अवकाश
प्रिय पाठकों व साथियों
कुछ अति महत्वपूर्ण योजनाओं को पूर्ण करने हेतु लेखन से अवकाश लेने का निर्णय लिया है। फुरसत मिलने पर रोजनामचा फिर हाजिर होगा। तब तक के लिये विदा। अब तक मेरे लेखन को प्रोत्साहन देने के लिये आप सबका मैं तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ।
सादर
अतुल


एक वर्ग जाहिर तौर पर ऐसे अभिभावकों का है जो बच्चों के उधम से तँग आकर कुछ देर कि हवाखोरी के लिये बाहर आते हैं या फिर जिन्हें सवेरे सवेरे काम पर जाते हुये बच्चों को डे-केयर छोड़ना होता है। जाहिर है बच्चा तो सबेरे अपनी रात भर में इकठ्ठा ऊर्जा को कहीं तो खर्च करेगा। ऐसे अबिभावक सोचते हैं कि क्या उनका सबेरे की एक प्याला चाय पर भी हक नही? आखिर बच्चो को कितना रोका जाये? अगर वे न रूके तो आखिर वे क्या कर सकते हैं?" किसी ने इसका भोले से सवाल का बड़ा करारा जवाब लिखा है
एक और विचार देखिये इस विषय पर "बच्चो के साथ आप अपने हर कहीं जाने की स्वतँत्रता कुछ हद तक खो देते हैं। आपकी आजादी इन छोटे पर अनिश्चित प्रकृति के इँसानो पर निर्भर करती है। अब या तो आप इन अनिश्चित प्रकृति के इँसानो के व्यवहार को सार्वजनिक स्थल पर नियंत्रित रखे या फिर वे आपके स्वेछाचरण को नियंत्रित करेंगे।