26 June 2006

अमरीका शमरीका पर मेरा नजरिया!

हिंदी ब्लागजगत में छिड़ी ताजा बहस कई दिन से पढ़ी जा रही थी, आनँद भी लिया जा रहा था। आज अपना उल्लेख देखा। लिखना बहुत दिन से टल रहा था। अपना नाम देख कर अब हाथ की खुजली और छपास की पीड़ा को रोकना अब सँभव नही। मेरा पहला प्रश्न है कि अमेरिका में अमरीकी कौन है? असली अमरीकी तो ईँडियन थे, जिन्हे नेटिव या रेड ईडियन भी कहा जाता है, जिन्हे मार मार कर अँग्रेजो ने जँगलो में घुसेड़ दिया। अब जो अमेरिका बसा है वह शत प्रतिशत प्रवासियों से बसा है, सारे के सारे अमेरिकियो के या तो माँ बाप या फिर दादे परदादे किसी न किसी दूसरे मुल्क से आ बसे हैं।न यकी हो तो याद करिये हर उस हिंदी फिल्म में जहाँ अमेरिका का जिक्र होते ही सबसे पहली क्या चीज दिखती है? स्टेच्यू आफ लिबर्टी। मैने देखा है इस द्वीप पर जो स्टीमर जाता है वह बीच में एलिस द्वीप पर रुकता है, जहाँ पिछले दौ सौ साल में आये प्रवासियों का सारा इतिहास दर्ज है। यहाँ हर अमरीकी को मैने अपना नाम कंप्यूटर में डालकर ढूँढते देखा है कि उनका कौन सा वँशज इस द्वीप पर उतरा था, बिल्कुल उसी तरह जैसे हरिद्वार के तेरह मँजिले मँदिर की सबसे ऊपर की मँजिलपर जहाँ बाबा अमरनाथ की प्रतिकृति है वहाँ बैठा पँडा एक पोथी खोलकर आपको यह बता देता है कि वहाँ आपके बाबा आये थे या परबाबा?

खैर मुद्दा यह है कि अमेरिका में हर देश या क्षेत्र के अलग अलग समूह से हैं। इनमें आपस में अनौपचारिक सँबध कम ही बनते देखे हैं मैने। इस सिलसिले में एक कहानी याद आती है जिसके लेखकऔर शीर्षक दोनो लाख याद करने पर याद नही आये। कहानी एक ऐसे मध्यमवर्गीय परिवार के बारे में है जिनकी सामूहिक कुँठा का एकमेव कारण पड़ोस मे बसा नया तीन सदस्यीय परिवार है, जो हरशाम आपस में ही मशगूल रहता है। वो मिँया,बीबी और उनकी युवा लड़की दिन भर क्या बतियाते हैं , क्यों इस पुराने परिवार से हाय हैलो नही करते यहाँ तक कि न उस पड़ोसन को चीनी-पत्ती तक माँगने की जरूरत पड़ती है न कभी उनका फोन खराब होता है। धमाका तब होता है जब पुराने पड़ोसियों को पता चलता है कि नये पड़ोसी की लड़की ने प्रेमविवाह कर लिया। ये बेचारे पूरा दिन उस लड़की को दुश्चरित्र और न जाने क्या समझते अगले प्रहसन का इंतजार करते हैं पर शाम को वह लड़की हँसी खुशी महज चार रिश्तेदारों के साथ विदा होते देख इनके आश्चर्य का ठिकाना नही रहता। कुछ ऐसा ही यहाँ का समाज है। यहाँ किसी अमरीकी पड़ोसी के घर व्यक्तिगत पैठ बनते दशकों लग सकते हैं और यह सब करने का आम भारतीय प्रवासी (उस कहानी के मध्यमवर्गीय परिवार की तरह) को शौक है न उसके पास समय ही है। हाय हैलो तक ठीक है , दो चार गोरे काले दोस्त भी बन जाते हैं पर न वह हमारे घर रोज आते हैं न हम उनके घर रोज जाते हैं। बात सिर्फ हम तक सीमित नही है, एक इटेलियन और आईरिश के मध्य भी कुछ इतनी ही दूरी देखी जा सकती है। यकीन न हो तो माई बिग फैट ग्रीक वैडिंग देख लीजिये। अमेरिका में सब के सब तलाकशुदा या सेक्स मांस्टर नही होते। यहाँ भी हर इतवार को बेसबाल के कैंप से स्वीमिंग पूलके बीच बच्चो को वैन में ढोते माँ बापो को देखा है मैने, हर रविवार को जैसे मैं बिटिया को मँदिर ले जाता हूँ हिंदी सिखाने , वे भी जाते हैं चर्च में। अभी पिछले हफ्ते बिटिया दो सहेलियाँ घर ले आयी। जब घर पहुँचा तो देख कर हैरान था कि घर में कोई वीडियोगेम नही खेला जा रहा, हमारी बेटी कोरियोग्राफर बनी अपनी गोरी सहेलियों को चँदु के चाचा वाले गाने पर डाँस सिखा रही थी। शाम को उन लड़कियों के अभिभावक जब उन्हें लेने आये तो वह छोले भठूरे खाकर गये जो खुद उनकी लड़कियों ने फर्माइश करके बनवाये थे। साथ ही उनमे से जान ऐशली एक मुझसे तीन घँटे बतियाता रहा और यह कहकर गया कि वह खुश है कि उसकी बेटी की दोस्त एक ऐसे परिवार से है जहाँ बाप दूसरा या माँ तीसरी नही है। मैं यह भी उल्लेख कर दूँ कि मेरी बिटिया पूरी ठसक से क्लास में आलू के पराठे से भरा टिफिन खोलती है और मजाल है कि पराठो के मसाले कि गँध पर कोई नाक बिचका सके। ऐसा करते ही उसका जवाब होता है कि "'if you think my lunch is yukee then so is yours , because it is made of ded animals". उसकी इस हिम्मत की दाद उसकी क्लास टीचर देती है और मैं इस बात पर उन भूरे अँग्रेजो पर तरस खाता हूँ जो अपने बच्चों के एक बार मिमियाने पर ही सलाद पास्ता देना शुरू कर देते हैं। बात सिर्फ इतनी है कि मीडिया हमेशा सनसनीखेज मसालेदार आईटम ही दिकाता है कि क्योंकि वही बिकता है। जिस तरह हमें कोफ्त होती है कि पश्चिमी मीडिया की दिलचस्पी हमारे सँपेरो में ज्यादा होती है बजाये हमारे काल सेंटरो के उसी तरह अमेरिकयों की कोफ्त भी है कि उनकी संस्कृति के मानक ब्रिटनी स्पियर्स और माइकल जैक्सन क्यों माने जाते हैं अमेरिका से बाहर।

मेरी समझ में भारतीयो ब्लागरो द्वारा अमरीकी जीवन शैली पर ज्यादा न लिखे जाने का कारण यही है कि आम इटेलियन्स,आईरिश,जापान, चीनी,अफ्रीकी या कोरियाई प्रवासी समूहों की तरह हम औसत प्रवासी भारतीय इनमें (शशि थरूर या रंजीत टवाल सरीखे टाईकून्स को मत जोड़िये) खानपान, सांस्कृतिक और भाषायी अभिरूचियों में समानता के कारण अपने समूहो मे ज्यादा मसरुफ रहते हैं। हमारा ताल्लुक ऐसे सिर्फ जान ऐशली सरीखे परिवारों से रहता है जो सामान्य खुशहाल पारिवारिक जिंदगी जी रहे हैं। जब हम भारत में चरसियों, भँगेड़ियों और मवालियों से दोस्ती नही रखते तो यहाँ के इकलखुड़े मवाली जो दर्जनों टैटू गुदवाये, जीभ या नाभि में छल्ले पहने मोटरसाईकिलों पर घूमते हैं उनसे क्या पूछे कि भारतीय मीडिया सिर्फ तुम्हें ही हाईलाईट क्यों करता है जान ऐशली को क्यो नही?

इस मौके का फायदा उठाते हुये मैं अपनि निजी सफाई जरूर देना चाहूँगा कि अमेरिका में रहकर मैं अमेरिका के बारे में लिखता जरूर हूँ, वैसे देवाशीष पहले ही खुलासा कर चुके हैं कि "अनूप लगभग दिन की सभी पोस्ट पढ़ते हैं, उनके हर पोस्ट पर मौके दर मौके आप जो कड़ियाँ विभिन्न ब्लॉग पोस्टों की देखते हैं वे सबूत हैं कि वे सरसरी तौर पर नहीं, ध्यान से पढ़ते हैं। और पढ़ा याद भी रखते हैं।" अनूप भाई साहब नें इन पोस्टों को पढ़ भी रखा है और टिप्पणी भी की है पर अगर किसी और ब्लागर पाठक मित्र को यह शिकायत हो हम अमेरिका में बसे भारतीय ब्लागर हिंदुस्तान में ठंड बढ़ते ही छींकने लगते हैं पर अमेरिका के मुद्दो पर पर चादर तान दुबके रहते हैं तो मेरी कारगुजारियों की सूची पेश है ताकि सनद रहेः


  1. जान केरी,विकसित भारत और चुनौतियाँ
  2. सबके फटे में टाँग अड़ाने की आदत पुरानी यानी हम हिंदुस्तानी
  3. मुझे भी कुछ कहना है|
  4. पर्यावरण समर्थक आतंकवादी!
  5. दो सबसे बड़े लोकतंत्रों की चुनावी चकल्लस
  6. चोला बदल कर पहचान छुपाने का अचूक मंत्र
  7. अब आपका गुस्सा ठंडा हुआ कि नही?
  8. हर्शी, क्रिसमस और गोविंदाचार्य
  9. जुड़वाँ होने का (ना)जायज फायदा!
  10. सड़क पर शुतुरमुर्ग नाचा किसने देखा?
  11. डोगा यानि श्वान योगा यानि कि कुत्तासन!
  12. फिलाडेल्फिया के सिटी हाल मे शोले का सजीव प्रदर्शन!
  13. क्या आपकी स्वतँत्रता भी किसी के हाथों बँधक है?

इसके अलावा जैसा रमन ने उल्लेख किया लाइफ इन एचओवी लेन (बड़ी सड़क की तेज़ गली ) पूरी तरह अमेरिकी और भारतीय जीवनशैली के मजेदार विभिन्नताओं पर लिखी पुस्तक है, शायद इसे भैंसकथा (क्योंकि भैंस को दर्द नही होता!) के जरिये फिर शुरू कर सकूँ। आगे भी कोशिश रहेगी कि अमेरिका के रुचिकर, मजेदार और ज्ञानवर्धक मुद्दो , घटनाओं पर रोशनी डालूँ सिर्फ आदर्श पार्किंग लाट की तलाश और झूलों तक सीमित न रहूँ।

06 June 2006

सुन साहिबा सुन , मेरे फोन में कितने गुन !

अब तो शस्य श्यामला भारत भूमि के वाशिंदे अब गोस्वामी जी के जीजाश्री सरीखे अनजान नही रहे फोन के अत्याधुनिक फीचर्स के मामले में। फिर भी मैने देखा है कि अमेरिकी फोन इस मामले में अभी कोसो आगे है। क्या क्या झन्नाटेदार फीचर मौजूद होते हैं। आप भी मुलाहिजा फरमाईयेः


  1. कालर आईडीः जो कॉल रिसीव करने वाले को बताता है आपकी पहचान। पहली बार अमेरिका में हमने किसी को फोन लगाया। फोन लगाते ही फोन उठाने वाले ने हमें जब हमारे नाम से सँबोधित किया तो हमारे मुँह से यही निकला "प्रभू आपको यह महाभारत के सँजय की आँख कहाँ से मिल गयी?" वैसे यह अब भारत में भी प्रचलित है। काश यह तब भी होता जब हमें कालेज के दिनो में न जाने कौन गुमनाम षोडशी फोन पर परेशान करती थी। हम न उसका नँबर जानते थे न आवाज पहचान पाते थे, इसलिये न थप्पड़ लगा सकते थे न ... ।
  2. काल वेटिंगः भई बड़े काम की चीज है उन आत्माओं के लिये जो दो बातूनियों के फोन पर डटे होने की स्थिति में इंगेज लाईन पर कम से कम अपने अस्तित्व का सबूत तो दे सकती हैं।
  3. काल फारवर्डिंगः मेरे जैसे सप्तहाँत पर हमेशा घर से नदारद रहने वाले जीवों के लिये अति उपयोगी। वैसे मैने इसका दुरुपयोग भी होते देखा है। हमारे मित्र त्रिपाठी जी, आजकल पत्नी की भारत यात्रा का सदुपयोग जम कर गुलछर्रे उड़ाने में कर रहे हैं। मिसेज त्रिपाठी के एयरपोर्ट पर दिये गये हुक्म की सरासर नाफरमानी करके त्रिपाठी जी हर रविवार बजाये योगा करने के डोगा क्लास में ऐश करने पहुँच जाते हैं। घर पर मिसेज त्रिपाठी की फोन कॉल आते ही स्वतः उनके मोबाईल पर पहुँच जाती है जहाँ वे अपने घर पर ही मौजूद होने के फर्जी सबूत किस तरह से देते हैं उसकी कल्पना ही की जा सकती है।
  4. डू नाट डिस्टर्ब: सनातनी आलसियों के लिये। चाहे कितने सवेरे कोई फोन लगाये, आपकी सुखदः नींद को आपका वफादार फोन टुनटुनाकर टूटने नही देगा, सीधे ही वॉयस मेल पर पहुँच जायेगा। अपने स्वामी जी ने भी पिछले हफ्ते हमारे बाँके बिहारी का शिकार बनने के बाद इसका कवच ओढ़ लिया है। दरअसल, पिछले रविवार को सीन यह हुआ कि हम तो एक शापिंग माल के बाहर अपनी कार में बाँके बिहारी के साथ अपनी बेगम के इंतजार में बैठे बोर हो रहे थे , चुनाँचे को स्वामी जी को गपशप के लिये फोन लगा बैठे। स्वामी जी बेचारे थोड़ी देर तो भलमनसाहत में गपियाये, फिर फरमाये कि "अभी अभी सो के उठा हूँ। चड्डी में हूँ, तैयार होकर बात करता हूँ। " हम कुछ बोले उससे पहले बाँके जो वार्तालाप हमारे सेलफोन के स्पीकर पर सुन रहे थे, उवाचे "अँकल, हम तो थामस की डिजाइन की चड्डी पहनते हैं , आप कौन डिजाईन की पहनते हो।" इस डायलाग पर स्वामी जी के मुखमँडल पर आयी आभा की कल्पना ही की जा सकती है।
  5. थ्री वे कालिंगः नाम से जाहिर है कि बतरस या वाकयुद्ध दोनो ही स्थिति में, तीन समझदारों को उलझाने की सुविधा का नाम है। इसका एक बड़ा संगीन उपयोग सुझाता हूँ। मान लीजिये आपको पाँडे जी से कोई हिसाब बराबर करना है और आप जानते हैं कि पाँडे जी पीठ पीछे परनिंदा कला के उपासक है। बस पहले आप वर्मा जी को फोन लगाईये, उन्हें मुँह में दही जमाकर वार्तालाप सुनने के लिये ऐश्वर्या राय की कसम दे दीजिये। अब थ्रीवे कॉलिंग का (स)दुरूपयोग करते हुये पाँडे जी को फोन लगाईये और बातों बातों में वर्मा जी का जिक्र छेड़ दीजिये। बाकी का काम पाँडे जी सँभाल लेंगे।


अब यह तो थे वह फीचर्स जो हम सब देखते जानते हैं। पर कभी कभी सोचता हूं कुछ और वाँछित फोन फीचर्स जो अब तक फोन कँपनियों को पता नही क्यों नही सूझे? जरा आप भी मुलाहिजा फर्माईये।

  1. कॉल झटकाः यह फीचर आपको फोन पर बोर करने वाली शख्सियतों के और टेलीमार्केटिंग कँपनियों के लिये समान रुप से उपयोगी है। जैसे ही आप इस तरह की कॉल से चट जायें, फोन पर कोई गुप्त कोड डॉयल करते ही, काल करने वाले के रिसीवर पर हल्का सा विद्युत आवेश प्रवाहित हो जाये। उसे इस हल्के से झटके से सदबुद्धि आ जाये कि हर कर्म का फल अवश्य मिलता है।
  2. कॉल फटकाः यह भी ऊपरोक्त दो तरह के प्राणियों के खिलाफ आजमायी जा सकती है। ऐसी किसी भी विकट कॉल के दौरान एक गुप्त कोड डॉयल करने पर आपके अँतर्राज्यीय या अँतर्रदेशीय कॉल्स का बीस प्रतिशत बिल की देनदारी आपके खाते से निकल कर काल करने वाले के खाते में स्वतः स्थानांतरित हो जाये। इसे कहते हैं जोर का झटका धीरे से लगे।
  3. कॉल मस्काः अगर आपकी बीबी आपको दिन में अक्सर फोन करके घँटो उलझाये रखती है तो, ऐसी किसी भी अनचाही कॉल के दौरान फोन पर कोई गुप्त कोड डॉयल करते ही आपकी आवाज में प्रिरिकार्डेड वाक्याँश जैसे कि "हाँ, हूँ, ठीक कहा, हूँ अच्छा.. " वगैरह वगैरह थोड़ी थोड़ी देर पर बजते रहें। फोन करने वाला(ली) भी खुश और आप को भी संत्रास से मुक्ति।
  4. बेकरार कॉलः कभी कॉल वेटिंग में त्रिशँकु की स्थिति को प्राप्त हुये हैं। खासकर कि अपने मोबाइल के कीमती एयरटाईम को किसी व्यक्ति या कंपनी द्वारा कॉल वेटिंग की रस्सी पर सूखते देखकर किसका दिल में टीस नही उठेगी। ऐसी स्थिति में फोन पर कोई गुप्त कोड डॉयल करते ही आपको कॉल वेटिंग की मझधार में छोड़ने वाले व्यक्ति के फोन पर या उसके फोन स्पीकर पर जोर से यह सँदेश बजेगा " जागो मोहन प्यारे!" या फिर "इँतहा हो गई , इँतजार की .. "
  5. कॉंल ००७: अगर आप किसी कँपनी में बॉस या मैनेजर है, और आपको शक है कि लोग आपकी खड़ूसियत की पीठ पीछे बुराई करते हैं या फिर आपकी मातहत सेक्रेटरी अपनी सहेली से आपके कत्थे से रँगे कत्थई दाँतो के बारे में बतियाती है तो यह फीचर आपके लिये वरदान है। पूरी कँपनी के फोन नेटवर्क पर आपका नाम किसी भी वार्तालाप में आते ही समूचा वार्तालाप गु्प्त रूप से न सिर्फ रिकार्ड हो जायेगा बल्कि आपके वॉयस मेलबाक्स में पहुँच जायेगा।
  6. चकाचक हाईवे कॉलः फर्ज कीजिये आप कार से कहीं जा रहे हैं और आपके आगे कोई कार कच्छप गति से चलने पर अमादा है। ऐसे से अपने मूड का सत्यानाश करने की जरूरत नही न ही हार्न बजाकर आगे वाले पर गुस्सा उतारिये। हो सकता है आगे नाना पाटेकर चल रहे हों या फिर राजा भैया के बाराती । बस अपने सेलफोन पर गुप्त कोड डॉयल करिये, यह फीचर आपके सेल फोन से १०० मीटर की दूरी में मौजूद हर सेलफोन में रिकार्डेड मैसेज बजा देगा कि "भईये तुरँत गड्डी किनारे लगाके मैकेनिक बुला , तेरी तेल की टँकी चू रही है.." , मैसेज बजते ही देखिये आगे चलती कार कैसे आपके लिये दन्न से रास्ता खाली करती है।
  7. एसएमएस पलटवारः कोई आपको बकवास एसएमएस भेज भेज कर दुखीः किये हो, तो यह फीचर बहुत उपयोगी है। आपके सेलफोन में एक एसएमएस ब्लैकलिस्ट मौजूद हो। किसी भी ब्लैकलिस्टेड नँबर से एसएमएस आते ही उसे एक स्पेशल एसएमएस वापस चला जाये। यह मैसेज खोलते ही प्राप्तकर्ता की बैटरी तुरँत डिस्चार्ज हो जायेगी।


अपनी टिप्पणियों के द्वारा बताना मत भूलियेगा अगर कोई फीचर छूट गया हो। वैसे आपका क्या ख्याल है , इन सातो फीचर्स का पेटेंट करा लेना चाहिये?