27 April 2007

नि:शब्द -- खामखाँ का बावेला

पिछले दिनों नि:शब्द देखी । इस फिल्म को लेकर खासा बावेला मचा था देश में । मुझे लगा कि फिल्म को दो तरह से देखा गया है लोगो के द्वारा । सतही तौर पर देखेंगे तो आप बिग बी द्वारा सींग कटा के बछड़ो में शामिल होने की कोशिश को लताड़े बिना नही रहेंगे । पर एक और भी पहलू है। इसे धवलकेशी वर्ग ने भी प्रमुखता से देखा। शायद पसंद भी किया । क्यों ? अब नवयुवा, युवा और अधेड़ावस्था को अग्रसर आयुवर्ग के पेट में मरोड़ क्यों उठ रहे हैं वृद्धों के मन में खिलती हरियाली देखकर। क्या हमें लगता हैं कि पाश्चात्य संस्कृति ने हमारी जड़ो पर हमला कर दिया? संस्कृति के प्रहरी इन वृद्धों को रामायणं शरणम गच्छाःमी के उपदेश देना न भूले होंगें। पर यह भी एक किस्म का आतंकवाद ही है।
अगर कुछ देर के लिये संस्कृति और धर्म को परे रख दें तो कुछ गंभीर प्रश्न उठाये हैं इस फिल्म ने और कुछ दृश्य बहुत साहसिक मुद्दे उठाते हैं।

जो दो दृश्य मुझे साहसिक लगे उनमें पहला था जब अमिताभ अपने मित्र द्वारा यह पूछे जाने पर कि "Are you really serious about this relation?" सपाट जवाब देते हैं कि "हाँ"। साठ वर्षीय वृद्ध के षोडषी से संबध को गलत सही ठहराने से पहले सोचिये कि सच को सच एक झटके में कहा गया है। उसे आध्यात्मिक प्रेम, वात्सल्य या फिर किसी और ढकोसले का बाना पहना कर सात आठ रील तक नही खींचा लेखक निर्देशक ने। इतनी साफगोई अभी अपने समाज में नही।

दूसरा दृश्य फिल्म के अँत मे हैं , यहाँ भी अमिताभ की स्वीकारोक्ति कि उनका षोडषी से रिश्ता यथार्थ के धरातल पर टिकने वाला नही, मुझे सराहनीय लगा। जहाँ अपनी गलती है उसे पूरी ईमानदारी से स्वीकारने के लिये बहुत हिम्मत चाहिये।

अब आता हूँ बुनियादि सवाल पर। यहाँ इस फिल्म में अमिताभ वर्चुअल विधुर हैं, पत्नी है पर जिम्मेदारियों और समय ने संबधो की उष्णता सुखा दी है। पर याद कीजिये १९८६ में बनी फिल्म अमृत। अपने ही बच्चों द्वारा बेगाने किये गये दो एकाकी जीवन जीते विधुर अमृत और विधवा कमला को। अपने दैनिक सुःख दुःख के दो पल साथ बाँतने की उनकी कोशिश को अनैतिक ठहरा सकते हैं आप। अगर नहीं तो जनाब यही डेटिंग है वृद्धों की। यहाँ अमेरिका में तो खूब चलती है। एकाकी जीवन जीने वाले वृ्द्ध सिर्फ कुछ लम्हे साथ बिताने को मित्र ढूँढ़ लेते हैं। इनका उद्देश्य हमेशा नापाक नही होता। अपने समाज में एकाकी जीवन जीते वृद्धों के पास ऐसा कोई विकल्प नही। नैतिकता संस्कृति और धर्म की बहुत ऊँची और मजबूत दीवारे हैं।

11 comments:

अतुल शर्मा said...

मैंने अभी तक यह फ़िल्म नहीं देखी है। आपकी समालोचना पढ़ कर ज़रूर देखूँगा किया फ़िल्म को किस तरह ट्रीट किया गया है।

अभय तिवारी said...

आपने बहुत मौलिक तरह से फ़िल्म को देखा है.. ये बहुत सराहनीय बात है.. मैंने फ़िल्म नहीं देखी है पर आपकी आलोचना आपकी सामाजिक दृष्टि का परिचय देती है.. और प्रभाव छोड़ती है..

Jitendra Chaudhary said...

बहुत दिनो बाद लौटे हो, अब डटे रहना।
आते ही बड़ी गम्भीरता वाले मुद्दे उटा लिए हो। क्या बात है, कंही तुम भी तो नि:शब्द.....

हीही...
मैने अभी तक फिल्म देखी नही है, लेकिन सचमुच कई लोगों ने तारीफ़ की है। आजकल काफी अच्छे विषयों पर फिल्में बन रही है। देखनी पड़ेगी भई।

अब रोज लिखो भैए, प्रोजेक्ट खत्म हो चुका है तुम्हारा।

अनूप शुक्ला said...

बढ़िया है। पिक्चर हमने नहीं देखी लेकिन हमें लगता है कि देखने लायक है। एक बालिका और
एक बुजुर्ग में प्यार हो जाना आम नहीं है लेकिन अस्वाभिक भी नहीं। मनुष्य का मन उमर के हिसाब से हमेशा काम नहीं करता।

राजीव said...

अतुल भाई, यह फिल्म तो मैंने नहीं देखी, शायद निकट भविष्य में भी देख पाने का समय न निकाल पाऊँ पर विषय चूँकि सामान्य भारतीय परिवेश से हटकर (बिना देखे जो अनुमान लगाया है), बनाया ही गया था सो इसे विभिन्न लोगों द्वारा भिन्न दृष्टिकोणों से देखा जाना अस्वाभाविक नहीं है। या यूँ कहें कि कैकुलटेड रिस्क ली गयी थी, विषय के असामान्य होने से शायद न सफल हो पाने की संभावना और उससे कहीं अधिक इसी कारण से चर्चित हो कर सफल होने की भी, साथ में अमिताभ जी के होने से सफलता की संभावनाएं और बलवती थीं। तो इस समीकरण के चलते इसे विवादों में बने रहना ही था। अब मैं इसकी व्यावसायिक सफलता के बारे में तो नहीँ जानता पर यह समीकरण बहुत बुद्धिमत्ता से प्रयोग किया गया था।

यह तो रही अपनी राय पर इससे भी अधिक अच्छा यह लगा कि एक लम्बे अरसे बाद आपका पुनरागमन हुआ। चिट्ठा-जगत में बहुत अपेक्षित तरक्की हुई है, आपके पिछले आलेख के बाद से तो;) कितना ही पानी बह गया दरिया में तब से, अब तो आशा है कि सक्रिय योगदान रहेगा आपका।

Mired Mirage said...

You have raised a very important issue through this post.
I too have written on the issue of remarriage/marriage of senior citizens and their needs for love and a person to share their life with on http://miredmiragemusings.blogspot.com/
Thanks.
ghughutibasuti

Shrish said...

वाह बहुत दिनों बाद लौटे, हमारे तो सक्रिय होने से पहले ही चले गए थे आप।

आपकी समीक्षा पढ़कर लगता है फिल्म देखनी पढ़ेगी। पर फिलहाल तो सीडी-ड्राइव ही खराब है।

अब नियमित लिखते रहिएगा।

Tarun said...

अभी तक जितनों ने टिप्पणी करी हैं सभी ने यही कहा कि उन्होंने अभी ये फिल्म देखी नही। हमारी टिप्पणी में थोड़ा फर्क है।

हाँ, हमने ये फिल्म देखी है और अतुल के नजरिये से पूरा इत्तफाक रखते हैं। ऐसा कुछ था नही जिसके लिये इतना हल्ला मचाया गया था। अब आ गये हो डटे रहना।

मैथिली said...

अतुल जी; शायद हम में से बहुतों नि:शब्द के पलों को जिया होगा पर स्वीकारना मुश्किल ही है. आपका लेख बहुत अच्छा है.

ratna said...

कल डी.वी.डी लगाई थी पर शुरूवात बिल्कुल बेकार लगी,देखने का मन न हुया। देख लेती तो शायद अपना तर्क रख पाती।

Udan Tashtari said...

बाकी तो जो भी हो हम इसी में खुश हैं कि कम से कम आये तो!!

अब आते रहो भाई!! ऐसा भी क्या है. :)