देखिये मेरा पहली (असली) वीडियो प्रविष्टि
यह वीडियो मैने वर्ष २००४ में लास वेगास में लिया था। एक जोकर की हरकते देख कर चारू खुश है जब्कि बाँके जी (नेपथ्य में) बुक्का फाड़ कर रो पड़े।
यह वीडियो मैने वर्ष २००४ में लास वेगास में लिया था। एक जोकर की हरकते देख कर चारू खुश है जब्कि बाँके जी (नेपथ्य में) बुक्का फाड़ कर रो पड़े।
एलेनटाऊन में स्वामीनारायण संप्रदाय का भव्य मँदिर है। यहाँ हाल में जाना हुआ। नटखट टोली ने एक से बढ़कर एक पोज देने की ठान रखी थी। इन तस्वीरो को प्रायोगिक तौर पर वीडियो शो में परिवर्तित करके पेश करने की एक कोशिश की है। अगर इस वीडियो को पाठकगण बिना किसी असुविधा के देख सकते है तो फिर अपनी वीडियोग्राफी के नमूने भी पोस्ट करूँगा।
प्रिंटमीडिया से पश्चिमी देशो में युवावर्ग का मोहभंग होता दिख रहा है।
यहाँ किये गये शोध बताते है कि अधिकतर युवा समाचार या तो टीवी के माध्यम से सुनते है या फिर इंटरनेट के माध्यम से। वैसे इस विषय पर महाग्रंथ लिखे जा सकते हैं और लँबि लँबि बहसे आयोजित हो सकती है पर इस दिशा में एक आर्केडिया विश्वविद्यालय में एक अनूठा शोध किया गया। यहाँ यह पाया गया कि कई बड़े अखबारो जैसे न्यूयार्क टाईम्स या फिर बोस्टन ग्लोब जैसे अखबारो से युवा पाठक वर्ग के मोहभँग का कारण इन अखबारो द्वारा मुख्य वैचारिक स्तंभो में युवावर्ग की भागीदारिता की सरासर उपेक्षा है। ऐसा नही कि युवावर्ग को अखबारो में प्रतिनिधित्व नही मिलता। पर ज्यादातर खेल, मनोरंजन और शापिंग जैसे स्तंभ ही आरक्षित होते हैं युवावर्ग के प्रवेश के लिये। एक प्रयोग के तौर पर गँभीर राजनैतिक सामाजिक विषयों पर जब इस विश्वविद्यालय के छात्रों को लेख लिखने को दिये गये तो इन युवाओं की विचारों की पैठ और परिमार्जित भाषा ने समीक्षको को चकित कर दिया। अब फिलाडेल्फिया इंक्वायरर सरीखे अखबार अपने वैचारिक स्तंभो में बुजुर्ग लेखकों के साथ युवाओं को भी प्रमुखता से स्थान दे रहे हैं। इससे युवावर्ग का प्रिंटमीडिया जुड़ाव कुछ बढ़ा है। ब्लागमँडल ने भी एक समानाँतर मँच की व्यवस्था कर दी है। अब देखना है कि भारत जहाँ साठ बसँत देख चुके नेता भी युवा समझे जाते हैं वहाँ का मीडिया इस ब्लागमँडल की बढ़ती आँधी का किस तरह मुकाबला करता है?
साथ ही देखिये अखबारों से जुड़ी कुछ मजेदार तस्वीरें:
जनाब कानपुर या फिर भारत का कोई भी शहर हो, वहाँ लोगबाग गुम्मा हेयर कटिंग सैलून में गुम्मे पर बैठकर बाल कटाने से लेकर फेसियल मसाज के चोंचलों तक की यात्रा कर चुके हैं।
पहली बार फेसियल मसाज सुनकर कई कौतुहूल जागते हैं। शायद मशहूर व्यंग्यकार केपीसक्सेना कुछ यूँ कहते फेसियल के बारे में "अमाँ, यह सब तो उन औरतों के शौक हैं जो बुढ़ापे से ढीली पड़ती खाल को फेसियल की इस्तरी से कड़क बनाये रखना चाहती हैं। अमाँ कभी देखा है चेहरे पर आटे की परत लपेटे आँखो पर कटे खीरे के टुकड़े चपकाये उन औरतो को । बाखुदा बड़ा खौफनाक मँजर दिखता है। अजी लाहौल भेजिये इन चोंचलो को। खुदा गारत करें इन नाईयों को अच्छे खासे खानदानी चँपी के हुनर से किनाराकशी कर रहे हैं। आजकल के मर्दो को भी जाने क्या फितूर सवार है, मालिश-चँपी कराना छोड़कर चेहरे के खाल यूँ रगड़वाते हैं जैसे धोबी पायजामा निचोड़ रहा हो।"
खैर सक्सेना जी के विचारों और गुम्मा हेयर कटिंग सैलून से याद आती है वह वारदात जो ठीक दस साल पहले हम पर गुजरी। जनाब उस दिन हमारी शादी भी हुई थी। पर शादी की घोड़ी चढ़ने से पहले क्या हुआ यह राज बहुत कम को मालुम है। हमारी बीबी को कभी कभी शक हो जाता है कि हमारी शायद कोई माशूका वगैरह थी। शायद उसके न मिल पाने के गम में हम अपनी ही शादी में मजनू सरीखे दिख रहे थे। हमारी दाढ़ी तक नहीं बनी थी और शक्ल कुछ यूँ दिख रही थी कि गोया किसी ने पाँच-दस तमाचे रसीद किये हों। शादी के दौरान हमारी श्रीमती जी को उनकी भाभी ने कोंचा भी कि नौशा मियाँ इतने गमजदा क्यों दिख रहे हैं ? बाद में श्रीमती जी ने भरसक कोशिश की यह पता लगाने की कि वह कौन सी बेवफा थी जिसके गम में हमने सूरत लटका कर उनकी शादी के अलबम का सत्यानाश कर दिया। हमारी गैरमौजूदगी में हमारी तथाकथित डायरी तलाशने की कोशिश भी की। उनके शक को मेरे कुछ मसखरे चचेरे भाईयों ने यह कहकर भी पुख्ता करने की कोशिश की कि भाई बड़े दिलफेंक किस्म के हैं जरा सँभाल के रखियेगा। हलाँकि हमने भी उन्हें असल वजह नही बतायी तो नही बतायी। अमाँ अपना फजीता थोड़े ही कराना था। पर अब इंडीब्लागीज का तँबू फिर से तन गया है तो हमने भी सोचा कि दस साल से दफन इस राज को बेपर्दा कर ही दिया जाये एक हाल आफ फेम पोस्ट के जरिये। किसी भी सूरतेहाल में एशेज को अपने कब्जे में रखने की कोशिश करने में क्या हर्ज है?
तो जनाब इस किस्से के मुख्य किरदारों से आपका परिचय करा दिया जाये।
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श्रेणी:
व्यंग्य