28 June 2007

आपने सरदारों पर कितने चुटकुले सुने हैं?


आईये आपको एक सच्चा किस्सा सुनाया जाये। हमारे एक मित्र हैं जयंत। काफी समय से भारत से बाहर रहे हैं। एक बार वे दीपावली की छुट्टी पर मित्रों से के साथ भारत भ्रमण पर गये।
यात्रा के दौरान दिल्ली दर्शन के लिये उन्होंने एक टैक्सी भाड़े पर ली। ड्राईवर एक बूढ़े सरदार जी थे। अब उम्र का तकाजा, जयंत बाबू और उनके दोस्तों ने सरदारों पर एक से बढ़कर एक चुटकुले सुनाने शुरू कर दिये। पर वे हैरान रह गये जब सरदार जी ने कोई प्रतिक्रिया जाहिर नही की।
शाम को घूमने फिरने के बाद जब इन लोगो ने भाड़े के पैसे दिये तो सरदार जी ने छुट्टे पैसों के साथ हर युवक को एक एक रूपया दिया और हिंदी मे कहा "बेटों , तुम लोग सवेरे से सरदारो पर चुटकुले सुना रहे हो। उनमें कुछ तो बहुत ही भद्दे थे। लेकिन मेरी एक इल्तजा है। तुम लोगो को मैने रूपया दिया है उसे तुम शहर में जो भी पहला सरदार भिखारी दिखे उसे दे देना।"

जयंत के पास वह रूपया आज भी है। उसको दिल्ली तो क्या पूरे हिंदुस्तान में कोई सरदार भिखारी नही मिला। हकीकत यह है कि हमें सरदारो पर चुटकुले तो बहुत मालुम हैं पर यह नही पता कि सरदार सबसे ज्यादा समृद्ध कौमों में एक है। उनकी सफलता का मूल मँत्र किसी काम को पूरे मन से करना है। एक सरदार ट्रक चला लेगा, ढाबा खोल लेगा सड़क किनारे साईकिल के पंचर जोड़ लेगा पर भीख कभी नही माँगेगा।

11 comments:

Mired Mirage said...

मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ । ये वे लोग भी हैं जिनमें से बहुत से केवल तन के कपड़ों के साथ पाकिस्तान से भारत आए थे । अपनी लगन और मेहनत से इन्होंने समाज में अपना ऊँचा स्थान बना लिया । मेरा पूरा बचपन उन्हीं के बीच बीता और मैंने कभी भी भिखारी या आलसी सिख नहीं देखा । खभी आपने कोई मैला, गंदा गुरूद्वारा देखा है ? शायद हम अपनी खीझ व ईर्ष्या कारण ही उन पर चुटकुले बनाते हैं ।
घुघूती बासूती

sunita (shanoo) said...

बिल्कुल सही लिखा है आपने ये बात बहुत पुरानी है मैने अपने पिता से सुनी थी...सरदार खुद भी अपने ऊपर चुटकलए सुनाते है..दर असल वो समझदार बहुत होते है अन्जान और बेवकूफ़ बन कर सारे काम कर लेते है...और एक बात सरदार मेहनती होते है इसीलिये भुखे भी नही मरते...

Udan Tashtari said...

सही कह रहे हैं. आज तक तो कोई नहीं दिखा.

RC Mishra said...

सरदार जी, हमने तो इसे एक तथ्य के रूप मे सालों पहले स्वीकार कर लिया है कि कोई सरदार भिखारी नही हो सकते।
आपको सरदार कहा, (बुरा मत मानियेगा) क्योंकि मेरी जानकारी मे अरोरा सिख(सरदार)होते हैं :)।

जोगलिखी संजय पटेल की said...

संता-बंता के नाम पर की जा रही ठिठोलियों की आपने तो जैसे धज्जियाँ ही उडा़ दी.सरदार वतन-परस्त लोग हैं.यदि आप सिख धर्म की बारीकी में जाएं पाएंगे के वे एक निराकार ईश्वर अनुयायी हैं जिसमे बडे़-छोटे का भेद नहीं है.आप इस बात का नोटिस लीजियेगा कि सिख समाज का सामाजिक ताना-बाना भी गै़र सिखों से बहुत प्रगतिशील हैं.हम हिन्दू ब्राह्मणों,वैश्यों राजपूत या दीगर कृषक पृष्ठ्भूमि की जातियों को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि इन समाजों में धन और हैसियत के आधार पर संबंधों का आदान-प्रदान होता है लेकिन सिख समाज में ऐसा नहीं है.और तो और आप गै़र सिख समाजों के आराधना स्थलों पर भी हैसियत और पैसे के आधार पर भेदभाव देखेंगे लेकिन कभी गुरद्वारे में जाईये वहाँ आपको ऐसा फ़र्क नहीं मिलेगा.और सबसे अच्छी और सीखने की बात जो सरदारों से ली जा सकती है ...ज़िन्दगी को जीने का अलमस्त अंदाज़...हर एक सिख भाई या बहन आपको झूमते नाचते गाते नज़र आएगा जबकि दीगर समाजों में में ऐसा नहीं है.सिख समाज भारत की शान है..उनके जीवन जीने का जज़्बा अनुकरणीय है.

Atul Arora said...

@मिश्रा जी
अरोरा सिख जरूर होते हैं पर सारे अरोरा नही। यहाँ अमेरिका में आजकल जातिसूचक नाम के हिसाब से भारत से टेलीमार्केटिंग कालर्स संबोधन करते हैं। अरोरा नाम की वजह से अक्सर सत श्री अकाल कह कर अभिवादन करते हैं लोग फोन पर। पर अपनी मुसीबत यह है कि अपना पंजाबी शब्दकोश ज्यादा समृद्ध नही है। यह लेख http://rojnamcha.blogspot.com/2005/08/blog-post_08.html शायद ज्यादा खुलासा कर सके।

अनूप शुक्ल said...

बढ़िया है। कामना है कि उनका सिक्का उनके पास ताजिन्दगी बना रहे। कुछ सिक्के और जमा हों जायें तो अच्छा।

Sagar Chand Nahar said...

वाकई आज तक कभी सरदारजी को भीख मांगते नहीं देखा!
एक कौम और भी देखी है जिसमें लोग कोई भी काम कर लेंगे पर भीख नहीं मांगेंगे। और वह कौम है सिंधी।

Nikita said...

सच ....स्कूल मे ऐसे ही किसी वाकये के दौरान एक सरदार मित्र ने कहा मुझे खुशी है सरदारो पर चुटकुलो के बहाने ही सही सब दो पल हंस तो लेते है....आठवी के हिसाब से बड़ी बात थी....उनकी खुशमीज़ाजी और ज़िंदादिली पर फक्र भी होता है, खुशी भी और हर माहौल मे खुश रहने की कला पर आश्चर्या भी....

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

प्रसंगवश यह ज़िक्र करना चाहूंगा कि हिन्दी के प्रसिद्ध कथाकार स्वयंप्रकाश की एक अद्भुत कहानी का शीर्षक ही है : 'क्या तुमने कोई सरदार भिखारी देखा है?' मैं मित्रों को सलाह देना चाहूंगा कि इस कहानी को ज़रूर

Anonymous said...

12 or 13.30 am or pm is the real story is as under:
The turkies lutere ( 0ne of them was Ahmad Shah Abdali} came to India & used to loot Indian Gold, Valubles, & Beautiful girls; till 2.30 pm. They make their way through Kabul kandhar to Gajnai & Bagdad. There they used to sell the Indian beauties at very low price.
When the looters pass through Punjab, Sikhs always tried to liberate them ( The Indian beautifull Girls.) They (Sardars) usually,attacked at midnight arround 12-12.30 and liberated the Indian prestige. They used to ask their home address & droppe them at their homes before dawn.
For this noble deed Sardars are still teased to be fool..! ???
The real brothers of all Indian communities could not dare to liberate their sisters & daughters from the clutches of Mughal Looters . BUT ONLY SARDARS PUT THEIR LIVES IN DANGER TO LIBERATE THE PRESTEAGE OF OUR COUNTRY. AND THEY DID IT NOT FOR REWARDS! BUT TO KEEP THEIR MORAL VALUES OF SIKH TREDITIONS & TEACHINGS OF GURU.