो। हमें तो मुन्ना भाई बनना चाहिये था। मेरे ख्याल से कमी वहाँ शुरू होती है जहाँ हम गाँधीवाद का पालन करते करते भीरू बन जाते हैं। कुछ उदाहरण काफी हैं:


  • बचपन से सिखाया जाता है कि एक अच्छे नागरिक को पँक्तिबद्धता का पालन करना चाहिये। जब हम किसी मुन्ना भाई या रामखिलावन सरीखे किसी छुटभैये नेता को राशन या टिकट खिड़की की लाईन को अँगूठा दिखाते दिखते हैं तो कहाँ चला जाता है समाज का आदर्शवाद। क्यों दिखाते हैं हम अत्याचारी को अपना दूसरा गाल एक और चाँटा मारने के लिये। अमेरिकी वालमार्ट की तरह इन लोगो की सामाजिक धुलाई क्यो नही कर देते।
  • कालेज में एडमिशन के लिये घूस का रोना रो सकते हैं पर एक विरोध प्रदर्शन करने में नानी क्यों मरती है हमारी?
  • नेताओं के भ्रष्टाचार पर रोना मचाते है तो फिर क्यों वोट देते समय जाति देखते हैं, तब कहाँ चला जाता है हमारा आदर्शवाद।

कुल मिलाकर मुझे लगता है कि कमी आदर्शवाद के पालन में नही उसके अधूरे पालन में है। सिर्फ एकला चलो नीति से भला होने वाला नही हमारे समाज का। एक और बात जो मुझे अब तक याद है "कि जैसे जैसे समाज में बेईमानो की बढ़ोतरी होगी, ईमानदारों की कीमत बढ़ती जायेगी।"

2 comments:

Jitendra Chaudhary said...

अतुल भाई, आपने कम शब्दो मे सटीक, सही और सहज तरीके अपने विचार रखे। अच्छा लिखे हो, आजकल बहुत कम कर दिये हो लिखना, का बात है?

अनूप शुक्ला said...

जैसे जैसे समाज में बेईमानो की बढ़ोतरी होगी, ईमानदारों की कीमत बढ़ती जायेगी।बड़ी ऊंची बात कह दी।