20 December 2005

अवकाश

प्रिय पाठकों व साथियों
कुछ अति महत्वपूर्ण योजनाओं को पूर्ण करने हेतु लेखन से अवकाश लेने का निर्णय लिया है। फुरसत मिलने पर रोजनामचा फिर हाजिर होगा। तब तक के लिये विदा। अब तक मेरे लेखन को प्रोत्साहन देने के लिये आप सबका मैं तहेदिल से शुक्रगुजार हूँ।

सादर
अतुल

14 December 2005

अनुगूँज १६: (अति)आदर्शवादी संस्कार सही या गलत?


साथी चिठ्ठाकारो के विचार जानने से कुछ ऐसा विचार उभरता दिख रहा है कि मानो हमें बचपन में राजा बेटा बनने की घुट्टी जबरन पिला दी गयी हो। हमें तो मुन्ना भाई बनना चाहिये था। मेरे ख्याल से कमी वहाँ शुरू होती है जहाँ हम गाँधीवाद का पालन करते करते भीरू बन जाते हैं। कुछ उदाहरण काफी हैं:


  • बचपन से सिखाया जाता है कि एक अच्छे नागरिक को पँक्तिबद्धता का पालन करना चाहिये। जब हम किसी मुन्ना भाई या रामखिलावन सरीखे किसी छुटभैये नेता को राशन या टिकट खिड़की की लाईन को अँगूठा दिखाते दिखते हैं तो कहाँ चला जाता है समाज का आदर्शवाद। क्यों दिखाते हैं हम अत्याचारी को अपना दूसरा गाल एक और चाँटा मारने के लिये। अमेरिकी वालमार्ट की तरह इन लोगो की सामाजिक धुलाई क्यो नही कर देते।
  • कालेज में एडमिशन के लिये घूस का रोना रो सकते हैं पर एक विरोध प्रदर्शन करने में नानी क्यों मरती है हमारी?
  • नेताओं के भ्रष्टाचार पर रोना मचाते है तो फिर क्यों वोट देते समय जाति देखते हैं, तब कहाँ चला जाता है हमारा आदर्शवाद।

कुल मिलाकर मुझे लगता है कि कमी आदर्शवाद के पालन में नही उसके अधूरे पालन में है। सिर्फ एकला चलो नीति से भला होने वाला नही हमारे समाज का। एक और बात जो मुझे अब तक याद है "कि जैसे जैसे समाज में बेईमानो की बढ़ोतरी होगी, ईमानदारों की कीमत बढ़ती जायेगी।"

07 December 2005

क्या आपकी स्वतँत्रता भी किसी के हाथों बँधक है?


शिकागो के डैन मकॉली ने अपने सिर्फ उज्जड् बच्चों के नासमझ अभिभावको को खबरदार करने के लिये एक चेतावनी लगायी थी। यह अब उनके लिये चाहे अनचाहे एक शोहरत का सबब बन गयी है। दूर दूर से उन्हे इस कदम के लिये जहाँ बधाईयाँ भी मिल रही है वहीं अभिभावकों के कुछ सँघ कभी कभार उनके रेस्टोरेंट के बाहर जिंदाबाद मुर्दाबाद भी कर देते हैं।
दरअसल मकॉली सिर्फ यही चाहते थे कि उनके ग्राहकों को सबेरे कि चाय कॉफी कुछ सुकुन के साथ मयस्सर हो सके। कभी कभी कुछ ऐसे अभीभावक भी ग्राहको में शामिल होते हैं जो खुद को तो अखबार के पीछे छुपा लेते हैं और उनके उद्दँड बच्चे हुड़दँग मचा मचाकर बाकी लोगो की सुबह खराब कर देते हैं। डैन मकॉली ने अपने रेस्टोरेंट "टेस्ट आफ हैवान" के बाहर एक पोस्टर चिपका दिया जिसमें लिखा था कि "हर उम्र के बच्चों को यहाँ अनुशासित रहना होगा और नीची आवाज प्रयोग करनी होगी।" वैसे डैन मकॉली की बच्चों से कोई दुश्मनी नही है, उन्हे सिर्फ उन अभिभावको से परेशानी है जो अपने बच्चों का समुचित ध्यान नही रखते। उनके इस कदम से साफ तौर पर दो अभिमत तैयार हो गये हैं। एक वर्ग जाहिर तौर पर ऐसे अभिभावकों का है जो बच्चों के उधम से तँग आकर कुछ देर कि हवाखोरी के लिये बाहर आते हैं या फिर जिन्हें सवेरे सवेरे काम पर जाते हुये बच्चों को डे-केयर छोड़ना होता है। जाहिर है बच्चा तो सबेरे अपनी रात भर में इकठ्ठा ऊर्जा को कहीं तो खर्च करेगा। ऐसे अबिभावक सोचते हैं कि क्या उनका सबेरे की एक प्याला चाय पर भी हक नही? आखिर बच्चो को कितना रोका जाये? अगर वे न रूके तो आखिर वे क्या कर सकते हैं?" किसी ने इसका भोले से सवाल का बड़ा करारा जवाब लिखा है

आप बहुत कुछ कर सकते हैं। आपको रेस्टोरेंट , सिनेमा या सार्वजनिक स्थल पर अपने बच्चों की देखरेख को अपने व्यक्तिगत आनँद के ऊपर वरीयता देनी चाहिये। आपको शर्म महसूस करनी चाहिये अगर आपकी देखरेख बेअसर हो जाती है। आपको अपनी शर्मिंदगी को बच्चों को आज्ञाकारी बनाने में खर्च करना चाहिये। अगर आपके बच्चे "नीची आवाज में बोलो" जैसा सीधा और स्पष्ट निर्देश भी न समझ सकें तो अपना सामान और बच्चे बटोर कर वहाँ से फूट लीजिये।

एक और विचार देखिये इस विषय पर "बच्चो के साथ आप अपने हर कहीं जाने की स्वतँत्रता कुछ हद तक खो देते हैं। आपकी आजादी इन छोटे पर अनिश्चित प्रकृति के इँसानो पर निर्भर करती है। अब या तो आप इन अनिश्चित प्रकृति के इँसानो के व्यवहार को सार्वजनिक स्थल पर नियंत्रित रखे या फिर वे आपके स्वेछाचरण को नियंत्रित करेंगे।

मुझे इस रोचक खबर पर एक किस्सा याद आ गया। अपने पुराने मित्र दारजी का और हमारा परिवार पोकोनस पर्वत पर स्थित एक झरना देखने गये थे। बड़े बच्चे पूरी तीन मील की हाईकिंग करने को मचल गये। हम भी उनके पीछे पीछे वजन घटाने के लालच में चल पड़े। दारजी बराबर अपने छोटे पुत्तर के पीछे लगे थे जिसका ध्यान घूमने में कम और पानी में पत्थर फेंकने में ज्यादा था। तीन चौथाई रास्ता तय करने के बाद सब कुछ सुस्ताने को बैठ गये। दारजी को गुमसुम देख उनकी श्रीमती जी बोली "आप चुप क्यो बैठे हैं? एन्जवाय नही कर करे क्या?" दारजी फट पड़े " अगर एन्जवाय करूँ तो डाँटोगी कि बच्चे को क्यो नही देखते , बच्चे को देख रहा हूँ तो तकलीफ है कि एन्जवाय क्यो नही कर रहा? हद है यार, मतलब यह हुआ कि एक तरफ जाये तो दो तमाचे पड़ेंगे, दूसरी तरफ जाओ तो तीन तमाचे । आखिर जाऊँ किधर?" मैने चुहल की "जिधर कम पड़े उधर।" दारजी हँसते हुये बोले "यार यही तो नही पता रहता महिलाओ के साथ। " दारजी की पत्नी बोलीं "अगर शादी के दस साल बाद भी आपको यह नही पता कि किस तरफ के रास्ते में ज्यादा तमाचे पड़ेंगे तो आप हमेशा ऐसे ही उलझन में रहोगे और ज्यादा पेनाल्टी खाओगे।"

01 December 2005

ग्रान्ड कैनियन

देखिये , आसमान से लिया कोलोरेडो नदी का विहंगम दृश्य साथ ही ग्रान्ड कैनियन का वीडियो। काफी सुँदर नजारा दिखा वहाँ। नदी के हजारो वर्ष पहले रास्ता बदल लेने से पहाड़ पर बने कटावो के मनोहारी दृश्य बन गये हैं। तलहटी में जाने पर पूरा दिन लगता है और रात वही बितानी होती है साँय साँय करती हवाओ की आवाज के दरमियाँ।