11 May 2006

एक मुलाकात जयँती लाल और सुच्चा सिंह से !

हमारे एक अभिन्न मित्र और पड़ोसी श्री बर्वे साहब को अपने किसी पुराने अपार्टमेंट से अपने नये घर कुछ फर्नीचर स्थानाँतरित करना था। हम दो मित्र साथ हाथ बँटाने को गये। उस दिन ठँड कुछ ज्यादा ही थी। अपार्टमेंट का बाहरी कमरा खाली पड़ा था। जब हम भीतरी कमरें में पहुँचे तो वहाँ जयँती लाल और सुच्चा सिंह के दर्शन हुये। यह दोनो भाई आराम से वहाँ पसरे बैठे थे। बर्वे साहब ने शराफत से कहा, "हटो भाई यहाँ से?" यह सुन कर सुच्चा सिंह तो थोड़ा हिले डुले पर जयँती लाल को कोई असर नही हुआ। हमें फर्नीचर अँधेरा होने से पहले हटाना था लिहाजा मैने अधीर होते हुये थोड़ा तेज आवाज में कहा "हट ओये!" इतना कहना था कि दोनो भाई दुम दबा के भाग लिये । तभी बर्वे साहब को ध्यान आया खुले दरवाजे का और वह चिल्लाये "अरे रोको इन दोनो को, दरवाजा खुला रह गया, कहीँ भाग न जाये यह दोनों।" मैं उन दोनो के पीछे भागा। सुच्चा सिंह तो बाहरी कमरे में मौजूद था। पर जयँती लाल रफूचक्कर हो चुका था। पता नही किधर निकल गया। अब एक नयी मुसीबत थी। फर्नीचर छोड़ कर हम अब जयँतीलाल को ढूँढ़ रहे थे और उधर बर्वे साहब सुच्चा सिंह से पूछ रहे थे " अरे जयँती कुठे गेला!" और सुच्चा सिँह उन्हें किंकर्तव्यविमूढ़ से निहार रहे थे। ठँड में जयँतीलाल को ढूँढ़ ढूँढ़ कर तबीयत हलकान हो गयी। अचानक मुझे धुँआधार छीकें आनी शुरू हो गयीं और आँखों की पुतलियाँ सुर्ख लाल । यह शायद ठँड का असर था। हमें जयँतीलाल का खोज अभियान बँद करना पड़ा और फनीर्चर लाद कर वापस चल पड़े। चलते चलते बर्वे साहब ने एक पड़ोसी से गुजारिश की कि यदि जयँती लाल वापस तशरीफ लायें तो उन्हें वे शरण दे दें। बर्वे साहब चिंतातुर थे, जयँतीलाल उनकी धर्मपत्नी के बहुत ही चहेते रहे हैं और सर्दी में हमारी वजह से उनका इस तरह बाहर रहना उनको नागवार गुजर सकता था।
खैर घर पहुँचने पर पता चला कि जयँतीलाल हमारे जाते ही वापस लौट आये थे और दरवाजा बँद देखकर क्रँदन कर रहे थे। पड़ोसी ने वायदानुसार उन्हें शरण दे दी थी। घर पर एक और प्रहसन इँतजार कर रहा था। पहले हमने फर्नीचर को गैराज से ले जाने की सोची पर फिर दूरी कम होने की वजह से मुख्य द्वार चुना। अब मुख्य द्वार के ठीक पीछे पचपन वर्षीय बर्वे साहब के पाँच वर्षीय दोस्त बाँकेबिहारी मोर्चा जमाये खड़े थे। बाँके जी और बर्वे साहब के मध्य अक्सर धमाचौकड़ी के खेल चलते रहते हैं। जैसे ही हमने फर्नीचर को जमीन पर उतारा , बाँके जी की बिन माँगी सलाह आयी " गाईज, ब्रिंग इट फ्राम गैराज डोर।" बर्वे साहब पहले चुहल करने के मूड में दिखे पर फिर काम में जुट गये बाँके को नजरअँदाज करके। हमारा पहला प्रयास असफल हुआ। हम अब फर्नीचर को दूसरे सिरे से उसी दरवाजे से निकालने में जुट गये और बाँके जी फिर टिपियाये " गाईज, आई टोल्ड यू । इट वोन्ट कम फ्राम दिस डोर। ब्रिंग इट फ्राम गैराज डोर।" अब हमारी हालत मनमोहन सिंह वाली हो रही थी जो सरकार बचाने में लगा हो और अर्जुनसिंह सरीखा कोई उसमें बिना माँगी सलाह देकर फच्चर लगा रहा हो। यह वारदात तीसरी बार होने पर मैने देखा कि बर्वे साहब के कान के निचले सिरे लाल हो गये थे। बेचारे व्यग्र थे बाँके जी को चिकोटी काटने को जो उनकी मजबूर स्थिति का फायदा उठाकर टिपियाये जा रहे थे। आखिर में जब हमने किसी तरह फर्नीचर अँदर पहुँचाया तो बर्वे साहब हाथ झाड़कर बोले "आई टोल्ड यू , इट विल कम फ्राम हियर।"
आशानुरूप बर्वे साहब और बाँके का मल्ल युद्ध शुरू हो चुका था।
वैसे मैं आपको जयँती लाल और सुच्चा सिंह के बारे में कुछ और बताना चाह रहा था, फिलहाल तो इस समय सुर्ख आँखो और रहस्यमयी छींकों की बौछार को रोकना जरूरी है।

3 comments:

Udan Tashtari said...

कौन सी ब्रीड हैं ये जयँती लाल और सुच्चा सिंह....?? :)

समीर

अनूप शुक्ला said...

छींके बंद न हों रहीं हों तो-विक्स की गोली लो ,खिच-खिच दूर करो इसके बाद आयोडेक्स मलिये ,काम पर चलिये।

रजनीश मंगला said...

जार तोहार बतिआने का ढंग बहुत रोचक है। जे जयंती लाल तथा सुच्चा सिंह नाम तुमने रखे हैं या सचमुच के नाम हैं?
बिलौग तो बहुत छुंदर दिखे है तोहार।