06 February 2006

होशियार, सावधान, खबरदार: टीपबाजी जोरो पर है!

आशीष, तरूण , शुकुल देव और अब जीतू भाई की भी टीप पड़ चुकी है। कुछ ऐसा आभास हो रहा है कि मित्रगण प्रोजेक्ट वाली थ्योरी हजम नही कर रहे। खैर जीतू भाई नाराज न हो जायें इसलिये इस सप्ताहाँत पर ठानी कि हम भी लिख ही डाले आदर्श प्रेमिका वाली विश लिस्ट। जबसे हमने अपना प्रोजेक्ट शुरू किया है , हम कुछ कुछ दस साल पहले वाली नर्डावस्था में पहुँच चुके थे। बच्चे प्रसन्न थे कि अब शाम को हम उन्हें पढ़ाई के बहाने भगाकर टीवी पर खुद कब्जा नही जमाते थे। पत्नी को विशेष फर्क नही पड़ा, हमारी बाँये कान की थ्योरी की वजह से। दरअसल दैनिक टीवी दर्शन के दौरान रसोई से आने आवाजो के प्रति भारतीय सरकार सरीखा निर्लिप्त भाव जब महँगा पड़ने लगा और हमें टीवी को ध्वस्त कर दिये जाने सरीखी क्रांतिपूर्ण स्थिति जन्म लेती दिखी तो हमने एक नया फलसफा ईजाद करना पड़ा। हमने पत्नी को बताया कि अकेले हम ही नही जो टीवी के सामने बैठकर नरसिंहराव सरीखे निर्मोही हो जाते हैं। पत्नी ने माना कि हमारे अन्य मित्र भी हमारे सरीखे ही हैं। इससे पहले कि वे महिला अधिकार, पुरूषों के सामजिक वर्चस्व सरीखे संवेदनशील मुद्दे छेड़ें हमने एक वैज्ञानिक चर्चा छेड़ दी। हमने बताया कि दरअसल सारा दोष पुरुषों के बायें दिमाग के हिस्से और बाँये कान का है। यह हिस्सा एक समय में एक ही बात पर ध्यान दे पाता है, जब्कि स्त्रियों के दिमाग के बायें हिस्से में मल्टीथ्रेडिंग इनबिल्ट होती है। श्रीमती जी को यकीन दिलाने के लिये हमनें टीवी को उठाकर दूसरी तरफ कर दिया और सोफे के उस तरफ बैठने लगे जिससे अब रसोई से आने वाले आदेश हमें दायें कान में सुनायी पड़े। एक हफ्ते तक उनकी एक ही आवाज पर जवाब देने से उन्हें हमारी थ्योरी पर यकीन भी गया, हलाँकि इस चक्कर में पूरे हफ्ते कई पिक्चरों को बीच में छोड़ने से मजा भी खूब किरकिरा हुआ। बाद में हमने श्रीमती जी की एक आँतरिक सज्जाकार मित्र को पटाया। जब उसने हमारे कमरे की व्यवस्था को किसी पुरातनपँथी दिमाग की बेहूदा उपज बताया तो श्रीमती जी की ऊँगली हमारी तरफ ईशारा कर रही थी। खैर टीवी फिर से बिना रोकटोक के चालू हो गया। पर बुरा हो इस टैगिंग के उलाहनों का। हम खाँमखा इस विशलिस्ट के टँटे में पड़ गये। पिछले शनिवार को आदत के विपरीत जल्द उठ कर विशलिस्ट बनाने के चक्कर में खोये खोये से बैठे पकड़े गये। उस समय हम अपनी टीनएज के गलियारों में नोस्टालजिया रहे थे। कालेज के उन हसीनाओं को याद फर्मा रहे थे जिन्हें तब निगाह भर ठीक से भी नही देखा था। अगर देखते, तो आशीष भईये, वह जमाना ही दूसरा था। अगर दीदे फाड़कर उस समय की भारतीय कुमारियों में अपनी विशलिस्ट के गुण ढूढ़ने की जुर्रत करते तो चमनगँज में बनी और परेड बाजार में बिकी जूतियाँ पड़ जाती सर पर बारह के भाव और सुनने को मिलता "क्या घर में माँ बहन नहीं हैं?" अगर झूठ बोल रहा हूँ तो प्रत्यक्षा जी, सारिका जी और शुकुल जी गवाह हैं कि हमारा जमाना कुछ दूसरा ही था, तब अच्छे बच्चे बगुला भगत की तरह नयनसुख दर्शन ही करते थे, एमएमएस नहीं भेजते थे। खैर हमारी तँद्रा टूटी श्रीमती जी की आवाज से, जो पूछ रही थी "यह कौन से प्रोजेक्ट पर काम हो रहा है? क्या फिर से ब्लागिंग की बीमारी लग गई? " मैने कहा नही , मैं तो बस विश लिस्ट बना रहा था। श्रीमती जी ने बिना पूछे स्क्रीन देखी और अचानक हम पर सवालो और आरोपों की बौछार शुरू हो गयी। आप भी झेलिये "यह क्या लिखा है? साँवली, तीखे नैन नक्श , पतला कटिबँध, मधुरभाषी..., यह सब क्या है? क्या फिर से कोई गुब्बारा पिचकाने की तैयारी है।" हमने जवाब में आजकल ब्लागजगत में चल रहे टैगिंग के खेल का खुलासा किया। मानो परमाणु बम फूट गया। आगे जो हुआ उसकी कल्पना भी हमने नही की थी। मुलाहिजा फरमाईये

श्रीमती जीः यह क्या दूसरी शादी की तैयारी है?
हमः अरे नही भाई, हम ठहरे सनातनी हिंदू। चाहें भी तो प्रवीण तोगड़िया करने नहीं देंगे।
श्रीमती जीः तो फिर क्या किसी डेटिंग साईट पर प्रोफाईल बनाने की तैयारी है?
हमः अरे नही यार, यह तो हम भी विश लिस्ट बना रहे हैं।
श्रीमती जीः क्यों, क्या मेरे अँदर यह सब गुण मौजूद नही हैं (थे) ? यह पतला कटिबँध , यह तीखे नैन यह सब शादी के पहले देखना था, दो अदद चलते फिरते शादी के सर्टिफिकेटों (बाँके और बाँके की दीदी) के होते यह सब करना शोभा देता है क्या?
हम(उनके कँधे पर हाथ रखकर): अरे नही प्रिये, यह तो तुम्हारे फेवरिट लेखक शुक्ल जी और महापत्नीभक्त वाइपरधारी जीतू ने भी बनाई है। और तो और स्वामी ने भी बनायी है।
श्रीमती जी(हमारा हाथ बेदर्दी से झटककर): यह स्वामी तो शुरू से लँपट लगता है, अगर तुमने न बताया होता कि वह शादी शुदा है तो उस पर अपनी "..." फिसल ही गयी थी। लोगोको सठियाते सुना था, जीतू और शुकुल जी तो चालिसिया गये हैं क्या? देखो अवस्थी जी को, देबू को। कितने शरीफ लोग हैं। आजकल एमएमएस के जमाने में भी पिक्चरें देख कर रोते हैं और घर में बच्चों को पढ़ाते हैं। इन स्वामियों के चक्कर में शुकुल और जीतू भी बौरा गये हैं। जरा देना तो कानपुर और कुवैत का नँबर, अब इनकी बीबियों से बात करनी ही पड़ेगी।
हमः अरे यार क्या कर रही हो, यह दोनो बड़े शरीफ लोग है। और यह भी देखो , स्वामी ने भी लिखा है कि उसका जमाना अलग था, बिल्कुल हमारी तरह। यह सब तो आशीष, तरूण और अमित का किया धरा है। मैने पहले भी मना किया था, अँग्रेज शहजादियों के ब्लाग न पढ़ा करों। एक भलामानस तो पहले ही पिट चुका है इस चक्कर में ।
श्रीमती जीः तो फिर यह विशलिस्ट किसके लिये बन रही थी। इसमें से कुछ क्वालिटी तो तुम अक्सर उस मुई, बाल में खिजाब लगाके घूमने वाली मिसेज कपाड़िया मे भी बखानते हो।
हमः आशीष के लिये (अगर हम यह न कहते थे तो बचने का कोई रास्ता न था), बेचारा अब तक कुँवारा है। खड़ूस है, तभी तो अमेरिका आकर भी कुँवारा ही रह गया।
श्रीमती जीः हम्म। यह कहीं सतरँगिया तो नही? इसकि अब की पोस्ट देखकर यही लगता है कि इसे लड़कियों से बैर है।
हमः पता नही। वैसे भी यह अपने City of brotherly love में तो कभी आया नही। वैसे इस पर निगाह रखनी पड़ेगी।

तो भाईयों, अमित,आशीष और तरून के टीपबाजी के चक्कर ने अच्छे खासे सद्चरित्र चिठ्ठा जगत को खाँमखा हमारी बीबीयों के शक के दाये मे ला दिया है। अमाँ तुम लोगो की शादी नही हुई है तभी खालीपीली निठल्ला चिंतन करते रहते हो और हमारे सरीखे शरीफ लोगो के सप्ताहाँत का बेड़ागर्क करवाते रहते हो। भगवान सब देख रहा है। तुमने मेरी, शुक्ल और जीतू की गत बनाने में कोई कसर नही छोड़ी है, इसलिये तुम सबको पानी पीकर आशीर्वाद दे रहा हूँ, कि जल्द जल्द तुम लोगो की शादियाँ हो जायें। जल्द से जल्द तुम दूधो नहायो , पूतो फलो। और तुम्हारे बाल बच्चे जीयें और बड़े होकर तुम्हारा खून पीयें । बाकी लोगो की तरह मैं और शरीफों को नही फँसाना चाहता। देबू, पँकज,रमण भाई और रवि भाई जरा सावधान रहना। जीतू और शुक्ल फँस गये हैं, हमें फँसाकर। आप लोग अनूँगूँज वगैरह के बहाने से पतली गली से निकल लो। बाद मे न कहना कि बताया नही। शुक्ल जी और जीतू, आप दोनो लोग यह न कहना कि बहुत सयाने हो। अभी तो अपनी विश लिस्ट को भाभियों के गुण बताकर इठला रहे हो। सोच लो कही मेरी बीबी ने मेरी ब्लागर फोन लिस्ट हैक कर ली (मुझे शक है कहीं स्वामी इस काम में उसकी मदद न कर दे) और उसने कानपुर और कुवैत,आपके गृहमँत्रालय फोन लगा दिया तो न सिर्फ आपलोगो की सारी की सारी बगुला-भगती धरी रह जायेगी बल्कि बछड़ो (अमित,आशीष और तरून) के बीच सींग कटाके घूमने का शौक की भी हवा निकल जायेगी।।

5 comments:

Amit said...

तो भाईयों, अमित,आशीष और तरून के टीपबाजी के चक्कर ने अच्छे खासे सद्चरित्र चिठ्ठा जगत को खाँमखा हमारी बीबीयों के शक के दाये मे ला दिया है। अमाँ तुम लोगो की शादी नही हुई है तभी खालीपीली निठल्ला चिंतन करते रहते हो और हमारे सरीखे शरीफ लोगो के सप्ताहाँत का बेड़ागर्क करवाते रहते हो। भगवान सब देख रहा है। तुमने मेरी, शुक्ल और जीतू की गत बनाने में कोई कसर नही छोड़ी है
कुछ तो शर्म कीजिए अतुल जी!! ;) भगवान सब देख रहा है और वह जानता है कि हम बालकों ने आपसे कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं की, मात्र आपको टैग किया यह सोचकर कि आप अनुभवी लोगों से हम नई उम्र के जवान कुछ सीख कर अपना कुछ भला कर लेंगे। :) यदि नहीं चाहते तो आप लोग कन्नी काट सकते थे, परन्तु यह तो आप लोग ही जानते हैं कि हम बालकों का भला करने के लिए या अपनी जवानी के दिन याद करने के लिए, आप लोगों ने अपनी "विशलिस्ट" बनाई!! ;)

इसलिये तुम सबको पानी पीकर आशीर्वाद दे रहा हूँ, कि जल्द जल्द तुम लोगो की शादियाँ हो जायें। जल्द से जल्द तुम दूधो नहायो , पूतो फलो। और तुम्हारे बाल बच्चे जीयें और बड़े होकर तुम्हारा खून पीयें
आशीर्वाद दे रहें हैं या शाप? :o अभी तो हम लोगों के खेलने कूदने के दिन हैं, शादी तो तब करते हैं जब खेलने कूदने की उम्र बीत जाती है, क्यों? ;) :P

रेलगाड़ी said...

धमाकेदार लेख के लिये बधायी..मज़ा आ गया..भैया ऐसे ही लिखते रहो। और भाभीजी को शुक्रिया जिन्होंने यह लेख सम्पूर्ण होने दिया!

Jitendra Chaudhary said...

बहुत दिनो बाद तुम्हारा लिखा दिखाई दिया। भाभी के बहाने, तुम शुकुल और हमारी खिंचाई कर रहे हो, अरे हम लोगों ने तो शादीशुदा लोगों को रास्ता दिखाया कि लेख भी पूरा हो जाय तो घर पर बवाल भी ना हो।

अच्छा लेख लिखे हो भैया।अब लगातार लिखते रहा करो।ये प्रोजेक्ट वगैरहा के झाम हमे ना टिकाना, ये तो हम भी जानते है कि थोड़ा समय तो निकाला ही जा सकता है।

अनूप शुक्ला said...

वाह! वो कुछ गाना सा है न! तुम आये तो आया मुझे याद गली में आज चांद निकला। तो ये लेख देख के कुछ अइसा ही लगा।फिर से
ब्लागिंग में हाथ साफ करने के लिये बधाई। लिखते रहो। दनादन। प्रोजेक्ट-स्रोजेक्ट तो चलते
ही रहते हैं। आशा है यह लेख देखकर पंकज,रमन कौल,रवि रतलामी जी भी अपना पिटारा खोलेंगे।
इन्द्र अवस्थी भी ड्राफ्ट मोड से पब्लिश मोड
में आयेंगे!

आशीष said...

वाह वाह मजा आ गया.
लेक्नि हमारे विचार उपर दिये अमित जी के विचारो एक्दम से मिलते है.

हमारा नाम लेकर आप बच रहे है ये अच्छी बात नही है अटल स्टाइल मे आंख बन्द है