18 October 2006

हद है बेशर्मी की

इस खबर को पढ़कर तो यही लगा। कुछ भारतीय विद्यार्थी धरे गये, चैट बोर्ड के जरिये अल्पव्यस्क बच्चों के साथ यौनाचार करने की कोशिश में । जब धरे गये तो उनके रिश्तेदार स्यापा कर रहे हैं कि उन बेचारों को यहाँ के कायदे कानून ठीक से नही मालूम। बिना सोचे समझे वे पुलिस द्वारा कहे जाने पर किसी भी कागज पर हस्ताक्षर कर देते हैं। इन बेचारो को पहले साल भर की जेल होगी फिर जबरन भारत पार्सल कर दिया जायेगा। भला एक ऐसे अपराध जो इन बेचारो ने किया ही नही उसकी इतनी बड़ी सजा?

बात सही भी है, भारत में कानून की इज्जत करना किसी ने सिखाया नही, अल्पव्यस्क से यौनाचार सजा लायक जुर्म है ये इन विद्यार्थियो को पता ही नही। शठे शाठ्यम समाचरेत की नीति हम भूल चुके हैं, हम भूल चुके हैं कि हर दुष्कर्म की सजा निश्चित है पर दूसरे तो नही भूले। क्या कहना चाहता है रेडिफ? होना तो चाहिये था कि ऐसी हरकत करने वालो की प्रताड़ना छपती, पर छप क्या रहा है? दोषियों के रिश्तेदारो का क्रंदन? क्या ऐसी खबर पढ़कर आँखो से वासना टपकाता "मैं तो नन्हा सा भोला सा बच्चा हूँ" गाता शक्ति कपूर का चरित्र नही याद आता ?

5 comments:

Udan Tashtari said...

अभी इस तरह की पिछली घटना जिसमें हालेण्ड मे हवाई जहाज उतरवा दिये थे और हमारा मिडिया लडकों की तरफदारी कर रहा था, भूली भी नहीं गई है कि यह फिर से.

सब पढ़े लिखे हैं. कानून न जाने, न सही. मर्यादायें तो समझते हैं.

शायद कहीं पश्चिमोत्तासन करते हुये मूलभूत व्यवहारिक मूल्यों का भी जबरदस्त ह्रास हो रहा है.

Atul Arora said...

समीर भाईसाहब

मुझे लगता है कि चरित्रपतन और पश्चिम दोनो को एक दूसरे का समानार्थी बनाना ठीक न होगा। स्वदेश फिल्म मे शाहरूख ने सटीक कहा कि "हर मुश्किल आने पर हम पुरानी महान संस्कृति के खोल मे छुप जाते हैं। महान हमारे पूर्वज थे हम नही, और हम खुद बिगड़े हैं।" जब अमेरिकी राष्ट्रपति को यौन शुचिता की वकालत करते देख कभी कभी आश्चर्य होता है, पिछले कुछ सालो में जहाँ अमेरिकी पारिवारिक जीवन का महत्व समझने लगे हैं वहीं हम अधोपतन की ओर बढ़ रहे हैं इक्कीसवि सदी का नारा लगाते हुये।

Udan Tashtari said...

अरे अतुल,

आप गलत समझ गये, मैं बिल्कुल समानार्थी नहीं बना रहा हूँ और न ही इसे मानता हूँ. इसीलिये मैने पश्चिमोत्तासन कहा कि काल्पनिक पाश्चायतता जो कि सत्य से बहुत परे है, के मोह में उलझी मानसिकता को इंगित करना चाह रहा था.

क्षितिज said...

पता नहीं क्या हो गया है आजकल लोगों को? अभी कल ही जर्मन समाचार में अल्पवयस्कों को लेकर अश्लील फिल्मे बनाने वालो के एक गिरोह की खबर सुनी थी। उधर हालैंड में तो एक राजनीतिक पार्टी ही गठित हो चुकी है अल्पवयस्को से व्यभिचार करने वालों की। उधर अमरीका में पिछली जनवरी में एक १७ वर्षीय की अश्लील फिल्म बनाकर बेचने के आरोप में मुकदमा दायर हुआ था। ऐसे माहौल में मीडिया को सिर्फ आरोपियों के भारतीय होने की वजह से उनकी तरफदारी करने में शर्म क्यों नहीं आती? व्यभिचारी की कोई नागरिकता नहीं होती, वह सिर्फ व्यभिचारी होता है।

संजय बेंगाणी said...

मिडीया की कथा मिडीया जाने. कानुन का पालन करना सभी के लिए अनिवार्य हैं, और फिर कुछ बाते ऐसी हैं जिनके लिए यह नहीं देखा जाता की कानुनन सही हैं या नहीं. क्या बच्चो के साथ व्यभिचार विरोधी कानुन न होता तब भी यह सही होता?