31 August 2005

सड़क पर शुतुरमुर्ग नाचा किसने देखा?

यह दृश्य हैं स्वर्णद्वार सेतु का। अगर आपको यह नाम कुछ अजीब सा लग रहा है तो मिर्ची सेठ शायद आपकी कुछ मदद कर सकें। खैर स्वर्णद्वार सेतु पर एक वैन में एक साहब दो शुतुरमुर्ग ले जा रहे थे। यहाँ लगे हाथ यह बता देना जरूरी है कि भले ही खुद अमेरिकी कुछ साल पहले तक भारत को मदारियों और सपेरो का देश समझते रहे हो (कालसेंटरों,आईटी विशेषज्ञों ने अब इनकी समझदानी का आकार थोड़ा बढा कर दिया है) पर यहाँ ऐसे खब्तियों की कमी नही जो अपने फार्म हाउस पर शेर चीते या फिर शुतुरमुर्ग सरीखे जीव पालते हैं। अगर आपको यकीन नही तो पहले बगल का चित्र देखिये। जब इन शुतुरमुर्ग साहब के मालिक ने वैन की ब्रेक लगायी तो झटका लगने से वैन की खिड़की खुल गयी और इन शुतुरमुर्ग साहब का मूड स्वर्णद्वार सेतु के नजारे देखने का हो गया। अब एक बार यह जनाब बाहर निकल के टहलकदमी करने लगे तो इन्हें पकड़ कर अँदर करने मे पुलिस के पसीने छूट गये।

अब सुनिए चीते की कहानी जो किसी के फार्म हाउस में नही बल्कि न्यूयार्क की एक बहुमँजिली इमारत में पाया गया। इनको पालने का शौक चर्राया था एंटोनी येट्स को। वह उसे काफी पहले लाया था जब यह चीता एक शावक था। आठ माह में चीता जवान होकर चारसौ पौंड का हो गया। येट्स के नीचे की मँजिल में रहने वाली पड़ोसन ने चीते की गुर्राहट और असह्य दुर्गधँ की शिकायत की। पर व्यक्तिगत गोपनीयता कानून की मजबूरियों के चलते बिल्डिंग प्रशासन खास कुछ पता नही लगा सका। एक दिन चीतेश्री का दिल येट्स की बिल्ली खाने को हो गया। येट्स साहब ने जब बिल्ली और चीते के बीच दीवार बनने की कोशिश कि तो चीतेश्री ने उन्हें घायल कर दिया। अस्तपताल में येट्स खुद को कुत्ते से कटा बताकर भर्ती हो गये। हलाँकि डाक्टरों को उनकी कहानी पर यकीन नही हुआ और उन्होनें पुलिस को इत्तला कर दी। पुलिस येट्स के अपार्टमेंट गयी और दरवाजे में झिरी से चार सौ पाउँड भारी चीतेश्री को चहलकदमी करते देख उनके होश उड़ गये। फिर पूरी कमाँडो कार्रवाई की गई, छत के रास्ते खिड़की के सामने लटक कर एक पुलिस अफसर ने नशे का इंजेक्शन विशेष बँदूक से दागा। चीतेश्री के बेहोश हो जाने के बाद उन्हें ससम्मान जँगल ले जाकर छोड़ दिया गया। पुलिस को अपार्टमेंट मे एक चीते का दोस्त एक तीन फुटा अजगर भी मिला था।
अब अगर आपको कोई भारत को मदारियों और सपेरो का देश कहता मिले तो उसे या तो यह लेख पढा दीजिए या फिर यह वाला।

29 August 2005

यह क्या हो रहा है?

तस्वीर देख कर बताईये कि यह क्या हो रहा है?



  1. कृष्ण जन्माष्टमी पर मुंबई में दहीहाँडी यानी की गोविंद आला रे महोत्सव मनाया जा रहा है।
  2. यह युवक महिलाओं द्वारा मटकी फोड़ने में पुरूषों का वर्चस्व नही टूटने देना चाहता।
  3. शायद यह मटकी फोड़ने में महिलाओं की मदद कर रहा है।
  4. यह निश्चय ही कोई सड़कछाप मजनू है जो पिटने से बचने के दौरान लटक गया है।
  5. यह रामगोपाल वर्मा की नयी पिक्चर "दुल्हन माँगे दहेज" का सीन है, जिसमें बिहार में दहेज विरोधी माफिया महिलाऐं नवयुवकों को जबरन पकड़ कर उसका दहेजरहित विवाह करवाती हैं।
  6. यह युवक राखी बँधवाने से बचने को लटक गया है।
  7. यह सारी लड़कियाँ वास्तव में रिलायँस टेलीकाम की सेल्सगर्ल टीम की सदस्याऐं है और इस युवक को कोई फोनप्लान बेचने की कोशिश कर रही हैं।
  8. इस लड़के नें दोस्ती डाट काम में एक साथ इन सबको डेट दी थी लेकिन इसके हैकर दोस्त (दुश्मन) ने सारी डेटस की डेट हैकिंग करके एक ही दिन सेट कर दी।
  9. इस लड़के का ब्लाग पड़ पड़कर यह लड़कियाँ पक गई हैं और यह लड़का उनकी कविताओं का ब्लाग पड़ने से ईंकार कर रहा है।

कृपया अपनी पसंद का जवाब टिप्पणी में दर्ज करिये, अगर आपको लगता है कि यहाँ इनमें से कुछ नही हो रहा तो अपनी बहुमूल्य राय देना न भूलें।

26 August 2005

इट हैप्पनस ओनली इन ईंडिया!

अखबारो से चुनी तीन विलक्षण तस्वीरें, भारत के तेजी से बदलते चेहरे की आदर्श नुमाईंदगी करती हैं।


नई तकनीक की सुविधा
पुराने स्वाद की चुस्कियों के साथ।
बरिस्ता के काउँटर चाँदनी चौक में देखकर भारत की तरक्की का अनुमान नही लग सकता। पर चाय के कुल्हड़ वाले स्टाल पर मोबाईल की मौजूदगी से इस तकनीक के हर वर्ग तक की पहुँच का सही पैमाना है।




अगर मोबाइल द्वापर में मौजूद होता तो?
मोबाइल गले की अनचाही घँटी बन चुकी है। क्या सुदामा अपनी पत्नी से पूछ रहें हैं कि कान्हा से क्या क्या माँगू?




आगाज ऐसा तो अँजाम खुदा जाने!
३३% आरक्षण की माँग करने में ही अगर पुलिस पिट रही है तो आरक्षण मिल जाने के बाद कौन कौन पिटेगा? यकीन मानिए, इस तस्वीर को देख कर पिहास या व्यंग्य नही कर रहा। सिर्फ यह सोच रहा हुँ कि अधिवेशन दर अधिवेशन महिंलाओं का अधिकार उन्हें आरक्षण बिल में नयी नयी पेचिदगियाँ निकाल कर वंचित कर दिया जाता है। अगर उनका गुस्सा इस तरह से नही फूटेगा तो शायद शासन सुनेगा भी नही।

23 August 2005

बड़े अखबारो को बुद्धु कैसे बनाऐं?


अरे दीवानो, मुझे पहचानो!
कहाँ से आया, मै हूँ कौन?
सीखिए इस नौजवान से। इन जनाब की राष्ट्रीयता जनाब जर्मन है। लंदन में सैर सपाटा करते वक्त शायद इनका पासपोर्ट खो गया। अब मुफ्त में वापस कैसे जायें? तो इन जनाब ने अपने कोट और बनियानों के सारे लेबल काट डाले, और लगे समुद्र तट पर चहलकदमी करने। पुलिस ने इन्हें पकड़ लिया तो इन्होनें कुछ ऐसे हाव भाव बनाये कि जैसे यह कोई सिरफिरे हैं और बोलना नही जानते। इनको मानसिक चिकित्सालय पहुँचाया गया। वहाँ भी इन्होनें अपने मुँह में दही जमाये रखा। किसी डाक्टर ने इनकी पहचान जानने के लिए इनको एक कागज दिया कि इसमें अपने देश का झँडा ही बना दो। इनके दिमाग में सबसे पहली जो चीज उसको इन्होनें कागज पर उकेर दिया। जाना चाहेंगे वह क्या था? एक पियानो। बस आनन फानन में इनके लिए कहीं से पियानो का जुगाड़ किया गया। यह जनाब उसकी एक ही कुँजी पीटते रहे और लोगो ने समझा यह कोई बड़े पियानोवादक है जिनका फिलहाल दिमाग सटक गया है। बस अखबारों में होड़ लग गयी। बीबीसी तक ने रिपोर्ट छाप दी कि इनकी संगीत पर गहरी पकड़ है और अस्तपताल का स्टाफ घँटो इनका संगीत सुन कर बेसुध हो जाता है। बस एक हेल्पलाईन सेटअप हो गयी इनकी पहचान जानने के लिए। इनकी तसवीरें टीवी पर दिखायी गयी ताकि इनका कोई मुरीद ही इन्हें पहचान ले। भाँडा तब फूटा जब किसी ने इनको चेक संगीतज्ञ थामस स्ट्रैंड समझ लिया। असली थामस स्ट्रैंड को चेक टीवी पर आकर खँडन करना पड़ा कि वे लंदन में नहीं पाये गये थे। जहाँ एक ओर लंदन के प्रतिष्ठित अखबार इनके अस्तपताल में संगीत प्रर्दशन के काल्पनिक दृश्य बुन रहे थे वहीं अस्तपताल वाले इनके एककुँजीवादन सुन सुन कर पक गये थे और अपना सिर धुन रहे थे। एक दिन किसी नर्स से यह जनाब खुद बोल पड़े और पता चला कि यह जर्मन हैं। इन्होने कभी मानसिक रोगियों के संस्थान में काम किया था और उन्ही के हावभावों को हूबहू कापी करके यह अस्पताल के डाक्टरों और नर्सों को उल्लू बनाते रहे और चार महीने तक आराम फरमाते रहें। अब अस्पताल और अखबारों ने व्यक्तिगत सूचना की सुरक्षा के कानूनो का हवाला देकर (झेंप मिटाने का इससे बेहतर तरीका और क्या हो सकता है?
) ज्यादा खुलासा करने से इंकार कर दिया है। वैसे इन जनाब को ससम्मान जर्मनी भेज दिया गया है।

22 August 2005

हद हो गई!

हद हो गई। सुबह आँख खुली तो कोई कानों में चिल्ला रहा था। आस पास देखा। श्रीमती जी सपनों में खोई थीं। बच्चे भी अभी नही जगे थे। कोई पड़ोसी भी नही था । शनिवार को सभी आलस्य का विश्व रिकार्ड तोड़ने की फिराक में रहते हैं। कहीं टेलीफोन की आंसरिग मशीन तो नही, शायद सवेरे सवेरे कोई मार्केंटिंग की काल हो। पर वह भी नही थी। नीचे गया तो कंप्यूटर खुला था और स्क्रीन पर रोजनामचा का मुख्यपृष्ठ दिख और बज रहा था। हैरानगी एक साथ तीन बातों पर थी।


  • मैंनें रात में कंप्यूटर खुला तो नही छोड़ा था।


  • ब्लागनाद का शट फिलहाल अगली सूचना तक बँद हैं।


  • मैनें आज तक फकत एक ही लेख को बोलने की इजाजत दी है।


हद हो गई, अब यह दिन भी देखना बदा था जब अपना ही चिठ्ठा हमें खुद उलाहना दे रहा था। आप भी सुनिए कि हमने क्या क्या सुना ?

मालिक तुम तो यही भूल गये कि तो यही भूल गये कि तुमने रोजनामचा कब शुरू किया था। हमारा जन्मदिन तो पिछली २४ अप्रैल को ही निकल गया और तुम फिलडेल्फिया की गुनगुनी गर्मी के गुलछर्रे उड़ाते रहे। मैं (रोजनामचा) बेचारा चीखता रहा कि अरे मेरे रचयिता मेरे जन्मदिवस पर कम से कम एक लेख तो रच दो। शायद दोचार टिप्पणियाँ खाने को मिल जायें। नही तो कम से कम नया टेंपमलेट ही चढा दो। कम से कम पंकज बाबू से सीखो, कुछ लिखे चाहे न लिखे हाँ भाई को नये कपड़े पहनाने में कँजूसी नही करते। कभी मिर्च के रंग दिखते हैं तो कभी मँगल गृह के। अब बेतरतीब यादें देख-देख कर हमें अपने अस्तित्व और तुम्हारी अलाली पर रंज हो रहा है। अरे यार और कुछ नही तो मेरा पन्ना के रचयिता से ही सीख लो। देखो कैसे अपनी गैर हाजिरी में भी गजल की मशीन फिट करके गये थे मेरा पन्ना पर। जब शटर बँद होने की नौबत आ गयी तो उन्होने अपनी गजल की मशीन कूड़े में फेंक कर पुरानी कलम रूपी तलवार पर सान चढा ली है। फिर पुरानी धार लौट आयी है। देखो, नये नये जबरदस्त चिठ्ठाकार आ गये हैं मैदान में। इसलिए हे मेरे रचयिता चाहे भैंसकथा पर लिखो चाहे साँडकथापर, पर लिखो जरूर वरना तुम्हारे साईट काऊँटर की विकास दर को हिंदू विकास दर का दर्जा दे दिया जायेगा और तुम्हे ठलुहा और अनकही के साथ क्लास से बाहर कान पकड़ के एक टाँग पर खड़ा कर दिया जायेगा।


तो फुरसतिया जी की वजह से हमारे चिठ्ठे की आदत बिगड़ गयी है। जन्मदिन की लालीपॉप का हिसाब माँग रहा है। खैर फुरसतिया जी को जन्मदिवस पर हार्दिक शुभकामनाऐं। हमें हाल आफ फेम टिप्णियों और लेखों पर उनके लेख का बेकरारी से इँतजार रहेगा।

09 August 2005

डोगा यानि श्वान योगा यानि कि कुत्तासन!

आपने कर्मयोग सुना होगा, हटयोग सुना होगा ,पावर योगा तक सुन रखा होगा लेकिन डोगा नही सुना होगा, जो पशुओं और उनके स्वामियों के लिए मोक्ष के द्वार खोल देता है।


यह है नया योगा यानि कि डोगा
जनाब न तो मै ठिठोली कर रहा हूँ न ही कोई नया शगूफा फिर से छेड़ रहा हूँ। यह सब करने से पहले हजार बार सोचना पड़ता है कि कहीं कूपमँडूक आस्तिको की धार्मिक भावनाओं, आस्थाओं, संस्कारों और न जाने कहाँ-कहाँ चोट,ठेस वगैरह लग सकती है। उसके बाद घँटा थाली बजने से लेकर त्रिशूल तक बँट सकते हैं, ईंटरनेट के मैसेज बोर्ड पर धर्मपरायण और धर्मनिरपेक्षों के मध्य युद्ध छिड़ सकता है और तो और अनगिनत याचिकाऐं दायर हो सकती है।
यहाँ जिक्र हो रहा है एनीमल प्लेनेट परअगली पँद्रह अगस्त से प्रातः ११:३० पर शुरू होने वाले कार्यक्रम K9 Karma का। यह अमेरिका में प्रसारित होने वाला है। भारत में अगर आप एकता कपूर के सासबहू के झोंटानुचव्वल सीरियलो या फिर दैनंदिन पॉप त्वचा प्रदर्शन से आजिज आ चुके हो, तो अपने केबिल आपरेटर को यह चैनल शुरू करने के लिए तुरंत हड़काईये।













आईये आपको मिलवाते हैं इस कार्यक्रम के किरदारो से। इस कार्यक्रम की सूत्रधार हैं कॉरी हेरेनडॉर्फ। घुटने की शल्य चिकित्सा से उपचार के दौरान कॉरी का योग से परिचय हुआ। वे लंबे समय से पशु चिकित्सालाय मे तकनीशियन के रूप में कार्य कर रही हैं। पंरतु पिछले आठ साल से उन्होने योगशिक्षा और पिछले ६ सालो से पशु योगशिक्षा को पेशा बना लिया है।


चार्ली पाँच वर्षीय काला श्वान है। उसे एक हाईवे पर अवारा घूमते पकड़ा गया था, वहाँ से उसे पशु संरक्षणालय लाया गया जहाँ कॉरी ने उसे देखा।

मिलिए डोगी (योगी) महाराज चार्ली से

कॉरी के अनुसार बाकी सब अब इतिहास है। कॉरी के अनुसार चार्ली ने ही डोगा का अविष्कार किया है। एक दिन घर पर योगाभ्यास के दौरान चार्ली उनकी चटाई पर लेट गया और उसने मानो आँखो से कहा "मैं योगा हूँ।" कॉरी के अनुसार श्वान योग जानते हैं। वे सूर्य नमस्कार और पीठ के बल लेटकर शवासन करना पहले से जानते हैं। लोग योग संतुलना साधने के लिए करते हैं जब्कि श्वान यह सब पहले से जानते हैं। कॉरी कहती हैं कि डोगा आपकी ओर से आपके श्वान के बँधन को मजबूती प्रदान करता है, क्योकि श्वान तो पहले ही आपसे शतप्रतिशत वफादार है।










आपकी जानकारी के लिए यहाँ कुछ तस्वीरे दिखाई गयी हैं। यह वे आसन हैं जिन्हें आप अपने श्वान के साथ घर पर कर सकते हैं। इन आसनों को मूल आसन मुद्राओं मे साधारण हेरफेर से तैयार किया गया है ताकि इन्हें श्वान के साथ किया जा सके। ज्यादा जानकारी के लिए तो आपको K9 Karma का इंतजार करना होगा।

अगर अभी भी आपके ज्ञानचक्षु न खुले हों और आप कुत्ते के नाम से नाकभौं सिकोड़ रहे हो तो जरा इन तथ्यों पर नजर डालिए।

मित्र तुम कितने भले हो


  • पालतू पशु रक्तचाप सामान्य रखने में सहायक हैं। यह सिद्ध हुआ है न्यूयार्क के बफैलो स्थित विश्वविद्यालय में हुए एक अध्ययन से।
  • पालतू पशु तनाव कम रखने में सहायक हैं। ब्रिटेन के वालथॉम पशु पुष्टाहार संस्थान के जोसेफ विल्स का मानना है कि पशुओ के साथ टहलने से नसों का तनाव कम होता है।
  • पालतू पशुओं की मदद से हदृयरोग कम होते हैं। ऐसा होता है पशुओ के विश्वसनीय रिश्ते से मिली मानसिक शांति से, जो हदृयरोग से बचाती है।
  • पालतू पशु अवसाद कम रखने में सहायक हैं। पशु एकाकीपन दूर करते हैं जिससे एक सुरक्षा की भावना का विकास होता है।

किसी महानुभाव के उर्वर दिमाग में यह प्रश्न भी उठ सकता है कि

मैं और योगा? कभी नही!
यदि डोगा यानि कि श्वानयोग हो सकता है तो बिलौटायोग क्यों नही हो सकता। आखिर बिल्लियाँ भी पालतू जीव हैं और लोकतँत्र के नियमानुसार उन्हें भि योग करने पर कोई रोक नही होनी चाहिए। कॉरी के अनुसार बिल्लियाँ भी योगसाधकों को मदद दे सकती हैं पर वे घर से बाहर बिल्ली योग साधना को प्रोत्साहन नहीं देती। क्योकि बिल्लियाँ घर से बाहर निकलते ही सनक जाती हैं और एकाग्रचित्त नही रह सकतीं। शायद इसीलिए कहते हैं कि बिल्लियाँ नाक पर मक्खी भी नही बैठने देतीं।

08 August 2005

पंजाबी पुत्तर !

पंकज भाई की याददाश्त दा जवाब नही। यह लेख मैने तब लिखा था जब रोजनामचा शुरू भी नही किया था और लाईफ ईन ए को पुस्तक का कलेवर देने का ख्याल भी नही आया था। बाद में इसे रोजनामचा पर डालना भूल गया शायद। द्विवेदी जी ने पंकज से पूछा है कि


बढ़िया तो लिखते ही हो...मेर मतबल ये कि...अगर नरूला...अरोड़ा इतनी बढ़्या हिन्दी लिखेंगे तो तिवारी शुक्ला द्विवेदी वगैरह का क्या होगा!!

पंकज भाई का जवाब हाजिर है

नरुला जी तो खालिस पंजाबी हैं पर अरोड़ा जी नाम से पंजाबी लगते हैं व पंजाबी कहे जाने पर बुरा भी नहीं मानते। उन्होंने इस बात पर एक प्रविष्टि भी लिखी थी जो कि पता नहीं कहाँ खो गई। उन्हें भी कॉपी कर रहाँ हूँ शायद वही उस प्रविष्टि का पता बता दें।

इसलिए पंकज भाई की फरमाईश पर यह पुराना आलेख यहाँ हाजिर है। ताकि आगे से हिंदी-पंजाबी मुद्दे पर इसका उल्लेख किया जा सके।

माननीय पंकज जी ने अपने हाँ भाई पर मुझे पंजाबी पुत्तर के संबोधन से नवाजा तो यह लेख लिखने की प्रेरणा मिली| अरोरा नाम से पंजाबी या सिख होने का आभास होता है| वैसे मुझे इस संबोधन पर कोई आपत्ति नही है, पर मेरी बेगम को अपने यूपी वाले खत्री होने पर दीवानगी की हद तक गर्व है | उसे पंजाबी समझने की गलती करने वाले को वह यह समझाये बिना नही छोड़ती कि पंजाबी खत्री एवं यूपी खत्री दोनों अलग-अलग प्रजातियाँ है| यह बात मेरे गैर उत्तर भारतीय मित्रों को उदरस्थ नहीं होती कि आखिर हम अरोरा होने के बावजूद न पंजाबी बोलते है न ही चिकन खाते हैं| मेरा ऐसी हर विकट स्थिती पर एक ही जवाब होता है कि भाई हमारे पूर्वज संभवतः पंजाब से आये थे , हमारा कुटुंब शायद कुछ पहले आ गया होगा और स्थानीय भाषा व खानपान को आत्मसात कर लिया , जो बाद में आने वालों ने अपेक्षाकृत कम किया| वैसे जाति से चिपकना सिर्फ हम भारतीयों का ही शगल नही है , अमेरिकी भी फैमिली ट्री की जड़े खोदते रहते हैं| इस काम के लिए सौ डालर तक के साफ्टवेयर तक मिलते हैं |

04 August 2005

शहर की पहचान

मान लीजिए कि किसी दिन आपको अत्यधिक रोमांच की सूझे और आप हवा के गुब्बारे में सैर के लिए या फिर पैराशूट जंप के लिए निकल पड़े। अचानक तेज हवा चलने से आप अपनी मँजिल की जगह किसी दूसरे शहर में कूद पड़ते हैं। अब आपको कैसे पता चलेगा कि आप किस शहर में हैं? जाहिर है आप यही जवाब देंगे न कि किसी से पूछ लेंगे, या फिर साईनबोर्ड पड़ेंगे। मान लीजिए वहाँ के साईनबोर्ड में शहर का नाम ही न लिखा हो या फिर लोग कोई दूसरी बोली बोलते हों तब? चलिए आपको एक आसान सा तरीका बताते हैं। अपना गुब्बारा या पैराशूट लपेट कर रख दीजिए और चल पड़िए उस शहर में चहलकदमी करने। ढूढिए कोई ऐसा नजारा जहाँ दो लोग लड़ रहे हों। इसमें चकित होने की कोई जरूरत नही, आपकी बदनसीबी ही होगी अगर आप नवाबों के शहर लखनऊ में टपक पड़े हों जहाँ कोई लड़ता नहीं वरना पूरे हिंदुस्तान में ऐसा कोई शहर नही जहाँ आपको कम से कम दो झगलाड़ू न मिल जायें। बस शहर की पहचान आसान है। अब आप यह देखिए कि अगर:

  • दो लोग लड़ रहे हैं। तीसरा आकर उस झगड़े में शामिल हो जाता है। फिर चौथा भी आकर बहस करता है कि कौन सही है। तो समझ जाईये बाबू मोशाय कि आप निश्चित ही कलकत्ता में हैं।
  • दो लोग लड़ रहे हैं। तीसरा आकर उन्हे देखता है और चला जाता है। तो समझ जाईये कि यह है मुँबई मेरी जान।
  • दो लोग लड़ रहे हैं। तीसरा आकर बीचबचाव करने की कोशिश करता है। दोनो अपना झगड़ा छोड़कर तीसरे को पीटने लगते हैं। तो समझ जाईये कि यह है बेदिल दिल्ली।
  • दो लोग लड़ रहे हैं। भीड़ तमाशा देखने जुट जाती है। तीसरा आकर चुपचाप चाय की दुकान खोल लेता है। केमछो, आप अहमदाबाद में मजा मा हैं।
  • दो लोग लड़ रहे हैं।तीसरा आकर कंप्यूटर प्रोग्राम लिखता है ताकि झगड़ा रूक जाये। पर प्रोग्राम मे बग होने की वजह से झगड़ा नही रूकता। तो फिकर नक्को करो, जनाब आप हैदराबाद में हैं।
  • दो लोग लड़ रहे हैं। भीड़ तमाशा देखने जुट जाती है। तीसरा आकर कहता है "अम्मा को यह मूर्खता नही सुहाती।" शांति हो जाती है। यह चेन्नई है।
  • दो लोग लड़ रहे हैं। तीसरा आकर बीयर की पेटी खोलता है। सब साथ मिलबैठकर बीयर पीते है। एक दूसरे को गरियाते है, और दोस्त बनकर घर जाते हैं। यह है गोवा।
  • दो लोग लड़ रहे हैं। झगड़े के बीच समय निकालकर दोनो मोबाईल से अपने दोस्तो को एसएमएस करते हैं। अब पचास लोग लड़ रहे हैं। पाप्पे तुसी लुधियाना विच टपक पड़े हो।
  • दो लोग लड़ रहे हैं। तीसरा आकर बीचबचाव करने की कोशिश करता है। उसके पान की पीक पहले वाले के कुर्ते पर गिर जाती है। भीड़ तमाशा देखने जुट जाती है। बातचीत में पता चलता है, कि तीसरा और दूसरा एक धर्म के हैं और पहला उन दोनो के हिसाब से काफिर या अधर्मी हैं। भीड़ भी झगड़े में शामिल हो जाती है। सांप्रदायिक दँगा हो जाता है। कर्फ्यू लग जाता है। गुरू, तुमको टपकने के लिए कानपुर ही मिला था?
  • दो लोग लड़ रहे हैं। आपको अचरज होता है कि पूरे बाजार में कोई उनकी ओर ध्यान नही दे रहा है। आप बीचबचाव की कोशिश करते हैं तो आपको जवाब मिलता है "क्या के रे हो मियाँ, हम तो इनसे यूँ ही दर्जी की दुकान का पता पूछ रिये थे, मियाँ इस शहर का नाम भोपाल, ये भई ऐसे ई नी हैं"।
  • दो लोग लड़ रहे है, लेकिन गाली गलौच के बीच बीच मे "पहले आप" "पहले आप" कर रहें है, तीसरा बन्दा बीच मे आकर दोनो को पान की गिलौरिया थमाता है, और तीनो झगड़ा खत्म करके, टुन्डे नवाब के कबाब खाने चले जाते है। तो यकीं मानिये जनाब आप शाने अवध लखनऊ मे है।
  • दो लोग झगड़ रहे है, खूब गाली गलौच होता है, कट्टे वगैरहा निकल आते है, इस बीच तीसरा बन्दा आता है और दोनो से बीच सड़क पर लड़ने का रंगदारी टैक्स वसूलता है. तो हमरा कहा मनिये ना, आप बिहार मे ही है भई। हम तो पहले ही कह रहा हूँ, कौनो सुने तब ना।
  • दो लोग लड़ रहे हैं। दोनो घर जाकर इंटरनेट पर बैठ जाते हैं। एक मैसेजबोर्ड पर बड़ी सी पोस्ट लिख मारते हैं। फिर टिप्पणियों में एक दूसरे को गरियाते हैं। बीसियों हजारो लोग उस पर कमेंट करते चले जाते हैं। आप यहाँ , यहाँ या यहाँ हो सकते हैं।

लखनऊ और बिहार की पहचान जीतू के सौजन्य से!