30 March 2005

सिद्धार्थ

यह नाम है उस जीवट बालक का जो एकसाथ दो दो अपंगताओं से जूझा और उनसे विजय भी पाई| पहली तो उसकी खुद की शारीरिक विकलांगता जो मस्तिष्क एवं माँसपेशियों के मध्य रक्तप्रवाह में बाधा होने से पैदा होती है और दूसरी हमारे इक्कीसवीं सदी में अमेरिका और चीन की अर्थव्यवस्थाओं से टक्कर लेने की मंशा वाले रखने समाज की मानसिक अपंगता से, जो कि शारीरीक रूप से विकलांग व्यक्तियों से भेदभाव करते हैं| इनमे इनफोसिस और टीसीएस भी शामिल हैं, यह मेरा नहीं खुद सिद्धार्थ का भोगा हुआ यथार्थ है|
वैसे क्या हमारे सूचना क्रांति के पुरोधा क्या खुद मानसिक विकलांगता को प्रोत्साहन नही दे रहे| कम से कम इस बयान से तो यही जाहिर होता है|


'The whole process where people get an idea and put together a team, raise the capital, create a product and mainstream it -- that can only be done in the US. It can't be done sitting in India. The Indian part of the equation is to help these innovative US companies bring their products to the market quicker, cheaper and better, which increases the innovative cycle there. It is a complementarity we need to enhance.'

-- Nandan Nilekani, CEO, Infosys, quoted in The New York Times, March 7, 2004.

पूरी जानकारी के लिए यहाँ देखिए|

28 March 2005

ऊँची छलाँग,महाचीख और पागलपन














यह सारे नाम हैं लास वेगास में बने स्ट्रेटोस्फियर टावर में ९०० फुट की ऊँचाई पर खुली हवा में बने झूलों के जिन पर बैठते ही या तो आपको अपने पेट में तितलियाँ उड़ती महसूस होंगी या दिन में तारे दिखेंगे| मेरे जैसे रोमांच को दूर से देखने वाले जीवो के लिए महज ६ वर्ष पहले रोमांच की परिभाषा थी "ऊपर चलता रेल का पहिया , नीचे बहती गँगा मईया!" या फिर दशहरे के मेले में लगा सौ फुट की ऊँचाई वाला मँथर गति से चलता झूला| पर जब स्ट्रेटोस्फियर का नजारा देखा तो रोमांच की पिछली परिभाषाऐं छिन्न भिन्न हो गयीं| अब पेट में तितलियाँ उड़े या दुनिया घूमती नजर आये , इस तरह के ओखली में सिर देना ही पड़ता है क्योकिं मुझे अपने दिल से भारतीय और दिमाग से अमरीकी नन्हे शैतानों के सामने फजीहत नही करानी होती | दोनो भाई बहन इस तरह के रोमांचकारी पर सिर के बाल खड़े कर देने वाले झूले देखते ही चीखते हैं "Dad! thats amazing, lets roll on it!". मेरे जमाने में लोग यह देखते ही बच्चों को "उई बाबा!" करके दुबका लेते थे| अब बीसवीं शताब्दी में जन्मे पर ईक्कसवीं शताब्दी में बाप बने Dad की खैर नहीं | मैने तो सशरीर झेला है अब आप तस्वीरों के माध्यम से झेलिए|

इस फ्लैश में बने फोटो एलबम में आडियो कमेन्ट्री का भी प्रावधान है| Next बटन दबाकर आगे के चित्र देखिए और चित्रों का विवरण सुनते जाईये| अगर आपको भी यह एलबम अपने ब्लाग पर उपयोग करना हो,तो जल्द ही यह सर्वज्ञ पर उपलब्ध होगा|

16 March 2005

बिल्लू भईया की नसीहतें (हिंदुस्तानी अँदाज में)

बिल गेट्स ने ११ नियम संपादित किए है जो छात्र स्कूल कालेज में नहीं सीखते| उनका मानना है कि हमारी दिवास्वपनों में रहने की आदत और शिक्षा में राजनीतिक हस्तक्षेप ने ऐसे छात्रों की जमात तैयार कर दी है जिनका जिंदगी की वास्तविकताओं से दोचार न होने के कारण असफल होना अवश्यंभावी है|
१ जिंदगी रहमदिल नही हैं, इस हकीकत से रूबरू हो जाओ|
२. दुनिया तुम्हारे स्वाभिमान को भाव नही देती| दुनिया उम्मीद करती है कि तुम अपने मुँह मियाँ मिठ्ठू बनने से पहले कुछ करके दिखाओ|
३. तुम कालेज से निकलते ही डालर चित्त करना नही शुरू कर सकते| कान में सेलफोन लगाये , मर्सीडीज पर बैठे खुद को किसी कंपनी के वाईस प्रेसीडेंट की कुर्सी पर बैठे मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखना छोड़ो| पहले वाईस प्रेसीडेंट बनने की सोचो फिर सेलफोन और मर्सीडीज के ख्वाब देखना|



आप सुन रहें हैं?


४. अगर तुम सोचते हो कि तुम अपने अध्यापक से आजिज आ गये हो तो जरा ईंतजार करो किसी अधिकारी के अधीनस्थ काम करने का| तुम्हें हर साल नये अध्यापक की तरह हर साल भर बाद नया अधिकारी नही मिलने वाला |
५. परचून की दुकान में बिक्री करने से औकात नहीं घटती| आपके पिता इस काम को जीविका चलानें के नाम से जानते हैं और उन्होने इसे अपनी शान में गुस्ताथी कभी नहीं माना तो आप क्यों मानते है?
६. अगर आपने कोई भूल की है तो दोष अपने माता पिता पर क्यों लादते हो, इसलिए अपनी गलती पर स्यापा बंद करके उससे सीख लो|
७. आपके माता पिता आपके अवतार लेने से पहले ऐसे बोर किस्म के नही थे| आपके खर्चे उठाते-उठाते,आपके कपड़े धोते-धोते और यह सुन-सुन कर कि आप कितने कूल है, उनकी यह गति हुई है|
८. अभी आपके कालेज ने ही विजेताओं और पराजितो का फैसला सुनाया होगा, जिंदगी ने नही| कुछ स्कूलों ने फेल करने की प्रथा समाप्त कर तब तक प्रयत्न करने की व्यवस्था दी है जब तक सफलता न मिले| पर जिंदगी में ऐसी किसी भी व्यवस्था का नामोनिशान तक नही है|
९.जिंदगी , कालेज की तरह सत्रों में बंटी नही होती| इसलिए आपको जिंदगी में सत्रावकाश भी नही मिलता और बहुत कम नियोक्ता आपको यह सिखाने में रुचि रखते हैं| यह गुर तो आपको खुद सीखना पड़ता है|
१०. टीवी जिंदगी नही है| असल जिंदगी में लोगो को चाय की चुस्कियाँ छोड़ कर काम करना पड़ता है|
११. सनकियों के प्रति उदार रवैया अपनाना सीखो| तुम्हें किसी सनकी के अधीन ही काम करना पड़ सकता है|

10 March 2005

हर्शी, क्रिसमस और गोविंदाचार्य














हर्शी चाकलेट का नाम सुनते ही मुँह में पानी आ जाता है| पिछली क्रिसमस पर हर्शी चाकलेट फैक्टरी देखने का मौका मिला| चाकलेट फैक्ट्री में एक छोटा मोटा टूर है जिसमें आप स्वचलित ट्राली में बैठे बैठे चालकेट निर्मान प्रक्रिया से रूबरू होते हैं| साथ ही एक त्रिआयामी चलचित्र का भी प्रदर्शन है जो शुरू होता है चाकलेट के ईतिहास से पर बीच में कई कार्टून चरित्र आकर जबरदस्त धमाचौकड़ी मचाते हैं| वैसे पूरी फिल्म बच्चो के लिए थी पर एक दृश्य अमेरिकी व्यापारिकता के दर्शन का गूढ रहस्य समझाने के लिए पर्याप्त है| उस दृश्य में दिखाया गया है कि एक मेहनतकश इंसान चाकलेट एक ठेले पर आवाज लगा लगाकर चाकलेट बेचता है बिल्कुल पुरानी फिल्मो के बलराज साहनी कि तरह| पर उसे कुछ खास हासिल नहीं हिता तभी अगले दृश्य में एक सर्कस धमाकेदार तरीके से अवतरित होता है जहाँ हर तरह कि चाकलेट रंग बिंरगे आवरणों में सजी हैं और हर तरह के तमाशे के बीच खूब बिक्री हो रही है| संदेश स्पष्ट है गोविंदाचार्य जी कि वीरेंद्र सहवाग,मंदिरा बेदी और अमिताभ बच्चन के विज्ञापनों की सपनीली दुनियाँ में इस कदर मदहोश भारतीयों को आपकी स्वदेशी की आवाज नक्करखाने में तूती की भाँति नहीं सुनायी देगी | आखिर में एक पार्क में क्रिसमस के अवसर पर एक पार्क में आयोजित लाईट शो देखा| प्रवेश द्वार पर तैनात प्रहरी आपको बता देते हैं कि अपनी कार के अमुक रेडियो स्टेशन को आन करिए जो क्रिसमस के गाने प्रसारित कर रहा है| पूरे दो मील के दायरे में फैली यह प्रदर्शनी आप अपनी कार में मंथर गति से चलते हुए देखते हैं ताकि बाहर पड़ती कड़कड़ाती ठंड आपका मजा किरकिरा न कर सके| बेहरतरीन आईडिया है, पार्क में बड़े पैमाने पर साउँड सिस्टम लगाने का झंझट बच गया और दर्शको को भी पूरा आनँद मिलता है|

अनुगूँज 7 - मुन्ना कबाड़ी और पत्थर से टक्कर!

Akshargram Anugunj
मेरे उस दोस्त मुन्ना का असली नाम शायद ही किसी को मालुम हो| यहाँ तक कि घर के लोग भी उसका असली नाम भूल चुके थे| हाँ कबाड़ी उपनाम हम सबने सिर्फ स्नेहवश ही नहीं जोड़ा था| दरअसल मुन्ना कबाड़ी को स्कूली दिनों मे इलेक्ट्रानिक का शौक चर्राया था और वह अक्सर विद्युतचालित घंटियाँ, रिमोट और न जाने क्या क्या शगूफे ईजाद करने के फेर में कबाड़ से स्प्रिंग, लोहा ईत्यादि ढूड़ा करता था|



पत्थर से टक्कर!

हम सब गर्मी की छुट्टियों में फुटबाल खेलते थे| क्रिकेट के खेल में तो कभी कभी बड़े लोग भी घुसपैठ बना लेते थे| पर फुटबाल का खेल ज्यादा दमखम माँगता है, अतः कोई व्यस्क सींग कटाकर हम बछड़ो की टोली में शामिल नहीं होता था| कुछ दिन बाद न जाने कहाँ से एक हट्टा कट्टा युवक हम लोगो की फुटबाल टीम में खेलने आ गया| पता चला कि वह कोई फौजी था और छुट्टियों मे घर आया था| लड़को को फुटबाल खेलते देख वह भी शामिल हो गया| हम सब भी खुश कि कोई एक्सपर्ट मिल गया| लेकिन खुशी जल्द ही जलन में बदल गयी| फौजी भाई पेशेवर खिलाड़ी थे और उनके साथ फुटबाल खेलने में हमारे नाको चने चब जाते थे| विपक्षी टीम हमेशा दस पंद्रह गोल से हारती थी| एकदिन हम लोग डट कर खेले और खेल खत्म होने से कुछ देर पहले मामला बराबरी पर चल रहा था| हमारी तरफ से मुन्ना कबाड़ी गोलची बने थे| मुन्ना भाई ज्यादा कवायद से बचने को हमेशा गोलची ही बनते थे| अचानक आखिरी क्षणों में फौजी भाई की टीम को पेनाल्टी किक मिल गई| अब रोमांच चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया| मुन्ना भाई गोल के एक कोने से दूसरे कोने तक दीवारघड़ी के पेंडुलम की तरह डोल रहे थे| सामने फौजी भाई पेनाल्टी किक के लिए तैयार थे और हम सब समवेत स्वर में चीख रहे थे "मुन्ना ईज्जत का सवाल है गोल मत होने देना"| मुन्ना कबाड़ी के डोलने की आवृति छण प्रतिक्षण बड़ती जा रही थी और साथ साथ हम सबकी उसको चने के झाड़ पर चड़ाती चीखें भी| हल्ला गुल्ला समझ कर मोहल्ले वाले भी खिड़की दरवाजों से झाँकने लगे कि लड़को में मारपीट तो नहीं हो गई| पर मैदान का महौल देख कर सब साँस थामें देखने लगे| तभी मुन्ना भाई की नजर उनके ईकतरफा ईश्क पर पड़ी जो ईमली वाले के ठेले के पास खड़ी चूरन लगी इमली खा रही थी और टकटकी बाँधे मुन्ना भाई पर अपनी सखियों के साथ नजरे गड़ाये थी| अब वाकई मुन्ना भाई की ईज्जत का सवाल था| फौजी भाई को भी ताव आ गया और उन्होने एक दनदनाती पेनाल्टी शाट मारी| हम सब चीखें "मुन्ना बाल गोल के बीच में जा रही रही है"| मुन्ना कबाड़ी गोल के कार्नर से बीच में कूदे | उधर फुटबाल तोप के गोले की तरह उनके सिर से टकरा कर नब्बे डिग्री के कोण पर ऊपर की उछल गयी और ईधर हम सब हिप हिप हुर्रे करते हुए मुन्ना भाई की ओर दौड़ पड़े| गोल पर जाकर देखा तो मुन्ना भाई चित्त पड़े थे और उनकी आँखे लट्टू की तरह घूम रहीं थी| उनको होश में लाने पर जब बधाई दी गयी तो उन्होनें कबूला कि वास्तव में उन्हे फुटबाल दिखी तक नहीं थी| वह तो न जाने कैसे गोलपोस्ट और फुटबाल के बीच में आ गये थे और उन्हे ऐसा लगा था कि किसी ने उनके सर पर आलू से भरा बोरा घसीट के दे मारा हो| खैर हमने उनकी ईज्जत की खातिर यह राज किसी को नहीं बताया और आप भी किसी से मत कहियेगा|