16 May 2006

क्योंकि भैंस को दर्द नही होता! [भाग ७]

नारद जी ने देखा खुद को नारद मुनि कहलाने वाले यह सज्जन इस वक्त सीट पर आराम से धँसे एक हाथ से ढोढा नोश फर्मा रहे थे तथा दूसरे हाथ से अपने नोटपैड के द्वारा ब्लागिस्तान की गतिविधियों पर पैनी नजर रखे थे। उनके लैपटाप पर एक साथ कई प्रोग्राम चल रहे थे । जिनमें एक ईँटरनेट का सागर मथ के मोतीयों सरीखी कड़ियाँ जुटाने में लगा था, दूसरा नये ब्लाग आलेखों के जन्म पर पैनी नजर रखे था, तीसरा जीमेल,याहू और हाटमेल पर गाहे बगाहे प्रकट होने वाली आत्माओं पर गिद्ध दृष्टि लगाये था। नारद जी कुछ देर तक पार्श्व से स्वयँभू नारद मुनि के क्रियाकलाप देखते रहे। स्वयँभू नारद मुनि ने पहले गुगल को अपनी टॉप सीक्रेट कूटशब्दों से गुगलाते हुये कुछ कड़ियाँ चेंपी और साप्ताहिक जुगाड़ू लिंक में परोस दी। फिर अपनी गोल ठुड्डी पर हाथ रखे गहन मुद्रा में डूब गये। ऐसा लगा कि वे किसी पुरानी याद में खोये थे। नारद जी ने स्वयँभू नारद के मन मे झाँक कर देख लिया , कि वे कानपुर के किसी मोहल्ले में साइकिल के टायर में डँडा लगा कर दौड़ने का खेल खेल रहे थे। उनके पीछे दस बारह बालकों की टोली थी, उसमें एक बालक जो एक हाथ से अपनी नेकर सँभाले था और दूसरे हाथ से नाक पोंछता भाग रहा था सब उसे छुट्टन-छुट्टन कहकर बुला रहा थे। अचानक स्वयँभू नारद मुनि की ऊँगलियों में हरकत हुई और नारद जी ने देखा कि लैपटाप की स्क्रीन पर मुहल्ला पुराण का अगला अध्याय लिखा जा रहा था। तभी एक कोने में जीमेल के चैट पर कोई चीज चमकी। अब स्वयँभू नारद जी उस शख्स से रूबरू थे। यह शख्स कोई खुद को ईस्वामी कहलाना पसँद करता था और इस वक्त अमेरिका के किसी शहर में अपने लैपटाप पर बैठा डिजीटल कैमरे का कोई मॉडल खोज रहा था और बेएरिया में रहने वाले किसी मिर्ची सेठ से मशविरा करना चाहता था कि अचानक नारदमुनि की चपेट में आ गया था। नारदमुनिने देखते देखते उसके न न करते करते उसे पाँच छः चर्चा फोरम का लँबरदार बना डाला। अचानक ईस्वामी अँतरध्यान हो गये। नारदमुनि को अभी बचे हुये फोरमों में हवलदारी की पोस्ट के लिये कुछ और सिरों की तलाश थी। दरअसल कई दिन से मोहक मुस्कान वाले बाल्टीमोरवासी बाल्टीचँद भूमिगत थे। नारदमुनि उन्हीं के आनलाईन होने की फिराक में थे कि अचानक एक और आत्मा जीमेल पर प्रकट हुई। नारमुनि ने फौरन उसको घेरा कि वह अपनी बीबी द्वारा रसोई में बुलाये जाने का बहाना टिका कर चँपत हो गयी। यह आत्मा भी अमेरिका में ही बसी थी और पिछले कई दिनों से नारमुनि को चकमा दे रही थी। अब नारदमुनि का मन मुहल्लापुराण में नही लग रहा था। तभी उनके नारदराडार पर एक नया सूचकाँक उभरा। कानपुर शहर से खुद नारमुनि पर नया प्रक्षेपास्त्र फुरसतिया नामक देव ने दागा गया था। नारमुनि सिर खुजाते कुछ अबे तबे सरीखा टिपियाने लगे। उधर उस प्रक्षेपास्त्र के क्षेपणस्थल पर फूलो के समान टिप्पणियाँ बरस रही थी। नारमुनि का रक्तचाप टिप्पणियों के समान बढ़ने लगा। हद तो यह थी कि अभी पार्टी के बहाने से भागी अमेरिकी आत्मा, स्वामी , विलुप्तप्राय मिर्ची सेठ सबके सब पता नही कौन सी कँदराओ से छुप कर टिपिया रहे थे जो सिर्फ नारदमुनि को जीमेलपर नजर नही आ रहे थे। नारदमुनि ने कहा "देख लूँगा सबको।" नारमुनि फिर यादों को झरोखे में खो गये। उनकों एक अप्सरा नजर आ रही थी जो हाथ में कड़वे तेल का दिया लिये कोई भयावह सा गीत गाती जा रही थी। नारदमुनि को इस सीन में एक जबरदस्त लेख की सँभावना नजर आने लगी। टिप्पणियों की जबरदस्त इनवेस्टमेंट सँभावना वाले इस आईटम के पीछे नारदमुनि ढोढ़ा फेंक कर भागे। अब उस सुँदरी द्वारा गाया जाने वाला गाना स्पष्ट सुनाई दे रहा था़
"ऐसा लोचा किया तूने मेरे प्यार का।
मालतो बिका नही बिल चढ़ा उधार का।"


नारदमुनि झटके से रूक गये। यह गाना तो उनके दिलअजीज कैसेट में था जो मिर्जा पाँच साल पहले माँगके ले गये थे। अब तक नही लौटाया था। नारमुनि सोचने लगे "हे प्रभू, यह कैसेट तब मिल गया होता तो पाँच दर्जन किस्तों में ब्लागनाद पर पोस्ट कर देता। खालीपीली ब्लागनाद की अकालमृत्यु तो न होती।"

तभी नारमुनि को सामने से वीणा लिये केसरिया वस्त्र धारी एक सन्यासी "वत्स वत्स" कहता दिखा। स्वयँभू नारद मुनि आँखे मींच के चिल्लाये कि "अरे मास्साब ने कौन सा नया लोगो डिजायन कर दिया नारद के वास्ते?" तभी सामने वाली आकृति पूरी तरह स्पष्ट रूप में उनके सामने साक्षात खड़ी हो गयी। यह तो खुद उनकी प्रिय साईट का प्रतीक चिन्ह जीवंत हो गया था। स्वयँभू नारद गरजे "कौन हे बे? ये क्या मजाक है? ये एयरलाइन में मँगते कब से चढ़ने लगे?"

स्वयँभू नारद मुनि को लगा कि यह सामने वाला अगर मँगता नही तो जरूर कोई नौटँकी मँडली का सदस्य वगैरह है जो अपने कास्टयूम में खड़ा मौज ले रहा है उनसे। स्वयँभू नारद मुनि गरजे "अमाँ चाटो नही, हमने खुद माले मुफ्त दिले बेरहम नामक नीति को जन्म दिया है। हमें जो लोगो पसँद आयेगा अपनी साईट पर लगा सकते हैं। कहो तो तुम्हारी नौटँकी पर के लिये एक ठो ब्लाग खोल दें, अभी मेरे सर्वर पर ८२ जीबी स्पेस फालतू पड़ी है। "

असली नारद मुनि बोले "नारायण! नारायण! वत्स क्या तुम नही जानते कि मुझे हमेशा गतिशील रहने का श्राप है। वत्स मुझे सिर्फ इतना कौतूहूल है कि तुम जिस तरह से पूरे ब्लागमँडल पर चतुर्दिक दृष्टि रखे हो, जिस तरह से हर माह नये ब्लाग को जन्म देते हों , जिस तरह नये ब्लाग के जन्म की घोषणा का एकल अधिकार रखते हो, ब्लागजगत में बिना तुम्हारी जानकारी के कोई भी पत्ता नही हिलता, जिस तरह से फुरदेव के बह्रमास्त्र तुम्हारीं कालविजयी हेंहें के सामने कुँद पड़ जाते हैं, जिस तरह से तुमने साँड जैसी शक्ति को वश में कर रखा है, तुम्हें तो जगत पालक विष्णु जी का प्रतीक चिन्ह धारण करना चाहिये था , भला इस नारायण के तुच्छ भक्त की छवि क्यों हथिया ली तुमने?"

इतनी शुद्ध हिंदी और इतनी इनसाईडर ईनफारमेशन सुनकर स्वयँभू नारद मुनि के कान खड़े हो गये। सामने वाला सन्यासी किसी भी कोने से निंरतर की (अ)भूतपूर्व सँपादकमँडली का सदस्य नही दिख रहा था। कहीं यह ईस्वामी न हो , अपनी शँका का समाधान करने के लिये स्वयँभू नारद मुनि ने अँतिम अस्त्र छोड़ा " बेटा स्वामी , आईडेंटिटी क्रिसिस से बचने के लिये अपनी प्रोफाईल पर फोटौ तो चेंपी नही तुमने। आज मैं ब्लागजगत का सबसे बड़ा स्कूप लिखूँगा ‍ ईस्वामी की पोलखोल! और स्वयँभू नारद मुनि ने दन्न से सामने खड़े सन्यासी की फोटो अपने मोबाईल पर खींच ली और ज्यों ही लैपटाप पर अपलोड करने चले जीमले की चैट पर ईस्वामी फिर नजर आ गये। अब स्वयँभू नारद मुनि सोच में पड़ गये कि यह सामने खड़े महात्मा आखिर हैं कौन?

स्वयँभू नारद मुनि को गहन सोच में देख सामने वाले सन्यासी ने कहा "वत्स मैं नारद हूँ, वही नारद जिसकी छवि के अधिकार का तुम खुल्लमखुल्ला उपयोग कर रहे हो पूरी कनपुरिया बेशर्मी के साथ।"
अगर फुरसतिया जी की दस भीषणतम पोस्टों का रासायनिक घोल बनाया जाये, उसमें स्वामी की प्रेमकथा का नशीलापन मिलाया जाये तदुपराँत उसमे इँडीब्लागीज की नामाँकन प्रक्रिया का वोल्टेजप्रवाहित करने से जो विद्युतीय आवेश तैयार होगा उससे भी तगड़ा झटका स्वयँभू नारद मुनि को लगा असली नारदजी को प्रत्यक्ष देख कर लगा। इस स्थिति से बचाव के लिये किसी रेडीमेड कवच का उल्लेख समीरसँहिता में नही था। स्वयँभू नारद मुनि जी और असली नारद जी ने एक दूसरे को कैसे झेला यह जानने के पहले लेते हैं एक छोटा सा नान-कामर्शियल ब्रे..........क।

भाग १|भाग २|भाग ३|भाग ४ | भाग ५ | भाग ६

5 comments:

Udan Tashtari said...

वाह भाई, अतुल जी, क्या गजब लिखा है, आन्नद आ गया.

समीर लाल

Jitendra Chaudhary said...

हमारी ओर से आंशिक कमेन्ट:

हेहेहे.......


झकास....

बकिया नारदमुनि कमेन्टियाएंगे।

अनूप शुक्ला said...

पढ़ के मुस्कराया जा रहा है। बड़ी खुशी की बात है कि जीतेनदर की असलियत बताने का काम हो रहा है । वैसे इसमें मजा जीतू को भी आ रहा है ,बिना कुछ किये धरे मुफत में नाम हो रहा है। हमारे साथी कहते हैं- काहे को लिफ्ट कराते हो जीतू को?वो तो खाली हेंहेंहें करेगा बस ।

रजनीश मंगला said...

बहुत मज़ेदार लिखा है यार।

Tarun said...

आप सीनियर चिठा्कारों को विशेष आमंत्रण है कि इस बार अनुगूँज में लिख ही डालिये, भाभी जी के गुस्‍से का ठीकिरा हमारे सर पे फोड़ दीजयेगा