29 August 2007

बलम अटके बीच बजरिया !

दो देशों मे दो बिल्कुल भिन्न दृश्य हो सकते हैं जब कोई ऐन सिगनल पर अटक जाये। अब हुआ यह कि इस सोमवार को जो कि श्रावण का अंतिम सोमवार था, मंदिर जाने का हुक्म सुनाया गया। क्या है कि सारे श्रद्धालु मदंरि में घँटे घड़ियाल बजाकर भगवान शंकर के चैन में खलल डालने का पुण्य काम इसी माह ज्यादा करते हैं। इसमें अपना गृह मंत्रालय भी शामिल है।
वैसे भारत में खसकर कानपुर के परमट मंदिर में बड़ा सुंदर दृश्य होता है। एक से एक विकट भक्तो के दर्शन होते हैं। कोई करतल कर रहा है , कोई शिवलिंग से चिपटा जा रहा है, कोई मत्था रगड़ रहा है तो कोई शिवलिंग यो दबा रहा है जैसे टीवी प्रोग्राम सारेगामा में इस्माइल दरबार हिमेश रेशमिया का कँधा दबाते हैं ( एक एपिसोड में हिमेश के पास कुछ प्रतिभागियो को वापस बुलाने का चान्स था, और इस्माईल जम के उनकी मक्खन पालिश में लगे थे।)

अब इसे हमारी काहिली कह लीजिये, लापरवाही या फिर शंकर जी का क्रोध कि मँदिर से बाहर निकलने के बाद ऐन रेड सिगनल पर अपनी कार ने धरना दे दिया। कार में गैस खत्म हो गई थी। जनाब यह अमेरिका है, और हियाँ पेट्रोल को गैस कहते हैं। खैर, सिगनल जब तक रेड रहा, अपनी खैर थी, पीछे वालो को कोई फर्क नही पड़ता। पर बकरे की अम्मा कब तक खैर मनाती। उधर सिगनल ग्रीन हुआ नही कि पीछे वालो को कौतुहूल, आश्चर्य, झल्लाहट और न जाने क्या क्या होने लगा आगे ग्रीन सिग्नल पर हमें रास्ता रोको आंदोलन करते देख।

दिमाग ने तुरंत काम किया, और कार में मौजूद दोनो सेल फोन एकसाथ उपयोग में लाये गये। एक तो यहाँ रोडसाइड असिसटेंस यानि कि आपातकालीन सहायता तुरंत उपलब्ध हो जाती है। आपातकालीन सेवा वालो को बताया गया कि हम कैसे , कहाँ और क्यों अटके हैं। दूसरे नँबर पर श्रीमती जी ९११ डायल कर बता रही थी अपने अटकने की दास्तान। ९११ पुलिस का आपातकालीन नँबर है, उन्हें बताना जरूरी था क्यों था वह भी आपको जल्द पता चल जायेगा।

अब आगे का दृश्यः कार की हैजार्ड सिग्नल हमने चला दिया था, हैजार्ड सिग्नल कार के दोनो ब्लिंकर एक साथ चालूकर देता है, झिलमिल मोड में। इससे बाकी राहगीरों को यह अहसास हो जाता है कि इस कार में कुछ लफड़ा है। फोन पर कार को आपातकालीन सेवा देने वालो से हम उलझे थे, उन्होंने पूछा कि कृपया कार का विन नँ बताओ। यह कार का कोड है , कार की जन्म कुँडली इससे निकल आती है। हमने कहा नही बता सकते, क्योंकि सिगनल पर पीछे से आने वाले दनादन हमारे बगल से निकल रहे हैं, बाहर निकल कर विन नँबर देखा तो कोई उड़ा देगा। फिर भाई ने नाम पता पूछा , आखिरी मे कार का रँग। हम झल्ला गये कि , कया रँग का आचार डालोगे, दूसरी तरफ से फोन पर विनम्रता से बताया गया कि भईये सड़क पर हम आपकी गाड़ी चीन्हेंगे कैसे?

जब यह सुनिश्चित हो गया कि कुछ मिनटो में आपातकालीन सेवा वाले आकर हमारी कार में एकाध गैलन तेल उड़ेल देंगे ताकि हम चलने काबिल हो सकें, तब लेक्चर का दौर शुरू हुआ। लेक्चर, अरे समझे नही । वही चिरपरिचित वाक्य जो आप रोज सुनते हैं और सुनकर अनसुना कर देते हैं और फिर मेरी तरह झलते हैं कभी न कभी यानि कि "मैं न कहती थी कि गैस भरवा लो ..., पर मेरी सुनता ही कौन है... वगैरह वगैरह।"
अब इस लेक्चर को चुपचाप सुनने के अलावा कोई और चारा भी तो नही, क्योंकि बाहर निकल नही सकते, जैसे ही ग्रीन सिग्नल होता है, पीछे की गाड़िया कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ रहने के उपरांत हम पर तिर्यक दृष्तिपात करते हुये दाये , बायें से दनानदन निकल जाती हैं। अचानक शँकर जी प्रसन्न हो गये और पीछे लाल नीली बत्ती जलाते मामू यानि कि ठुल्ला यानि कि कॉप यानि कि पुलिसवाले अंकिल आ गये। यह तसल्ली कर लेने के बाद कि हमने ही कुछ देर पहले ९११ घुमाया था और यह कि हमने जुगाड़सेवा को भी दरयाफ्त कर दी है, उसने हुक्म दिया कि गड्डी नयूट्रल में डालो। भाई ने एक हाथ से धक्का दिया और गाड़ी सड़क किनारे। उसके बाद पुलिस वाले मामू , अपनी कार की फ्लैश लाइट जलाये हमारी कार के पीछे तैनात हो गये। अब यह ठहरा अमरीक्का का कायदा। जब तक हम सुरक्षित वहाँ से रवाना नही हो जाते पुलिस वाले अँकल हमारी कार के बाडीगार्ड बन कर रहेंगे।
बाय द वे, कार में लेक्चर फिर चालू हो गया था, साथ में बाँके बिहारी का आलाप भी। अब बाँके जी थोड़े बड़े हो गये है चुनाँचे हमें हैरान भी कुछ जुदा अँदाज में करते हैं अब। बाँके जी को जाहिर है, गर्मी तो सता ही रही थी साथ ही अब तक परफेक्ट रहे हमारे बाप वाले रोल की परफेक्टता पर कछु कछु संदेह हो रहा था कि बीच बजरिया हमें अटकाया क्यों और साथ ही यह लेक्चर भी कि तुम मम्मी कि क्यों नही सुनते। बाँके जी पानी की बोतलिया माँग रहे थे जो कार में थी नही, और बाँके की बहना का था यह कहना कि क्यो नही पुलिस बाले अँकल से पूछा जाये कि उनके पास एकाध पानी की बोतल एक्सट्रा है ( अगर कोक मिल जाये तो क्या कहना।

आगे क्या हुआ, पुलिस वाले मामू का सब्र छूटने लगा और बोले कि अगर तुम्हारी आपातकालीन सेवा दो मिनट में न आयी तो एक और पुलिस वाले को तुम्हारी कार और परिवार के सुरक्षा में लगाकर मुझे तुम्हें निकटस्थ गैस स्टेशन तक ले जाकर गैस दिलानी होगी। तभी, आपातकालीन सेवा वाला ट्रक आया, उसने हमारी गाड़ी में एक गैलन तेल डाला, हमने पुलिस वाले मामू को थैक्यूं बोला और चल दिये अपने रास्ते।


कथा का निष्कर्षः अब यह भी कोई समझाने की बात है कि आप लोग कृपया अपनी अपनी ब्लागराईनों यानि कि पत्नियों की बात सुनने की आदत डालें, अगर उनकी हर बात पर कान में तेल डालकर बैठेंगे तो कभी न कभी गाड़ी बिना तेल के अटक जायेगी। और हाँ ये याद रखियेगा कि हमारी अटकन जैसे अमेरिका में सुलझी वैसे हर कहीं नही सुलझती। अगर किसी के साथ भारत में ऐसा हुआ हो जरूर बताया जाये कि वहाँ पुलिस वाले मामू और रहागीरों के सहयोगात्मक रवैये के बारे में।

7 comments:

Jitendra Chaudhary said...

बहुत सही , अच्छी सिचुवेशन मे फंसे थे, बाहर निकलते तो पीछे वाली गाड़ी बाजा बजा देती, इसलिए अन्दर बैठकर भाभीजी के भजन ही सुनने मे भलाई थी।

हमारे यहाँ अगर ऐसा हो जाए तो रोडसाइड सर्विस वाले तो आएंगे ही, उसके पहले पुलिस वाला आ जाएगा और हाँ हमारे यहाँ अगर आपकी गाड़ी मे बीच सड़क पर पेट्रोल खत्म हो गया है तो आपको फाइन भी देना पड़ेगा ज्यादा नही मात्र ३० कुवैती दिनार यानि ४५०० रुपए। इसलिए जाहिर है किसी भी इन्डियन की गाड़ी मे बीच सड़क पर पेट्रोल तो खत्म होने से रहा। फिर भी कभी कभी कोई सीन दिख ही जाता है और हाँ भजन हमारे यहाँ भी चलते है, गाड़ी मे बैठने के तुरन्त बाद ही शुरु हो जाते है, एक और दिन होता है वीकली ग्रासरीज लाने वाले दिन, उसका किस्सा फिर कभी।

बहुत दिनो बाद लौटे हो, लगातार लिखो। ताकि लोगों को पता चले, कि अतुल अरोरा क्या चीज है।

परमजीत बाली said...

अतुल जी ,आप बहुत बढिया लिखते हैं ।आशा है आगे भी पढ़्ने को मिलता रहेगा।

Mired Mirage said...

अच्छा तो जरूर लिखते हो पर महिला नामक जीव से बहुत परेशान दिख रहे हो । चिन्ता मत करो। हमारी भारत भूमि में यह प्राय लुप्त हो रहा है । फिर ना रहेगा बाँस ना बजेगी बाँसुरी । सबसे अच्छी बात यह कि इनके बिना पानी आदि की चीख पुकार करने वाला प्राणी भी जन्म नहीं लेगा । :) :D
घुघूती बासूती

Atul Arora said...

घुघूती जी

महिला नामक जीव से परेशानी जैसा कुछ नही। बात सिर्फ महिला और पुरूष के दिमाग के भिन्न तरीकों से सोचने से उपजने वाले विनोद की है। दोनो अपनी जगह सही हैं और दोनो का भिन्न होना जरूरी भी है। अगर दोनो एक जैसा सोचे और एक विचार के हो जायें जो दापंत्य बिना नमक का खाना हो जायेगा।

यहाँ भी यही उकेरने की कोशिश है कि पत्नी की हर टोकाटोकी को दाँये कान से सुनकर बाँये कान से निकाल देने वाले वीरोचित व्यवहार के क्या परिणाम हो सकते हैं :) । यहाँ तो व्यंग्य है, पर साठ मील के स्पीड से चलती गाड़ी पीछै से ठोंक देती तो....

अनूप शुक्ल said...

बढ़िया है। स्वागत है फ़िर से ब्लाग जगत में। :)

अंतर्मन | Inner Voice said...

काफी दिनों बाद वापस आए हो धाँसू लेख के साथ! लिखते रहें।

रजनी भार्गव said...

आपके लिखने का अंदाज़ अच्छा लगा.पढ़ कर मज़ा आ गया.