27 August 2006

महाशक्ति के भग्नावशेष














पेनसिलवेनिया में ऐशलैंड नाम की जगह एक पुरानी कोयले की भूमिगत खदान की यात्रा कथा पेश है। आर्थिक मँदी के दौर में ४० के दशक मे यह खदान बँद कर दी गई थी। अब इसे पयर्टक स्थल की तरह विकसित किया गया है। हलाँकि इसके पहले भारत में उत्तरप्रदेश व मध्य प्रदेश की सीम पर खुली कोयले की खदाने भी देखी हैं पर भूमिगत खदान देखने का कुछ और ही मजा है। वैसे यह खदान पहाड़ के नीचे स्थित है। जमीन में करीब चार सौ फुट नीचे। कोयले की सुरँग बन गयी हैं इसमें। कोयले के खनन से पहाड़ न धसक जाये इसके लिये नसों की तरह क्षैतिज खुदाई की जाती है, करीब तीस चालीस फुट की दूरी छोड़ छोड़ कर।
इस दौरना मीथेन व अन्य जहरीली गैसे की पूर्व चेतावनी देने वाले लैम्प भी देखे। वह कोयले की "नसें" भी देखी। साथ ही यह भी देखा कि जमीन के नीचे चार सौ फुट की गहराई में अत्यंत मँद रोशनी में सँकरी जगह विस्फोटक लगाकर कोयला तोड़ने के लिये खुदाई करना कितना दुरुह कार्य था। विस्फोट के बाद कोयला वैगन में लाद कर खच्चर घसीट कर बाहर लाते थे। खच्चरों का रखरखाव खासा महँगा था। खच्चरों को मारना पीटना उस जमाने में नौकरी की बलि लेने को काफी था।

खदान के बाहर मँदी के दौर के मालिक श्रमिक संघर्षो की दस्तान भी सुनी और मँदी के दौर के भग्नावशेष भी देखे। मँडी के दौर में भुखमरी से त्रस्त खनिकों नें अवैध सुरँगे खोदकर हस्तचालित लिफ्ट बना रखी थी, जिससे कोयला निकला के वे खुले बाजार में बेचते थे। इन सब की परिणिति खानमालिकों की निजी पुलिस से इन श्रमिकों के संघर्ष में हुई। जो भी हो, एक महाशक्ति के उभरने के दौर में इस तरह के किस्से देखने-खोजने को उसकी तहों मे जाना पड़ता है। इस यात्रा से अँकल सैम , महाशक्ति बनने के दौर से कैसे गुजरे सब साक्षात देखा।

2 comments:

अनूप शुक्ला said...

बढ़िया है फोटो। खासकर अभी तो मैं जवान हूँ वाला!

Abhishek Sinha said...

अतुल जी ,
अच्छा है,,,
बहुत दिनों पहले आपका ब्लॉग देखा था.. आप्की यह पद्यति बहुत पसन्द आयी ,,,जिसमें आपने चित्रों के साथ साथ अपनी अवाज भी डाली है,,,हो सके तो इस के बारे में मुझे भी बतायें... मेर भी विचार अपने ब्लॉग को इसी भाँति प्रस्तुत करना है...उम्मीद के साथ कि आप जल्द हि जवाब देंगे.....
अभिषेक सिन्हा
abhimeranaam@yahoo.com