21 October 2005

फिलाडेल्फिया के सिटी हाल मे शोले का सजीव प्रदर्शन!


कल फिलाडेल्फिया के सिटी हाल पर एक वीरू चढ गया और सारा गाँव इकठ्ठा हो गया। बिल्कुल शोले की तरह। फर्क सिर्फ इतना था कि गाँव वालो की जगह दमकल,पुलिस, डाक्टर,नागरिक और नगर पालिका के तमाशबीन थे, मौसी की भूमिका थी एफबीआई की,वीरू थे एक नगर पार्षद श्री रिक मैरियानो और जय की भूमिका मे थे मेयर जान स्ट्रीट। यहाँ के नेताओ ने वाकई शोले की स्टोरी से प्रेरणा लेकर तमाशा खड़ा किया था। ट्विस्ट सिर्फ इतना था कि श्रीयुत मैरियानो जो एक बिजली कारीगर की हैसियत से नगर पार्षद तक का सफर तय कर चुके हैं अपने ऊपर एफबीआई द्वारा भ्रष्टाचार, कदाचार, अनाचार,व्यभिचार और न जाने कौन कौन से आचार जैसे असंख्य आरोपो की जाँच से त्रस्त होकर सिटी हाल के टावर पर चढ गये। जिस टावर से वह कूदने की धमकी देते रहे वहाँ ऐसा सुरक्षा घेरा बना है कि मैरियानो के फरिश्ते भी नही कूद सकते। कूद भी जाते तो दस पँद्रह फुट नीचे प्लेटफार्म पर गिरकर ज्यादा से ज्यादा हाथपैर कि हड्डी तुड़ा बैठते। पर जब दमकल वालो ने उन्हे जबरन नीचे उतारने के लिए सीढीयाँ लगाई तो जय भैया, यानि कि मेयर जान स्ट्रीट जिनकी गरदन पर खुद एफबीआई वालो का शिकँजा है, नमूदार हुए। जाने क्या उन्होनें वीरू को समझाया कि वीरू भाई नीचे आ गये। हाल-फिलहाल अपने वीरू भाई फिलाडेल्फिया के मानसिक चिकित्सालय मे अवसाद का ईलाज करा रहे हैं। जिस तरह से बालीवुड वाले हालीवुड से प्रेरणा लेते रहते हैं, उसी तरह से फिलाडेल्फिया के नेताओं ने हमारे बालीवुड की फिल्म शोले से स्टंट की प्रेरणा ले डाली है। अगर यह प्रेरणाचक्र आगे घूम कर कहीं भारत पहुँच गया तब तो हर शाख (इमारत) पे उल्लू (नेता) बैठ जायेगा। क्योकिं अपने यहाँ सारे नेता तो रिक मैरियानो के भी उस्ताद है। ऐसे में ऊँची अट्टालिकाओ की कमी पड़ सकती है और नेताओ में जाँच से बचने के लिए ऐसी ईमारतों पर चढने के लिए मारामारी भी हो सकती है। भारत सरकार को अब शाँति भँग होने से बचाने के लिए सभी ऊँची इमारतों की छते सील कर देनी चाहिए।

11 October 2005

जब हम जवाँ होंगे! जाने कहाँ होंगे?


एक दिन कुछ पुरानी फोटो पलटते हुऐ अपने बचपन को फिर से देखा तो इस पुराने गाने के बोल याद आ गये। याद तो और भी बहुत कुछ आया पर एक बात जो ख्याल बन कर जहन से चिपक गयी कि कानपुर की उन गलियों में रँग बिरंगी पापिन्स की गोलियाँ चूसते, एगफा कैमरे से श्वेत श्याम तस्वीर बिरहाना रोड के स्टूडियो में खिंचवाते, रविवार की छुट्टी चिड़ियाघर में बिताते , पिताजी के लेम्ब्रेटा स्कूटर के हेंडिल पर आगे ठुड्डी टिका कर घूमते, बिरहाना रोड और माल रोड की चकाचौंध को देखते, प्लास्टिक की गेंद को प्लास्टिक के बल्ले से पीटते, चाचा चौधरी और साबू के कामिक्स पढते हुऐ हमने कभी नही सोचा था कि कभी अपने उम्र के टुकड़े को हम हजारों मील दूर बैठ कर अत्याधुनिक तकनीकि से विश्चजाल पर चस्पां करेंगे। हम यह भी सोच रहे कि अगर हम अपनी इस उम्र के टुकड़े को वापस पाकर जिस तरह नोस्टालजिक हुए, इस चित्र के बाकी दो नमूने अपनी उम्र में ऐसी ही परिस्थिति आने पर क्या करेंगे? पता नही आज से बीस बरस बाद वैश्वीकरण के दौर में नोस्टालजिया नाम की चीज का नामोनिशां भी बचेगा कि नही? तकनीक, किंग आफ प्रशिया और कानपुर के बीच की दूरियाँ पाट देगी, शायद आर्थिक अँतर भी मिट जायें और जब आज मुझे अस्सी नब्बे के दशक वाला कानपुर सिर्फ सपनों मे दिखता है तो शायद सामाजिक अँतर भी तब तक मिट ही जायेगा। उस उम्र में शायद सब कुछ हैलोवीन के पंपकिन सरीखा होगा , खोखला। आज एक औसत अमरीकी को पूछो तो शायद ही कोई बता सके कि क्यों वह घर के बाहर नेटिविटी वाले खिलौने सजाता है , क्यो नारंगी कद्दू को काटके उसमें रोशनियाँ लगाता है , क्यों क्रिसमस पर खुशियाँ मनाता है, शायद इसलिये कि वार्षिक छुट्टी होती है, वार्षिक सेल लगी होती बस ! इससे ज्यादा जानकरी ढूढो तो खोखला कद्दू। वही कुछ भारत में भी हो रहा है, सब कुछ पैकेज्ड। हो रहा है वही कुछ पर धीरे धीरे, हमें होली के रंग , दीवाली के पटाखे तो याद हैं पर अब नही दिखता तो होली में घरों मे बेसन के लड्डू का बनना , लोगो का टोली बनाकर घर घर जाना, होली पर हास्य कवि सम्मेलन का होना। सब कुछ अब रस्मी सा क्यों लगने लगा है। अब तो होली दिवाली के ऐनीमेटेड कार्ड ईमेल पर देखकर भी झुँझलाहट होने लगी है उन यंत्रमानवों पर जो बाकी पूरे साल की तरह इन दो महापर्वो पर भी दो घड़ी बात करने की फुरसत नही निकाल सकते।


हैलोवीन के कद्दू

इस मशहूर गजले को याद करते हुऐः
दौलत भी ले लो यह शोहरत भी ले लो
कोई लौटा दे मुझको वह बचपन का सावन,
वह कागज की किश्ती वह बारिश का पानी!


कुछ लाईनें आज के परिप्रेक्ष्य में सूझी हैं:
टीवी भी ले लो यह डीवीडी भी ले लो,
भले तोड़ डालो तुम इस कंप्यूटर का मानीटर
मगर लौटा दो मुझको मेरा स्कूल का बस्ता
वह पापिन्स की गोली, वह साबू की कहानी