17 December 2007

I want that dude!

एक देसी स्टोर में कुछ खरीदारी करते समय , बांके जी का आदेशात्मक आग्रह सुन कर कान खड़े हो गए ।
मुड़ कर देखा तो बांके आपने हाथ में हनुमान रूपी एक्शन फिगर लिए थे।

अमेरिकन देसियों के लिए क्रिदाना नाम की कम्पनी ने दो एक्शन फिगर प्रस्तुत किये हैं । पैकेजिंग वगैरह में एन आर आई नफासत का पूरा ध्यान रखा गया है।

भारत में इस तरह का उत्पाद शायद केसरिया दलों के नाक भौं सिकोड़ने का सबब बन जाये।

31 October 2007

किताब का मालिक कौन?

कल की बात है, घर के अध्ययन कक्ष में बाँके जी और उनकी माँ के बीच जोर आजमाइश चल रही थी, पढ़ाने लेकर। बाँके जी की माँ चिल्ला रही थीं "ये क्या उल्टा सीधा लिखा फिर से लिखो।"
बाँके जी ने कसमसा के फिर से लिखा। लिखाई ऐसी कि खुद लिखें बाँचे खुदा। क्या करे बाप पर जो गये हैं
नतीजा फिर वही, फिर से डपटे गये, और माँ अमादा है कि बाँके जी की हस्तलिपि सुधरवा के रहेंगी।
कुछ देर बाद बाँके जी के सब्र का पैमाना छलक गया। आगे जो मैने सुना वह कुछ ऐसा था इसमें बाँके जी और उनकी माँ का वार्तालाप अपनी अपनी मातृभाषा में है।

बाँके जी: Hey Mom, tell me one thing !
बाँके जी की माँ: टेलो ( कभी कभी परिहास में हम लोग अंग्रेजी का हिन्दीकरण कर डालते हैं )
बाँके जी: Whose home work is this?
बाँके जी की माँ : तुम्हारा
बाँके जी: and whose book is this?
बाँके जी की माँ: तुम्हारी
बाँके जी: and who has to write in this?
बाँके जी की माँ:तुमको
बाँके जी: then who is the Boss of this book?
बाँके जी की माँ:आप
बाँके जी: then I will decide how to write in it, because I am the Boss!


बाँके जी की माँ सन्न! हम सोच रहे हैं कि शायद इसी तरह के जवाब अमेरिकी कूटनीतिज्ञ देते होंगे दुनिया के नेताओं को।

22 October 2007

एक प्रिंटर की शहादत!

देखिये यह मजेदार फिल्म, जिसमे हमें भी अभिनय करना पड़ा। फिल्म साढ़े आठ मिनट की है, विषयवस्तु हैः सप्ताहांत भर मस्तीखोरी के बाद सोमवार की मुसीबतें, बॉस द्वारा अगले रविवार को काम पर हाजिर रहने का आदेशात्मक अनुरोध, महाबोर मीटिंगस, और सबसे बढ़कर एक खलनायक भी है, जो कि है प्रिंटर।


यह फिल्म आफिस स्पेस से प्रेरित है और एक वार्षिक समारोह के लिये इसका फिल्मांकन हुआ था। खास बात यह थी कि फिल्म का संपादन, निर्देशन, अभिनय वगैरह सब कुछ आफिस के सहकर्मियों द्वारा किया गया। यहाँ तक कि बॉस का अभिनय कर रहे बॉस भी असली हैं और असल जिंदगी में वैसे कड़कमिजाज नही, जैसे इस फिल्म में दिखे। फुरसतिया जी के शब्दों में पूरी मौज ली गई है सिचुऐशन की। वैसे असल आफिस स्पेस जिसने न देखी हो , जरूर देखे।

11 September 2007

गड्डी जांदी है छलांगा मारदी!

घूमने का शौक रखने वालो के लिये सही गाड़ी है। यह नही पता कि है कित्ते की !

29 August 2007

बलम अटके बीच बजरिया !

दो देशों मे दो बिल्कुल भिन्न दृश्य हो सकते हैं जब कोई ऐन सिगनल पर अटक जाये। अब हुआ यह कि इस सोमवार को जो कि श्रावण का अंतिम सोमवार था, मंदिर जाने का हुक्म सुनाया गया। क्या है कि सारे श्रद्धालु मदंरि में घँटे घड़ियाल बजाकर भगवान शंकर के चैन में खलल डालने का पुण्य काम इसी माह ज्यादा करते हैं। इसमें अपना गृह मंत्रालय भी शामिल है।
वैसे भारत में खसकर कानपुर के परमट मंदिर में बड़ा सुंदर दृश्य होता है। एक से एक विकट भक्तो के दर्शन होते हैं। कोई करतल कर रहा है , कोई शिवलिंग से चिपटा जा रहा है, कोई मत्था रगड़ रहा है तो कोई शिवलिंग यो दबा रहा है जैसे टीवी प्रोग्राम सारेगामा में इस्माइल दरबार हिमेश रेशमिया का कँधा दबाते हैं ( एक एपिसोड में हिमेश के पास कुछ प्रतिभागियो को वापस बुलाने का चान्स था, और इस्माईल जम के उनकी मक्खन पालिश में लगे थे।)

अब इसे हमारी काहिली कह लीजिये, लापरवाही या फिर शंकर जी का क्रोध कि मँदिर से बाहर निकलने के बाद ऐन रेड सिगनल पर अपनी कार ने धरना दे दिया। कार में गैस खत्म हो गई थी। जनाब यह अमेरिका है, और हियाँ पेट्रोल को गैस कहते हैं। खैर, सिगनल जब तक रेड रहा, अपनी खैर थी, पीछे वालो को कोई फर्क नही पड़ता। पर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाती। उधर सिगनल ग्रीन हुआ नही कि पीछे वालो को कौतुहूल, आश्चर्य, झल्लाहट और न जाने क्या क्या होने लगा आगे ग्रीन सिग्नल पर हमें रास्ता रोको आंदोलन करते देख।

दिमाग ने तुरंत काम किया, और कार में मौजूद दोनो सेल फोन एकसाथ उपयोग में लाये गये। एक तो यहाँ रोडसाइड असिसटेंस यानि कि आपातकालीन सहायता तुरंत उपलब्ध हो जाती है। आपातकालीन सेवा वालो को बताया गया कि हम कैसे , कहाँ और क्यों अटके हैं। दूसरे नँबर पर श्रीमती जी ९११ डायल कर बता रही थी अपने अटकने की दास्तान। ९११ पुलिस का आपातकालीन नँबर है, उन्हें बताना जरूरी था क्यों था वह भी आपको जल्द पता चल जायेगा।

अब आगे का दृश्यः कार की हैजार्ड सिग्नल हमने चला दिया था, हैजार्ड सिग्नल कार के दोनो ब्लिंकर एक साथ चालूकर देता है, झिलमिल मोड में। इससे बाकी राहगीरों को यह अहसास हो जाता है कि इस कार में कुछ लफड़ा है। फोन पर कार को आपातकालीन सेवा देने वालो से हम उलझे थे, उन्होंने पूछा कि कृपया कार का विन नँ बताओ। यह कार का कोड है , कार की जन्म कुँडली इससे निकल आती है। हमने कहा नही बता सकते, क्योंकि सिगनल पर पीछे से आने वाले दनादन हमारे बगल से निकल रहे हैं, बाहर निकल कर विन नँबर देखा तो कोई उड़ा देगा। फिर भाई ने नाम पता पूछा , आखिरी मे कार का रँग। हम झल्ला गये कि , कया रँग का आचार डालोगे, दूसरी तरफ से फोन पर विनम्रता से बताया गया कि भईये सड़क पर हम आपकी गाड़ी चीन्हेंगे कैसे?

जब यह सुनिश्चित हो गया कि कुछ मिनटो में आपातकालीन सेवा वाले आकर हमारी कार में एकाध गैलन तेल उड़ेल देंगे ताकि हम चलने काबिल हो सकें, तब लेक्चर का दौर शुरू हुआ। लेक्चर, अरे समझे नही । वही चिरपरिचित वाक्य जो आप रोज सुनते हैं और सुनकर अनसुना कर देते हैं और फिर मेरी तरह झलते हैं कभी न कभी यानि कि "मैं न कहती थी कि गैस भरवा लो ..., पर मेरी सुनता ही कौन है... वगैरह वगैरह।"
अब इस लेक्चर को चुपचाप सुनने के अलावा कोई और चारा भी तो नही, क्योंकि बाहर निकल नही सकते, जैसे ही ग्रीन सिग्नल होता है, पीछे की गाड़िया कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ रहने के उपरांत हम पर तिर्यक दृष्तिपात करते हुये दाये , बायें से दनानदन निकल जाती हैं। अचानक शँकर जी प्रसन्न हो गये और पीछे लाल नीली बत्ती जलाते मामू यानि कि ठुल्ला यानि कि कॉप यानि कि पुलिसवाले अंकिल आ गये। यह तसल्ली कर लेने के बाद कि हमने ही कुछ देर पहले ९११ घुमाया था और यह कि हमने जुगाड़सेवा को भी दरयाफ्त कर दी है, उसने हुक्म दिया कि गड्डी नयूट्रल में डालो। भाई ने एक हाथ से धक्का दिया और गाड़ी सड़क किनारे। उसके बाद पुलिस वाले मामू , अपनी कार की फ्लैश लाइट जलाये हमारी कार के पीछे तैनात हो गये। अब यह ठहरा अमरीक्का का कायदा। जब तक हम सुरक्षित वहाँ से रवाना नही हो जाते पुलिस वाले अँकल हमारी कार के बाडीगार्ड बन कर रहेंगे।
बाय द वे, कार में लेक्चर फिर चालू हो गया था, साथ में बाँके बिहारी का आलाप भी। अब बाँके जी थोड़े बड़े हो गये है चुनाँचे हमें हैरान भी कुछ जुदा अँदाज में करते हैं अब। बाँके जी को जाहिर है, गर्मी तो सता ही रही थी साथ ही अब तक परफेक्ट रहे हमारे बाप वाले रोल की परफेक्टता पर कछु कछु संदेह हो रहा था कि बीच बजरिया हमें अटकाया क्यों और साथ ही यह लेक्चर भी कि तुम मम्मी कि क्यों नही सुनते। बाँके जी पानी की बोतलिया माँग रहे थे जो कार में थी नही, और बाँके की बहना का था यह कहना कि क्यो नही पुलिस बाले अँकल से पूछा जाये कि उनके पास एकाध पानी की बोतल एक्सट्रा है ( अगर कोक मिल जाये तो क्या कहना।

आगे क्या हुआ, पुलिस वाले मामू का सब्र छूटने लगा और बोले कि अगर तुम्हारी आपातकालीन सेवा दो मिनट में न आयी तो एक और पुलिस वाले को तुम्हारी कार और परिवार के सुरक्षा में लगाकर मुझे तुम्हें निकटस्थ गैस स्टेशन तक ले जाकर गैस दिलानी होगी। तभी, आपातकालीन सेवा वाला ट्रक आया, उसने हमारी गाड़ी में एक गैलन तेल डाला, हमने पुलिस वाले मामू को थैक्यूं बोला और चल दिये अपने रास्ते।


कथा का निष्कर्षः अब यह भी कोई समझाने की बात है कि आप लोग कृपया अपनी अपनी ब्लागराईनों यानि कि पत्नियों की बात सुनने की आदत डालें, अगर उनकी हर बात पर कान में तेल डालकर बैठेंगे तो कभी न कभी गाड़ी बिना तेल के अटक जायेगी। और हाँ ये याद रखियेगा कि हमारी अटकन जैसे अमेरिका में सुलझी वैसे हर कहीं नही सुलझती। अगर किसी के साथ भारत में ऐसा हुआ हो जरूर बताया जाये कि वहाँ पुलिस वाले मामू और रहागीरों के सहयोगात्मक रवैये के बारे में।

28 June 2007

आपने सरदारों पर कितने चुटकुले सुने हैं?


आईये आपको एक सच्चा किस्सा सुनाया जाये। हमारे एक मित्र हैं जयंत। काफी समय से भारत से बाहर रहे हैं। एक बार वे दीपावली की छुट्टी पर मित्रों से के साथ भारत भ्रमण पर गये।
यात्रा के दौरान दिल्ली दर्शन के लिये उन्होंने एक टैक्सी भाड़े पर ली। ड्राईवर एक बूढ़े सरदार जी थे। अब उम्र का तकाजा, जयंत बाबू और उनके दोस्तों ने सरदारों पर एक से बढ़कर एक चुटकुले सुनाने शुरू कर दिये। पर वे हैरान रह गये जब सरदार जी ने कोई प्रतिक्रिया जाहिर नही की।
शाम को घूमने फिरने के बाद जब इन लोगो ने भाड़े के पैसे दिये तो सरदार जी ने छुट्टे पैसों के साथ हर युवक को एक एक रूपया दिया और हिंदी मे कहा "बेटों , तुम लोग सवेरे से सरदारो पर चुटकुले सुना रहे हो। उनमें कुछ तो बहुत ही भद्दे थे। लेकिन मेरी एक इल्तजा है। तुम लोगो को मैने रूपया दिया है उसे तुम शहर में जो भी पहला सरदार भिखारी दिखे उसे दे देना।"

जयंत के पास वह रूपया आज भी है। उसको दिल्ली तो क्या पूरे हिंदुस्तान में कोई सरदार भिखारी नही मिला। हकीकत यह है कि हमें सरदारो पर चुटकुले तो बहुत मालुम हैं पर यह नही पता कि सरदार सबसे ज्यादा समृद्ध कौमों में एक है। उनकी सफलता का मूल मँत्र किसी काम को पूरे मन से करना है। एक सरदार ट्रक चला लेगा, ढाबा खोल लेगा सड़क किनारे साईकिल के पंचर जोड़ लेगा पर भीख कभी नही माँगेगा।

19 June 2007

श्राप से मुक्ति !

पेश है फिलाडेल्फिया की सबसे ऊँची इमारत की एक झलक । केबल टेलीविजन के क्षेत्र का महारथी कामकास्ट इस 975 ft ऊंची इमारत का निर्माण करा रहा है। इसमें ५७ मंजिले होंगी। १८ जून को इमारत की आखिरी शहतीर को समारोहपूर्वक छत पर पहुँचाया गया । इस अवसर पर कामकास्ट के संस्थापक, कार्यकारी अधिकारी व फिलाडेल्फिया के मेयर मौजूद थे। इस शहतीर पर अमेरिकी ध्वज और विलियम पेन की काँसे की प्रतिमा विराजमान थी। माना जाता है कि करीब एक शताब्दी तक विलियम पेन की सिटी हाल पर लगी प्रतिमा से ऊँची ईमारत किसी निर्माणकर्ता ने नही बनायी। यह पंरपरा १९८७ में ४२ मंजिला लिबर्टी प्लेस ने तोड़ी। चित्र में निर्माणाधीन कामकास्ट टावर के बगल में लिबर्टी प्लेस की जुड़वाँ इमारतें थोड़ा नीचे घड़ी वाले टॉवर पर खड़े विलियम पेन को मुँह चिढ़ा रही हैं।
ऐसी मान्यता है कि विलियम पेन को नीचा दिखाने का श्राप फिलाडेल्फिया की खेल टीमों को झेलना पढ़ रहा है जिन्होनें १९८३ से कोई बड़ा खिताब नही जीता। कामकास्ट टावर के निर्माणकर्ता का मानना है कि विलयम पेन को कामकास्ट टावर पर विराजने से इस श्राप से मुक्ति मिल जायेगी।

यहाँ यह बताना जरूरी है कि फिलाडेल्फिया शहर पेनसिलवेनिया प्रांत में है और इस प्रांत का नाम विलियम पेन के नाम पर पड़ा था। विलियम पेन ने संयुक्त राज्य की परिकल्पना सर्वप्रथम की थी । विलियम पेन के पिताश्री के कर्जदार थे इंग्लैड के राजा किंग जार्ज द्वितीय। कर्जा निपटाने को उन्होनें विलियम पेन को १६८१ में न्यू जर्सी के दक्षिण में खासी जमीन दे दी। इसे विलियम पेन नें पेनसिलवेनिया राज्य के नाम से विकसित किया।

05 June 2007

अब तक छप्पन

शीर्षक से अगर नाना पाटेकर की तस्वीर दिमाग मे आ रही हो तो उसे झटक कर कुछ मजेदार तथ्यों से अवगत हो लीजिये-

क्या आप जानते हैं कि

  1. मादा प्रजाति से भेदभाव छींक जुकाम का कारण है।
  2. भारतीय छींकने के माले में निहायत ही बदतमीज होते हैं।
  3. जुकाम , खाँसी वगैरह का सबसे ज्यादा प्रकोप अप्रैल मई में होता है।
  4. बिना आँखे बंद किए छींकना असंभव है, ऐसा न करने पर आँख की पुतलियाँ बाहर टपक कर गिर सकती है।

अब आप इन तथ्यों को बकवास करार ही करार देंगे, क्योंकि जुकाम वगैरह तो सर्दी में होता है, और फिर छींकने और शराफत का क्या मेल और उस पर तुर्रा यह कि महिलाओं से भेदभाव का जुकाम का कारण है?

दिल्ली या मुंबई जैसे किसी शहर में बैठकर ऐसे किसी भी नतीजे पर पहुँचने से पहले जरा अपनी सोच को आठ हज़ार मील खिसकाइए और उत्तरी अमेरिका के किसी भी शहर में चार पाँच साल रहकर देख लीजिए ऊपर की कोई बात दूर की कौड़ी नही लगेगी।

दरअसल उत्तरी अमेरिका में बसंत का आगमन अमूमन अप्रैल के मध्य तक होता है। यही समय होता है जब विभिन्न प्रकार के पेड़ पौधों वंशवृद्धि के लिए सक्रिय होते हैं। उनकी वंशवृद्धि पराग-कणों के प्रसार पर निर्भर होती है। अब कुछ प्रजातियाँ निर्भर करती है कीट पतंगों पर जो कहलाती है एन्ट्रोमोफिलस और कुछ प्रजातियाँ निर्भर करती हैं वायु द्वारा पराग-कणों के विस्तार पर जो कहलाती हैं एनिमोफिलस। यही एनिमोफिलस उत्तरी अमेरिका के लिए बवालेजान बन जाता है। यही नारी प्रजाति से भेदभाव का दुष्परिणाम भी है। दरअसल पराग-कण या पोलन एलर्जी का मुख्य कारण है। यह अति-सूक्ष्म पराग-कण श्वसन तंत्र में जाकर श्वास नलियों की सूजन , छींक या जुकाम का कारण बनते हैं। कुछ अन्य दुष्प्रभावों में ज्वर आना, आँखे लाल होना भी शामिल है। इनसे लाखों करोड़ों लोग प्रभावित होते हैं और और यह पोलन प्रतिवर्ष इस तरह कामकाजी आबादी को बीमार कर अर्थव्यवस्था को करोड़ों का नुकसान पहुँचाता है। (दाहिनी ओर फ़ोटो में विभिन्न प्रकार के पराग-कण)

अब मूल कारण तो पता लग गया छींक का , पर भला इसमें नारियों से भेदभाव की बात कहाँ से आई? बात नारियों की नही मादा प्रजाति की हो रही है। दरअसल शहरी इलाकों में लोगों को अपने घरेलू बगिया में पेड़ पौधे लगाने का शौक तो बहुत है पर फूल, फल का कचरा उठाना , कीट पतंगों का आना जाना पसंद नही। अब उदाहरण के लिए मान लीजिए आपके घर के सामने बेरी का झाड़ है, इतनी बेरियाँ उगती हैं पेड़ पर कि पूरा घर खाकर अघा जाए। अब पड़ोसियों को कहाँ तक बाँटे और फिर रोज रोज कौन चुने, काँटा लगने का खतरा भी है। नतीजा यह कि फालतू बेरी आपके लॉन में गिरेंगी और सड़कर गंध पैदा करेंगी और कीट पतंग, कीड़े मकोड़ों को न्योता देंगी सो अलग। ध्यान देने की बात है कि फल तो हमेशा मादा प्रजाति के पेड़ पौधे ही देते हैं। अतः सफाई पसंद शहरी आबादी अक्सर नर प्रजाति के सिर्फ फूल पत्ती वाले नर प्रजाति के पेड़ पौधे लगा डालते हैं। नतीजा पराग कणों की अधिकता और बसंत आते ही दनादन छींके।

अब बात करें अमरीकियों की शराफत और हिंदुस्तानियों की तथाकथित बदतमीज़ी की। यह भी एक मजेदार तथ्य हैं। जरा सोचिए , अपने हिंदुस्तान में जब कोई छींकता है तो लोग क्या कहते हैं? "धत्त-तेरे-की!" दरअसल बहुतों को अंधविश्वास हैं किसी शुभ काम से बाहर जाने से पहले छींकना अपशकुन की निशानी है। अमेरिका में आने के बाद आप देखेंगे कि लोग कहते हैं "गॉड ब्लेस यू" यानी भगवान आपका भला करे। दरअसल ईसाइयों मे ऐसा माना जाना है कि छींकते वक्त आपका दिल क्षण भर को रुकता है और आपकी आत्मा मुँह के रास्ते बाहर आ जाती है। आपकी आत्मा को शैतान न लपक ले, अतः गॉड ब्लेस यू कहा जाता है ताकि आत्मा वापस शरीर में लौट जाए। वहीं जर्मन और यहूदी किसी के छींकने पर कहते है "जिसनडाईट " इसका भी मतलब यही है कि भगवान आपका भला करे। पुराने समय में यूरोप में ब्योबोनिक प्लेग के फैलने पर लोगों ने जिसनडाईट कहना शुरू किया , ऐसा वे रोगी की स्वास्थ्य कामना हेतु कहते थे। आधुनिक काल में भी जर्मन स्वास्थ्य शुभकामना जिसनडाईट कहकर व्यक्त करते हैं। इस जिसनडाईट ने एक बार बात का बतंगड़ भी बनाया है। एक कंपनी है शार्पर ईमेज। इस कंपनी ने एक वायु शुद्धिकरण यंत्र यानि कि एयर प्यूरीफायर बनाया और उसके विज्ञापन में लिख दिया अपनी जिंदगी से जिसनडाईट को निकाल दो। अब इसका अर्थ तो यही निकला न कि अगर हमारा उत्पाद उपभोग करोगे तो न तो जिंदगी भर एलर्जी न होगी न आप छींकोगे न किसी को आपको जिसनडाईट कहने की जहमत उठानी पड़ेगी। पर अर्थ का अनर्थ यह निकलता है कि जिंदगी से अच्छे स्वास्थ्य की ही छुट्टी। अब अपनी संस्कृति को ठेस लगने पर बमचक मचाने का ठेका खाली हिंदुस्तानियों ने थोड़े ही ले रखा है । अमेरिका में रहने वाले जर्मन वशंजियों ने भी शार्पर ईमेज के नाको चने चबवा दिये थे।

अब सोचिए किसी के छींकने पर क्या अब भी आप धत्त-तेरे-की बोलना पसंद करेंगे। बताता चलूँ कि छींकते छींकते, छींके गिनते ही इस लेख का शीर्षक सूझा है।

नोट : लेख अभिव्यक्ति में पूर्व प्रकाशित

22 May 2007

ताज्जुब कैसा?

अनोखे लाल जी आफिस में बैठे थे कि डाक्टर झटका का फोन आ गया ।
डाक्टर झटका: यार अनोखे कमाल हो गया ।
अनोखे लाल: क्या हो गया डाक्टर?
डाक्टर झटका: यार तुम्हारी और भाभीजी की वार्षिक ख़ून की जाँच की रिपोर्ट आयी है।
अनोखे लाल:तो इसमे कमाल की क्या बात है?
डाक्टर झटका: अरे भाभीजी का ब्लड ग्रुप ही बदल गया यार ।
अनोखे लाल: यार तेरी भाभी तो रंग बदलने में माहिर है , अब ब्लड ग्रुप बदलना भी सीख गयी ।
डाक्टर झटका: अरे यार बात तो सुन पूरी पहले । अब तेरा और भाभीजी का ब्लड ग्रुप एक ही हो गया है।
अनोखे लाल: यह तो होना ही था।
डाक्टर झटका: क्या जाहिलो जैसी बाते कर रहे हो। अमाँ मेडिकल साईंस में आज तक ऐसा केस नही हुआ। अरे जाकर घर को सजा सँवार लो, अब टीवी वाले तुम दोनोको इंटरव्यू लेंगे, तुम दोनो सेलेब्रिटी बन गये बैठे ठाले। तुम्हें कोई ताज्जुब नही होता?
अनोखे लाल: काहे का ताज्जुब , अरे जो मेरी बीबी दस साल से मेरा खून पी रही है, तो क्या उसका ब्लड ग्रुप मेरे से मैच नही करेगा ?

04 May 2007

पासा पलट गया !

आज यह दिलचस्प किस्सा सुनने को मिला। एक मध्यमवर्गीय पचास वर्षीय महाशय अपनी शादी की पच्चीसवी वर्षगांठ एक पप्पू के ढाबे में मना रहे थे । अचानक एक देवी प्रकट होकर बोली , तुम दोनो आदर्श पति पत्नी की तरह रहे हो, तुम पर आज हम प्रसन्न है ,बोलो क्या वर माँगते हो ? दोनो को एक एक वर दे सकती हूँ मैं ।

पत्नी ने कहा : जिन्दगी की जद्दोजहद में हम कभी घूम फिर न सके। मैं तो वर्ड दूर करना चाहती हूँ।
देवी ने कहा तथास्तु और दो वर्ड दूर के पैकेज प्रकट हो गए ।
पति कुछ सकुचाते कुछ अकुलाते कुछ बलखाते बोला " माना कि मैंने पूरी जिन्दगी एक पत्नी व्रत किया , परिवार का भरण पोषण किया । पर अब खुद के लिए कुछ मांगने का समय है तो मैं अब पैतालिस साल की मोटी बीबी के साथ वर्ड दूर पे जाने से रहा । मुझे तो अपने से कम से कम तीस साल छोटी छप्पन छुरी बीबी के साथ वर्ड दूर पर जाना कहूँगा ।

देवी ने कहा तथास्तु

अरे आप क्या सोच रहे हो, यह भी कोई बात हुई । यार ये तो सरासर नाइंसाफ़ी हो गयी उस पतिव्रता स्त्री के साथ । पर जनाब यह क्यों भूलते हैं कि देवी भी स्त्री थी । उसके तथास्तु कहते ही पति झक्क से अस्सी का हुई गवा ।

अब यह तो भारत में ही होता है । विदेश में क्या होता है खुद देखिए ।


27 April 2007

नि:शब्द -- खामखाँ का बावेला

पिछले दिनों नि:शब्द देखी । इस फिल्म को लेकर खासा बावेला मचा था देश में । मुझे लगा कि फिल्म को दो तरह से देखा गया है लोगो के द्वारा । सतही तौर पर देखेंगे तो आप बिग बी द्वारा सींग कटा के बछड़ो में शामिल होने की कोशिश को लताड़े बिना नही रहेंगे । पर एक और भी पहलू है। इसे धवलकेशी वर्ग ने भी प्रमुखता से देखा। शायद पसंद भी किया । क्यों ? अब नवयुवा, युवा और अधेड़ावस्था को अग्रसर आयुवर्ग के पेट में मरोड़ क्यों उठ रहे हैं वृद्धों के मन में खिलती हरियाली देखकर। क्या हमें लगता हैं कि पाश्चात्य संस्कृति ने हमारी जड़ो पर हमला कर दिया? संस्कृति के प्रहरी इन वृद्धों को रामायणं शरणम गच्छाःमी के उपदेश देना न भूले होंगें। पर यह भी एक किस्म का आतंकवाद ही है।
अगर कुछ देर के लिये संस्कृति और धर्म को परे रख दें तो कुछ गंभीर प्रश्न उठाये हैं इस फिल्म ने और कुछ दृश्य बहुत साहसिक मुद्दे उठाते हैं।

जो दो दृश्य मुझे साहसिक लगे उनमें पहला था जब अमिताभ अपने मित्र द्वारा यह पूछे जाने पर कि "Are you really serious about this relation?" सपाट जवाब देते हैं कि "हाँ"। साठ वर्षीय वृद्ध के षोडषी से संबध को गलत सही ठहराने से पहले सोचिये कि सच को सच एक झटके में कहा गया है। उसे आध्यात्मिक प्रेम, वात्सल्य या फिर किसी और ढकोसले का बाना पहना कर सात आठ रील तक नही खींचा लेखक निर्देशक ने। इतनी साफगोई अभी अपने समाज में नही।

दूसरा दृश्य फिल्म के अँत मे हैं , यहाँ भी अमिताभ की स्वीकारोक्ति कि उनका षोडषी से रिश्ता यथार्थ के धरातल पर टिकने वाला नही, मुझे सराहनीय लगा। जहाँ अपनी गलती है उसे पूरी ईमानदारी से स्वीकारने के लिये बहुत हिम्मत चाहिये।

अब आता हूँ बुनियादि सवाल पर। यहाँ इस फिल्म में अमिताभ वर्चुअल विधुर हैं, पत्नी है पर जिम्मेदारियों और समय ने संबधो की उष्णता सुखा दी है। पर याद कीजिये १९८६ में बनी फिल्म अमृत। अपने ही बच्चों द्वारा बेगाने किये गये दो एकाकी जीवन जीते विधुर अमृत और विधवा कमला को। अपने दैनिक सुःख दुःख के दो पल साथ बाँतने की उनकी कोशिश को अनैतिक ठहरा सकते हैं आप। अगर नहीं तो जनाब यही डेटिंग है वृद्धों की। यहाँ अमेरिका में तो खूब चलती है। एकाकी जीवन जीने वाले वृ्द्ध सिर्फ कुछ लम्हे साथ बिताने को मित्र ढूँढ़ लेते हैं। इनका उद्देश्य हमेशा नापाक नही होता। अपने समाज में एकाकी जीवन जीते वृद्धों के पास ऐसा कोई विकल्प नही। नैतिकता संस्कृति और धर्म की बहुत ऊँची और मजबूत दीवारे हैं।