10 May 2005

बाँके बिहारी Go Cart पर!














वृंदावन वाले बाँके बिहारी के जन्मदिन पर मिलता है सुस्वादु प्रसाद और पंचाअमृत, जब्कि हमारे बाँके बिहारी मनाते है अपना जन्मदिन अमेरिकी स्टाईल में। इस बार बाँके बिहारी और उनके भक्तो (मेरे मित्रो) की इच्छा थी कि कुछ हटके किया जाये। वैसे बात वाजिब भी है, पेंसिलवेनिया में अक्टूबर से मार्च तक ६ माह तो ठंड ही घर के अँदर दुबका रहने को मजबूर कर देती है। बचे ६ माह में कुल जमा २४-२५ सप्ताहाँत होते है जिसमे से कम से कम दो चार वर्षा में ही धुल जाते हैं। ऐसे में बचे खुचे बीसेक सप्ताहाँत में अगर कोई बर्थडे या शादी की वर्षगाँठ सरीखे आयोजन करे तो मेरे सरीखे घुमँतु के लिए यह किसी सजा से कम नही। मेरा एक आबजर्वेशन है, ऐसे समारोहो में जनता ईंडियन स्टैडंर्ड टाईम को फालो करती है यानि की नियत समय से एक दो घंटे देर से आना। फिर बातचीत के विषय भी टाईप्ड होते हैं। जरा मुलाहिजा फरमाईये

  • और भाई क्या चल रहा है?
  • यार आज तो बारिश होने वाली थी?
  • तुम्हारा प्रोजेक्ट कब तक चलेगा?
  • लेबर (हरे पत्ते वाला, नौ महीने के बाद वाला नही) कहाँ तक पहुँचा?
  • यार मेरे लायर ने कहा है कि अब एकसाथ I140 और I485 फाईल नही हो सकते।
  • भाईसाहब कौन सी वैन ठीक रहेगी?
  • और आपने घर फाईनल कर लिया?
  • आजकल मार्टगेज बहुत सस्ता है।
  • और घास काटी कि नही इस हफ्ते? (यह मजाक नही, अमेरिकी गृहस्वामित्व के साथ मिलने वाला अनचाहा झमेला है)
  • मुझे अपने बेसमेंट मे फिनिशिंग करनी है।
  • यार मार्केट (शेयर) तो बिल्कुल बैठ गया है, कन्ज्यूमर रिपोर्ट तो ठीक ठाक थी>

सवालो से अँदाजा लग सकता है कि कौन अमेरिका मे कितना जम चुका है और किस दौर से गुजर रहा है? शायद इसीलिए मुझे सब के सब एचओवी लेन में दौड़ते लगते हैं, सबकी जिंदगी एक ही रास्ते पर दौड़ रही है बस सब अलग अलग लेन में हैं। एन्ट्री लेन वाला अभी एच १ ट्रांसफर को लेकर हैरान है। वह लेन चेंज कर चुका व्यक्ति अब I140 के चक्कर में फँस चुका है। उससे बगल की लेन वाला अब घर ढूड़ रहा है या अपने घर की घास काटने को लेकर हैरान है। उससे ऊपर की लेन वाला नासाडेक की डुबकी पर ग्रीनस्पान को कोस रहा है। जब्कि एचओवी लेन में वेटेरन है यानि जो सारे घाटो का पानी पी चुका है और अपने शागिर्दो को गुरुमंत्र दे रहा है।

तो जनाब हमने सोचा कि हम परउपदेश बहुकूल तेरे वाली स्थिति नही आने देते और इस बार सबको बाँके बिहारी जन्मदिवस पर सबको Go cart से परिचय कराते हैं। प्रयोग सफल रहा, बाँके बिहारी भी खुश, मित्र भी खुश। न किसी ने किसी से घर की घास की चिंता व्यक्त करी न किसी ने किसी को शेयर के भाव बताये। और तो और मातृ दिवस पर माताऐ भी पीछे नही रही और उन्होने भी और उन्होने जेसीपेनी और मेसीज की सेल की चिंता छोड़कर Go cart का आनंद लिया।

06 May 2005

क्योंकि भैंस को दर्द नही होता! [भाग ३]

कमला,विमला और अमला की विशलिस्ट एक औसत मध्यमवर्गीय महिला का प्रतिनिधित्व करती है और इसमें परालौकिक तत्व की उपस्थिति के कारण अपनी राजनैतिक,सामाजिक महत्वाकांक्षाए घुसेड़ने का साहस मुझमें नही था। वैसे यहाँ यह बता देना जरूरी है कि जैसे मैं २० साल में साईकिलिंग की जगह ब्लागिंग करने लगा हूँ वैसे ही कमला,विमला और अमला भी बदलते भारतीय समाज और जीवनशैली के परिवर्तनों से अछूती नही रही है। उनके गाँव में भी स्टारटीवी और आजतक जैसे चैनल आते हैं, वे भी ईंटर पास हैं, उनके पोते भी अब ब्रिटेनिया बिस्कुट के रैपर पर छपा कूपन का नंबर लेकर पीसीओ में केबीसी की हमेशा ईंगेज रहने वाली लाईन से भिड़े रहते है, अपनी तकदीर का ताला खोलने और बिगबी के दीदार का चांस पाने के लिए। कमला,विमला और अमला भी अब कपड़े धोने के लिए पीले रंग की ५०१ नं वाली चौकोर बट्टी से सुपर रिन, नीम की दातून से कोलगेट की चमकार और दशहरे के मेले से रेव ३ तक का सफर तय कर चुकी हैं। यहाँ मेवालाल गुप्ता और विशंभर यादव का जिक्र भी लगे हाथ कर देना जरूरी है। दरअसल मेवालाल गुप्ता गाँव की पंचायत का सरपंच है और विमला उसी पंचायत में महिला कोटे से पंच है। दोनो की बिल्कुल नही बनती क्योकि विमला को लगता है कि मेवालाल उस ब्लाक के बीडीओ विशंभर यादव की मिलीभगत से विकास का पैसा हड़प कर जाता है। वैसे कुछेक साल पहले विशंभर यादव भरी पँचायत के सामने विमला के हाथो जलील हुआ था। न जाने कहाँ से उसने सुन लिया था कि Bill Clinton भारत दौरे के दौरान झींझक भी आने वाले हैं। पँचायत में उसकी और विमला की कुछ ईस प्रकार से नोंक झोंक हुई थी।
रामबदन यादव (पंच नं १): अरे विशंभर भईया ई कलीनटन कौनसे करनल है जो हमरे हियाँ आय रहे हैं?
जग्गू चौधरी (गाँव का थानेदार): अरे ऊ हमरे राषटरपति हैं शायद।
विशंभर: अरे नही, तुम सबको कुछ नही मालुम। ऊ तो अमरीका के राषटरपति ठहरे। ऊ हमरे हियाँ महिला परगति की रिपोरट देखे आय रहे हैं। गाँव वालो , यह हमरी ईज्जत का सवाल है, सिर्फ हमरी और मेवालाल की बीबी ही बीए पास हैं अतः केवल वहीं कलीनटन साहेब की आरती करिहैं और उनके साथ फोटू खिंचवईये।
विमला: काहे हम तो महिला पँच है, हम काहे नही खिँचवा सकते फोटू?
विशंभर: देखौ विमला, तुमको कछु तो मालुम है नही कि कौन है कलीनटन, फिर काहे उनके सामने कुछ उलटा सीधा बोलि के हम सबकी हुज्जत करईहौ?
विमला: मालुम है , सबै मालुम है ऊ वही है न लिंसकी Monika Levinsky वाला?
अब विशंभर की बीबी उसके पीछे पड़ गई कि बताओ यह Monika Levinsky कौन है? विमला ने जब पूरा लिंसकी प्रकरण उसके कान में बखान किया तो वह रणचंडिका बन गई। साफ ऐलान करके के बोली कि उसे किसी छलिया की अगवानी नही करनी न उसके साथ फोटूओटू खिंचवानी है।
शायद इसीलिए गाँव की ईकलौती सोडियम लाईट भी मेवालाल के घर के बाहर लगी है। विमला अक्सर कमला और अमला के साथ मिलकर गाँव की भलाई के लिए जो भी योजना बनाती है वह या तो मेवालाल विशंभर प्रसाद एंड कंपनी की चांडाल चौकड़ी के अड़ंगो का शिकार होती है या फिर उसके बजट का ९५ प्रतिशत हिस्सा वे दोनो बिना डकार लिए हजम कर जाते हैं। शायद ईसिलिए इनकी विशलिस्ट में ८ और ९ नंबर की ईच्छाऐं जुड़ी हैं। पर कुछ भी हो कमला,विमला और अमला की शँकर जी की अनन्य भक्ति में लेश मात्र की कमी नही आई। वैसे उनको अक्सर यह दुविधा जरूर होती थी कि उनकी विश लिस्ट में सिर्फ पहले दो नंबर की माँगो के अलावा शँकर जी ने बाकी की माँगो पर आज तक विचार क्यो नही किया? पिछले कुछ महीने पहले एक सोमवार को तीनो सखियाँ हमेशा की तरह शँकर जी के मँदिर पहुँची नियमित पूजा के लिए।

शिव मंदिर
सिठमरा गाँव का शिवमंदिर
उस दिन सवेरे से खासी उमस भरी गर्मी थी। घरों के बाहर बहुत कम लोग थे, मँदिर भी जिस नहर के पास था वहाँ सन्नाटा था। पूजा के दौरान कमला का जल चड़ाने वाला लोटा हाथ से जमीन पर गिर गया और टन्न की जोरदार आवाज हुई। साथ ही एक कड़कती हुई भारीभरकम हुँकार के साथ किसी ने पूछा "कौन है?" तीनो सखियाँ चौंक कर आस पास देखने लगीं। अमला बोली, "अरे कमला यह तो शोले सनीमा जईसा हुइ गवा। ऊ फिलम में भी बसँती पर मँदिर में संकर भगवान चिल्लावत हैं।" कमला ने पलट कर जवाब दिया " अरी विमला, ऊ फिलम मां तो धरमिन्दर चुहलबाजी करत रहे, अब ईस बुड़ौती मे कौन्हो हमसे काहे को चुहल करिहै?" तभी फिर से वही भारी आवाज आई "अरे कौन हो तुम लोग, अरे विश्वकर्मा श्री, यह कौन सी लाईन कनेक्ट हो गई है?" अब तीनो सखियाँ चौंक कर आस पास देखने लगी कि यह आवाज कहाँ से आ रही है, पर दस मिनट की ढुड़ाई का कोई फायदा न होते देख विमला ने पूछ ही लिया "आप कौन हैं और कहाँ से बोल रहे है?" यह पूछते हुए विमला के दिमाग मे अँदेशा था कि शायद रात बिरात टेलिफोन वाले गलती से मँदिर में तो फोन नही लगा गये पर फोन की आवाज इतनी जोर से तो आती नही। तभी उसको अमला ने कोंचा, अमला का चेहरा फक्क पड़ चुका था। दोनो ने जब अमला के हाथ के इशारे को देखा तो उनके विस्मय की सीमा नही रही, आवाज शिवलिंग से आ रही थी। अत्यधिक रोमांच के चलते तीनो सखियाँ धम्म से शिवलिंग के सामने बैठ गयी और लगी फिर से जल चड़ाने और जोर जोर से मत्था रगड़ने। कमला ने तो जोर जोर से मँदिर का घँटा बजाना शुरू कर दिया कि तभी शिवलिंग से गर्जना हुई " अरे यह क्या बेहूदगी है? तुम लोग क्या कभी ढँग के मंदिर में नहीं गयी जहाँ लिखा होता है कि शिंवलिंग को रगड़ना मना है? और बंद करो यह घँटनाद। मेरा इस समय इसे सुनने का कोई मूड नही हैं। "
शिवलिंग
यही है वह शिवलिंग!
विमला ने चिंचियाई सी आवाज मे कहा "प्रभु! अ आप?" शिंवलिंग से फिर आवाज आयी "हाँ , यह हम है स्वंय भोलेशँकर, हम प्रभातकाल में अँतराष्ट्रीय स्तर की जटिल समस्या पर विचार कर रहे थे कि पता नही कैसे तुम्हारे मँदिर से हमारी वीआईपी हाटलाईन जुड़ गई। सवेरे सवेरे हमारे मेडिटेशन में खलल डाल दिया।"
विमला: हाटलाईन?
शिवलिंग: हाँ, हाटलाईन, हर प्रार्थना हम तक शिवलिंग से एक विशेष सँदेश लाईन के द्वारा आती है।
विमला :परंतु प्रभु सँदेश लाईन और वीआईपी हाटलाईन अलग अलग होती है क्या?
शिवलिंग: हाँ, सामान्य जनता के लिए सँदेश लाईन और नेतागण, अभिनेतागण और आईएएस जिन्हे तुमने क्रीमी लेयर का नाम दे रखा है उनके लिए हाटलाईन जब्कि राष्ट्रीय, अँतराष्ट्रीय स्तर के महत्वपूर्ण व्यक्ति जिनकी सुरक्षा मे कम से कम बीस पचीस ब्लैक कैट कमाँडो लगे हो उनके लिए वीआईपी हाटलाईन।
विमला: पर प्रभु, यह तो अन्याय हुआ, हमने तो सुना है कि भगवान तो सबके लिए बराबर हैं।
शिवलिंग: अरे तुम पंच हो या तरूण तेजपाल, हमारा ही तहलका करने पर अमादा हो गई? यह सँदेश लाईन के अपग्रेड सैम पित्रोदा ने हमें सुझाये थे, बड़ा काबिल बँदा है। अरे अगर यह कैटेगराईजेशन न हो तो हर मिनट दो मिनट में तुम्हारे सरीखा भक्त टन्न से घँटा बजा के दो रूपल्ली के बताशे हाजिर कर देता है। पूछने पर एक ही जवाब कि भगवान हाउ डू यू डू करने चले आये थे। फिर हाजिर हो जाती है विशलिस्ट, वही पुरानी फटीचर माँगे कि मेरे लड़के का ट्राँसफर करा दो, दुकान की बिक्री बड़वा दो वगैरह वगैरह।
विमला: लेकिन प्रभू, यह तो सरासर अन्याय है, आपके करोड़ो भक्त हैं जो रातदिन आपका ध्यान करते हैं पर आप उनका ध्यान रखने की जगह सिर्फ हाटलाईन और वीआईपीलाईन पर ही प्रार्थनाऐ सुनेगे तो आपमे और भारत सरकार में फर्क क्या रह जायेगा।
शिवलिंग: जैसी सरकार चुनोगे वैसा शासन भोगोगे। जाति देखकर वोट देने को क्या मैने कहा था? और पहले की बात और थी, तब आबादी की वजह से प्रार्थनाओं की प्रोसेसिंग क्यू छोटी होती थी। अब तो छोटे छोटे बच्चे प्रार्थना करते हैं कि पापा केबल न कटवाये नहीं तो काँटा लगा देखने को नही मिलेगा।
विमला: लेकिन प्रभु बच्चे तो आपका ही प्रसाद हैं।
शिवलिंग: प्रसाद पर भी कोई राशन होता है कि नही? भड़काया जयप्रकाशनारायण ने कि "डरो नही हम जिंदा है" तो खत्म हो गया डर सँजय गाँधी की नसबँदी का और बड़ाते गये आबादी। अब सुदर्शन बहका रहा है तुम सबको कि हिंदू कम पड़ गये, बड़ाओ आबादी। लगता है उसका जल्दी ईंतजाम करना होगा।
इसके बाद अगले दो घँटे तक विमला और शँकर जी की नोंकझोंक चलती रही। अब विमला भले ही अटल जी की तरह कुशल वक्ता न हो पर पँच होने के नाते उसे सवाल जवाब खूब आते थे और उसने शँकर जी की इस वर्गभेद आधारित प्रार्थना सुनने की प्रणाली की धज्जियाँ उड़ाने में कोई कसर नही छोड़ी। बहस का तापमान जैसे जैसे बड़ रहा था, तीनो सहेलियों को समझ आ गया था कि क्यों आम जनता त्रस्त है और क्यो शासक वर्ग मालामाल हैं। क्यों बड़े बड़े घोटालेबाज नेता महायज्ञ वगैरह कराकर फिर से सत्तासुख भोगते हैं। खैर आप सब सुधी पाठकजन है ज्यादा डिटेल दिये बिना आप समझ गये होंगे कि इस बहस के मुद्दे क्या रहे होंगे। बहस का नतीजा अगले भाग में। तब तक के लिए लेते हैं एक छोटा सा नान-कामर्शियल ब्रे..........क|

03 May 2005

क्योंकि भैंस को दर्द नही होता! [भाग २]

हाँ तो जनाब बात हो रही थी झींझक की। झींझक में एक गाँव है सिठमरा। यहाँ की तीन महिलाओं की दासतान इस आलेख के जरिए आप तक पहुँचायी जाने वाली है। यह तीनो महिलाऐं गाँव के मध्यम आयवर्ग का प्रतिनिधित्व करती है। इनके में से एक का पति खेती करती है, दूसरी का पति ग्वाला है और तीसरी के पति की परचून की दुकान है।


परचून की दुकान
परचून की दुकान
हाँ, मुझे मालुम था कि आप में से कुछ जरूर पूछेंगे कि परचून की दुकान में चूना बिकता है कि चूरन, तो जवाब यह है कि दोनो बिकते हैं। यह भारत के आदर्श गाँव का वालमार्ट है। अब अगर आपकी जिज्ञासा की पिपासा शाँत हो गयी हो यह भी बता दूँ कि इन तीनो महिलाओं का नाम है कमला,विमला और अमला। नाम से यह तीनो बहने लगती है पर इस लेख के लिए यह महत्वपूर्ण नही है। यह तीनो काफी अच्छी सखियाँ हैं और जिस जमाने में मैं हाफपैंट पहन कर कानपुर शहर के श्याम नगर में साईकिल से किदवई नगर ट्यूशन पड़ने जाता था, तब से यह एक दूसरे के पड़ोस में रह रही हैं। उस समय तो मैनें अमेरिका की सूरत सिर्फ हिंदी फिल्म के गानो में देखी थी जिसमें राजकपूर,अमिताभ बच्चन या धर्मेद्र विदेशो की गलियों में ठुमके लगा रहे होते थे जब्कि

कमला,विमला और अमला
कमला,विमला और अमला
कमला,विमला और अमला इंतजार कर रही थीं कि कब ज्ञानी जैल सिंह उनके गाँव के बाहर लगी दूरदर्शन की छतरी का उदघाटन करने आयें। और वे सखियाँ भी देखे टीवी पर गब्बर सिंह को बसंती पर चिल्लाते हुए कि "अरी ओ छमियाँ, जरा हमको भी तो दिखाओ दो चार ठुमके!" यह तीनो सखियाँ पति सेवा, सास सेवा, गृह सेवा के अतिरिक्त प्रतिदिन शिव मंदिर की सेवा भी करती थी जो इनके पड़ोस वाली गली से बाहर जाने पर बहने वाली नहर के किनारे स्थित है। हर सोमवार को यह तीनों निर्विघ्न रूप से व्रत भी रखती आ रही हैं। अब इनके द्वारा की जाने वाली सेवाओं में से सास एवं गृह सेवा का काम बहूसोर्स हो गया है। अरे चौंकिए नही, यह कोई नही गुत्थी नही है। मैने तो सिर्फ एक नया शब्द इजाद करने की कोशिश की है। जैसे अमेरिकी कंपनियाँ अपने ऊबाऊ काम को चीन और भारत में आऊटसोर्स करते हैं वैसे इन तीनों सखियों की पदोन्नति हो चुकी है और यह सासे बन चुकी है। अतः सास एवं गृह सेवा का काम अब ईनकी बहुऐं करती हैं। तो बताईये कि यह कर्तव्य का हस्तांतरण बहूसोर्सिंग नहीं कहलायेगा तो क्या लाजिकल प्रोसेस माडलिंग कहलायेगा? खैर तब इनकी शिवशँकर जी से प्रार्थनाओं की लिस्ट बहुत छोटी थी। आप जानना चाहे तो लिस्ट हाजिर है

  • पति की लंबी आयु
  • तीन बेटे
  • अच्छी आमदनी
  • सूदखोर महाजन की याददाश्त चली जाये
  • सास की कर्कश बोलती बँद हो जाये

इन तीनो की शिवशँकर सेवा हलाँकि अब भी बदस्तूर जारी है और आज की तारीख में भी इस विशलिस्ट में कुछ खास बदलाव नही आया है। मेरे ख्याल से गोविंदाचार्य और के सी सुदर्शन यह सूची देख कर खुश हो सकते हैं कि कम से कम सेटेलाईट अपसंस्कृति ने भारतीय ग्रामीण समाज को ज्यादा चौपट नही किया है।

  • पति की लंबी आयु
  • नौ पोते
  • अच्छी आमदनी
  • सूदखोर महाजन की याददाश्त चली जाये
  • तीनो बहुओं की कर्कश बोलती बँद हो जाये
  • सचिन की पैतीसवीं सेंचुरी जल्दी पूरी हो जाये
  • राहुल गाँधी की किसी हिंदी फिल्म की हिरोइन से शादी हो जाये
  • मेवालाल गुप्ता की लुटिया थाली डूब जाये
  • विशंभर यादव का तबादला हो जाये

आगे का वृतांत अगले भाग में। तब तक के लिए लेते हैं एक छोटा सा नान-कामर्शियल ब्रे..........क|

02 May 2005

क्योंकि भैंस को दर्द नही होता! [भाग १]

क्या आपको यह शीर्षक अटपटा लगता है? अँदाज लगाईये इस अटपटे लेख की विषयवस्तु क्या हो सकती है?


  1. कहीं मैं किसी पशुविज्ञानी से टकरा गया?
  2. या फिर मुझे पशुसंररक्षण पर लिखने की सूझी है?
  3. या फिर नयी बोतल में पुरानी शराब परोस रहा हूँ यानि कि फिर से नोस्टालजिया प्रलाप इस बार कुत्ते के बजाय भैंस के बहाने।
  4. या फिर किसी अंग्रेजी ब्लाग पर गाय-भैंस पर कुछ लिखा देखा है उसे यहाँ टीप रहा हूँ कुछ हिंदी फिल्म निर्माताओं जैसे हटके वाले अँदाज में?
  5. और सबसे महत्वपूर्ण यह भाग १ क्या बला है, शायद आपको कई दिन बोर करने की ठानी है?

अगर आपका अँदाज नं १ से ४ तक में कोई भी है तो आपको निराशा हाथ लगने वाली है। हाँ इस बार मेरे इस निठल्ले चितंन को एकाधिक भागो का विस्तार जरूर मिलने वाला है , पर कितना यह मुझे भी नही पता| यह सिर्फ तब बंद होगा जब मेरी ख्याली पुलावों की खिचड़ी पूरी तरह पक जायेगी या फिर आप सब इसे सुन सुन कर पक जायेगें और कहेंगे कि बस बहुत हो गया।

subashghai
कुछ याद आया? टाईटल उड़ाया फिल्मी डायलाग से
और तोहमत हमपे कि हम फिल्में हटके बनाते हैं!
तो चलिए देखते हैं कि इस भैंस कथा का माजरा क्या है? बात आजकल के दौर की ही है पर बिलकुल सत्य घटना पर आधारित है। उत्तर प्रदेश में एक शहर है कानपुर देहात। अब आप कहेंगे कि कानपुर देहात भला शहर कैसे हो सकता है? जहाँ तक मुझे मालुम है सरकार ने प्रशासनिक कारणों से जो कि आमतौर पर जनता जनार्दन की समझ से परे पर जनता के भले के लिए होते हैं, कानपुर का कानपुर शहर और कानपुर देहात नाम के दो शहरों में १९७७ में विभाजन किया था। फिर १९७९ में वापस मिला दिया शायद जनता की भलाई की मलाई खट्टी हो गई होगी और फिर १९८१ में अलग कर दिया। पर जनाब यह लेख इस विभाजन की पोस्टमार्टम रिपोर्ट नही है। यह तो आपको बस एक छोटा सा बैकग्राऊँड बता रहा था बिलकुल वैसे ही जैसे कल हो न हो के ओपेनिंग सीन में प्रीति जिंटा ब्रुकलिन से मैनहैटन तक (बाप रे! शायद तभी वह इतनी स्लिम ट्रिम है) मार्निंग वाक के दौरान न्यूयार्क की देशी लाईफ के बारे में बताती हैं। तो साहब कानपुर देहात में एक कस्बा है झींझक। अब यह मत कहिएगा कि यह किसी जगह का नाम कैसे हो सकता है? अरे जब पथनमथिट्टा हो सकता है , झझ्झर हो सकता है तो झींझक क्यो नही हो सकता। फिर भी आपको कोई कष्ट है तो शहरों, कस्बो और मुहल्लो के नामों के विशेषज्ञ से पूछिए वे आपकी जिज्ञासा शांत कर देंगे ऐसा मुझे विश्वास है| पर भाई मुझे आप लोग विषय से बार बार सवालो की टँगड़ी मार के भटका क्यो देते हो यार? पूरा मूड खराब हो गया। अभी आगे का वृतांत अगले भाग में। तब तक के लिए लेते हैं एक छोटा सा नान-कामर्शियल ब्रे..........क|