20 November 2006

गोविंदा, सलमू और अक्की को चुनौती देने आया मेंबले !

पिछले सप्ताहांत पर बाँके बिहारी हैप्पी फीट देखने को पसड़ गये। आमतौर पर अपनी कोशिश यह रहती है कि ऐसे मौको पर बालगोपालमँडली को उनकी माँ के कार्टून देखने छोड़कर हम ऐसी कोई फिल्म देखना पसंद करते हो जिसे देखने में घर में बाकी सबकी फूँक सरकती है यानि कि हारर या जबरदस्त एक्शन। मल्टीप्लेक्स में पिक्चर देखने के यह फायदे है। पर इस बार कोई धाँसू विकल्प न होने से हैप्पी फीट देखनी पड़ी।
पर अपनी राय यह बनी कि मौका लगे तो जरूर देखी जाये यह फिल्म। कहानी शुरू होती है इस फिल्म के नायक श्रीमान मेंबले के माता पिता मेम्फिस और नोर्मा जीन नाम के पेंग्विन्स के संगीतमय मिलन से। चौंकिये मत, गा बजाकर प्रेमियों को रिझाने की कला पर सिर्फ बॉलीवुड का पेटेंट नही है। हर पेंगविन्स के लिये दिल से गाना आना जरूरी है। अब नोर्मा जीन तो चल देती है मछली के शिकार पर और रात भर अँडा सेंकने की ड्यूटी लगती है मेम्फिस साहब की। यह भी अँटार्कटिका के पेंगविन्स की जीवनशैली का अटूट नियम है। इनके चूजे अपनी माँ को तड़ से पहचान भी लेते हैं। पर लोचा यह हो जाता है कि मेम्फिस मियाँ जो रात्रिकाल में बाकी सब पेंग्विन्स के साथ भैरवी आलाप रहे थे अँडा कुछ देर के लिये खो बैठते हैं। शायद उसका असर था या कुछ और कि उनकी संतान मेंबले नाचते हुये अँडे से बाहर आती है।
अब इस कहानी में ट्रैजेडी भी है, ड्रामा भी और इमोशन भी। बेचारा मेंबले नीली आँखो वाला खूबसूरत पेंग्विन है पर सबसे सुरीले माँ बाप की निहायत ही बेसुरी संतान। बेचारे को ग्रेजुऐशन डे पर डिग्री नही मिलती। वह बात अलग है कि वह गजब का नचैया है , यार अपने गोविंदा को भी मात करता है । मेंबले का दिल भी आना था तो सबसे सुरीली ग्लोरिया पर। मेंबले को कुछ हिप हाप गाने वाले दोस्तों की टोली मिल जाती है। हिप हाप गायक एडले एमिगो और मेंबले की ताल मचा देती है पेंगविन्स की महफिल में धमाल। पर जैसा हर हिंदी पिक्चर में होता है , समूह के मुखिया नोहा को मेंबले की टोली के यह तौर तरीके सीधे सीधे संस्कृति पर हमला लगते हैं और वह उन्हे पंचायत के साथ मिलकर समूह निकाल दे देता है।

बेचारा मेंबले वहाँ से निकलकर टकराता है एडले एमिगो के धर्मगुरू लवलेस से। अब लवलेस ऐसा इकलौता पेंग्विन है जिसने साक्षात एलियन्स यानि की दूसरी दुनिया के लोगो को देखा है। यह धर्मगुरू भी भारतीय धर्मगुरूओ की तरह बिना दक्षिणा के कुछ नही बताता। उसका ब्रह्मवाक्य है "एक पेबल दो, एक सवाल का जवाब पाओ।" पेबल संगमरमरी पत्थर को कहते हैं जिस पर बैठना लवलेस को पसंद है।

यही सारा वितंडा शुरू होता है, मेंबले को लगता है कि उसके पेंग्विन समूह की इकलौती परेशानी यानि की भोजन सामग्री में होती कमी के पीछे एलियन्स ही जिम्मेदार हैं। मेंबले पूछता है लवलेस से कि क्या एलियन्स समझाने से मान जायेंगे? लेकिन लवलेस मियाँ की एलियन्स के दिये उपहार में अटकी गर्दन से आवाज ही नही निकलती। दरअसल यह एलियन्स कोई मँगल गृह के प्राणी नही आप और हम यानि कि मानव हैं, और लवलेस के गले में अटका दुलर्भ हार वस्तुतः कोक के केन को फँसाये रखने वाला प्लास्टिकनुमा छल्ला है। अब मेंबले , लवलेस और एडले एमिगो की टीम निकल पड़ती है एलियन्स से मिलने के जीवट अभियान पर। रास्ते में कुछ सील मछलियाँ और व्हेल से हुई भिड़ंत पूरा आईमैक्स थियेटर हिला देने को काफी थी।
जुझारू मेंबले एलियन्स के पानी के जहाज के पीछे तैरता अकेला ही पहुँच जाता है न्यूयार्क सिटी। पर परिस्थितियाँ उसे एक चिड़ियाघर में पहुँचा देती है। अपने पेंगविन कुल के लिये परेशान मेंबले चिड़ियाघर आने वाले हर एलियन्स यानि की मानव से गुजारिश करता है कि हमारे भोजन को हमसे मत छीनो हम मिट जायेंगे पर उसकी भाषा कोई नही समझता। इकोसिस्टम को बिगाड़ने पर अमादा इंसान शायद ऐसी मर्मस्पर्शी तरीके से कुछ समझ सके।

यही एक छोटी लड़की को मेंबले मियाँ अपना टैप डाँस क्या दिखाते है कि पूरे न्यूयार्क में चिहाड़ मच जाती है। विज्ञानीजन मेंबले की पीठ में सेंसर बाँध कर उसे वापस अँटार्कटिका भैज देते हैं। वह अपने परिवार से मिलकर बहुत खुश होता है और सब मिलकर डाँस करते है बिल्कुल दिलीप कुमार वाले "कोई मेरे पैरो में घुँघरू बँधा दे .." जैसा। नोहा फिर खरीखोटी सुना ही रहा होता है कि एलिय्नस यानि कि मानव टपक पड़ते हैं । नोहा कोई और चारा न देख मेंबले को टैप डाँस करने को बोलता है। सारे पेंग्विन नाचते हैं और विज्ञानीजन अँदाज लगाते है कि पेंग्विन कुछ कहना चाहते हैं। बात बढ़कर यूनाईटेड नेशन पहुँची और अँटार्कटिका में मछिलयो के शिकार पर प्रतिबँध लग जाता है।
वार्नर ब्रदर्स की इस अजीमोशान पेशकश की समाप्ति के बाद देखा कि हाल में पिक्चर देखने आये दर्शक बच्चे ही नही साठ साठ साल के बूढ़े भी थे। हॉल के बाहर मजाल है कि कोई भी बच्चा बिना टैप डांस करते न निकला हो। यह सब देखकर सोच रहा था कि अब वार्नर ब्रद्रस हॉल के अलावा बच्चो के टीशर्ट , कप प्लेट , खिलौने यहाँ तक कि चढ्ढी बनियान पर मेंबले की तस्वीर छाप-छाप कर नोट बनायेगी जब्कि बॉलीवुड के निर्माता सरकार के सामने कटोरे फैलायेंगे कि सबसिडी दो अगर बच्चो की फिल्म बनवानी है तो। यार यहाँ जार्ज मिलर ने खेल खेल में सामाजिक महत्व का संदेश भी दे दिया और अपने बॉलीवुड के नकलटिप्पुओं को सत्तर के दशक की कहानियों की मय्यत निकालने से फुर्सत नही। चालीस पचास साल में कितनी बाल फिल्में बनायी हैं हमने ? सफेद हाथी, शिवा का इंसाफ,छोटा चेतन और मकड़ी। इसमें से सफेद हाथी को छोड़कर अपन को तो मनोरंजन में लपेटकर संदेश देती और कोई फिल्म नही लगती।
हैप्पी फीट के एनिमेशन गजब के हैं और व्हेल से पिंड छुड़ाते मेंबले और लवलेस के सीन में ध्वन्यात्मक प्रभाव हैरतअँगेज। धरती के इस कोने में हर क्षण अंगहिलाते रहना पेंग्विन की मजबूरी है क्योंकि ऐसा नही करने पर खून जम जाता है, पर इस गहन बात को एक सुरीली रात के दृश्य से समझाया गया है और नन्हे मुन्ने यह आसानी से समझ जाते है कि पेंग्विन्स के रात भर गा गाकर मनाने से ही अँधियारे मे छुपा सूरज निकलता है। हिपहाप गायक एडले एमिगो की अलग बस्ती और उनके नाच पर नोहा का नाक भौं सिकोड़ना सूक्षम्ता से दर्शाता है कि गोरो के दिमाग से रंगभेद अभी गया नही।

18 October 2006

हद है बेशर्मी की

इस खबर को पढ़कर तो यही लगा। कुछ भारतीय विद्यार्थी धरे गये, चैट बोर्ड के जरिये अल्पव्यस्क बच्चों के साथ यौनाचार करने की कोशिश में । जब धरे गये तो उनके रिश्तेदार स्यापा कर रहे हैं कि उन बेचारों को यहाँ के कायदे कानून ठीक से नही मालूम। बिना सोचे समझे वे पुलिस द्वारा कहे जाने पर किसी भी कागज पर हस्ताक्षर कर देते हैं। इन बेचारो को पहले साल भर की जेल होगी फिर जबरन भारत पार्सल कर दिया जायेगा। भला एक ऐसे अपराध जो इन बेचारो ने किया ही नही उसकी इतनी बड़ी सजा?

बात सही भी है, भारत में कानून की इज्जत करना किसी ने सिखाया नही, अल्पव्यस्क से यौनाचार सजा लायक जुर्म है ये इन विद्यार्थियो को पता ही नही। शठे शाठ्यम समाचरेत की नीति हम भूल चुके हैं, हम भूल चुके हैं कि हर दुष्कर्म की सजा निश्चित है पर दूसरे तो नही भूले। क्या कहना चाहता है रेडिफ? होना तो चाहिये था कि ऐसी हरकत करने वालो की प्रताड़ना छपती, पर छप क्या रहा है? दोषियों के रिश्तेदारो का क्रंदन? क्या ऐसी खबर पढ़कर आँखो से वासना टपकाता "मैं तो नन्हा सा भोला सा बच्चा हूँ" गाता शक्ति कपूर का चरित्र नही याद आता ?

15 September 2006

दो मजेदार तस्वीरें

१२ साल के परवेज खान अपनी दुकान से लादेन के पोस्टरों को रूखसत कर रहे हैं दो वजहों से। पहली पुलिस डँडा बरसाती है ऐसे पोस्टरों से , दूसरे अब भारतीय अभिनेत्रियों के पोस्टरों के खरीदार बढ़ गये हैं।



जनाब यह तो महज एक मूर्ती है, यह ऐसा कुछ नही करेगी कि इसकी इस तरह सरेआम धुलाई हो। वह तो मार पड़े मौसम को, जो काई जमा देता है। केनसास में "विचारक" नाम की इस मूर्ती पर मौसमरोधी लेप चढ़ाया जा रहा है बस!

06 September 2006

शराफत अली को शराफत ने मारा!

हमारे एक मित्र हैं मियाँ शराफत अली। बहुत दिन से अकुला रहे थे कि हिंदुस्तान में उनकी हुनरमंदी की बेकदरी हो रही है और इसी के चलते वहाँ कोई तरक्की नही हो रही । शराफत अली की हमने भी मदद की बहुत कोशिश की कि उन्हें भी अमेरिका में कुछ काम मिल जाये। अभी पिछले हफ्ते मामूगिरी करने वाले एक मित्र की मदद से शराफत अली का इंटरव्यू कराया गया। यहाँ यह बता देना जरूरी है कि यह मामू सुबह हो गई वाले मामू नही हैं , इन मामुओं पर आगे रोशनी डाली जायेगी। अब नौकरी के लिये जो प्रश्न पूछे जाते हैं उन सबके स्टैंडर्ड,रेडिमेड जवाब दुनिया भर के जालस्थलों मे मिल जाते हैं। पर जनाब शराफत अली की सोच अलहदा ही है, जो जवाब उन्होंने दिये, दिल की गहराई से सच्चाई से दिये। अब आप, शराफत अली के टेलिफोनिक इंटरव्यू का मुलाहिजा फरमायें।

प्रश्नकर्ताः आपने इस नौकरी के लिये आवेदन क्यों किया?
शराफत अलीः वैसे तो हमने बहुतेरी नौकरियों के लिये अप्लाई किया था, खुशकिस्मती हमारी कि कॉल आपने ही किया।

प्रश्नकर्ताः आप इस कंपनी में काम क्यों करना चाहते हैं?
शराफत अलीः अब किसी न किसी कंपनी में काम तो करना ही है, जो भी काम दे दे। कोई खास कंपनी का नाम दिमाग में रखकरके ठलुआ तो बैठै नही रहेंगे?

प्रश्नकर्ताः बताईये, आपको ही क्यों चुना जाये इस नौकरी के लिये?
शराफत अलीः आपको किसी न किसी को चुनना ही है, हमको भी आजमा के देख लीजिये।

प्रश्नकर्ताः अगर आपको नौकरी मिल जाये तो क्या करेंगे?
शराफत अलीः अब यह मूड और समय के हिसाब से तय होगा कि हम क्या करेंगे।

प्रश्नकर्ताः आपकी सबसे बड़ी ताकत क्या है?
शराफत अलीः साहब , किसी ऐसी कंपनी को ज्वाईन करना ही हमारी सबसे बड़ी हिम्मत का सबूत है जिस कंपनी की तकदीर का हमें ओर छोर न दिखता हो।

प्रश्नकर्ताः और आपकी सबसे बड़ी कमजोरी?
शराफत अलीः जी , लड़कियाँ।

प्रश्नकर्ताः आपकी सबसे गँभीर गलती क्या रही है और आपने उससे क्या सीखा?
शराफत अलीः पिछली कंपनी को ज्वाईन करना। उससे मैने यह सीखा कि ज्यादा तनख्वाह के लिये नौकरी बदलते रहना चाहिये, तभी तो मैं आपसे मुखातिब हूँ।

प्रश्नकर्ताः आपकी पिछली नौकरी में आपकी सबसे बड़ी कौन सी उपलब्धि थी जिस पर आप गर्व कर सकते हैं?
शराफत अलीः जनाब, पिछली नौकरी में मैने कोई तीर मारा ही होता तो उनसे तरक्की की माँग के वहीं न टिक गया होता, काहे को खामखाँ आपके सवालो का जवाब देकर अपना और आपका वक्त जाया कर रहा होता ?

प्रश्नकर्ताः एक चुनौतीपूर्ण स्थिति का उदाहरण देकर बताईये उससे कैसे निपटेंगे?
शराफत अलीः सबसे ज्यादा मुश्किल है इस सवाल का जवाब देना कि "आप नौकरी क्यों बदलना चाहते हैं?" और इससे निपटने को मुझे हजार तरह के झूठ बोलने पड़ते हैं।

प्रश्नकर्ताः आपने पिछली नौकरी क्यों छोड़ रहे हैं?
शराफत अलीः उसी वजह से, जिस वजह से आपने अपनी पिछली नौकरी छोड़ी होगी।

प्रश्नकर्ताः आप इस नौकरी से क्या अपेक्षा रखते हैं?
शराफत अलीः अगर ज्यादा काम न दिया जाये पर तरक्की मिलती रहे।

प्रश्नकर्ताः आपके क्या लक्ष्य हैं और उन्हें पाने को क्या तैयारी कर रहे हैं?
शराफत अलीः ज्यादा पैसा बनाना और उसके लिये हर दो साल में कंपनी बदलना।

प्रश्नकर्ताः आपको हमारी कंपनी के बारे में कैसे पता चला और आप इसके बारे में क्या जानते हैं?
शराफत अलीः मुझे पता था आप यही पूछेंगे, मैं आपकी कंपनी की बेबसाईट सत्ताईस मर्तबा देख चुका हूँ।

प्रश्नकर्ताः आप कितनी तनख्वाह की उम्मीद रखते हैं ?
शराफत अलीः जनाब बिना बढ़ोत्तरी के कौन नौकरी बदलता है? आप तो जो जमाने का दस्तूर है उसके हिसाब से मेरी हालिया तनख्वाह से २० फीसदी ज्यादा दे दीजिये मैं कल से काम पे हाजिर हो जाऊँगा।

शराफत अली इस आखिरी सवाल पर मन में सोच रहे थे कि "भैंस जब पूछ उठायेगी तो गाना नही जायेगी, गोबर ही करेगी, मुझे पता था कि तू यही सवाल करेगा इसलिये मैने अपने बायोडेटा में पिछली तनख्वाह ३० फीसदी ज्यादा बयाँ की है! "

शराफत अली को इंटरव्यू लेने वाले ने जमाने के दस्तूर के हिसाब से, नतीजा जानने को बाद में संपर्क करने को कहा। अब शराफत अली बाट जोह रहे हैं। और जगहों पर भी अप्लाई कर रहे हैं। अगर आप लोगो की कंपनी में ऐसे साफगोई से बोलने वाले बँदो की कदर हो तो जरूर बताईयेगा।

01 September 2006

कानपुर देखा , आसमान से!

अंतर्मन के रचियता द्विवेदी के सौजन्य से पता चला कि भारत के शहरों के हवाई चित्र गुगल मैप्स पर मौजूद हैं। मैने भी दो चित्र पहचानने की कोशिश की है।

ग्रीनपार्क क्रिकेट स्टेडियम








ऊपर चलता रेलका पहिया
नीचे बहती गँगा मईया यानि कि गँगा पुल!

27 August 2006

महाशक्ति के भग्नावशेष














पेनसिलवेनिया में ऐशलैंड नाम की जगह एक पुरानी कोयले की भूमिगत खदान की यात्रा कथा पेश है। आर्थिक मँदी के दौर में ४० के दशक मे यह खदान बँद कर दी गई थी। अब इसे पयर्टक स्थल की तरह विकसित किया गया है। हलाँकि इसके पहले भारत में उत्तरप्रदेश व मध्य प्रदेश की सीम पर खुली कोयले की खदाने भी देखी हैं पर भूमिगत खदान देखने का कुछ और ही मजा है। वैसे यह खदान पहाड़ के नीचे स्थित है। जमीन में करीब चार सौ फुट नीचे। कोयले की सुरँग बन गयी हैं इसमें। कोयले के खनन से पहाड़ न धसक जाये इसके लिये नसों की तरह क्षैतिज खुदाई की जाती है, करीब तीस चालीस फुट की दूरी छोड़ छोड़ कर।
इस दौरना मीथेन व अन्य जहरीली गैसे की पूर्व चेतावनी देने वाले लैम्प भी देखे। वह कोयले की "नसें" भी देखी। साथ ही यह भी देखा कि जमीन के नीचे चार सौ फुट की गहराई में अत्यंत मँद रोशनी में सँकरी जगह विस्फोटक लगाकर कोयला तोड़ने के लिये खुदाई करना कितना दुरुह कार्य था। विस्फोट के बाद कोयला वैगन में लाद कर खच्चर घसीट कर बाहर लाते थे। खच्चरों का रखरखाव खासा महँगा था। खच्चरों को मारना पीटना उस जमाने में नौकरी की बलि लेने को काफी था।

खदान के बाहर मँदी के दौर के मालिक श्रमिक संघर्षो की दस्तान भी सुनी और मँदी के दौर के भग्नावशेष भी देखे। मँडी के दौर में भुखमरी से त्रस्त खनिकों नें अवैध सुरँगे खोदकर हस्तचालित लिफ्ट बना रखी थी, जिससे कोयला निकला के वे खुले बाजार में बेचते थे। इन सब की परिणिति खानमालिकों की निजी पुलिस से इन श्रमिकों के संघर्ष में हुई। जो भी हो, एक महाशक्ति के उभरने के दौर में इस तरह के किस्से देखने-खोजने को उसकी तहों मे जाना पड़ता है। इस यात्रा से अँकल सैम , महाशक्ति बनने के दौर से कैसे गुजरे सब साक्षात देखा।

09 August 2006

यह अँदर की बात है!


आज सवेरे सवेरे बाँके स्वामी सँवाद और लक्स का टीकू तलसानिया अभिनीत "यह अँदर की बात है!" वाला विज्ञापन एकसाथ याद आ गया। दरअसल रक्षाबँधन के सुअवसर पर बाँके तैयार हो रहे थे और "अँदर की बात" वाली तस्वीर नही दे रहे थे, क्या है कि अब बाँके जी को शर्माना भी आ गया है। जब उनको उनकी प्यारी दीदी ने याद दिलाया कि वे सुपरमैन हैं तो यह झन्नाटेदार पोज मिल गया।

06 August 2006

बूझो तो जाने - कयास अच्छे लगे!


कयास अच्छे लगाये गये। मिर्ची सेठ बहुत पास पहुँच गये। अब इस तस्वीर से शायद मामला साफ हो जाये! अगर भी अब कोई शँका तो समझ लीजिये कि मामला शँका समाधान से संबधित हैं।

04 August 2006

बूझो तो जाने!


क्या आप अँदाज लगा सकते हैं कि यह कलाकृति कहाँ सुशोभित हो सकती है? चलिये आपकौ सुविधा के लिये कुछ टिप्स दे देते हैं
१ सरकारी संग्रहालय
२ व्यक्तिगत संग्रहालय
३ किसी आफिस का प्रतीक्षाकक्ष
४ होटल का चेकइन काउँटर

आप इन विकल्पो में से किसी पर तुक्का लगाईये, वैसे आपके नये तुक्के देखने का आनँद कुछ और ही होगा।

29 July 2006

ताज महल में भी हिंदी का पदार्पण !

जनाब, बात शाहजहाँ के ताजमहल की नही डोनाल्ड ट्रम्प के ताजमहल की हो रही है। यह अटलाँटिक सिटी का प्रसिद्ध जुआड़खाना यानि कि कैसिनो है। इसके पीछे खूबसूरत ब्राडवाक और समुद्र तट है। अक्सर सपरिवार गर्मी के दिनो में जाना होता है। यहाँ एक स्टील पियर भी है जहाँ बच्चो के दर्जनों झूले लगे हैं। इसी के बाहर अन्य भाषाओं के साथ यह सूचनापट मिला पढ़ने को। हर्षमिश्रित आश्चर्य के साथ मन में यह भावना भी आई कि काश आजतक और सहारा समय सरीखे हिंदी समाचार चैनलों के कर्ताधर्ता यहाँ मिल जाये तो उन्हें बोलूँ कि अपने समाचार वाचकों को कृपया यह सूचनापट पढ़वा दें, ताकि हिंदी के नाम पर अधकचरी हिंग्लिश परोसने वालो के ज्ञानचक्षु खुल सकें।

28 July 2006

नौ सौ दास्ताने चुरा के बिल्ली रस्सी पे टँगी!


इनसे मिलिये। नाम है विली , उम्र एक वर्ष , निवास न्यूयार्क का एक घर और शौक पड़ोसियों के दास्ताने चुरा कर मालिक के बरामदे में छोड़ देना। अब बेचारा मालिक पड़ोसियों से झगड़ते झगड़ते आजिज आ गया तो उसने अपने घर के बाहर चुरकट बिल्ली को बाँध दिया और पोस्टर लगा दिया कि जिसका जो दास्ताना हो ले जाये। देख लीजिये आपका भी दास्ताना इस बिल्लो रानी ने तो नही चुराया है।

26 July 2006

कैसे झेलेंगे हम पाकिस्तान का हमला !

प्रस्तुत है रचनाकार में पूर्व प्रकाशित चुटकुला, यह पूर्णतः कल्पना की उपज है, पढ़ें व मज़े लें।

हमेशा की तरह, इस बार भी भारत सरकार को पाकिस्तान की हरकतों पर बहुत गुस्सा आया और उन्होंने कड़े शब्दों में कड़ी चेतावनी जारी करके बलपूर्वक अपना विरोध कोफी अन्नान और जार्ज बुश के दरबार में दर्ज कराकर सो गई। पर किसी शरारती तत्व ने मुशर्रफ के कान भर दिये कि भारत चुपचाप रात में हमला करने वाला है। यह सुनते ही मुशर्रफ ने तुरंत पाकिस्तान की मिसाइल कमांड को भारत पर मिसाइल हमले का हुक्म तामील कर दिया। आगे का घटनाक्रम समयानुसार प्रस्तुत है।

  1. स्थानः पाकिस्तान की मिसाइल कमाँड, समयःरात आठ बजे, गतिविधिः पहली मिसाइल दागने की तैयारी चल रही है।
  2. स्थानः दिल्ली का नेशनल सेक्योरिटी कमाँड सेंटर समयः रात आठ बजकर दस मिनट ,गतिविधिः रक्षा मंत्री, रक्षा सचिव, सहयोगी पार्टियों के नेता , प्रधानमँत्री सब आ चुके हैं और सुपर प्राईम मिनिस्टर का इंतजार हो रहा है।
  3. स्थानः पाकिस्तान की मिसाइल कमाँड, समयःरात आठ बजकर बारह मिनट, गतिविधिः पहली मिसाइल दाग दी गई , मिसाईल दस मिनट में भारत में गिरेगी।
  4. स्थानः दिल्ली का नेशनल सेक्योरिटी कमाँड सेंटर समयः रात आठ बजकर तेरह मिनट ,गतिविधिः रक्षा मंत्री बार बार जवाबी आक्रमण के लिये अनुमति माँग रहे हैं पर रेलमँत्री और वामपँथी एकस्वर में धर्मनिरपेक्षता की दुहाई देते हुये मामले को इंटरनेशनल इस्लामिक काऊँसिल में ले जाने की सलाह दे रहे हैं।
  5. स्थानः पाकिस्तान की मिसाइल कमाँड, समयःरात आठ बजकर पँद्रह मिनट, गतिविधिः पहली मिसाइल बीच हवा में दग गई। कारण इंजन फेल होना। दूसरी मिसाईल दागने के लिये लगाई जा रही है।
  6. स्थानः दिल्ली का नेशनल सेक्योरिटी कमाँड सेंटर समयः रात आठ बजकर सत्रह मिनट ,गतिविधिः जवाबी आक्रमण के लिये बुलाई गई बहस धर्मनिरपेक्षता से बढ़ते बढ़ते पिछले चुनाव में गुप्त रुप से कट्टरपँथी पार्टियों को दिये लिये समर्थन पर जा पहुँची है। रक्षा मंत्री बेबस होकर प्रधानमँत्री को ताक रहे हैं जो पूरी तन्मयता से सुपर प्रधानमँत्री को सारी बहस का तजुर्मा कर रहे हैं। मीटिंग में सारे समाचार चैनल भी घुस आये हैं, पूरी बहस का सजीव प्रसारण हो रहा है।
  7. स्थानः पाकिस्तान की मिसाइल कमाँड, समयःरात आठ बजकर तेईस मिनट, गतिविधिः पहली मिसाइल गिरने पर पूरे कमाँड सेंटर मुशर्रफ की झाड़ खा रहा है और मुशर्रफ का काफिला कमाँड की ओर चल पड़ा है खुद सारी कार्यवाही अपने सामने अँजाम देने के लिये।
  8. स्थानः दिल्ली का नेशनल सेक्योरिटी कमाँड सेंटर समयः रात आठ बजकर तीस मिनट ,गतिविधिः प्रधानमँत्री दूसरी पाकिस्तानी मिसाईल की तैयारी के लिये खुद मुशर्रफ के जाने की खबर सुन तुरँत रक्षामँत्री को जवाबी हमले का हुक्म दे देते हैं। रेलमँत्री और वामपँथी पक्ष इसे कामन मिनिमम प्रोग्राम का सरासर अपमान मानते हैं और सरकार से समर्थन वापस ले लेते हैं। अब लोकसभा का विशेष अधिवेशन बुलाये जाने की माँग हो रही है।
  9. स्थानः पाकिस्तान की मिसाइल कमाँड, समयःरात आठ बजकर बत्तीस मिनट, गतिविधिः मुशर्रफ की निगरानी में दूसरी मिसाईल दाग दी जाती है।
  10. स्थानः सर्वोच्च न्यायालय, समयःरात आठ बजकर पैतीस मिनट ,गतिविधिः सरकार में शामिल सारी पार्टियों ने अल्पमत सरकार के पाकिस्तान पर प्रत्याक्रमण के फैसले की वैधता को चुनौती देने के लिये आपात याचिका दायर कर दी है। सर्वोच्च न्यायालय के बाहर राम विलास पासवान और लालू इसे धर्मनिरपेक्ष ताकतों की जीत बता रहे हैं।
  11. स्थानः पाकिस्तान की मिसाइल कमाँड, समयःरात आठ बजकर चालीस मिनट, गतिविधिः मुशर्रफ की निगरानी में दूसरी मिसाईल का लाँच भी फेल हो गया है। अब पाकिस्तान की फौज के पास उत्तर कोरिया की बनी मिसाईल पड़ी है जिसके मैनुअल का अब तक उर्दू में अनुवाद नही हुआ है। आगबबूला मुशर्रफ ने अपने नकारा कमाँडरो को वही मिसाईल बिना मैनुअल के चित्र देखे, दाग देने का हुक्म तामील कर दिया है।
  12. स्थानः सर्वोच्च न्यायालय, समयः रात नौ बजे ,गतिविधिः सर्वोच्च न्यायालय ने अल्पमत सरकार की वैधता पर निर्णय सुरक्षित रख लिया है। मामले की गँभीरता को देख कर आडवाणी ने काँग्रेस सरकार के समर्थन का ऐलान किया है। अब आडवाणी के घर के बाहर शिवसेना और बजरँग दल वाले छद्मनिरपेक्षियों के हाथ खेलने के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं और उधर प्रधानमँत्री के घर के बाहर तीस्तासीतलवाड़, शबाना, कुलदीप नैयर और सीतराम येचुरी कट्टरपँथियो के हाथ खेलने का आरोप लगाते हुये घेराव डाले हैं।
  13. स्थानः पाकिस्तान की मिसाइल कमाँड, समयःरात नौ बजकर आठ मिनट, गतिविधिः मुशर्रफ की निगरानी में तीसरी मिसाईल दाग दी गई है। इसका सँचालन पथ पहले से फीड किया गया था। इसलिये यह पूरे वेग से आसमान में उड़ गयी। पर कमाँड सेंटर के होश तब फाख्ता हो गये जब इसने बजाये दिल्ली के, पूर्व की ओर का रूख अख्तियार कर लिया। मुशर्रफ बैचैन होकर प्योडोंग फोन लगा रहे हैं।
  14. स्थानः प्रधानमँत्री आवास, समयः रात नौ बजकर अठ्ठारह मिनट,गतिविधिः प्रधानमँत्री घेराव की वजह से बाहर नही निकल पा रहे हैं। ऐसी आपातकालीन स्थिति में रक्षामँत्री को कार में छुपाकर खुद अरूण जेटली सर्वोच्च न्यायालय ले गये हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने आपातकालिन स्थिति की गँभीरता देखकर लोकसभा का आपातकालीन अधिवेशन बुलाने का आदेश दिया है।
  15. स्थानः पाकिस्तान की मिसाइल कमाँड, समयःरात नौ बजकर बाईस मिनट, गतिविधिःमुशर्रफ मियाँ एकसाथ दो दो बुरी खबर न झेल पाने से बेहोश हो गये हैं। प्योडोंग से खबर मिली की उस मिसाईल में शँघाई का रुट फीड था। मिसाईल शँघाई पर गिर भी गई और तिलमिलाये चीन ने दन्न से अपनी मिसाईल इस्लामाबाद की ओर रवाना कर दी है।
  16. स्थानः लोकसभा, समयः रात नौ बजकर चालीस मिनट,गतिविधिःआपातकालीन अधिवेशन चल रहा है। शिवसेना के सदस्यों की चप्पलो से बचने को भाजपा के सदस्य, काँग्रेसियों की सीट के पीछे जा छुपे हैं। येचुरी, लालू और दयानिधि मारन समवेत स्वर में प्रधानमँत्री पर धर्मनिरपेक्षता को धोखा देने के आरोप लगाते हुये इस्तीफे की माँग कर रहे हैं। तभी सूचना एवं प्रसारण मँत्री की उदघोषणा से सन्नाटा छा जा है कि अभी-अभी इस्लामाबाद में एक चीनी मिसाईल ने भारी तबाही मचाई है। लोकसभा, इस्लामाबाद की तबाही पर दुःखी होकर सर्वसम्मत शोक प्रस्ताव पारित करती है और हरसँभव सहायता का वचन देती है।
  17. स्थानः वाघा बार्डरः समयः अगले दिन सुबह पाँच बजे, गतिविधिः राहत सामग्री से लदे ट्रकों को लिये आडवाणी इस्लामबाद की ओर रवाना हो चुके हैं और उन्हें मोमबत्ती दिखाकर वाघा बार्डर पर विदा कर रहे हैं कुलदीप नैयर।

26 June 2006

अमरीका शमरीका पर मेरा नजरिया!

हिंदी ब्लागजगत में छिड़ी ताजा बहस कई दिन से पढ़ी जा रही थी, आनँद भी लिया जा रहा था। आज अपना उल्लेख देखा। लिखना बहुत दिन से टल रहा था। अपना नाम देख कर अब हाथ की खुजली और छपास की पीड़ा को रोकना अब सँभव नही। मेरा पहला प्रश्न है कि अमेरिका में अमरीकी कौन है? असली अमरीकी तो ईँडियन थे, जिन्हे नेटिव या रेड ईडियन भी कहा जाता है, जिन्हे मार मार कर अँग्रेजो ने जँगलो में घुसेड़ दिया। अब जो अमेरिका बसा है वह शत प्रतिशत प्रवासियों से बसा है, सारे के सारे अमेरिकियो के या तो माँ बाप या फिर दादे परदादे किसी न किसी दूसरे मुल्क से आ बसे हैं।न यकी हो तो याद करिये हर उस हिंदी फिल्म में जहाँ अमेरिका का जिक्र होते ही सबसे पहली क्या चीज दिखती है? स्टेच्यू आफ लिबर्टी। मैने देखा है इस द्वीप पर जो स्टीमर जाता है वह बीच में एलिस द्वीप पर रुकता है, जहाँ पिछले दौ सौ साल में आये प्रवासियों का सारा इतिहास दर्ज है। यहाँ हर अमरीकी को मैने अपना नाम कंप्यूटर में डालकर ढूँढते देखा है कि उनका कौन सा वँशज इस द्वीप पर उतरा था, बिल्कुल उसी तरह जैसे हरिद्वार के तेरह मँजिले मँदिर की सबसे ऊपर की मँजिलपर जहाँ बाबा अमरनाथ की प्रतिकृति है वहाँ बैठा पँडा एक पोथी खोलकर आपको यह बता देता है कि वहाँ आपके बाबा आये थे या परबाबा?

खैर मुद्दा यह है कि अमेरिका में हर देश या क्षेत्र के अलग अलग समूह से हैं। इनमें आपस में अनौपचारिक सँबध कम ही बनते देखे हैं मैने। इस सिलसिले में एक कहानी याद आती है जिसके लेखकऔर शीर्षक दोनो लाख याद करने पर याद नही आये। कहानी एक ऐसे मध्यमवर्गीय परिवार के बारे में है जिनकी सामूहिक कुँठा का एकमेव कारण पड़ोस मे बसा नया तीन सदस्यीय परिवार है, जो हरशाम आपस में ही मशगूल रहता है। वो मिँया,बीबी और उनकी युवा लड़की दिन भर क्या बतियाते हैं , क्यों इस पुराने परिवार से हाय हैलो नही करते यहाँ तक कि न उस पड़ोसन को चीनी-पत्ती तक माँगने की जरूरत पड़ती है न कभी उनका फोन खराब होता है। धमाका तब होता है जब पुराने पड़ोसियों को पता चलता है कि नये पड़ोसी की लड़की ने प्रेमविवाह कर लिया। ये बेचारे पूरा दिन उस लड़की को दुश्चरित्र और न जाने क्या समझते अगले प्रहसन का इंतजार करते हैं पर शाम को वह लड़की हँसी खुशी महज चार रिश्तेदारों के साथ विदा होते देख इनके आश्चर्य का ठिकाना नही रहता। कुछ ऐसा ही यहाँ का समाज है। यहाँ किसी अमरीकी पड़ोसी के घर व्यक्तिगत पैठ बनते दशकों लग सकते हैं और यह सब करने का आम भारतीय प्रवासी (उस कहानी के मध्यमवर्गीय परिवार की तरह) को शौक है न उसके पास समय ही है। हाय हैलो तक ठीक है , दो चार गोरे काले दोस्त भी बन जाते हैं पर न वह हमारे घर रोज आते हैं न हम उनके घर रोज जाते हैं। बात सिर्फ हम तक सीमित नही है, एक इटेलियन और आईरिश के मध्य भी कुछ इतनी ही दूरी देखी जा सकती है। यकीन न हो तो माई बिग फैट ग्रीक वैडिंग देख लीजिये। अमेरिका में सब के सब तलाकशुदा या सेक्स मांस्टर नही होते। यहाँ भी हर इतवार को बेसबाल के कैंप से स्वीमिंग पूलके बीच बच्चो को वैन में ढोते माँ बापो को देखा है मैने, हर रविवार को जैसे मैं बिटिया को मँदिर ले जाता हूँ हिंदी सिखाने , वे भी जाते हैं चर्च में। अभी पिछले हफ्ते बिटिया दो सहेलियाँ घर ले आयी। जब घर पहुँचा तो देख कर हैरान था कि घर में कोई वीडियोगेम नही खेला जा रहा, हमारी बेटी कोरियोग्राफर बनी अपनी गोरी सहेलियों को चँदु के चाचा वाले गाने पर डाँस सिखा रही थी। शाम को उन लड़कियों के अभिभावक जब उन्हें लेने आये तो वह छोले भठूरे खाकर गये जो खुद उनकी लड़कियों ने फर्माइश करके बनवाये थे। साथ ही उनमे से जान ऐशली एक मुझसे तीन घँटे बतियाता रहा और यह कहकर गया कि वह खुश है कि उसकी बेटी की दोस्त एक ऐसे परिवार से है जहाँ बाप दूसरा या माँ तीसरी नही है। मैं यह भी उल्लेख कर दूँ कि मेरी बिटिया पूरी ठसक से क्लास में आलू के पराठे से भरा टिफिन खोलती है और मजाल है कि पराठो के मसाले कि गँध पर कोई नाक बिचका सके। ऐसा करते ही उसका जवाब होता है कि "'if you think my lunch is yukee then so is yours , because it is made of ded animals". उसकी इस हिम्मत की दाद उसकी क्लास टीचर देती है और मैं इस बात पर उन भूरे अँग्रेजो पर तरस खाता हूँ जो अपने बच्चों के एक बार मिमियाने पर ही सलाद पास्ता देना शुरू कर देते हैं। बात सिर्फ इतनी है कि मीडिया हमेशा सनसनीखेज मसालेदार आईटम ही दिकाता है कि क्योंकि वही बिकता है। जिस तरह हमें कोफ्त होती है कि पश्चिमी मीडिया की दिलचस्पी हमारे सँपेरो में ज्यादा होती है बजाये हमारे काल सेंटरो के उसी तरह अमेरिकयों की कोफ्त भी है कि उनकी संस्कृति के मानक ब्रिटनी स्पियर्स और माइकल जैक्सन क्यों माने जाते हैं अमेरिका से बाहर।

मेरी समझ में भारतीयो ब्लागरो द्वारा अमरीकी जीवन शैली पर ज्यादा न लिखे जाने का कारण यही है कि आम इटेलियन्स,आईरिश,जापान, चीनी,अफ्रीकी या कोरियाई प्रवासी समूहों की तरह हम औसत प्रवासी भारतीय इनमें (शशि थरूर या रंजीत टवाल सरीखे टाईकून्स को मत जोड़िये) खानपान, सांस्कृतिक और भाषायी अभिरूचियों में समानता के कारण अपने समूहो मे ज्यादा मसरुफ रहते हैं। हमारा ताल्लुक ऐसे सिर्फ जान ऐशली सरीखे परिवारों से रहता है जो सामान्य खुशहाल पारिवारिक जिंदगी जी रहे हैं। जब हम भारत में चरसियों, भँगेड़ियों और मवालियों से दोस्ती नही रखते तो यहाँ के इकलखुड़े मवाली जो दर्जनों टैटू गुदवाये, जीभ या नाभि में छल्ले पहने मोटरसाईकिलों पर घूमते हैं उनसे क्या पूछे कि भारतीय मीडिया सिर्फ तुम्हें ही हाईलाईट क्यों करता है जान ऐशली को क्यो नही?

इस मौके का फायदा उठाते हुये मैं अपनि निजी सफाई जरूर देना चाहूँगा कि अमेरिका में रहकर मैं अमेरिका के बारे में लिखता जरूर हूँ, वैसे देवाशीष पहले ही खुलासा कर चुके हैं कि "अनूप लगभग दिन की सभी पोस्ट पढ़ते हैं, उनके हर पोस्ट पर मौके दर मौके आप जो कड़ियाँ विभिन्न ब्लॉग पोस्टों की देखते हैं वे सबूत हैं कि वे सरसरी तौर पर नहीं, ध्यान से पढ़ते हैं। और पढ़ा याद भी रखते हैं।" अनूप भाई साहब नें इन पोस्टों को पढ़ भी रखा है और टिप्पणी भी की है पर अगर किसी और ब्लागर पाठक मित्र को यह शिकायत हो हम अमेरिका में बसे भारतीय ब्लागर हिंदुस्तान में ठंड बढ़ते ही छींकने लगते हैं पर अमेरिका के मुद्दो पर पर चादर तान दुबके रहते हैं तो मेरी कारगुजारियों की सूची पेश है ताकि सनद रहेः


  1. जान केरी,विकसित भारत और चुनौतियाँ
  2. सबके फटे में टाँग अड़ाने की आदत पुरानी यानी हम हिंदुस्तानी
  3. मुझे भी कुछ कहना है|
  4. पर्यावरण समर्थक आतंकवादी!
  5. दो सबसे बड़े लोकतंत्रों की चुनावी चकल्लस
  6. चोला बदल कर पहचान छुपाने का अचूक मंत्र
  7. अब आपका गुस्सा ठंडा हुआ कि नही?
  8. हर्शी, क्रिसमस और गोविंदाचार्य
  9. जुड़वाँ होने का (ना)जायज फायदा!
  10. सड़क पर शुतुरमुर्ग नाचा किसने देखा?
  11. डोगा यानि श्वान योगा यानि कि कुत्तासन!
  12. फिलाडेल्फिया के सिटी हाल मे शोले का सजीव प्रदर्शन!
  13. क्या आपकी स्वतँत्रता भी किसी के हाथों बँधक है?

इसके अलावा जैसा रमन ने उल्लेख किया लाइफ इन एचओवी लेन (बड़ी सड़क की तेज़ गली ) पूरी तरह अमेरिकी और भारतीय जीवनशैली के मजेदार विभिन्नताओं पर लिखी पुस्तक है, शायद इसे भैंसकथा (क्योंकि भैंस को दर्द नही होता!) के जरिये फिर शुरू कर सकूँ। आगे भी कोशिश रहेगी कि अमेरिका के रुचिकर, मजेदार और ज्ञानवर्धक मुद्दो , घटनाओं पर रोशनी डालूँ सिर्फ आदर्श पार्किंग लाट की तलाश और झूलों तक सीमित न रहूँ।

06 June 2006

सुन साहिबा सुन , मेरे फोन में कितने गुन !

अब तो शस्य श्यामला भारत भूमि के वाशिंदे अब गोस्वामी जी के जीजाश्री सरीखे अनजान नही रहे फोन के अत्याधुनिक फीचर्स के मामले में। फिर भी मैने देखा है कि अमेरिकी फोन इस मामले में अभी कोसो आगे है। क्या क्या झन्नाटेदार फीचर मौजूद होते हैं। आप भी मुलाहिजा फरमाईयेः


  1. कालर आईडीः जो कॉल रिसीव करने वाले को बताता है आपकी पहचान। पहली बार अमेरिका में हमने किसी को फोन लगाया। फोन लगाते ही फोन उठाने वाले ने हमें जब हमारे नाम से सँबोधित किया तो हमारे मुँह से यही निकला "प्रभू आपको यह महाभारत के सँजय की आँख कहाँ से मिल गयी?" वैसे यह अब भारत में भी प्रचलित है। काश यह तब भी होता जब हमें कालेज के दिनो में न जाने कौन गुमनाम षोडशी फोन पर परेशान करती थी। हम न उसका नँबर जानते थे न आवाज पहचान पाते थे, इसलिये न थप्पड़ लगा सकते थे न ... ।
  2. काल वेटिंगः भई बड़े काम की चीज है उन आत्माओं के लिये जो दो बातूनियों के फोन पर डटे होने की स्थिति में इंगेज लाईन पर कम से कम अपने अस्तित्व का सबूत तो दे सकती हैं।
  3. काल फारवर्डिंगः मेरे जैसे सप्तहाँत पर हमेशा घर से नदारद रहने वाले जीवों के लिये अति उपयोगी। वैसे मैने इसका दुरुपयोग भी होते देखा है। हमारे मित्र त्रिपाठी जी, आजकल पत्नी की भारत यात्रा का सदुपयोग जम कर गुलछर्रे उड़ाने में कर रहे हैं। मिसेज त्रिपाठी के एयरपोर्ट पर दिये गये हुक्म की सरासर नाफरमानी करके त्रिपाठी जी हर रविवार बजाये योगा करने के डोगा क्लास में ऐश करने पहुँच जाते हैं। घर पर मिसेज त्रिपाठी की फोन कॉल आते ही स्वतः उनके मोबाईल पर पहुँच जाती है जहाँ वे अपने घर पर ही मौजूद होने के फर्जी सबूत किस तरह से देते हैं उसकी कल्पना ही की जा सकती है।
  4. डू नाट डिस्टर्ब: सनातनी आलसियों के लिये। चाहे कितने सवेरे कोई फोन लगाये, आपकी सुखदः नींद को आपका वफादार फोन टुनटुनाकर टूटने नही देगा, सीधे ही वॉयस मेल पर पहुँच जायेगा। अपने स्वामी जी ने भी पिछले हफ्ते हमारे बाँके बिहारी का शिकार बनने के बाद इसका कवच ओढ़ लिया है। दरअसल, पिछले रविवार को सीन यह हुआ कि हम तो एक शापिंग माल के बाहर अपनी कार में बाँके बिहारी के साथ अपनी बेगम के इंतजार में बैठे बोर हो रहे थे , चुनाँचे को स्वामी जी को गपशप के लिये फोन लगा बैठे। स्वामी जी बेचारे थोड़ी देर तो भलमनसाहत में गपियाये, फिर फरमाये कि "अभी अभी सो के उठा हूँ। चड्डी में हूँ, तैयार होकर बात करता हूँ। " हम कुछ बोले उससे पहले बाँके जो वार्तालाप हमारे सेलफोन के स्पीकर पर सुन रहे थे, उवाचे "अँकल, हम तो थामस की डिजाइन की चड्डी पहनते हैं , आप कौन डिजाईन की पहनते हो।" इस डायलाग पर स्वामी जी के मुखमँडल पर आयी आभा की कल्पना ही की जा सकती है।
  5. थ्री वे कालिंगः नाम से जाहिर है कि बतरस या वाकयुद्ध दोनो ही स्थिति में, तीन समझदारों को उलझाने की सुविधा का नाम है। इसका एक बड़ा संगीन उपयोग सुझाता हूँ। मान लीजिये आपको पाँडे जी से कोई हिसाब बराबर करना है और आप जानते हैं कि पाँडे जी पीठ पीछे परनिंदा कला के उपासक है। बस पहले आप वर्मा जी को फोन लगाईये, उन्हें मुँह में दही जमाकर वार्तालाप सुनने के लिये ऐश्वर्या राय की कसम दे दीजिये। अब थ्रीवे कॉलिंग का (स)दुरूपयोग करते हुये पाँडे जी को फोन लगाईये और बातों बातों में वर्मा जी का जिक्र छेड़ दीजिये। बाकी का काम पाँडे जी सँभाल लेंगे।


अब यह तो थे वह फीचर्स जो हम सब देखते जानते हैं। पर कभी कभी सोचता हूं कुछ और वाँछित फोन फीचर्स जो अब तक फोन कँपनियों को पता नही क्यों नही सूझे? जरा आप भी मुलाहिजा फर्माईये।

  1. कॉल झटकाः यह फीचर आपको फोन पर बोर करने वाली शख्सियतों के और टेलीमार्केटिंग कँपनियों के लिये समान रुप से उपयोगी है। जैसे ही आप इस तरह की कॉल से चट जायें, फोन पर कोई गुप्त कोड डॉयल करते ही, काल करने वाले के रिसीवर पर हल्का सा विद्युत आवेश प्रवाहित हो जाये। उसे इस हल्के से झटके से सदबुद्धि आ जाये कि हर कर्म का फल अवश्य मिलता है।
  2. कॉल फटकाः यह भी ऊपरोक्त दो तरह के प्राणियों के खिलाफ आजमायी जा सकती है। ऐसी किसी भी विकट कॉल के दौरान एक गुप्त कोड डॉयल करने पर आपके अँतर्राज्यीय या अँतर्रदेशीय कॉल्स का बीस प्रतिशत बिल की देनदारी आपके खाते से निकल कर काल करने वाले के खाते में स्वतः स्थानांतरित हो जाये। इसे कहते हैं जोर का झटका धीरे से लगे।
  3. कॉल मस्काः अगर आपकी बीबी आपको दिन में अक्सर फोन करके घँटो उलझाये रखती है तो, ऐसी किसी भी अनचाही कॉल के दौरान फोन पर कोई गुप्त कोड डॉयल करते ही आपकी आवाज में प्रिरिकार्डेड वाक्याँश जैसे कि "हाँ, हूँ, ठीक कहा, हूँ अच्छा.. " वगैरह वगैरह थोड़ी थोड़ी देर पर बजते रहें। फोन करने वाला(ली) भी खुश और आप को भी संत्रास से मुक्ति।
  4. बेकरार कॉलः कभी कॉल वेटिंग में त्रिशँकु की स्थिति को प्राप्त हुये हैं। खासकर कि अपने मोबाइल के कीमती एयरटाईम को किसी व्यक्ति या कंपनी द्वारा कॉल वेटिंग की रस्सी पर सूखते देखकर किसका दिल में टीस नही उठेगी। ऐसी स्थिति में फोन पर कोई गुप्त कोड डॉयल करते ही आपको कॉल वेटिंग की मझधार में छोड़ने वाले व्यक्ति के फोन पर या उसके फोन स्पीकर पर जोर से यह सँदेश बजेगा " जागो मोहन प्यारे!" या फिर "इँतहा हो गई , इँतजार की .. "
  5. कॉंल ००७: अगर आप किसी कँपनी में बॉस या मैनेजर है, और आपको शक है कि लोग आपकी खड़ूसियत की पीठ पीछे बुराई करते हैं या फिर आपकी मातहत सेक्रेटरी अपनी सहेली से आपके कत्थे से रँगे कत्थई दाँतो के बारे में बतियाती है तो यह फीचर आपके लिये वरदान है। पूरी कँपनी के फोन नेटवर्क पर आपका नाम किसी भी वार्तालाप में आते ही समूचा वार्तालाप गु्प्त रूप से न सिर्फ रिकार्ड हो जायेगा बल्कि आपके वॉयस मेलबाक्स में पहुँच जायेगा।
  6. चकाचक हाईवे कॉलः फर्ज कीजिये आप कार से कहीं जा रहे हैं और आपके आगे कोई कार कच्छप गति से चलने पर अमादा है। ऐसे से अपने मूड का सत्यानाश करने की जरूरत नही न ही हार्न बजाकर आगे वाले पर गुस्सा उतारिये। हो सकता है आगे नाना पाटेकर चल रहे हों या फिर राजा भैया के बाराती । बस अपने सेलफोन पर गुप्त कोड डॉयल करिये, यह फीचर आपके सेल फोन से १०० मीटर की दूरी में मौजूद हर सेलफोन में रिकार्डेड मैसेज बजा देगा कि "भईये तुरँत गड्डी किनारे लगाके मैकेनिक बुला , तेरी तेल की टँकी चू रही है.." , मैसेज बजते ही देखिये आगे चलती कार कैसे आपके लिये दन्न से रास्ता खाली करती है।
  7. एसएमएस पलटवारः कोई आपको बकवास एसएमएस भेज भेज कर दुखीः किये हो, तो यह फीचर बहुत उपयोगी है। आपके सेलफोन में एक एसएमएस ब्लैकलिस्ट मौजूद हो। किसी भी ब्लैकलिस्टेड नँबर से एसएमएस आते ही उसे एक स्पेशल एसएमएस वापस चला जाये। यह मैसेज खोलते ही प्राप्तकर्ता की बैटरी तुरँत डिस्चार्ज हो जायेगी।


अपनी टिप्पणियों के द्वारा बताना मत भूलियेगा अगर कोई फीचर छूट गया हो। वैसे आपका क्या ख्याल है , इन सातो फीचर्स का पेटेंट करा लेना चाहिये?

16 May 2006

क्योंकि भैंस को दर्द नही होता! [भाग ७]

नारद जी ने देखा खुद को नारद मुनि कहलाने वाले यह सज्जन इस वक्त सीट पर आराम से धँसे एक हाथ से ढोढा नोश फर्मा रहे थे तथा दूसरे हाथ से अपने नोटपैड के द्वारा ब्लागिस्तान की गतिविधियों पर पैनी नजर रखे थे। उनके लैपटाप पर एक साथ कई प्रोग्राम चल रहे थे । जिनमें एक ईँटरनेट का सागर मथ के मोतीयों सरीखी कड़ियाँ जुटाने में लगा था, दूसरा नये ब्लाग आलेखों के जन्म पर पैनी नजर रखे था, तीसरा जीमेल,याहू और हाटमेल पर गाहे बगाहे प्रकट होने वाली आत्माओं पर गिद्ध दृष्टि लगाये था। नारद जी कुछ देर तक पार्श्व से स्वयँभू नारद मुनि के क्रियाकलाप देखते रहे। स्वयँभू नारद मुनि ने पहले गुगल को अपनी टॉप सीक्रेट कूटशब्दों से गुगलाते हुये कुछ कड़ियाँ चेंपी और साप्ताहिक जुगाड़ू लिंक में परोस दी। फिर अपनी गोल ठुड्डी पर हाथ रखे गहन मुद्रा में डूब गये। ऐसा लगा कि वे किसी पुरानी याद में खोये थे। नारद जी ने स्वयँभू नारद के मन मे झाँक कर देख लिया , कि वे कानपुर के किसी मोहल्ले में साइकिल के टायर में डँडा लगा कर दौड़ने का खेल खेल रहे थे। उनके पीछे दस बारह बालकों की टोली थी, उसमें एक बालक जो एक हाथ से अपनी नेकर सँभाले था और दूसरे हाथ से नाक पोंछता भाग रहा था सब उसे छुट्टन-छुट्टन कहकर बुला रहा थे। अचानक स्वयँभू नारद मुनि की ऊँगलियों में हरकत हुई और नारद जी ने देखा कि लैपटाप की स्क्रीन पर मुहल्ला पुराण का अगला अध्याय लिखा जा रहा था। तभी एक कोने में जीमेल के चैट पर कोई चीज चमकी। अब स्वयँभू नारद जी उस शख्स से रूबरू थे। यह शख्स कोई खुद को ईस्वामी कहलाना पसँद करता था और इस वक्त अमेरिका के किसी शहर में अपने लैपटाप पर बैठा डिजीटल कैमरे का कोई मॉडल खोज रहा था और बेएरिया में रहने वाले किसी मिर्ची सेठ से मशविरा करना चाहता था कि अचानक नारदमुनि की चपेट में आ गया था। नारदमुनिने देखते देखते उसके न न करते करते उसे पाँच छः चर्चा फोरम का लँबरदार बना डाला। अचानक ईस्वामी अँतरध्यान हो गये। नारदमुनि को अभी बचे हुये फोरमों में हवलदारी की पोस्ट के लिये कुछ और सिरों की तलाश थी। दरअसल कई दिन से मोहक मुस्कान वाले बाल्टीमोरवासी बाल्टीचँद भूमिगत थे। नारदमुनि उन्हीं के आनलाईन होने की फिराक में थे कि अचानक एक और आत्मा जीमेल पर प्रकट हुई। नारमुनि ने फौरन उसको घेरा कि वह अपनी बीबी द्वारा रसोई में बुलाये जाने का बहाना टिका कर चँपत हो गयी। यह आत्मा भी अमेरिका में ही बसी थी और पिछले कई दिनों से नारमुनि को चकमा दे रही थी। अब नारदमुनि का मन मुहल्लापुराण में नही लग रहा था। तभी उनके नारदराडार पर एक नया सूचकाँक उभरा। कानपुर शहर से खुद नारमुनि पर नया प्रक्षेपास्त्र फुरसतिया नामक देव ने दागा गया था। नारमुनि सिर खुजाते कुछ अबे तबे सरीखा टिपियाने लगे। उधर उस प्रक्षेपास्त्र के क्षेपणस्थल पर फूलो के समान टिप्पणियाँ बरस रही थी। नारमुनि का रक्तचाप टिप्पणियों के समान बढ़ने लगा। हद तो यह थी कि अभी पार्टी के बहाने से भागी अमेरिकी आत्मा, स्वामी , विलुप्तप्राय मिर्ची सेठ सबके सब पता नही कौन सी कँदराओ से छुप कर टिपिया रहे थे जो सिर्फ नारदमुनि को जीमेलपर नजर नही आ रहे थे। नारदमुनि ने कहा "देख लूँगा सबको।" नारमुनि फिर यादों को झरोखे में खो गये। उनकों एक अप्सरा नजर आ रही थी जो हाथ में कड़वे तेल का दिया लिये कोई भयावह सा गीत गाती जा रही थी। नारदमुनि को इस सीन में एक जबरदस्त लेख की सँभावना नजर आने लगी। टिप्पणियों की जबरदस्त इनवेस्टमेंट सँभावना वाले इस आईटम के पीछे नारदमुनि ढोढ़ा फेंक कर भागे। अब उस सुँदरी द्वारा गाया जाने वाला गाना स्पष्ट सुनाई दे रहा था़
"ऐसा लोचा किया तूने मेरे प्यार का।
मालतो बिका नही बिल चढ़ा उधार का।"


नारदमुनि झटके से रूक गये। यह गाना तो उनके दिलअजीज कैसेट में था जो मिर्जा पाँच साल पहले माँगके ले गये थे। अब तक नही लौटाया था। नारमुनि सोचने लगे "हे प्रभू, यह कैसेट तब मिल गया होता तो पाँच दर्जन किस्तों में ब्लागनाद पर पोस्ट कर देता। खालीपीली ब्लागनाद की अकालमृत्यु तो न होती।"

तभी नारमुनि को सामने से वीणा लिये केसरिया वस्त्र धारी एक सन्यासी "वत्स वत्स" कहता दिखा। स्वयँभू नारद मुनि आँखे मींच के चिल्लाये कि "अरे मास्साब ने कौन सा नया लोगो डिजायन कर दिया नारद के वास्ते?" तभी सामने वाली आकृति पूरी तरह स्पष्ट रूप में उनके सामने साक्षात खड़ी हो गयी। यह तो खुद उनकी प्रिय साईट का प्रतीक चिन्ह जीवंत हो गया था। स्वयँभू नारद गरजे "कौन हे बे? ये क्या मजाक है? ये एयरलाइन में मँगते कब से चढ़ने लगे?"

स्वयँभू नारद मुनि को लगा कि यह सामने वाला अगर मँगता नही तो जरूर कोई नौटँकी मँडली का सदस्य वगैरह है जो अपने कास्टयूम में खड़ा मौज ले रहा है उनसे। स्वयँभू नारद मुनि गरजे "अमाँ चाटो नही, हमने खुद माले मुफ्त दिले बेरहम नामक नीति को जन्म दिया है। हमें जो लोगो पसँद आयेगा अपनी साईट पर लगा सकते हैं। कहो तो तुम्हारी नौटँकी पर के लिये एक ठो ब्लाग खोल दें, अभी मेरे सर्वर पर ८२ जीबी स्पेस फालतू पड़ी है। "

असली नारद मुनि बोले "नारायण! नारायण! वत्स क्या तुम नही जानते कि मुझे हमेशा गतिशील रहने का श्राप है। वत्स मुझे सिर्फ इतना कौतूहूल है कि तुम जिस तरह से पूरे ब्लागमँडल पर चतुर्दिक दृष्टि रखे हो, जिस तरह से हर माह नये ब्लाग को जन्म देते हों , जिस तरह नये ब्लाग के जन्म की घोषणा का एकल अधिकार रखते हो, ब्लागजगत में बिना तुम्हारी जानकारी के कोई भी पत्ता नही हिलता, जिस तरह से फुरदेव के बह्रमास्त्र तुम्हारीं कालविजयी हेंहें के सामने कुँद पड़ जाते हैं, जिस तरह से तुमने साँड जैसी शक्ति को वश में कर रखा है, तुम्हें तो जगत पालक विष्णु जी का प्रतीक चिन्ह धारण करना चाहिये था , भला इस नारायण के तुच्छ भक्त की छवि क्यों हथिया ली तुमने?"

इतनी शुद्ध हिंदी और इतनी इनसाईडर ईनफारमेशन सुनकर स्वयँभू नारद मुनि के कान खड़े हो गये। सामने वाला सन्यासी किसी भी कोने से निंरतर की (अ)भूतपूर्व सँपादकमँडली का सदस्य नही दिख रहा था। कहीं यह ईस्वामी न हो , अपनी शँका का समाधान करने के लिये स्वयँभू नारद मुनि ने अँतिम अस्त्र छोड़ा " बेटा स्वामी , आईडेंटिटी क्रिसिस से बचने के लिये अपनी प्रोफाईल पर फोटौ तो चेंपी नही तुमने। आज मैं ब्लागजगत का सबसे बड़ा स्कूप लिखूँगा ‍ ईस्वामी की पोलखोल! और स्वयँभू नारद मुनि ने दन्न से सामने खड़े सन्यासी की फोटो अपने मोबाईल पर खींच ली और ज्यों ही लैपटाप पर अपलोड करने चले जीमले की चैट पर ईस्वामी फिर नजर आ गये। अब स्वयँभू नारद मुनि सोच में पड़ गये कि यह सामने खड़े महात्मा आखिर हैं कौन?

स्वयँभू नारद मुनि को गहन सोच में देख सामने वाले सन्यासी ने कहा "वत्स मैं नारद हूँ, वही नारद जिसकी छवि के अधिकार का तुम खुल्लमखुल्ला उपयोग कर रहे हो पूरी कनपुरिया बेशर्मी के साथ।"
अगर फुरसतिया जी की दस भीषणतम पोस्टों का रासायनिक घोल बनाया जाये, उसमें स्वामी की प्रेमकथा का नशीलापन मिलाया जाये तदुपराँत उसमे इँडीब्लागीज की नामाँकन प्रक्रिया का वोल्टेजप्रवाहित करने से जो विद्युतीय आवेश तैयार होगा उससे भी तगड़ा झटका स्वयँभू नारद मुनि को लगा असली नारदजी को प्रत्यक्ष देख कर लगा। इस स्थिति से बचाव के लिये किसी रेडीमेड कवच का उल्लेख समीरसँहिता में नही था। स्वयँभू नारद मुनि जी और असली नारद जी ने एक दूसरे को कैसे झेला यह जानने के पहले लेते हैं एक छोटा सा नान-कामर्शियल ब्रे..........क।

भाग १|भाग २|भाग ३|भाग ४ | भाग ५ | भाग ६

12 May 2006

मिलिये जयँती लाल और सुच्चा सिंह से!

लीजिये वायदे के मुताबिक सुच्चा सिंह और जयँती लाल
की तस्वीरें हाजिर हैं। वैसे इन दोनो के नाम कुछ और हैं पर मैने इन्हे ये नाम प्यार से दिये हैं। क्या हैं कि देशी घर के इन सदस्यों के नाम भला विदेशी क्यों हों। वरना इनकी पहचान का सँकट खड़ा हो सकता है। अब तो मजा यह है कि इनके पालनकर्ता श्री बर्वे साहब भी इन्हें सुच्चा सिंह और जयँती लाल के नाम से ही बुलाते हैं। इन नामों की पृष्ठभूमि में है एक फिल्म अवारा पागल दीवाना । जो देयर इस सम्थिंग अबाऊट मैरी की टोपोलाजी है। इस फिल्म में एक किरदार जयँतीलाल नाम का श्वान है जिससे मुझे काले वाले बिलौटे का नाम जयँतीलाल रखने की सूझी। यह काला बिलौटा बहुत डरपोक है , अक्सर मेरी आवाज सुनते ही छुप जाता है। जब्कि भूरा बिलौटा निडर है अतः उसका नाम सुच्चा सिंह रख छोड़ा है। सु्च्चा सिंह की वीरता का एक और किस्सा भी है। कुछ साल पहले बर्वे साहब के घर एक कुत्ता लाया गया जो कि शीपडाग था। शीपडाग को चरवाहे भेड़ बकरी वगैरह इकट्ठा करने के लिये पालते हैं। यहाँ बर्वे साहब के घर में इस शीपडाग ने अपना कर्तव्य नही भूला और दिनरात सुच्चा सिंह और जयँती लाल को खदेड़ कर एक घेरे में बँद करने की फिराक में रहता। बेचारे बिलौटे मारे डर के पूरे सप्ताह बेसमेंट में नजरबँद रहे। एक दिन सुच्चा सिंह ने ठान लिया कि जीना है तो सिर उठाकर। वह बेसमेंट से बाहर आया, शीपडाग उस तक दौड़ कर आया ही था कि सुच्चा सिंह ने दिया अपने दाँये हाथ का पँजा घुमा कर उसकी नाक पर। बेचारा शीपडाग चारो खाने चित्त। उस दिन से दोनो पक्षों में अघोषित युद्धविराम है। इस श्रँखला की अँतिम कड़ी में आप देखियेगा सु्च्चा सिंह एँड जयँती लाल चेक्स ईन ए होटल!

11 May 2006

एक मुलाकात जयँती लाल और सुच्चा सिंह से !

हमारे एक अभिन्न मित्र और पड़ोसी श्री बर्वे साहब को अपने किसी पुराने अपार्टमेंट से अपने नये घर कुछ फर्नीचर स्थानाँतरित करना था। हम दो मित्र साथ हाथ बँटाने को गये। उस दिन ठँड कुछ ज्यादा ही थी। अपार्टमेंट का बाहरी कमरा खाली पड़ा था। जब हम भीतरी कमरें में पहुँचे तो वहाँ जयँती लाल और सुच्चा सिंह के दर्शन हुये। यह दोनो भाई आराम से वहाँ पसरे बैठे थे। बर्वे साहब ने शराफत से कहा, "हटो भाई यहाँ से?" यह सुन कर सुच्चा सिंह तो थोड़ा हिले डुले पर जयँती लाल को कोई असर नही हुआ। हमें फर्नीचर अँधेरा होने से पहले हटाना था लिहाजा मैने अधीर होते हुये थोड़ा तेज आवाज में कहा "हट ओये!" इतना कहना था कि दोनो भाई दुम दबा के भाग लिये । तभी बर्वे साहब को ध्यान आया खुले दरवाजे का और वह चिल्लाये "अरे रोको इन दोनो को, दरवाजा खुला रह गया, कहीँ भाग न जाये यह दोनों।" मैं उन दोनो के पीछे भागा। सुच्चा सिंह तो बाहरी कमरे में मौजूद था। पर जयँती लाल रफूचक्कर हो चुका था। पता नही किधर निकल गया। अब एक नयी मुसीबत थी। फर्नीचर छोड़ कर हम अब जयँतीलाल को ढूँढ़ रहे थे और उधर बर्वे साहब सुच्चा सिंह से पूछ रहे थे " अरे जयँती कुठे गेला!" और सुच्चा सिँह उन्हें किंकर्तव्यविमूढ़ से निहार रहे थे। ठँड में जयँतीलाल को ढूँढ़ ढूँढ़ कर तबीयत हलकान हो गयी। अचानक मुझे धुँआधार छीकें आनी शुरू हो गयीं और आँखों की पुतलियाँ सुर्ख लाल । यह शायद ठँड का असर था। हमें जयँतीलाल का खोज अभियान बँद करना पड़ा और फनीर्चर लाद कर वापस चल पड़े। चलते चलते बर्वे साहब ने एक पड़ोसी से गुजारिश की कि यदि जयँती लाल वापस तशरीफ लायें तो उन्हें वे शरण दे दें। बर्वे साहब चिंतातुर थे, जयँतीलाल उनकी धर्मपत्नी के बहुत ही चहेते रहे हैं और सर्दी में हमारी वजह से उनका इस तरह बाहर रहना उनको नागवार गुजर सकता था।
खैर घर पहुँचने पर पता चला कि जयँतीलाल हमारे जाते ही वापस लौट आये थे और दरवाजा बँद देखकर क्रँदन कर रहे थे। पड़ोसी ने वायदानुसार उन्हें शरण दे दी थी। घर पर एक और प्रहसन इँतजार कर रहा था। पहले हमने फर्नीचर को गैराज से ले जाने की सोची पर फिर दूरी कम होने की वजह से मुख्य द्वार चुना। अब मुख्य द्वार के ठीक पीछे पचपन वर्षीय बर्वे साहब के पाँच वर्षीय दोस्त बाँकेबिहारी मोर्चा जमाये खड़े थे। बाँके जी और बर्वे साहब के मध्य अक्सर धमाचौकड़ी के खेल चलते रहते हैं। जैसे ही हमने फर्नीचर को जमीन पर उतारा , बाँके जी की बिन माँगी सलाह आयी " गाईज, ब्रिंग इट फ्राम गैराज डोर।" बर्वे साहब पहले चुहल करने के मूड में दिखे पर फिर काम में जुट गये बाँके को नजरअँदाज करके। हमारा पहला प्रयास असफल हुआ। हम अब फर्नीचर को दूसरे सिरे से उसी दरवाजे से निकालने में जुट गये और बाँके जी फिर टिपियाये " गाईज, आई टोल्ड यू । इट वोन्ट कम फ्राम दिस डोर। ब्रिंग इट फ्राम गैराज डोर।" अब हमारी हालत मनमोहन सिंह वाली हो रही थी जो सरकार बचाने में लगा हो और अर्जुनसिंह सरीखा कोई उसमें बिना माँगी सलाह देकर फच्चर लगा रहा हो। यह वारदात तीसरी बार होने पर मैने देखा कि बर्वे साहब के कान के निचले सिरे लाल हो गये थे। बेचारे व्यग्र थे बाँके जी को चिकोटी काटने को जो उनकी मजबूर स्थिति का फायदा उठाकर टिपियाये जा रहे थे। आखिर में जब हमने किसी तरह फर्नीचर अँदर पहुँचाया तो बर्वे साहब हाथ झाड़कर बोले "आई टोल्ड यू , इट विल कम फ्राम हियर।"
आशानुरूप बर्वे साहब और बाँके का मल्ल युद्ध शुरू हो चुका था।
वैसे मैं आपको जयँती लाल और सुच्चा सिंह के बारे में कुछ और बताना चाह रहा था, फिलहाल तो इस समय सुर्ख आँखो और रहस्यमयी छींकों की बौछार को रोकना जरूरी है।

05 May 2006

क्योंकि भैंस को दर्द नही होता! [भाग 6]

नारद जी हमेशा की तरह हाथ में वीणा लेकर नारायण नारायण गाते वसुँधरा की ओर प्रस्थान करने लगे। आकाश मार्ग से पृथ्वी अतिसुँदर दिख रही थी। हलाँकि अब नारद जी को भी धरती वालों की तरह कम्यूटमेनिया होने लगा था। पहले तो धरती की परिधि के बाहर हर साल मच्छरों की तरह उपग्रह बढ़ रहे थे , फिर उसके बाद वायुयानो का आवागमन। नारद जी ने एक नजर स्पेस स्टेशन को देखा फिर धरती के वातावरण में प्रवेश कर गये। अभी मुश्किल से कुछ हजार फुट ही उतरे होंगे कि कुवैती एयरलाईन का वायुयान बगल से निकलते दिखा। विमान पर बने चाँद सितारे से नारद जी को स्वर्ग में हजरत साहब की बेकरारी याद आयी और वे शीघ्रता से आगे जाने को उद्यत हुये कि जो उन्होनें सुना उस पर यकीन नही हुआ। आवाज आ रही थी "अरे नारद फिर बैठ गया क्या? लगता है इसकी फीड काम नही कर रही।" नारद जी ने कुछ ही दिन पहले इस फीड वगैरह के चोंचलो की ट्यूशन विष्णु जी को दी थी पर यहाँ खुले आकाश में कौन उनकी तथाकथित फीड का तहलाकाई भँडाफोड़ करने पर ऊतारू था। अचानक फिर आवाज आई , "अरे नारद मुनि हमारे फोरम की फीड भी जोड़ लीजिए न।" नारद जी चौंके यह कौन है उनसे अजीबोगरीब याचनाऐं कर रहा था। नारद जी अपनी वीणा पर लगे एँटिना को ठीक करने लगे कि आवाज आयी " देखो भईया फोरम वोरम की फीड मैं नही जोड़ सकता, नही तो बकिया लोग भी चिल्लायेंगे । अब एक अकेले नारद का का दिखावें, भँडौ़वा भी, पेल भी पहेली भी, कुँडली भी और फोटू भी? " नारद जी को तो वह हालत कि काटो तो खून नही। साफ साफ आईडेंटिटी क्रिसिस का मामला हो गया।

नारद जी ने एक पल तो सोचा कि वापस फूट लें ब्रह्मा जी के पास यह फरियाद लेकर कि धरती के पापों का घड़ा भर गया है। लोग अब सीधे सीधे भगवानों के काम की जबरिया आऊटसोर्सिंग पर ऊतारू है। पर फिर यह सोच रूक गये कि कलयुग को समाप्त रकने के लिये भी शिवशँकर जी की जरूरत पड़ेगी। लिहाजा उन्हें खतरा उठा कर भी यह पता लगाना जरूरी था कि खुद उनकी पहचान कौन चुराने का दुस्साहस किसने किया था। नारद जी को ज्यादा ढूढ़ना नही पड़ा। आवाज सामने से गुजर रहे वायुयान से आ रही थी। नारद जी ने फौरन उस वायुयान में प्रवेश किया। वहाँ उनकी नजर एक्जीक्यूटिव क्लास में एक गोरे ,गोल ,सुदर्शन चेहरे वाले व्यक्ति जिसकी मूँछे किसी खूबसूरत काली हवाई पट्टी या किसी पिच पर ढंके मखमली तिरपाल जैसी लग रही थी और जिसे बाकी लोग कभी जीतू तो कभी नारद मुनि कहकर बुला रहे थे , उस पर पड़ी। अब असली नारद जी ने अपने प्यारे नारद से क्या सवाल जवाब किये यह जानने के पहले लेते हैं एक छोटा सा नान-कामर्शियल ब्रे..........क।

साभारः धरती के नारद की तारीफ के बोल यहाँ से टीपे गये हैं

भाग १|भाग २|भाग ३|भाग ४ | भाग ५

24 April 2006

क्योंकि भैंस को दर्द नही होता! [भाग ५]

शिवशँकर जी से ब्लागमहिमा सुनने के बाद अमला,कमला और विमला और भी ज्यादा कनफ्युजिया गयी थी। मसले के हल निकल रही था। उधर कैलाश पर्वत पर अफरातफरी मची हुई थी। शँकर जी की हाटलाईन सिठमरा गाँव के मँदिर से जुड़ी होने के कारण बड़ी गड़बड़ हो गयी थी। बड़े बड़े नेताओ, अभिनेताओं और अधिकारियों की प्रार्थनाऐं प्रतीक्षासूची में फँसी पड़ी थीं। शिव जी की औघड़ सेना ने भी कम खुराफते नहीं ढायी थीं। औघड़ सेना के खुराफाती तत्व किसी तरह से सँसार के कँट्रोल पैनल से छेड़छाड़ कर बैठे थे। जिसकी वजह से दलेर मेंहदी जैसे अँदर हो गये जब्कि लालू सरीखे बाहर घूमते रहे। काँटा लगा सरीखे एलबम हिट हुए वहीं बीजेपी सरीखे पिट गये। और तो और अडवाणी की पाकिस्तान यात्रा ने ऊपर भी भूचाल ला दिया था। उधर ब्रह्मा जी अलग परेशान थे, एक तो विष्णु जी की ऐजुकेशन लीव खत्म होने का नाम नही ले रही थी तिसपर शँकर जी के यहाँ का सँचार केंद्र बीएसएनएल से होड़ लेता दिख रहा था। हद तो तब हो गई जब हजरत मोहम्मद के डिपार्टमेंट ने सीधे ब्रह्मा जी पर ही सांप्रदायिकता का आरोप मढ़ दिया। ब्रह्मा जी सन्न रह गये। सब सोच रहे थे कि हो न हो यह सब यानि कि उसी मुच्छाड़ियल जिया उल हक की कारीगरी है, क्योंकि कायदेआजम तो महीनों से आडवाणी का दिया गैरसांप्रदायिकता का सर्टिफिकेट लहरा लहरा नेहरू को चिढा रहे थे। और तो और, कायदेआजम तो अगले जन्म में रामविलास पासवान के परिवार में जन्म लेने की ब्रह्मा जी से जिद पकड़ के बैठ गये थे क्योकि उन्हें अब भारत की राजनीति में जबरदस्त स्कोप नजर आ रहा था।
हजरत मोहम्मद की चिल्लपों के सामने ब्रह्मा जी को बेबस देखकर नारद जी को आना पड़ा।
अब सुनिए नारद मोहम्मद संवाद
नारद: जनाब हजरत साहब, आपके दरबार में हाजिरी लगाने भर से लोगो को हाजी होने का तमगा मिल जाता है। जहाँ एक हाजी अँगूठाटेक होकर भी विधायक बन जाता है वही जन्म भर पुराणों से माथापच्ची करने वाला शँकराचार्य तक को जेल में ठूँस दिया जाता है, फिर आप कैसे सांप्रदायिकता का आरोप लगा रहे है।
हजरतः नारद मुनि साहब, आप हरदिल अजीज हैं, पर जो हो रहा है वह हमें हमारे नुमाईंदो पर सरासर ज्यादती लग रही है।
नारद: आप कैसी बात करते हैं, आपको ऐसा क्यों लगता है कि इस सर्वसत्ता से सांप्रदायिकता जैसा तुच्छ कार्य हो सकता है। अल्लाह ईश्वर एक हैं यह आपसे ज्यादा कौन जाना है?
हजरतः नारद देखिये मुनिश्वर , इस ट्रेड सीक्रेट का सरेआम खुलासा मत कीजिए नही तो गजब हो जायेगा वरना नीचे न जाने कितनो की धार्मिक भावनाओं को ठेस लग जायेगी और न जाने कितनो की मजहबी दुकान बँद हो जायेगी।। पिछले कुछ दिन से हम देख रहे हैं कि हमारे नुमाईंदो पर आपके डिस्ट्रक्शन डिपार्टमेंट वाले शँकर जी की हमारे नुमाईंदो पर नजर कुछ ज्यादा टेढ़ी है। पहले ही बुश नाम की आफत कम थी जो तुर्की, ईरान और अब पाकिस्तान में भूकँप ला दिया। हमें लगता है कि यह हमारे नुमाइंदो को कम करने की साजिश हो रही है।
नारद: जनाब हजरत साहब, यह सरासर गलत है, शँकर जी का डिस्ट्रक्शन डिपार्टमेंट बिना भेदभाव के काम करता है, अगर ईरान , तुर्की में भूकँप आये तो अमेरिका पर भी कैटरीना का नजला गिरा। हिंदुस्तान और श्रीलँका भी सुनामी की चोट खाये बैठे हैं। आप कैसे कह सकते हैं कि डिस्ट्रक्शन डिपार्टमेंट में धार्मिक आधार पर कोई भेदभाव हो रहा है?
हजरतः चलिऐ डिस्ट्रक्शन डिपार्टमेंट न सही ब्रह्मा जी के कांसट्रक्शन डिपार्टमेंट का क्या कहेंगे? हमें लगता है यहाँ पर जरूर हमारे साथ ज्यादती हो रही है।
नारद: हजरत साहब आप अब बात बदल रहे हैं। यह आप कैसे कह सकते हैं?
हजरतः देखिये, अफगानिस्तान को आपने सिर्फ पत्थर दे दिये। फिलीस्तीन के बगल में ईजराइल नाम का जिन्न ईजाद कर दिया। हमारे बँदे जाये तो जाये कहाँ?
नारद: पर सारे के सारे तेल के भँडार किसको बख्शे गये हैं? देखिये कांसट्रक्शन डिपार्टमेंट बहुत ही बैलेंस्ड डिपार्टमेंट है। यहाँ सँतुलन के लिये हर अच्छी चीज के साथ एक नुक्स जरूर जोड़ दिया जाता है जिससे किसी के साथ नाइंसाफी न हो। अगर अरब देशो के पास तेल हैं तो तेल की धार पीने को शेख भी दे दिये। अगर अमेरिका को सुपरपावर बनाया तो हरीकेन जैसी आफतें और लालबुझक्कड़ जनता दे दी, चीन को विशाल सँसाधन दिये तो चीनीयों को आबादी बढ़ाने की जबरदस्त उर्वर क्षमता दे दी। है कि नही परफेक्ट बैलेंस?
हजरतः नही, कतई नही, वह जमीन का टुकड़ा जो तीन और पानी से और एक ओर हिमालय से घिरा है, जिसकी जमीन सोना उगलती है और आबादी आईटी के ईंजिनियर उगलती है। वह तो महाशक्ति बनने के कगार पर दिखता है। उस हिंदुस्तान को आपने हर तसल्लीबख्श चीज अता कर रखी है। उस पर यह रहनुमाई क्यों?
नारद: जनाब हजरत साहब, हिंदुस्तान को बरक्कत बख्शते वक्त बैलेंस कही नही बिगड़ा है, उसे पाकिस्तान और बांग्लादेश सरीखे पड़ोसी और अम्मा, बहनजी और लालू सरीखे नेता देकर हमने नकेल भी लगा रखी है।
हजरत साहब निरूत्तर हो गये। हलाँकि एक शिकायत उन्हें तब भी थी। वह यह कि ईराक में डिस्ट्रक्शन स्विच आन करके शँकर जी उसे आफ करना भूल कर कहाँ गायब हो गये?
तँग आकर ब्रह्मा जी ने हजरत साहब को तमाम मनुहार कर वापस भेजा और नारद जी को पृथ्वी पर जाकर शँकर जी का पता लगाने का आदेश थमाया। अब नारद जी जब तक सर्च वारँट को तामील करें तब तक के लिए लेते हैं एक छोटा सा नान-कामर्शियल ब्रे..........क।
भाग १|भाग २|भाग ३|भाग ४

अरे भाई हम कब से इस्लाम के दुश्मन हो गये?

चिठ्ठाकारी से अवकाश लेने का कारण एक नये व्यवसायिक अँतर्जाल का निर्माण था। यह अभी भी निर्माणप्रक्रिया में है। आज सवेरे पता चला कि इसे किसी ने हैक कर दिया। मैने अभी व्यवसायिक कारणवश साईट का नाम चित्र में ढक दिया है, पर डोमेन नेम अमेरिकी होने से इस्लाम के अँधानुयाईयो के चपेटे में आ गया लगता है। हद है, इस तरह जबरन दूसरे के घर में कब्जा करके अपना झँडा लहराने से लोग इस्लाम से प्रेम करेंगे या फिर इस्लामियों को दाद खाद खुजली के रोगियों की तरह अपने से दूर रखने की यथासँभव कोशिश करेंगे। मन तो कर रहा है कि खूब लानत मलानत की जाये पर दुबारा कोई केसरिया या हरा झँडा लहराने साईट पर न आये इसका जुगाड़ करना जरूरी है, इसलिये लाहौल भेजने का काम मिर्जा साहब एँड कँपनी के भरोसे छोड़ता हूँ।

06 February 2006

होशियार, सावधान, खबरदार: टीपबाजी जोरो पर है!

आशीष, तरूण , शुकुल देव और अब जीतू भाई की भी टीप पड़ चुकी है। कुछ ऐसा आभास हो रहा है कि मित्रगण प्रोजेक्ट वाली थ्योरी हजम नही कर रहे। खैर जीतू भाई नाराज न हो जायें इसलिये इस सप्ताहाँत पर ठानी कि हम भी लिख ही डाले आदर्श प्रेमिका वाली विश लिस्ट। जबसे हमने अपना प्रोजेक्ट शुरू किया है , हम कुछ कुछ दस साल पहले वाली नर्डावस्था में पहुँच चुके थे। बच्चे प्रसन्न थे कि अब शाम को हम उन्हें पढ़ाई के बहाने भगाकर टीवी पर खुद कब्जा नही जमाते थे। पत्नी को विशेष फर्क नही पड़ा, हमारी बाँये कान की थ्योरी की वजह से। दरअसल दैनिक टीवी दर्शन के दौरान रसोई से आने आवाजो के प्रति भारतीय सरकार सरीखा निर्लिप्त भाव जब महँगा पड़ने लगा और हमें टीवी को ध्वस्त कर दिये जाने सरीखी क्रांतिपूर्ण स्थिति जन्म लेती दिखी तो हमने एक नया फलसफा ईजाद करना पड़ा। हमने पत्नी को बताया कि अकेले हम ही नही जो टीवी के सामने बैठकर नरसिंहराव सरीखे निर्मोही हो जाते हैं। पत्नी ने माना कि हमारे अन्य मित्र भी हमारे सरीखे ही हैं। इससे पहले कि वे महिला अधिकार, पुरूषों के सामजिक वर्चस्व सरीखे संवेदनशील मुद्दे छेड़ें हमने एक वैज्ञानिक चर्चा छेड़ दी। हमने बताया कि दरअसल सारा दोष पुरुषों के बायें दिमाग के हिस्से और बाँये कान का है। यह हिस्सा एक समय में एक ही बात पर ध्यान दे पाता है, जब्कि स्त्रियों के दिमाग के बायें हिस्से में मल्टीथ्रेडिंग इनबिल्ट होती है। श्रीमती जी को यकीन दिलाने के लिये हमनें टीवी को उठाकर दूसरी तरफ कर दिया और सोफे के उस तरफ बैठने लगे जिससे अब रसोई से आने वाले आदेश हमें दायें कान में सुनायी पड़े। एक हफ्ते तक उनकी एक ही आवाज पर जवाब देने से उन्हें हमारी थ्योरी पर यकीन भी गया, हलाँकि इस चक्कर में पूरे हफ्ते कई पिक्चरों को बीच में छोड़ने से मजा भी खूब किरकिरा हुआ। बाद में हमने श्रीमती जी की एक आँतरिक सज्जाकार मित्र को पटाया। जब उसने हमारे कमरे की व्यवस्था को किसी पुरातनपँथी दिमाग की बेहूदा उपज बताया तो श्रीमती जी की ऊँगली हमारी तरफ ईशारा कर रही थी। खैर टीवी फिर से बिना रोकटोक के चालू हो गया। पर बुरा हो इस टैगिंग के उलाहनों का। हम खाँमखा इस विशलिस्ट के टँटे में पड़ गये। पिछले शनिवार को आदत के विपरीत जल्द उठ कर विशलिस्ट बनाने के चक्कर में खोये खोये से बैठे पकड़े गये। उस समय हम अपनी टीनएज के गलियारों में नोस्टालजिया रहे थे। कालेज के उन हसीनाओं को याद फर्मा रहे थे जिन्हें तब निगाह भर ठीक से भी नही देखा था। अगर देखते, तो आशीष भईये, वह जमाना ही दूसरा था। अगर दीदे फाड़कर उस समय की भारतीय कुमारियों में अपनी विशलिस्ट के गुण ढूढ़ने की जुर्रत करते तो चमनगँज में बनी और परेड बाजार में बिकी जूतियाँ पड़ जाती सर पर बारह के भाव और सुनने को मिलता "क्या घर में माँ बहन नहीं हैं?" अगर झूठ बोल रहा हूँ तो प्रत्यक्षा जी, सारिका जी और शुकुल जी गवाह हैं कि हमारा जमाना कुछ दूसरा ही था, तब अच्छे बच्चे बगुला भगत की तरह नयनसुख दर्शन ही करते थे, एमएमएस नहीं भेजते थे। खैर हमारी तँद्रा टूटी श्रीमती जी की आवाज से, जो पूछ रही थी "यह कौन से प्रोजेक्ट पर काम हो रहा है? क्या फिर से ब्लागिंग की बीमारी लग गई? " मैने कहा नही , मैं तो बस विश लिस्ट बना रहा था। श्रीमती जी ने बिना पूछे स्क्रीन देखी और अचानक हम पर सवालो और आरोपों की बौछार शुरू हो गयी। आप भी झेलिये "यह क्या लिखा है? साँवली, तीखे नैन नक्श , पतला कटिबँध, मधुरभाषी..., यह सब क्या है? क्या फिर से कोई गुब्बारा पिचकाने की तैयारी है।" हमने जवाब में आजकल ब्लागजगत में चल रहे टैगिंग के खेल का खुलासा किया। मानो परमाणु बम फूट गया। आगे जो हुआ उसकी कल्पना भी हमने नही की थी। मुलाहिजा फरमाईये

श्रीमती जीः यह क्या दूसरी शादी की तैयारी है?
हमः अरे नही भाई, हम ठहरे सनातनी हिंदू। चाहें भी तो प्रवीण तोगड़िया करने नहीं देंगे।
श्रीमती जीः तो फिर क्या किसी डेटिंग साईट पर प्रोफाईल बनाने की तैयारी है?
हमः अरे नही यार, यह तो हम भी विश लिस्ट बना रहे हैं।
श्रीमती जीः क्यों, क्या मेरे अँदर यह सब गुण मौजूद नही हैं (थे) ? यह पतला कटिबँध , यह तीखे नैन यह सब शादी के पहले देखना था, दो अदद चलते फिरते शादी के सर्टिफिकेटों (बाँके और बाँके की दीदी) के होते यह सब करना शोभा देता है क्या?
हम(उनके कँधे पर हाथ रखकर): अरे नही प्रिये, यह तो तुम्हारे फेवरिट लेखक शुक्ल जी और महापत्नीभक्त वाइपरधारी जीतू ने भी बनाई है। और तो और स्वामी ने भी बनायी है।
श्रीमती जी(हमारा हाथ बेदर्दी से झटककर): यह स्वामी तो शुरू से लँपट लगता है, अगर तुमने न बताया होता कि वह शादी शुदा है तो उस पर अपनी "..." फिसल ही गयी थी। लोगोको सठियाते सुना था, जीतू और शुकुल जी तो चालिसिया गये हैं क्या? देखो अवस्थी जी को, देबू को। कितने शरीफ लोग हैं। आजकल एमएमएस के जमाने में भी पिक्चरें देख कर रोते हैं और घर में बच्चों को पढ़ाते हैं। इन स्वामियों के चक्कर में शुकुल और जीतू भी बौरा गये हैं। जरा देना तो कानपुर और कुवैत का नँबर, अब इनकी बीबियों से बात करनी ही पड़ेगी।
हमः अरे यार क्या कर रही हो, यह दोनो बड़े शरीफ लोग है। और यह भी देखो , स्वामी ने भी लिखा है कि उसका जमाना अलग था, बिल्कुल हमारी तरह। यह सब तो आशीष, तरूण और अमित का किया धरा है। मैने पहले भी मना किया था, अँग्रेज शहजादियों के ब्लाग न पढ़ा करों। एक भलामानस तो पहले ही पिट चुका है इस चक्कर में ।
श्रीमती जीः तो फिर यह विशलिस्ट किसके लिये बन रही थी। इसमें से कुछ क्वालिटी तो तुम अक्सर उस मुई, बाल में खिजाब लगाके घूमने वाली मिसेज कपाड़िया मे भी बखानते हो।
हमः आशीष के लिये (अगर हम यह न कहते थे तो बचने का कोई रास्ता न था), बेचारा अब तक कुँवारा है। खड़ूस है, तभी तो अमेरिका आकर भी कुँवारा ही रह गया।
श्रीमती जीः हम्म। यह कहीं सतरँगिया तो नही? इसकि अब की पोस्ट देखकर यही लगता है कि इसे लड़कियों से बैर है।
हमः पता नही। वैसे भी यह अपने City of brotherly love में तो कभी आया नही। वैसे इस पर निगाह रखनी पड़ेगी।

तो भाईयों, अमित,आशीष और तरून के टीपबाजी के चक्कर ने अच्छे खासे सद्चरित्र चिठ्ठा जगत को खाँमखा हमारी बीबीयों के शक के दाये मे ला दिया है। अमाँ तुम लोगो की शादी नही हुई है तभी खालीपीली निठल्ला चिंतन करते रहते हो और हमारे सरीखे शरीफ लोगो के सप्ताहाँत का बेड़ागर्क करवाते रहते हो। भगवान सब देख रहा है। तुमने मेरी, शुक्ल और जीतू की गत बनाने में कोई कसर नही छोड़ी है, इसलिये तुम सबको पानी पीकर आशीर्वाद दे रहा हूँ, कि जल्द जल्द तुम लोगो की शादियाँ हो जायें। जल्द से जल्द तुम दूधो नहायो , पूतो फलो। और तुम्हारे बाल बच्चे जीयें और बड़े होकर तुम्हारा खून पीयें । बाकी लोगो की तरह मैं और शरीफों को नही फँसाना चाहता। देबू, पँकज,रमण भाई और रवि भाई जरा सावधान रहना। जीतू और शुक्ल फँस गये हैं, हमें फँसाकर। आप लोग अनूँगूँज वगैरह के बहाने से पतली गली से निकल लो। बाद मे न कहना कि बताया नही। शुक्ल जी और जीतू, आप दोनो लोग यह न कहना कि बहुत सयाने हो। अभी तो अपनी विश लिस्ट को भाभियों के गुण बताकर इठला रहे हो। सोच लो कही मेरी बीबी ने मेरी ब्लागर फोन लिस्ट हैक कर ली (मुझे शक है कहीं स्वामी इस काम में उसकी मदद न कर दे) और उसने कानपुर और कुवैत,आपके गृहमँत्रालय फोन लगा दिया तो न सिर्फ आपलोगो की सारी की सारी बगुला-भगती धरी रह जायेगी बल्कि बछड़ो (अमित,आशीष और तरून) के बीच सींग कटाके घूमने का शौक की भी हवा निकल जायेगी।।